Rajya Sarkar Aur Jansampark
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लोकतान्त्रिक मूल्यों की महत्ता को देखते हुए ‘लोक’ और ‘जन’ अभिव्यक्तियाँ किसी भी संगठन या गतिविधि को सम्मान दिलाने के लिए कारगर विशेषण या उपसर्ग बन जाती हैं। कई बार ये अभिव्यक्तियाँ सम्मान का स्थान प्राप्त करने का औजार मात्र बनकर रह जाती हैं। उसकी मूल भावना का नितान्त अभाव सम्बन्धित संगठन या गतिविधि में होता है। भारतीय संविधान में सरकार के लिए जो भूमिका निर्धारित की गई है उसके चलते, वैश्वीकरण की आँधी के बावजूद सरकार आनेवाले बहुत समय तक समाज की सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण संस्था के रूप में स्थापित रहेगी। सच कहा जाए तो सरकार की भूमिका का दायरा बढ़ता ही जा रहा है, बहुत बार सही ढंग से तथा कई बार प्रश्नास्पद तरीके से यह प्रवृत्ति भारत की तरह अन्य लोकतान्त्रिक विकासशील देशों में भी जारी रहेगी, तेज भी हो सकती है, पर घटेगी नहीं। समाज पर बाजार के हावी होने की कोशिश के बावजूद राज्य की महत्ता के अक्षुण्ण रहने के परिप्रेक्ष्य में समाचार के क्षेत्र में सरकार के सम्पर्क में आनेवाले, सरकार से जूझनेवाले और सरकार में सेवा करनेवाले सभी प्रकार के लोगों के लिए निश्चय ही विशेषज्ञ लेखकों द्वारा तैयार यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी।
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लोकतान्त्रिक मूल्यों की महत्ता को देखते हुए ‘लोक’ और ‘जन’ अभिव्यक्तियाँ किसी भी संगठन या गतिविधि को सम्मान दिलाने के लिए कारगर विशेषण या उपसर्ग बन जाती हैं। कई बार ये अभिव्यक्तियाँ सम्मान का स्थान प्राप्त करने का औजार मात्र बनकर रह जाती हैं। उसकी मूल भावना का नितान्त अभाव सम्बन्धित संगठन या गतिविधि में होता है। भारतीय संविधान में सरकार के लिए जो भूमिका निर्धारित की गई है उसके चलते, वैश्वीकरण की आँधी के बावजूद सरकार आनेवाले बहुत समय तक समाज की सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण संस्था के रूप में स्थापित रहेगी। सच कहा जाए तो सरकार की भूमिका का दायरा बढ़ता ही जा रहा है, बहुत बार सही ढंग से तथा कई बार प्रश्नास्पद तरीके से यह प्रवृत्ति भारत की तरह अन्य लोकतान्त्रिक विकासशील देशों में भी जारी रहेगी, तेज भी हो सकती है, पर घटेगी नहीं। समाज पर बाजार के हावी होने की कोशिश के बावजूद राज्य की महत्ता के अक्षुण्ण रहने के परिप्रेक्ष्य में समाचार के क्षेत्र में सरकार के सम्पर्क में आनेवाले, सरकार से जूझनेवाले और सरकार में सेवा करनेवाले सभी प्रकार के लोगों के लिए निश्चय ही विशेषज्ञ लेखकों द्वारा तैयार यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी।
Book Details
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ISBN9788171198474
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Pages167
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Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: हर दिन एक कहानी मुश्किलों के बिन जिंदगानी! यह वर्ष 2020 की बात है, जब बच्चे घरों में कैद होकर रह गए; क्योंकि नोवेल कोरोना वायरस भारत में आ धमका है। पूरे देश में लॉकडाउन घोषित हो चुका है, और इस बढ़ते संकट के बीच अज्जा और अज्जी अपने पोते-पोतियों और कमलु अज्जी का शिग्गाँव स्थित अपने घर में स्वागत करते हैं। मास्क सिलने से लेकर, घर के काम में हाथ बँटाने और श्रमिकों के लिए खाना तैयार करने से लेकर कालातीत कहानियों में खो जाने तक बच्चों के लिए लॉकडाउन का समय यादगार बन जाता है, जब वे देवी-देवताओं, राजाओं, राजकुमारों, साँपों, जादुई फलियों, चोरों, साम्राज्यों और महलों की दिलचस्प दुनिया में कदम रखते हैं। दादा-दादी की सुनाई अनगिनत कहानियाँ उनके जीवन में खुशियाँ भर देती हैं, जिनसे बच्चे दुनियादारी को लेकर पहले से कहीं अधिक दयालु और समझदार हो जाते हैं। भारत की लोकप्रिय लेखिका सुधा मूर्ति आपके लिए नैतिक गुणों से भरी ‘दादा-दादी की कहानियों का पिटारा’ का ऐसा संग्रह लेकर आई हैं, जिसे उन्होंने लॉकडाउन के दौरान बड़े प्यार से सँजोया है, ताकि नन्हे-मुन्ने पाठकों को सुकून मिले और वे दूसरों की देखरेख तथा उनके साथ चीजों को साझा करने के चमत्कार का अनुभव प्राप्त कर सकें। उनकी चिर-परिचित शैली में बेहतरीन ढंग से बुनी गई पुस्तक को आप पढ़ने लगें तो उसे छोड़ने का मन नहीं करेगा और यह हर बच्चे के बुकशेल्फ के लिए एक आवश्यकता तो है ही!
Democrats and Dissenters
- Author Name:
Ramchandra Guha
- Rating:
- Book Type:

- Description: A major new collection of essays by Ramachandra Guha, Democrats and Dissenters is a work of rigorous scholarship on topics of compelling contemporary interest, written with elegance and wit. The book covers a wide range of themes: from the varying national projects of India’s neighbours to political debates within India itself, from the responsibilities of writers to the complex relationship between democracy and violence. It has essays critically assessing the work of Amartya Sen and Eric Hobsbawm, commentaries on the tragic predicament of tribals in India–who are, as Guha demonstrates, far worse off than Dalits or Muslims, yet get a fraction of the attention–and on the peculiar absence of a tradition of conservative intellectuals in India. Each essay takes up an important topic or an influential intellectual, as a window to explore major political and cultural debates in India and the world. Democrats and Dissenters is a book that is widely read, and even more widely discussed.
Prayojanmulak Hindi : Prayog Aur Prakriti
- Author Name:
Manoj Pandey
- Book Type:

- Description: हिन्दी को राजभाषा बनाने के पीछे संकल्पना यह थी कि हिन्दी देश में संप्रेषण और संवाद की मुख्य भाषा बने, राजकाज का प्रधान माध्यम बने और महज कार्यालयीन व्यवहार तक सीमित न रहे, बल्कि देशवासियों के बीच संपर्क का सेतु बने। संवैधानिक स्वीकृति मिलने के पहले से ही हिन्दी इस दिशा में प्रयत्नशील थी, परंतु आजादी के बाद निश्चित रूप से उसके कदम तेजी से आगे बढ़े। सरकारी प्रयास भी सहायक बने। विगत कुछ दशकों से हिन्दी साहित्यानुशीलन ही नहीं, बल्कि जीविकोपार्जन की भाषा के रूप में देश के मानस-पटल पर अंकित हुई है। परिणामस्वरूप उसका अर्थ, स्वरूप और व्यवहार-क्षेत्र भी व्यापक हुआ है। धीरे-धीरे पाठ्यक्रमों में भी यह आवश्यकता महसूस की गई कि हिन्दी को उसकी भाषिक प्रयुक्तियों के आधार पर पढ़ा-पढ़ाया जाए। अनुवाद, जनसंचार, वाणिज्य, व्यवसाय, कम्प्यूटर, सोशल मीडिया आदि विविध क्षेत्रों में आज हिन्दी की सशक्त उपस्थिति को देखते हुए हिन्दी शिक्षण के प्रयोजनपरक पक्षों के शिक्षण-प्रशिक्षण की नितांत आवश्यकता है। यह पुस्तक इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए हिन्दी के प्रयोजनमूलक पक्षों की प्रकृति को समझने का एक प्रयास है।
Aidu Paise VaradakshiNe
- Author Name:
Vasudhendra
- Book Type:

- Description: ಕತೆಗಾರರೂ, ಬರಹಗಾರರೂ ಆದ ವಸುಧೇಂದ್ರ ಬರೆದಿರುವ ಸುಲಲಿತ ಪ್ರಬಂಧಗಳ ಸಂಕಲನ ಕೃತಿ ’5 ಪೈಸೆ ವರದಕ್ಷಿಣೆ’. ಲೇಖಕರ ಬಾಲ್ಯ, ಮತ್ತು ಅವರ ವೃತ್ತಿ ಬದುಕಿನ ಬಗ್ಗೆಯೂ ಇಲ್ಲಿರುವ ಪ್ರಬಂಧಗಳಲ್ಲಿ ಪ್ರಸ್ತಾಪವಿದೆ. ಚುಕ್ಕಿ ಬಾಳೆಯ ಹಣ್ಣನ್ನು ಕಂಡಾಗಲೆಲ್ಲ ಲೇಖಕರನ್ನು ಕಾಡುವ ನೆನವರಿಕೆ, ವಾರಣಾಸಿಯಲ್ಲಿನ ಪ್ರವಾಸಾನುಭವ, ಚಾರಣಕ್ಕೆ ಹೊರಡುವವರ ಪೀಕಲಾಟ ಹೀಗೆ, ಎಲ್ಲ ನಮೂನೆಯ ವಿಷಯಗಳ ಕುರಿತಾದ ಬರಹಗಳಿವೆ. ಮಹಾಭಾರತದಲ್ಲಿನ ಒಳಸುಳಿಗಳನ್ನು ಬಿಚ್ಚಿಡುವ ಪ್ರಯತ್ನವೂ ಕೆಲ ಪ್ರಬಂಧ ಬರಹಗಳಲ್ಲಿ ನವಿರಾಗಿ ಸಾಗಿದೆ.
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