Mere Yuvjan Mere Parijan
(0)
Author:
Ramesh Gajanan Muktibodh, Ashok VajpeyiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
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मुक्तिबोधजी अपनी रचनाओं के प्रति कुछ लापरवाह ज़रूर रहे हों किन्तु इसके विपरीत वे लेखक-मित्रों से प्राप्त पत्रों को सहेजकर सुरक्षित रखने में काफ़ी सचेत थे। संग्रह के इन पत्रों की अवधि 28 वर्ष के अन्तराल में फैली हुई है। संग्रह का पहला पत्र 11.3.1936 को प्रभागचन्द्र शर्माजी ने तथा अन्तिम पत्र विनोद कुमार शुक्लजी ने 7.4.1964 को लिखा है। 43 लेखकों के कुल 306 पत्र संग्रहीत हैं। पुस्तक की पांडुलिपि तैयार करते समय नेमिजी के पत्रों की खोज करने पर संयोगवश वे प्राप्त हो गए। अन्यथा उनके पत्रों के बिना यह पुस्तक अपूर्ण-सी रहती। परिशिष्ट में मुक्तिबोधजी के सहपाठी अन्य मित्रों के 15 पत्र हैं। इनकी एक ऐतिहासिकता है। पुस्तक में मात्र 6 पत्र मराठी में लिखे हैं। इनमें एक पत्र प्रभाकर माचवेजी ने 27.12.1939 को पेंसिल से लिखा है जो अंग्रेज़ी से शुरू होकर मराठी में समाप्त होता है। बीच-बीच में अंग्रेज़ी-मराठी का प्रयोग खूब हुआ है। गांधीजी के आश्रम का सुन्दर चित्र खींचा है। इन पत्रों का मूल स्वर या सार संक्षेप एक-दूसरे के प्रति सौम्य आदर और अटूट स्नेह का है। आचार-विचार में मतान्तर रहते हुए भी स्नेहमय सम्बन्धों की मिठास में कोई कमी नहीं। —रमेश गजानन मुक्तिबोध पिछली शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जिस एक कवि ने मरणोत्तर मूर्धन्यता अर्जित की, वे हैं गजानन माधव मुक्तिबोध। वे एक ऐसे कवि भी रहे हैं जिनकी कविता में मित्रता का एक विराट् स्पन्दित परिसर महसूस किया जा सकता है : दरअसल उन्हें एक अनोखे अर्थ में एक बड़ा मित्र-कवि भी कहा जा सकता है। एक स्तर पर उनकी कविता मित्र-संवाद है। वह जो सुने उसको तो सम्बोधित है ही वह अपने मित्रों को भी लगातार और विशेष रूप से सम्बोधित है। हिन्दी के मुख्य अंचल के हाशिए पर रहते हुए भी मुक्तिबोध एक संवादप्रिय व्यक्ति और लेखक थे। इस अनूठे संचयन में लगभग पचास लेखकों के तीन सौ से अधिक पत्र शामिल किए गए हैं। मुक्तिबोध की 1964 में असमय और बेहद दुखद मृत्यु के 43 बरसों बाद इन पत्रों का एकत्र प्रकाश में आना एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक घटना है। इस पत्र-संग्रह से उस समय की याने आज से चालीस साल पहले की हिन्दी साहित्य-संस्कृति के बारे में कुछ ऐसा पता चलता है जो इन दिनों उस संस्कृति से, हमारा दुर्भाग्य है, कि अगर एक दम गायब नहीं तो बहुत बिरला हो गया है। इन पत्रों में कई पत्रिकाओं की व्यथा और संघर्ष की अन्तरंग कथाएँ भी छिपी हुई हैं जैसे हरिशंकर परसाई द्वारा सम्पादित ‘वसुधा’ और नरेश मेहता और श्रीकान्त वर्मा द्वारा सम्पादित ‘कृति’ की। ‘आलोचना’, ‘कल्पना’, ‘हंस’ आदि की अन्तर्कथाएँ भी कुछ पता चलती हैं। कई लेखकों की कठिनाइयों, संघर्षों, समझौतों, दिग्भ्रमों, उलझनों और चतुराइयों का आभास भी यहाँ-वहाँ मिलता है। जो भी हो, यह पत्र-संग्रह मुक्तिबोध को उस समय चल रहे साहित्यिक, वैचारिक और निजी संवाद के एक महत्त्वपूर्ण, सजग और सक्रिय केन्द्र के रूप में भी अवस्थित करता है। —अशोक वाजपेयी
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मुक्तिबोधजी अपनी रचनाओं के प्रति कुछ लापरवाह ज़रूर रहे हों किन्तु इसके विपरीत वे लेखक-मित्रों से प्राप्त पत्रों को सहेजकर सुरक्षित रखने में काफ़ी सचेत थे।
संग्रह के इन पत्रों की अवधि 28 वर्ष के अन्तराल में फैली हुई है। संग्रह का पहला पत्र 11.3.1936 को प्रभागचन्द्र शर्माजी ने तथा अन्तिम पत्र विनोद कुमार शुक्लजी ने 7.4.1964 को लिखा है। 43 लेखकों के कुल 306 पत्र संग्रहीत हैं। पुस्तक की पांडुलिपि तैयार करते समय नेमिजी के पत्रों की खोज करने पर संयोगवश वे प्राप्त हो गए। अन्यथा उनके पत्रों के बिना यह पुस्तक अपूर्ण-सी रहती। परिशिष्ट में मुक्तिबोधजी के सहपाठी अन्य मित्रों के 15 पत्र हैं। इनकी एक ऐतिहासिकता है। पुस्तक में मात्र 6 पत्र मराठी में लिखे हैं। इनमें एक पत्र प्रभाकर माचवेजी ने 27.12.1939 को पेंसिल से लिखा है जो अंग्रेज़ी से शुरू होकर मराठी में समाप्त होता है। बीच-बीच में अंग्रेज़ी-मराठी का प्रयोग खूब हुआ है। गांधीजी के आश्रम का सुन्दर चित्र खींचा है।
इन पत्रों का मूल स्वर या सार संक्षेप एक-दूसरे के प्रति सौम्य आदर और अटूट स्नेह का है। आचार-विचार में मतान्तर रहते हुए भी स्नेहमय सम्बन्धों की मिठास में कोई कमी नहीं।
—रमेश गजानन मुक्तिबोध
पिछली शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जिस एक कवि ने मरणोत्तर मूर्धन्यता अर्जित की, वे हैं गजानन माधव मुक्तिबोध। वे एक ऐसे कवि भी रहे हैं जिनकी कविता में मित्रता का एक विराट् स्पन्दित परिसर महसूस किया जा सकता है : दरअसल उन्हें एक अनोखे अर्थ में एक बड़ा मित्र-कवि भी कहा जा सकता है। एक स्तर पर उनकी कविता मित्र-संवाद है। वह जो सुने उसको तो सम्बोधित है ही वह अपने मित्रों को भी लगातार और विशेष रूप से सम्बोधित है। हिन्दी के मुख्य अंचल के हाशिए पर रहते हुए भी मुक्तिबोध एक संवादप्रिय व्यक्ति और लेखक थे।
इस अनूठे संचयन में लगभग पचास लेखकों के तीन सौ से अधिक पत्र शामिल किए गए हैं। मुक्तिबोध की 1964 में असमय और बेहद दुखद मृत्यु के 43 बरसों बाद इन पत्रों का एकत्र प्रकाश में आना एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक घटना है।
इस पत्र-संग्रह से उस समय की याने आज से चालीस साल पहले की हिन्दी साहित्य-संस्कृति के बारे में कुछ ऐसा पता चलता है जो इन दिनों उस संस्कृति से, हमारा दुर्भाग्य है, कि अगर एक दम गायब नहीं तो बहुत बिरला हो गया है।
इन पत्रों में कई पत्रिकाओं की व्यथा और संघर्ष की अन्तरंग कथाएँ भी छिपी हुई हैं जैसे हरिशंकर परसाई द्वारा सम्पादित ‘वसुधा’ और नरेश मेहता और श्रीकान्त वर्मा द्वारा सम्पादित ‘कृति’ की। ‘आलोचना’, ‘कल्पना’, ‘हंस’ आदि की अन्तर्कथाएँ भी कुछ पता चलती हैं। कई लेखकों की कठिनाइयों, संघर्षों, समझौतों, दिग्भ्रमों, उलझनों और चतुराइयों का आभास भी यहाँ-वहाँ मिलता है।
जो भी हो, यह पत्र-संग्रह मुक्तिबोध को उस समय चल रहे साहित्यिक, वैचारिक और निजी संवाद के एक महत्त्वपूर्ण, सजग और सक्रिय केन्द्र के रूप में भी अवस्थित करता है।
—अशोक वाजपेयी
Book Details
-
ISBN9788126714537
-
Pages376
-
Avg Reading Time13 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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रज़ा साहब जब 2010 के अन्त में अपने जीवन का आख़िरी चरण बिताने दिल्ली आ गए तो अपने साथ पुस्तकों, कैटलॉगों व अन्य काग़ज़ात का एक बड़ा संग्रह भी लाए। इस सारी सामग्री को एकत्र और व्यवस्थित कर रज़ा अभिलेखागार बनाया जा रहा है। जो काग़ज़ात हमें मिले उनमें रज़ा के कलाकार-मित्रों के कई पत्र भी मिले हैं। इनमें मक़बूल फिदा हुसेन, फ्रांसिस न्यूटन सूज़ा, के.एच. आरा, रामकुमार, कृष्ण खन्ना और तैयब मेहता शामिल हैं। उनके पत्राचार में निजी, कलात्मक, सामाजिक आदि कई विषयों पर लिखा गया है और उन्हें पढ़ने से एक मूर्धन्य कलाकार की संघर्ष-गाथा के कई पहलू समझ में आते हैं। उस परिवेश, उन मित्रों और उनके सम्बन्धों पर भी रोशनी पड़ती है जिन्होंने रज़ा को एक व्यक्ति और कलाकार के रूप में विकसित होने में भूमिका निभाई। यह एक तरह का अनौपचारिक रिकॉर्ड भी है जो हमें बताता है कि हमारे कुछ कला-मूर्धन्य अपने समय कैसे देख-समझ रहे थे, उनकी उत्सुकताएँ और बेचैनियाँ क्या थीं और एक विकासशील सौन्दर्य-बोध कैसे आकार ले रहा था। इस पत्राचार को क्रमश: कुछ पुस्तकों में प्रकाशित करने का इरादा है। इस सीरीज़ में पहली पुस्तक रज़ा और कृष्ण खन्ना के पत्राचार की है। सौभाग्य से इन दोनों ने एक-दूसरे के पत्र सँभालकर रखे। दो मूर्धन्य कलाकारों के बीच यह पत्र-संवाद बिरला है और इसे हिन्दी अनुवाद में प्रकाशित करते हमें प्रसन्नता है। —अशोक वाजपेयी
Khul Gaya Hai Dwar Ek
- Author Name:
Ashok Vajpeyi +1
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अशोक वाजपेयी को पहले ‘देह और गेह का कवि’ कहा गया था। यह कहना निराधार नहीं था, लेकिन शनै:-शनै: उनकी दैहिक और गैहिक भावना का ऐसा विस्तार हुआ कि उसमें प्रकृति ही नहीं, सम्पूर्ण पृथ्वी सिमट आई। वे नई कविता के आख़िरी दौर के कवि हैं। उसके बाद से हिन्दी कविता में कई प्रकार के बदलाव हुए, पर उन्होंने अपना मार्ग कभी नहीं बदला। कारण यह कि उनकी कविता में स्वयं ऐसे आयाम प्रकट होते गए कि उन्हें कभी उसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ी। उनकी काव्य-यात्रा एक लम्बी काव्य-यात्रा है, जिसमें कवि ने कई मंज़िलें पार की हैं। आज उनकी कविता के बारे में दिनकर के शब्दों में यही कहा जा सकता है कि ‘वर्षा का मौसम गया, बाढ़ भी साथ गई, जो बचा आज वह स्वच्छ नीर का सोता है...।’
अशोक जी हमेशा ऊँचे सरकारी पदों पर रहे, लेकिन यह प्रीतिकर आश्चर्य की बात है कि उनकी कविता का नायक अभिजन न होकर साधारण जन है। इस साधारण जन को वे नज़दीक से जानते हैं और उसकी समस्त पीड़ाओं के साथ उसकी इतिहास-निर्मात्री शक्ति से भी परिचित हैं। स्वभावत: उनमें नक़ली क्रान्ति के लिए कोई बेचैनी नहीं है, जैसी कथित प्रगतिशीलों और जनवादियों में देखी जाती है। उनकी तरह वे समाज को साहित्य के ऊपर नहीं रखते, बल्कि साहित्य के अनुशासन में ही समाज और इसके अन्य पक्षों को स्वीकार करते हैं। साधारण जन का शत्रु कौन है? यह कवि से छिपा नहीं है, इसलिए बिना कविता को छोड़े वह उससे उसे आगाह करता है। आशा है, यह चयन हिन्दी के बृहत्तर पाठक-समुदाय को पसन्द आएगा, क्योंकि यह उसी को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। यह उसे समकालीन हिन्दी कविता का एक ऐसा दृश्य भी दिखलाएगा, जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलता।
Thodi Si Jagah
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
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अशोक वाजपेयी हिन्दी के समकालीन कवियों में उन थोड़े-से लोगों में से हैं जिन्होंने अपने समय में प्रेम की सघनता, उत्कृष्टता और महिमा को लगातार अपनी कविता के केन्द्र में बनाए रखा है। एक ऐसे समय में जब रति और शृंगार के पारम्परिक सौन्दर्य-मूल्य कविता के दृश्य से ग़ायब ही हो गए हैं, अशोक वाजपेयी ने उन्हीं को अपनी कविता में सबसे अधिक जगह दी है। उनकी प्रेम कविता में जो ऐन्द्रिकता है, वह परम्परा को पुनराविष्कृत करती है और साथ ही उसे समकालीन आँच और लपक भी देती है। प्रेम की अनेक सूक्ष्मताएँ खड़ी बोली में इन कविताओं के माध्यम से पहली बार कविता के परिसर में प्रवेश करती हैं।
प्रेम में, अशोक वाजपेयी के कविता-संसार में भरा-पूरापन है, रसिकता और प्रयास है। उसमें जीवन से भागकर कहीं और नहीं, बल्कि इसी अच्छी-बुरी दुनिया में अपने लिए थोड़ी-सी जगह पाने की दुर्लभ ज़िद है।
कविता में प्रेम करना या कि प्रेम की कविता करना अशोक वाजपेयी की अदम्य जिजीविषा का ही प्रमाण है। यह स्पन्दन और ऊष्मा की पुस्तक है : प्रेम के स्पन्दन, जीवन और भाषा की ऊष्मा की पुस्तक।
Kuchh Rafoo Kuchh Thigare
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
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“यह तो अच्छा हुआ कि कविता मेरे साथ है/जो यह भरोसा दिलाती है कि/कोई भी पथ कभी समाप्त नहीं होता/और सब कुछ गँवा देने के बाद भी/कुछ बचा रहता है।”
अशोक वाजपेयी की अथक और अदम्य जिजीविषा इन कविताओं में उदास विवेक और आत्मस्वीकार के बीच गहरे संयम के साथ नाजुक ढंग से सन्तुलित है। कुल एक वर्ष की अवधि में लिखी गई ये कविताएँ कई बार उदासी से घिरी होने के बावजूद अपनी पारदर्शिता में उजली और निर्मल हैं। सारे ध्वंस और नाश के विरुद्ध कविता को अपने लिए एकमात्र बचाव माननेवाले इस कवि की भाषा, सयानापन और शिल्प पर सहज अधिकार एक बार फिर सत्यापित करते हैं कि हमारे समय में कविता मनुष्य की हालत, उसकी उलझनों और जीवट का सूक्ष्म बखान करती है और ऐसा करते हुए हमें सचाई में ऐन्द्रिय शिरकत का अवसर देती है।
अशोक वाजपेयी की आवाज़, हमेशा की तरह, निजी और समाजधर्मी एक साथ है और वे लगातार अपने को वेध्य और बेबाक बनाए हुए हैं। उनकी कविता के केन्द्र में साधारण जीवन की आभा और छवियाँ हैं जिन्हें उनकी भाषा अनूठे शब्दालोक और समयातीत आशयों से उद्दीप्त करती है।
Shesh-Ashesh
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Gajanan Madhav Muktibodh +2
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मुक्तिबोध स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता और साहित्य-चिन्तन का वह स्तम्भ हैं जो पिछले कई दशकों से हमारे आदर्श भी बने रहे हैं और चुनौती भी। उन्होंने जो रचा, वह हमें पुनः-पुनः पाठ के लिए आमंत्रित करता है और रचने की प्रक्रिया को लेकर जो कहा, वह एक निर्देशिका की तरह हमारे अन्तःस्तल में रच-बस गया है।
‘शेष-अशेष’ मुक्तिबोध की उन विविध रचनाओं का संकलन है जो उनकी रचनावली के प्रकाशन के उपरान्त प्राप्त हुई हैं। इन रचनाओं में कविता, कहानी, निबन्ध, समीक्षा, पत्र और सिने-समीक्षा तक शामिल हैं। मुक्तिबोध उन लेखकों में नहीं थे जो अपनी लिखी चिन्दियों को भी सँभालकर रखते हैं, वे अपनी रचनाओं को लेकर घोर संकोच और निस्पृहता के लिए जाने जाते हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाओं की तलाश एक मुश्किल काम है।
इस संकलन में शामिल मुक्तिबोध की विविधवर्णी रचनाएँ जिनमें कविता और समीक्षा से लेकर फ़िल्म रिव्यू तक शामिल हैं, उनकी रचनात्मकता के कुछ और आयामों को सामने लाती हैं, और हमें अपने उस प्रिय मनुष्य के कुछ और भीतर ले जाती हैं।
Punarvasu
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
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जब भी हम अनुवाद, विशेषकर कविता का अनुवाद पढ़ते हैं, हम संशय में होते हैं। यह संशय तब तो और भी ज़्यादा होता है जब वह कविता, मसलन, फ़्रेंच या स्वीडिश से अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ी से हिन्दी जैसे तिर्यक रास्ते से भटकती आती हम तक पहुँचती है। “क्या वह ठीक वही कविता रह पाती है, जैसी वह मूल में है?” —यह संशय अनुवाद से ज़्यादा, अनुवाद की ओट में वस्तुतः कविता को लेकर संशय है जो इस विश्वास से जनमता है कि कविता का एक ‘स्थिर’, ‘मूल’ रूप होता है जो उस भाषा, शैली और ढाँचे में सुरक्षित होता है जिसमें वह लिखी गई है; और यह विश्वास भी कि जब हम उसे उसके ‘मूल रूप’ में पढ़ रहे होते हैं तब हम उसे यथा—अर्थतः ग्रहण कर रहे होते हैं। प्रस्तुत चयन हमें इस अन्धविश्वास से मुक्त करता हुआ उस विस्मयकारी प्रक्रिया के क़रीब ले जाता है जिसमें कविता भाषा, शैली और संरचना का निरन्तर उत्सर्जन करती हुई उस ‘एजेंसी’ की पकड़ से बाहर जाती रहती है जिसे हम ‘कवि’ या ‘रचयिता’ या ‘मूल’ कहते हैं।
इस चयन को पढ़ते हुए हम अनुभव करते हैं कि कविता निरन्तर रूपान्तरित और परिशोधित होती ऊर्जा है (जैसाकि इस चयन में शामिल स्वीडिश कवि टोमास ट्रान्सट्रोमर भी मानते हैं) और वह तभी तक ऊर्जा है जब तक वह रूपान्तरण और परिशोधन की प्रक्रिया में है। वह या तो मूल का निषेध है या वे तमाम पाठक उसका मूल हैं जो उसे अपनी सृजनात्मकता के भीतर से परिशोधित, रूपान्तरित और मुक्त होने देते हैं। वह किसी विशिष्ट देश, विशिष्ट भाषा या विशिष्ट कवि का सृजन नहीं, पाठक का सृजन है और इसी अर्थ में वह देश, भाषा और कवि का सृजन है। इस चयन में शामिल सारे अनुवादक ऐसे ही पाठक हैं और इसीलिए इन अनुवादों को पढ़ना, अपने भीतर निहित पाठक को उद्दीप्त कर उसे कविता के ‘होने’ की सतत प्रक्रिया में हिस्सेदार बनाना है; उसे उसकी ‘कर्मवाचक’ स्थिति से मुक्त कर कर्त्तृवाचक स्थिति में ले जाना है और अन्ततः उसे यह बोध कराना है कि कम से कम कविता की दुनिया में कर्तृत्त्व, स्वत्त्व का साधन नहीं है, वह स्वत्त्व का निषेध है।
कहना न होगा कि पाठक को उसकी इस गम्भीर और सृजनात्मक स्थिति का बोध करानेवाली यह एक अद्वितीय पुस्तक है। मनुष्यों के छह महाद्वीपों के बीच छुपा हुआ एक सातवाँ महाद्वीप है। जहाँ और जब भी कोई कविता लिखी (और पढ़ी) जाती है, यह महाद्वीप मूर्त और स्पन्दित होता है। इस महाद्वीप पर अस्तित्व का पुनर्वास होता है। हम इस महाद्वीप को ‘पुनर्वसु’ कहकर पुकार सकते हैं।
Philhal
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
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पचास साल पहले प्रकाशित यह पुस्तक ऐसे समीक्षात्मक लेखों का संग्रह है, जिससे हिन्दी आलोचना में एक ‘रेडिकल चेंज’ आया, और आज भी इसका महत्त्व अपनी उल्लेखनीय भूमिका में बना हुआ है।
पुस्तक में शामिल अपने लेखों के बारे में अशोक वाजपेयी ने ख़ुद ‘दृश्यालेख’ में स्पष्ट किया है कि ये लेख ‘जब-तब लिखे गए हैं और इसलिए इनमें बहुत स्पष्ट तारतम्य नहीं है’। पर अपनी समग्रता में ये ‘उन खोजों और आग्रहों को’ उजागर करते हैं जो समकालीन कविता के मूल में हैं। युवा कविता के घटाटोप से बौखलाकर जब सिद्ध और प्रतिष्ठित समीक्षक आँख मींच बैठे हों, तब उस ढेर में से सही और सार्थक कविता की पहचान करने-कराने का अशोक वाजपेयी का यह प्रयत्न कल भी आत्यन्तिक महत्त्व रखता था, आज भी रखता है।
इस पुस्तक में अपने समय के युवा-लेखन की गड़बड़ियों और उनके स्रोतों को स्पष्ट करते हुए अशोक वाजपेयी अच्छे कवियों की रचना की मूल्यवत्ता को रेखांकित करने में सफल हुए हैं। वैज्ञानिक समझ और बेलाग सफ़ाई से उन्होंने काव्य-सृजन को परखा है और मुक्तिबोध, कमलेश, धूमिल आदि समकालीन कवियों की कविता की विशेषताओं को सही रोशनी में रखा है। अपने लेखन से उन्होंने समकालीन आलोचना को जो नई समझ और उसके लिए जो ज़रूरी मुहावरा दिया, उसके बल पर हम कह सकते हैं कि इस पुस्तक के प्रकाशन का हिन्दी समीक्षा पर ही नहीं, हिन्दी कविता पर भी गहरा प्रभाव पड़ा।
निस्सन्देह, आलोचना साहित्य में एक बहुमूल्य और विरल कृति का नाम है ‘फ़िलहाल’।
Pao Bhar Jeere Main Brahmbhoj
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
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समकालीन संस्कृति और हिन्दी साहित्य के पिछले दशकों के दृश्य में जो कुछ व्यक्ति बेहद सक्रिय और उतने ही विवादास्पद रहे हैं, उनमें अशोक वाजपेयी निश्चय ही एक हैं। जहाँ उनके जीवट, साहस, बेबाकी और अदम्यता की व्यापक सराहना होती रही है वहीं उन्हें समाज-विरोधी, नीचट कलावादी, अभिजात, आत्मकेन्द्रित आदि भी कहा जाता रहा है। अशोक वाजपेयी की कविता आज लिखी जा रही अधिकांश कविता का प्रतिपक्ष है, अपनी ज़िद पर अड़ी कविता। उनकी आलोचना का वितान बहुत व्यापक है : वे कविता, विश्व कविता, साहित्य-चिन्तन से लेकर शास्त्रीय और समकालीन कलाओं का साधिकार विश्लेषण और आकलन करने में समर्थ रहे हैं। युवा प्रतिभा का, फिर वह शास्त्रीय संगीत या नृत्य हो, ललित कलाएँ हों या रंगमंच या लोककलाएँ, अशोक वाजपेयी जैसा उन्नायक बिरला ही होगा लेकिन उन पर हिन्दी की युवतम प्रतिभा को दुर्लक्ष्य करने का आरोप लगता रहता है। अपने समय की सभी प्रमुख बहसों में उनकी हिस्सेदारी रही है और वे इस समय हिन्दी के सबसे प्रखर और विचारोत्तेजक वक्ता माने जाते हैं। उन पर कभी भी कटूक्ति करने से न चूकने का इल्ज़ाम लगता रहता है। हमेशा हँसमुख, मददगार अशोक वाजपेयी अपने गुट के अथक समर्थक माने जाते हैं। बेहद यारबाश होने के बावजूद अशोक वाजपेयी के व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष यह है कि वे ऐकान्तिक अवसाद से घिरे रहते हैं। पिछली अधसदी में हिन्दी अंचल में सबसे अधिक संस्कृति सम्बन्धी संस्थाओं के निर्माता और उनमें से अनेक के सफल संचालक अशोक वाजपेयी को सांस्कृतिक ज़ार कहा जाता रहा है।
यह पुस्तक अशोक वाजपेयी के अन्तरंग का आत्मीय, सटीक और मुखर दस्तावेज़ है। इसके गद्य में उनकी कविता की गरमाहट और आलोचना की तीक्ष्णता का ऐसा संयोग है जो उन्हें हमारे समय का समर्थ और साक्षी गद्यकार भी सिद्ध करता है।
Pratinidhi Kavitayen : Bharatbhushan Agrawal
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Bharatbhushan Agrawal +1
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भारतभूषण अग्रवाल की कविता बिना किसी नाटकीयता, बिना कोई चीख़-पुकार मचाए ईमानदारी से अपनी सच्चाई को देखती-परखती कविता है। उसमें रूमानी आवेग से लेकर मुक्त हास्य, विद्रूप से लेकर अनुराग और कोमलता की कई छवियाँ, सभी शामिल हैं। कामकाजी मध्यवर्ग की विडम्बनाएँ, संवेदनशील व्यक्ति के ऊहापोह, शहराती ज़िन्दगी के रोज़मर्रा के सुख-दु:ख आदि को भारत जी ईमानदारी और पारदर्शिता से अपनी कविता में जगह देते हैं। उनमें अपनी विशिष्टता का रत्ती-भर भी आग्रह नहीं है। बल्कि अगर आग्रह है तो अपनी सीधी-सादी, सरल जान पड़ती लेकिन दरअसल जटिल साधारणता का। यह आग्रह उनकी आवाज़ को और सघन तथा उत्कट बनाता है।
उनकी कविता अपने को महत्त्वाकांक्षा के किसी विराट लोक में विलीन नहीं करती। वह अपनी उत्सुकताओं और बेचैनियों को जतन से नबेरती है। वह कविता में विकल्प इतना नहीं खोजती जितना सच्चाई की ही कई अन्यथा अलक्षित रह जानेवाली परतों को। कविता में कवि का यह अहसास बराबर मौजूद है कि सच्चाई और ज़िन्दगी कविता से कहीं बड़ी और व्यापक हैं और वे कविता में अँट नहीं पा रही हैं।
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