Rajya Sarkar Aur Jansampark
Publisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
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Price: ₹ 396
₹
495
Available
लोकतान्त्रिक मूल्यों की महत्ता को देखते हुए ‘लोक’ और ‘जन’ अभिव्यक्तियाँ किसी भी संगठन या गतिविधि को सम्मान दिलाने के लिए कारगर विशेषण या उपसर्ग बन जाती हैं। कई बार ये अभिव्यक्तियाँ सम्मान का स्थान प्राप्त करने का औजार मात्र बनकर रह जाती हैं। उसकी मूल भावना का नितान्त अभाव सम्बन्धित संगठन या गतिविधि में होता है। भारतीय संविधान में सरकार के लिए जो भूमिका निर्धारित की गई है उसके चलते, वैश्वीकरण की आँधी के बावजूद सरकार आनेवाले बहुत समय तक समाज की सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण संस्था के रूप में स्थापित रहेगी। सच कहा जाए तो सरकार की भूमिका का दायरा बढ़ता ही जा रहा है, बहुत बार सही ढंग से तथा कई बार प्रश्नास्पद तरीके से यह प्रवृत्ति भारत की तरह अन्य लोकतान्त्रिक विकासशील देशों में भी जारी रहेगी, तेज भी हो सकती है, पर घटेगी नहीं। समाज पर बाजार के हावी होने की कोशिश के बावजूद राज्य की महत्ता के अक्षुण्ण रहने के परिप्रेक्ष्य में समाचार के क्षेत्र में सरकार के सम्पर्क में आनेवाले, सरकार से जूझनेवाले और सरकार में सेवा करनेवाले सभी प्रकार के लोगों के लिए निश्चय ही विशेषज्ञ लेखकों द्वारा तैयार यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी।
ISBN: 9788171198474
Pages: 167
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: मोहन राकेश के समृद्ध और बहुआयामी व्यक्तित्व के अनेक पक्ष थे, जो शायद किसी एक मित्र के साथ पूरी तरह शेयर नहीं किये जा सकते थे। लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने जिस मित्र के साथ जो पहलू शेयर किया, वह पूरी ईमानदारी के साथ किया। फिर भी, आज इतने समय के बाद भी उनके दोस्त और दुश्मन, प्रशंसक और आलोचक, दर्शक, पाठक और इतिहासकार यही तय नहीं कर पाए कि वह व्यक्ति वास्तव में था क्या? उसके कृतित्व का मूल्य और महत्त्व क्या और कितना है? वह असीम भावुक था या चरम बौद्धिक? अत्यन्त महत्त्वाकांक्षी अवसरवादी था या तमाम उपलब्धियों के मोहपाश को पल-भर में काटकर किसी नये, अज्ञात और बड़े लक्ष्य की ओर निर्भय आगे बढ़ जानेवाला निरासक्त संन्यासी? मोहन राकेश के अन्तर्विरोधी एवं चौंकानेवाले अप्रत्याशित-अनपेक्षित कारनामों को लेकर उनके दोस्त और दुश्मन समान रूप से सच्चे-झूठे किन्तु चकित करनेवाले क़िस्से, प्रसंग, लतीफ़े, कथा-कहानियाँ, ख़बरें और अफ़वाहें रचते रहे हैं। सत्य और कल्पना तथा हक़ीक़त और फ़सानों से उपजी इस धुंध ने राकेश के जीवनकाल में ही उन्हें एक जीवित किंवदन्ती बना दिया था। ‘कीर्तिशेष : मोहन राकेश’ पुस्तक उन्हें, उनके जटिल व्यक्तित्व को एक नये सिरे से समझने का रास्ता खोलती है। यहाँ आप उनके समकालीनों, सहकर्मियों, मित्रों, सम्पादकों, प्रकाशकों, नाट्य-निर्देशकों, अभिनेताओं, फ़िल्मकारों, आलोचकों, मीडिया-कर्मियों और शिष्यों के संस्मरण पढ़ेंगे। उम्मीद है कि इनसे हम मोहन राकेश के व्यक्तित्व को कुछ बेहतर समझ सकेंगे।
Sukhe Hue Khwab
- Author Name:
Vimal Yadav
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- Description: मुझे नहीं पता मैं क्या ढूँढ रहा हूँ? मुझे किसकी तलाश है? मैं बस चल रहा हूँ! क्यों चल रहा हूँ? मैं यह भी बिल्कुल नहीं जानता। मेरे हिस्से में बस सफ़र आया है; एक लंबा अंतहीन सफर! कुछ ख़्वाब सिर्फ़ देखने के लिए होते है। वे कभी पूरे नहीं होते।
Chunautiyon Ko Avasaron Mein Badalata Bharat
- Author Name:
Ramesh Pokhriyal 'Nishank'
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- Description: नई शिक्षा नीति से विद्यार्थियों, अध्यापकों, शोधार्थियों व शैक्षिक नेतृत्व की सोच में व्यापक बदलाव होगा। समकालीन विषय, जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजाइन थिंकिंग, होलिस्टिक हेल्थ, ऑर्गेनिक लिविंग, इनवायरनमेंटल एजुकेशन, ग्लोबल सिटिजनशिप एजुकेशन आदि शामिल करने से शिक्षा के स्तर में काफी बढ़ोतरी होगी। नई शिक्षा नीति में हमारा पूरा ध्यान इस बात पर केंद्रित है कि हमारी बालिकाएँ कहीं भी पीछे नहीं रहें। केवल भारत ही एक ऐसा देश है, जहाँ पर अल्पसंख्यकों के साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं हुआ। जहाँ एक ओर हमने हमेशा विदेशी भूमि से लोगों का स्वागत किया है और उन्हें गले लगाया है, उनके मूल्यों और परंपराओं को समाहित करती हमारी संस्कृति अत्यंत विविधताओं को समेटे हुए एक खूबसूरत जीवंतता के दर्शन कराती है। आज पूरा विश्व भारत की ओर देख रहा है, क्योंकि विषम परिस्थितियों में भी अद्भुत जिजीविषा का परिचय देकर भारतीयों ने हर क्षेत्र—शिक्षा, उद्योग, विज्ञान, पर्यावरण, अनुसंधान में मुँह बाए खड़ी चुनौतियों को अवसर में बदलकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की है। प्रस्तुत पुस्तक भारतीय कर्मशीलता और कर्तव्यबोध का दिग्दर्शन कराती सकारात्मकता जाग्रत् करनेवाली कृति है।
Kathghare Mein Loktantra
- Author Name:
Arundhati Roy
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Description:
अपने जनवादी सरोकारों और ठोस तथ्यपरक तार्किक गद्य के बल पर अरुन्धति रॉय ने आज एक प्रखर चिन्तक और सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अपना ख़ास मुक़ाम हासिल कर लिया है। उनके सरोकारों का अन्दाज़ा उनके चर्चित उपन्यास, ‘मामूली चीज़ों का देवता’ ही से होने लगा था, लेकिन इसे उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता की निशानी ही माना जाएगा कि अपने विचारों और सरोकारों को और व्यापक रूप से अभिव्यक्त करने के लिए, अरुन्धति रॉय ने अपने पाठकों की उम्मीदों को झुठलाते हुए, कथा की विधा का नहीं, बल्कि वैचारिक गद्य का माध्यम चुना और चूँकि वे स्वानुभूत सत्य पर विश्वास करती हैं, उन्होंने न सिर्फ़ नर्मदा आन्दोलन के बारे में अत्यन्त विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित किया, बल्कि उस आन्दोलन में सक्रिय तौर पर शिरकत भी की। यही सिलसिला आगे परमाणु प्रसंग, अमरीका की एकाधिपत्यवादी नीतियों और ऐसे ही दूसरे ज्वलन्त विषयों पर लिखे गए लेखों की शक्ल में सामने आया।
‘कठघरे में लोकतंत्र’ इसी सिलसिले की अगली कड़ी है। इस पुस्तक में संकलित लेखों में अरुन्धति रॉय ने आम जनता पर राज्य-तंत्र के दमन और उत्पीड़न का जायज़ा लिया है, चाहे वह हिन्दुस्तान में हो या तुर्की में या फिर अमरीका में। जैसा कि इस किताब के शीर्षक से साफ़ है, ये सारे लेख ऐसी तमाम कार्रवाइयों पर सवाल उठाते हैं जिनके चलते लोकतंत्र–यानी जनता द्वारा जनता के लिए जनता का शासन–मुट्ठी-भर सत्ताधारियों का बँधुआ बन जाता है।
अपनी बेबाक मगर तार्किक शैली में अरुन्धति रॉय ने तीखे और ज़रूरी सवाल उठाए हैं, जो नए विचारों ही को नहीं, नई सक्रियता को भी प्रेरित करेंगे। और यह सच्चे लोकतंत्र के प्रति अरुन्धति की अडिग निष्ठा का सबूत हैं।
–नीलाभ
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