Mere Yuvjan Mere Parijan
(0)
Author:
Ramesh Gajanan MuktibodhPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
1295
1036 (20% off)
Available
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मुक्तिबोधजी अपनी रचनाओं के प्रति कुछ लापरवाह ज़रूर रहे हों किन्तु इसके विपरीत वे लेखक-मित्रों से प्राप्त पत्रों को सहेजकर सुरक्षित रखने में काफ़ी सचेत थे। संग्रह के इन पत्रों की अवधि 28 वर्ष के अन्तराल में फैली हुई है। संग्रह का पहला पत्र 11.3.1936 को प्रभागचन्द्र शर्माजी ने तथा अन्तिम पत्र विनोद कुमार शुक्लजी ने 7.4.1964 को लिखा है। 43 लेखकों के कुल 306 पत्र संग्रहीत हैं। पुस्तक की पांडुलिपि तैयार करते समय नेमिजी के पत्रों की खोज करने पर संयोगवश वे प्राप्त हो गए। अन्यथा उनके पत्रों के बिना यह पुस्तक अपूर्ण-सी रहती। परिशिष्ट में मुक्तिबोधजी के सहपाठी अन्य मित्रों के 15 पत्र हैं। इनकी एक ऐतिहासिकता है। पुस्तक में मात्र 6 पत्र मराठी में लिखे हैं। इनमें एक पत्र प्रभाकर माचवेजी ने 27.12.1939 को पेंसिल से लिखा है जो अंग्रेज़ी से शुरू होकर मराठी में समाप्त होता है। बीच-बीच में अंग्रेज़ी-मराठी का प्रयोग खूब हुआ है। गांधीजी के आश्रम का सुन्दर चित्र खींचा है। इन पत्रों का मूल स्वर या सार संक्षेप एक-दूसरे के प्रति सौम्य आदर और अटूट स्नेह का है। आचार-विचार में मतान्तर रहते हुए भी स्नेहमय सम्बन्धों की मिठास में कोई कमी नहीं। —रमेश गजानन मुक्तिबोध पिछली शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जिस एक कवि ने मरणोत्तर मूर्धन्यता अर्जित की, वे हैं गजानन माधव मुक्तिबोध। वे एक ऐसे कवि भी रहे हैं जिनकी कविता में मित्रता का एक विराट् स्पन्दित परिसर महसूस किया जा सकता है : दरअसल उन्हें एक अनोखे अर्थ में एक बड़ा मित्र-कवि भी कहा जा सकता है। एक स्तर पर उनकी कविता मित्र-संवाद है। वह जो सुने उसको तो सम्बोधित है ही वह अपने मित्रों को भी लगातार और विशेष रूप से सम्बोधित है। हिन्दी के मुख्य अंचल के हाशिए पर रहते हुए भी मुक्तिबोध एक संवादप्रिय व्यक्ति और लेखक थे। इस अनूठे संचयन में लगभग पचास लेखकों के तीन सौ से अधिक पत्र शामिल किए गए हैं। मुक्तिबोध की 1964 में असमय और बेहद दुखद मृत्यु के 43 बरसों बाद इन पत्रों का एकत्र प्रकाश में आना एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक घटना है। इस पत्र-संग्रह से उस समय की याने आज से चालीस साल पहले की हिन्दी साहित्य-संस्कृति के बारे में कुछ ऐसा पता चलता है जो इन दिनों उस संस्कृति से, हमारा दुर्भाग्य है, कि अगर एक दम गायब नहीं तो बहुत बिरला हो गया है। इन पत्रों में कई पत्रिकाओं की व्यथा और संघर्ष की अन्तरंग कथाएँ भी छिपी हुई हैं जैसे हरिशंकर परसाई द्वारा सम्पादित ‘वसुधा’ और नरेश मेहता और श्रीकान्त वर्मा द्वारा सम्पादित ‘कृति’ की। ‘आलोचना’, ‘कल्पना’, ‘हंस’ आदि की अन्तर्कथाएँ भी कुछ पता चलती हैं। कई लेखकों की कठिनाइयों, संघर्षों, समझौतों, दिग्भ्रमों, उलझनों और चतुराइयों का आभास भी यहाँ-वहाँ मिलता है। जो भी हो, यह पत्र-संग्रह मुक्तिबोध को उस समय चल रहे साहित्यिक, वैचारिक और निजी संवाद के एक महत्त्वपूर्ण, सजग और सक्रिय केन्द्र के रूप में भी अवस्थित करता है। —अशोक वाजपेयी
Read moreAbout the Book
मुक्तिबोधजी अपनी रचनाओं के प्रति कुछ लापरवाह ज़रूर रहे हों किन्तु इसके विपरीत वे लेखक-मित्रों से प्राप्त पत्रों को सहेजकर सुरक्षित रखने में काफ़ी सचेत थे।
संग्रह के इन पत्रों की अवधि 28 वर्ष के अन्तराल में फैली हुई है। संग्रह का पहला पत्र 11.3.1936 को प्रभागचन्द्र शर्माजी ने तथा अन्तिम पत्र विनोद कुमार शुक्लजी ने 7.4.1964 को लिखा है। 43 लेखकों के कुल 306 पत्र संग्रहीत हैं। पुस्तक की पांडुलिपि तैयार करते समय नेमिजी के पत्रों की खोज करने पर संयोगवश वे प्राप्त हो गए। अन्यथा उनके पत्रों के बिना यह पुस्तक अपूर्ण-सी रहती। परिशिष्ट में मुक्तिबोधजी के सहपाठी अन्य मित्रों के 15 पत्र हैं। इनकी एक ऐतिहासिकता है। पुस्तक में मात्र 6 पत्र मराठी में लिखे हैं। इनमें एक पत्र प्रभाकर माचवेजी ने 27.12.1939 को पेंसिल से लिखा है जो अंग्रेज़ी से शुरू होकर मराठी में समाप्त होता है। बीच-बीच में अंग्रेज़ी-मराठी का प्रयोग खूब हुआ है। गांधीजी के आश्रम का सुन्दर चित्र खींचा है।
इन पत्रों का मूल स्वर या सार संक्षेप एक-दूसरे के प्रति सौम्य आदर और अटूट स्नेह का है। आचार-विचार में मतान्तर रहते हुए भी स्नेहमय सम्बन्धों की मिठास में कोई कमी नहीं।
—रमेश गजानन मुक्तिबोध
पिछली शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जिस एक कवि ने मरणोत्तर मूर्धन्यता अर्जित की, वे हैं गजानन माधव मुक्तिबोध। वे एक ऐसे कवि भी रहे हैं जिनकी कविता में मित्रता का एक विराट् स्पन्दित परिसर महसूस किया जा सकता है : दरअसल उन्हें एक अनोखे अर्थ में एक बड़ा मित्र-कवि भी कहा जा सकता है। एक स्तर पर उनकी कविता मित्र-संवाद है। वह जो सुने उसको तो सम्बोधित है ही वह अपने मित्रों को भी लगातार और विशेष रूप से सम्बोधित है। हिन्दी के मुख्य अंचल के हाशिए पर रहते हुए भी मुक्तिबोध एक संवादप्रिय व्यक्ति और लेखक थे।
इस अनूठे संचयन में लगभग पचास लेखकों के तीन सौ से अधिक पत्र शामिल किए गए हैं। मुक्तिबोध की 1964 में असमय और बेहद दुखद मृत्यु के 43 बरसों बाद इन पत्रों का एकत्र प्रकाश में आना एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक घटना है।
इस पत्र-संग्रह से उस समय की याने आज से चालीस साल पहले की हिन्दी साहित्य-संस्कृति के बारे में कुछ ऐसा पता चलता है जो इन दिनों उस संस्कृति से, हमारा दुर्भाग्य है, कि अगर एक दम गायब नहीं तो बहुत बिरला हो गया है।
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जो भी हो, यह पत्र-संग्रह मुक्तिबोध को उस समय चल रहे साहित्यिक, वैचारिक और निजी संवाद के एक महत्त्वपूर्ण, सजग और सक्रिय केन्द्र के रूप में भी अवस्थित करता है।
—अशोक वाजपेयी
Book Details
-
ISBN9788126714537
-
Pages376
-
Avg Reading Time13 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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ख्यात दलित लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि की इस पुस्तक में देश-समाज के सबसे उपेक्षित तबक़े भंगी या वाल्मीकि की ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के साथ मौजूदा वास्तविक स्थिति का सप्रमाण वर्णन करने का प्रयास किया गया है। ‘भंगी’—शब्द सुनकर ही लोगों की भौंहें तन जाती हैं। समाज की उपेक्षा और प्रताड़ना ने उनमें इस हद तक हीनताबोध भर दिया है कि वाल्मीकि समाज के उच्च शिक्षित लोग भी अपनी पहचान छुपाते फिरते हैं। दलितों में दलित यह तबक़ा आर्थिक विपन्नता की दलदल में फँसा है। पुनर्वसन की राजनीति करनेवाले इस तंत्र में इन सफ़ाई कर्मचारियों के पुनर्वसन की ज़रूरत कभी किसी ने महसूस नहीं की। उच्चवर्गीय, ब्राह्मणवादी मानसिकता और सामन्ती सोच-विचार के लोग इन्हें कोई भी सामाजिक अधिकार देने के पक्ष में नहीं हैं। इस पुस्तक का उद्देश्य ऐतिहासिक उत्पीड़न, शोषण और दमन का विश्लेषण करना है। उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का आकलन करना है, और उसके सामने खड़ी समस्याओं का विवेचन करना है। इसके लिए ऐतिहासिक विवरण ही काफ़ी नहीं हैं, वर्तमान का मूल्यांकन भी उतना ही आवश्यक है। लेखक का उद्देश्य लम्बे भीषण, नारकीय दौर में वाल्मीकि समाज की उपलब्धियों, संघर्षों की खोज कर, ऐसी मिसाल पेश करना है जो भविष्य के अन्धकार से उसे बाहर निकलने की प्रेरणा दे सके।
Finding The Raga
- Author Name:
Amit Chaudhuri
- Book Type:

- Description:
By turns essay, memoir and cultural study, Finding the Raga is Amit Chaudhuri’s singular account of his discovery of, and enduring passion for, North Indian music: an ancient, evolving tradition whose principles and practices will alter the reader’s notion of what music might – and can – be. Tracing the music’s development, Finding the Raga dwells on its most distinctive and mysterious characteristics: its extraordinary approach to time, language and silence; its embrace of confoundment, and its ethos of evocation over representation. The result is a strange gift of a book, for musicians and music lovers, and for any creative mind in search of diverse and transforming inspiration.
Charaksanhita Ke Jiva-Jantu
- Author Name:
Ramesh Bedi
- Book Type:

- Description:
चरकसंहिता व्यापक रूप से पढ़ा-पढ़ाया जाने वाला आयुर्वेद का प्रतिष्ठित ग्रन्थ है। महर्षि चरक ने इसमें अनेक प्रकार के मानव उपयोगी जीव-जन्तुओं का उल्लेख किया है। वनों, वनस्पतियों और जीव-जन्तुओं के अन्वेषक, प्राणि-विशेषज्ञ रामेश बेदी ने अपनी दीर्घकालीन अनुभव के आधार पर उनकी प्रकृति और जातियों को ध्यान में रखते हुए उन्हें निम्नलिखित वर्गों में श्रेणीबद्ध किया है—स्तनपायी की 44 जातियाँ, पक्षियों की 42 जातियाँ, सरीसृपों की 12 जातियाँ, क्षुद्र जीवों की 12 जातियाँ, कुल 110 जातियाँ। इन जीव-जन्तुओं के सम्बन्ध में दिए गए 46 रंगीन फोटो तथा 128 सादे चित्र इनके स्वरूप को भली भाँति समझने में सहायक होंगे। चरकसंहिता के जीव-जन्तुओं के स्वरूप, रहन-सहन, आहार-विहार, पारिवारिक जीवन, प्रजनन, सन्तान का पालन-पोषण, इन्सान के साथ उनका स्नेहिल व्यवहार, इन्सान के लिए उनकी उपादेयता का लेखक ने विस्तार से परिचय दिया है। लेखक के अनुभव रोचक हैं। भाषा सरल, प्रवाहमयी और आकर्षक है।
Dharm, Satta Aur Hinsa
- Author Name:
Ram Puniyani
- Book Type:

- Description:
बीते वर्षों के दौरान साम्प्रदायिकता का उभार भारतीय राजनीति में एक बड़े दावेदार के रूप में हुआ है। सो भी इतने ज़ोर-शोर से कि हमारे संवैधानिक ढाँचे के लिए ख़तरा बनता दिखाई दे रहा है। अन्तरराष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में भी उत्तरोत्तर धार्मिक शब्दावली का प्रयोग ज़्यादा दिखने लगा है। विश्व के भी मानवाधिकार आन्दोलन इसको एक बड़ी चुनौती के रूप में देख रहे हैं।
इस पुस्तक में शामिल सत्रह मौलिक आलेखों की पृष्ठभूमि यही है जिसमें अमेरिका पर सितम्बर 11 का हमला, अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ पर अमेरिकी आक्रमण, दुनिया-भर में इस्लाम का शैतानीकरण और भारत के मुम्बई व गुजरात के दंगों को ख़ास तौर पर रेखांकित किया गया है।
ये आलेख बताते हैं कि भीड़ को धर्म के नाम पर भड़काकर वंचित समूहों के भीतर किसी भी विद्रोह की सम्भावना को कैसे असम्भव कर दिया जाता है और धर्म-आधारित राजनीति किस तरह आज उदारीकरण, भूमंडलीकरण और निजीकरण के साथ गठजोड़ करके चल रही है। यह पुस्तक मुस्लिम पिछड़ेपन के मिथक, हिन्दुत्व की विभाजनकारी राजनीति को आप्रवासियों की आर्थिक मदद आदि मुद्दों पर भी तथ्याधारित विचार करती है और अब आदिवासी, दलित और स्त्रियों के साथ अन्य अल्पसंख्यक समूह कैसे उसके निशाने पर आ रहे हैं, यह भी बताती है।
‘हिन्दुत्व’ पर लगभग हर कोण से विस्तृत परिदृश्य में प्रश्नवाचक समीक्षा करनेवाली यह पुस्तक राजनीति, समाजविज्ञान, इतिहास और धर्म आदि सभी क्षेत्र के अध्येताओं के लिए पठनीय है।
1000 Computer-Internet Prashnottari
- Author Name:
Vinay Bhushan
- Book Type:

- Description:
"15 फरवरी, 1946 को ' एनियाक ' नामक कंप्यूटर दुनिया के सामने पहली बार आया था । तब से लेकर आज तक हमारे जीवन में कंप्यूटर का महत्व बढ़ता ही जा रहा है । इसके आकर्षण से क्या बच्चे, क्या बड़े-कोई नहीं बच पा रहा है । गणना करनी हो, गीत-संगीत सुनना हो, गप करना हो या फिर शोध करना हो, सबके लिए अपनी सेवाएँ देने हेतु सदैव तत्पर रहता है कंप्यूटर । इस पुस्तक में 1000 प्रश्नों के माध्यम से कंप्यूटर से संबंधित अनेक जानकारियाँ दी गई हैं । कंप्यूटर का आविष्कार, कंप्यूटर की पीढ़ियाँ, डिजिटल कंप्यूटरों का वर्गीकरण, कंप्यूटर : एक परिचय, सेकेंडरी मेमोरी, इनपुट/आउटपुट उपकरण, इंटरफेस, सॉफ्टवेअर, ऑपरेटिंग सिस्टम, डाटा संचार (कम्यूनिकेशन), कंप्यूटर नेटवर्क व्यवस्था, कंप्यूटर वाइरस एवं सुरक्षा प्रबंधन, सुपर कंप्यूटर, इंटरनेट, ई-मेल, एफ.टी.पी. और टेलनेट, कंप्यूटर और भारत तथा कंप्यूटर और कैरियर जैसे अध्यायों के द्वारा इस पुस्तक में कंप्यूटर की दुनिया की रोचक व रोमांचक यात्रा कराई गई है । यह पुस्तक कंप्यूटर के क्षेत्र से संबंध रखनेवालों, छात्रों, इंजीनियरों, शोधार्थियों तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठनेवाले प्रतियोगियों के लिए अत्यंत उपयोगी है । "
Memories Are Forever
- Author Name:
Sarika Giria
- Book Type:

- Description:
This diary is a compilation of my feelings, emotions and experiences. It is a saga of the highs and lows which I have undergone in the roller coaster called life. A bouquet of the joyous moments, when I have laughed so hard that tears have rolled down my cheeks. A bucket of tears that I have shed till there were no more to spare
Bad Man
- Author Name:
Gulshan Grover +1
- Book Type:

- Description:
"हमारे देश की राजधानी के बाहरी इलाके में पले-बढ़े गुलशन ग्रोवर 1970 के दशक में एक्टिंग में अपना कॅरियर बनाने के लिए बंबई चले आए। ऐसे समय में जब एक्टर बनने की ख्वाहिश रखनेवाले अधिकांश लोग हीरो बनना चाहते थे, तब उन्होंने अपनी पसंद से खलनायक की भूमिकाओं को चुना। उन्होंने एक के बाद एक कई यादगार किरदार निभाए जिनमें से 1989 की सुपरहिट फिल्म, ‘राम-लखन’ में उनकी भूमिका कॅरियर के लिए निर्णायक साबित हुई और बॉलीवुड के ‘बैड मैन’ के तौर पर उनकी पहचान पक्की हो गई। उस युग की कितनी ही बड़ी-बड़ी फिल्मों को उनके खास तकियाकलामों और अजीब-अजीब किस्म की पोशाकों की वजह से कामयाबी मिली जो अब बॉलीवुड के किस्से-कहानियों का हिस्सा बन चुके हैं। धीरे-धीरे उन्होंने अंतरराष्ट्रीय फिल्मों का रुख किया और वहाँ भी अपने बेहतरीन अभिनय केकारण भारत का जाना-माना चेहरा बन गए। इस आत्मकथा में, ग्रोवर अपनी कहानी बयाँ करते हैं—अपनी फिल्मों की, अपने सफर की, बैड मैन की छवि को बनाए रखने के मनोवैज्ञानिक और व्यक्तिगत नुकसान की, बॉलीवुड के खलनायकों के बीच होड़ की, ज्यादा विविधता भरे किरदार निभाने के फैसले की, और बहुत कुछ ऐसी बातों की, जो उनकेबारे में लगभग अनजानी हैं।
Udarikaran Ki Tanashahi
- Author Name:
Prem Singh
- Book Type:

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यह पुस्तक उदारीकरण-भूमंडलीकरण की परिघटना पर केन्द्रित है। इसमें उदारीकरण के नाम से प्रचारित नई आर्थिक नीतियों के देश की अर्थव्यवस्था और राजनीति पर पड़नेवाले प्रभावों का विश्लेषण किया गया है। पुस्तक की मुख्य स्थापना है : वैश्विक आर्थिक संस्थाओं—विश्व बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व व्यापार संगठन—और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के ‘डिक्टेट’ पर लादी जा रही आर्थिक ग़ुलामी का नतीजा राजनैतिक ग़ुलामी में निकलने लगा है।
इसके साथ यह भी दर्शाया गया है कि आर्थिक और राजनैतिक के साथ सांस्कृतिक और शैक्षिक क्षेत्रों पर भी उदारीकरण की तानाशाही चल रही है। इसके लिए अकेले राजनैतिक नेतृत्व को ज़िम्मेदार न मानकर, भूमंडलीकरण के समर्थक बुद्धिजीवियों और विदेशी धन लेकर एनजीओ चलानेवाले लोगों को भी ज़िम्मेदार माना गया है।
पुस्तक में भूमंडलीकरण को नवसाम्राज्यवाद का अग्रदूत मानते हुए साम्राज्यवादी सभ्यता के बरक्स वैकल्पिक सभ्यता के निर्माण की ज़रूरत पर बल दिया गया है।
पुस्तक में सारी बहस देश और दुनिया की वंचित आबादी की ज़मीन से की गई है। इस रूप में यह सरोकारधर्मी और हस्तक्षेपकारी लेखन का सशक्त उदाहरण है।
भाषा की स्पष्टता और शैली की रोचकता पुस्तक को सामान्य पाठकों के लिए पठनीय बनाती है।
Guntavnuk Darala Mahit Asayalacha Havya Ashya Sharebajarachya Yuktichya Goshti
- Author Name:
Swaminathan Annamalai +1
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शेअर बाजारात नवोदित आणि अनुभवी असलेल्यांसाठीही हे पुस्तक आहे. भारतीय शेअर बाजाराबद्दल फारशा माहीत नसलेल्या गोष्टी लेखकाने अत्यंत सोप्या, तरीही रोचक पद्धतीने सांगितलेल्या आहेत.’ - फिरोज व्ही. आर. वैश्विक सेवाप्रमुख, उपाध्यक्ष ‘एस.ए.पी.’ आणि इंडिया इन्क्ल्यूजन फाउंडेशनचे संस्थापक हे पुस्तक तुम्ही का वाचायला हवे? हे पुस्तक वाचून झाल्यानंतर तुम्हाला खालील गोष्टींबद्दल समजेल : 1. शेअर बाजार जितका वेळ चालू असतो तितका वेळ संगणकासमोर बसला नाहीत, तरीही पैसे कमावता येतात. 2. भरपूर नफा मिळवून देणारे शेअर्स पटकन ओळखून आपला फायदा करून घेता येतो. 3. शेअर बाजारात ज्या शेअर्सचे व्यवहार आता होत नाहीत अशा अ-सूचीबद्ध शेअर्सची हाताळणी. 4. भीडभाड न बाळगता ऑप्शन्स विकून टाकणे आणि नफ्याची टक्केवारी वाढवणे. 5. आयपीओबद्दल आणि आयपीओकरिता पैसे कसे उभे करावेत याबद्दल माहिती. 6. कागदी शेअर्सचे रूपांतरण इलेक्ट्रॉनिक शेअर्समध्ये (डिमटेरिअलायझेशन) कसे करावे. 7. बीईईएस (इशएड) म्हणजे काय, तो गुंतवणुकीचा जोखीममुक्त पर्याय आहे का? 8. स्टॉक स्क्रीनर्सशी ओळख. 9. शेअर बाजाराला कोणत्या प्रकारच्या घोटाळ्यांमुळे फटका बसू शकतो. 10. हिंदू अविभक्त कुटुंबाची (कणऋ) स्थापना करून आयकर वाचवता येऊ शकतो. Guntavnuk Darala Mahit Asayalacha Havya Ashya Sharebajarachya Yuktichya Goshti - Swaminathan Annamalai गुंतवणूकदाराला माहित असायलाच हव्या अश्या शेअरबाजारच्या युक्तीच्या गोष्टी - स्वामिनाथन अन्नामलाई
Yog Purankatha
- Author Name:
Dr. Madhavi Kulkarni +1
- Book Type:

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वीरभद्रासन आणि हनुमानासनापासून मत्स्येंद्रासन, कूर्मासन आणि अनंतासनापर्यंत अनेक योगासनांची लोकप्रिय नावे भारतीय पुराणकथांमधील पात्रे आणि श्रेष्ठ व्यक्तींवर आधारित आहेत. ही पौराणिक पात्रे कोण होती, त्यांच्या कथा काय आहेत आणि योगासनांशी त्यांचा काय संबंध आहे? देवदत्त पट्टनाईक यांचे अलीकडील पुस्तक ‘योग पुराणकथा' (सहलेखक - आंतरराष्ट्रीय योग साधक मॅथ्यू रॉली) हे पुस्तक हिंदू, बौद्ध आणि जैन धर्मातील पूर्वापार चालत आलेल्या लोककथा आपल्याला पुन्हा सांगते. जगाला सुपरिचित असलेल्या योगासनांच्या मागे या कथा आहेत. 64 महत्त्वाच्या आसनांमागील कथांच्या हकिकती सांगताना शाश्वत सत्ये, पुनर्जन्म, मुक्ती आणि सहवेदना या संकल्पनांवर आधारित भारतीय उपखंडातील दृष्टिकोनाकडे देवदत्त आपले लक्ष वेधतात. हजारो वर्षे या संकल्पना योगाचे संवर्धन करत आहेत. या पुस्तकात आसनांमधील शरीराच्या विशिष्ट स्थितीबद्दल विचार मांडले आहेत. असे असले तरी आसने कशी करावीत याविषयी हे पुस्तक नाही. एक ज्ञानशाखा म्हणून योगाकडे बघताना त्याचे मानसिक, आध्यात्मिक दृष्टिकोन आणि योगदान, तसेच त्यामागील तत्त्वज्ञान, परंपरा, संस्कृती समजावून घेणं आवश्यक असते. तीन हजाराहून अधिक वर्ष प्रभाव असलेल्या या कथांनी जागतिक दृष्टिकोन आकारास आणला. अशा सर्वांची ओळख हे पुस्तक करून देते. Yog Purankatha | Devdutt Pattanaik, Matthew Rulli | Translated By : Madhavi Kulkarni योग पुराणकथा | देवदत्त पट्टनायक, मॅथ्यू रॉली | अनुवाद : माधवी कुलकर्णी
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