Manch Pravesh

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Author:

Feisal Alkazi

Language:

Hindi

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अलक़ाज़ी और पद्मसी परिवारों की इस कहानी को समकालीन रंगमंच के संक्षिप्त इतिहास की तरह पढ़ा जा सकता है, लेकिन फ़ैसल अलक़ाज़ी इसमें कुछ ऐसे अफ़साने जोड़ते हैं जिन्हें कोई ‘इनसाइडर’ ही जान सकता है। मसलन—उनकी दादी, ‘कुलसुम टेरेस’ की कुलसुमबाई ने 20 वर्ष तक अपने पति से एक लफ़्ज़ भी क्यों नहीं बोला, एलेक और पर्ल पद्मसी की मुलाक़ात कैसे हुई, और फिर क्या हुआ; किस तरह अलक़ाज़ी और निस्सिम इज़ेकियल लंदन के एक फ़्लैट में एक ही बिस्तर साझा करने लगे; और वह नायाब रिश्ता जो इब्राहिम साहब और रोशन अलक़ाज़ी के बीच था और उनके जीवन की ‘दूसरी औरत’ भी। मुम्बई में शुरू हुए अंग्रेज़ी थिएटर को इब्राहिम अलक़ाज़ी उसे राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय ख्याति तक लेकर गए। इसमें 1950 के दशक में इडिपस रेक्स, मर्डर इन कैथेड्रल और मैकबेथ से लेकर 60 और 70 के दशक में आषाढ़ का एक दिन, अंधा युग और तुग़लक़ जैसे सौ से ज्यादा नाटकों का निर्देशन और अभिनय शामिल था। उनकी जीवन और कर्म-संगिनी, जिनका ताल्लुक़ पद्मसी परिवार से था, उनकी सभी प्रस्तुतियों की मुख्य वेश-भूषा परिकल्पक रहीं। पचास से ज़्यादा दुर्लभ तस्वीरों से सुसज्जित ‘मंच प्रवेश भारतीय रंगमंच की अनूठी दास्तान है’ जिसे इस तरह से पहले कभी नहीं लिखा गया। रंगप्रेमी इसे सँजो कर रखना चाहेंगे और अच्छी कहानी पसन्द करने वाले पाठक भी।

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ISBN
9789360862879
Pages
256
Avg Reading Time
9 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

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About the Book

अलक़ाज़ी और पद्मसी परिवारों की इस कहानी को समकालीन रंगमंच के संक्षिप्त इतिहास की तरह पढ़ा जा सकता है, लेकिन फ़ैसल अलक़ाज़ी इसमें कुछ ऐसे अफ़साने जोड़ते हैं जिन्हें कोई ‘इनसाइडर’ ही जान सकता है। मसलन—उनकी दादी, ‘कुलसुम टेरेस’ की कुलसुमबाई ने 20 वर्ष तक अपने पति से एक लफ़्ज़ भी क्यों नहीं बोला, एलेक और पर्ल पद्मसी की मुलाक़ात कैसे हुई, और फिर क्या हुआ; किस तरह अलक़ाज़ी और निस्सिम इज़ेकियल लंदन के एक फ़्लैट में एक ही बिस्तर साझा करने लगे; और वह नायाब रिश्ता जो इब्राहिम साहब और रोशन अलक़ाज़ी के बीच था और उनके जीवन की ‘दूसरी औरत’ भी।

मुम्बई में शुरू हुए अंग्रेज़ी थिएटर को इब्राहिम अलक़ाज़ी उसे राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय ख्याति तक लेकर गए। इसमें 1950 के दशक में इडिपस रेक्स, मर्डर इन कैथेड्रल और मैकबेथ से लेकर 60 और 70 के दशक में आषाढ़ का एक दिन, अंधा युग और तुग़लक़ जैसे सौ से ज्यादा नाटकों का निर्देशन और अभिनय शामिल था। उनकी जीवन और कर्म-संगिनी, जिनका ताल्लुक़ पद्मसी परिवार से था, उनकी सभी प्रस्तुतियों की मुख्य वेश-भूषा परिकल्पक रहीं।

पचास से ज़्यादा दुर्लभ तस्वीरों से सुसज्जित ‘मंच प्रवेश भारतीय रंगमंच की अनूठी दास्तान है’ जिसे इस तरह से पहले कभी नहीं लिखा गया। रंगप्रेमी इसे सँजो कर रखना चाहेंगे और अच्छी कहानी पसन्द करने वाले पाठक भी।

Book Details

  • ISBN
    9789360862879
  • Pages
    256
  • Avg Reading Time
    9 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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