Pakistan: Balochistan Ki Paheli
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Author:
Shri Tilak DevasharPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
UrduCategory:
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تلک دیواشیر نے 2014 میں خصوصی سکریٹری کے طور پر کابینہ سکریٹریٹ، حکومت ہند سے سبکدوش ہونے کے بعد لکھنا شروع کیا۔ وہ پاكستان کے موضوع پر دو وسیع پیمانے پر سراہی جانے والی کتابوں کے مصنف ہیں—پاكستان: کورٹنگ دی آبیس (2016) اور پاکستان: ایٹ دی ہیلم (2018)۔ کابینہ سکریٹریٹ میں اپنے پیشہ ورانہ کیریئر کے دوران، انھوں نے ہندوستان کے پڑوس سے متعلق سلامتی کے معاملات میں مہارت حاصل کی۔ سبکدوش ہونے کے بعد سے انھوں نے پاكستان اور افغانستان پر خصوصی توجہ کے ساتھ ہندوستان کے پڑوس میں گہری دلچسپی لینا جاری رکھی ہے۔ انھوں نے مختلف قومی اخبارات اور رسائل کے لیے مضامین لکھے ہیں اور وہ انڈیا ٹوڈے، ٹائمز ناؤ، سی این این نیوز18 اور راجیہ سبھا ٹی وی جیسے سرکردہ نیوز چینلوں پر ٹی وی شوز میں بھی نظر آئے ہیں۔ دیواشیر نے اپنی اسکول کی تعلیم میو کالج، اجمیر سے حاصل کی، اور انھوں نے انڈرگریجویٹ سطح پر سینٹ اسٹیفن کالج، دہلی اور پوسٹ گریجویٹ سطح پر دہلی یونیورسٹی سے تاریخ میں تعلیم حاصل کی۔ وہ فی الحال نیشنل سکیورٹی ایڈوائزری بورڈ (این ایس اے بی) کے ممبر اور وویکانند انٹرنیشنل فاؤنڈیشن (وی آئی ایف) میں مشیر ہیں۔
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تلک دیواشیر نے 2014 میں خصوصی سکریٹری کے طور پر کابینہ سکریٹریٹ، حکومت ہند سے سبکدوش ہونے کے بعد لکھنا شروع کیا۔ وہ پاكستان کے موضوع پر دو وسیع پیمانے پر سراہی جانے والی کتابوں کے مصنف ہیں—پاكستان: کورٹنگ دی آبیس (2016) اور پاکستان: ایٹ دی ہیلم (2018)۔
کابینہ سکریٹریٹ میں اپنے پیشہ ورانہ کیریئر کے دوران، انھوں نے ہندوستان کے پڑوس سے متعلق سلامتی کے معاملات میں مہارت حاصل کی۔ سبکدوش ہونے کے بعد سے انھوں نے پاكستان اور افغانستان پر خصوصی توجہ کے ساتھ ہندوستان کے پڑوس میں گہری دلچسپی لینا جاری رکھی ہے۔ انھوں نے مختلف قومی اخبارات اور رسائل کے لیے مضامین لکھے ہیں اور وہ انڈیا ٹوڈے، ٹائمز ناؤ، سی این این نیوز18 اور راجیہ سبھا ٹی وی جیسے سرکردہ نیوز چینلوں پر ٹی وی شوز میں بھی نظر آئے ہیں۔
دیواشیر نے اپنی اسکول کی تعلیم میو کالج، اجمیر سے حاصل کی، اور انھوں نے انڈرگریجویٹ سطح پر سینٹ اسٹیفن کالج، دہلی اور پوسٹ گریجویٹ سطح پر دہلی یونیورسٹی سے تاریخ میں تعلیم حاصل کی۔
وہ فی الحال نیشنل سکیورٹی ایڈوائزری بورڈ (این ایس اے بی) کے ممبر اور وویکانند انٹرنیشنل فاؤنڈیشن (وی آئی ایف) میں مشیر ہیں۔
Book Details
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ISBN9789390923410
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Pages316
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Avg Reading Time11 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: पूछो परसाई से अपने ढंग की एक अनूठी पुस्तक है। हरिशंकर परसाई का रचनात्मक हस्तक्षेप स्थायी, परिवर्तनकारी और बहुआयामी रहा है। उन्होंने अपने साहित्य में समाज के अनेक पक्षों पर मौलिकता के साथ विचार किया है। वस्तुतः उनका समस्त लेखन भाषा, साहित्य और समाज की धरोहर है। यह पुस्तक हरिशंकर परसाई की मनीषा के कई विलक्षण आयाम रेखांकित करती है। प्रश्नोत्तर शैली की परम्परा अति प्राचीन है। पूछो परसाई से इसी परम्परा का आधुनिक संस्करण है। ‘देशबन्धु’ समाचार-पत्र में नियमित रूप से प्रकाशित होनेवाला यह स्तम्भ अत्यन्त लोकप्रिय था। देश के कोने-कोने से जागरूक उत्सुक पाठक अपने प्रिय लेखक परसाई से भाँति-भाँति के प्रश्न पूछते थे। इन प्रश्नों में दुनिया जहान की जाने कैसी-कैसी जिज्ञासाएँ भरी रहती थीं।...और परसाई प्रश्न की प्रकृति के अनुसार सूचनात्मक, विश्लेषणात्मक, तुलनात्मक, व्यंग्यात्मक आदि शैलियों में उत्तर देते थे। यही कारण है कि प्रायः सर्वाधिक समय तक नियमित प्रकाशित होनेवाला यह स्तम्भ आज भी विषय-वैविध्य और ‘बहुआस्वादकता’ का उदाहरण बना हुआ है। पूछो परसाई से में हरिशंकर परसाई की प्रचलित छवि भी एक नया विस्तार पाती है। परसाई की विचारधारा और भावप्रवणता पुस्तक की प्राणशक्ति है। इसमें व्याप्त तार्किकता, सरलता, सहजता और आत्मीयता के दर्शन भी उत्तरों में होते हैं। जाने कितने उकसाने वाले प्रश्नों के उत्तर भी उन्होंने पूरी सहजता से दिए हैं। उदाहरणार्थ, एक प्रश्न है–‘आपके पास हर प्रश्न का जवाब है। क्या आप अक्ल के जहाज हैं?’ परसाई का उत्तर है–‘मेरे पास हर प्रश्न का जवाब नहीं है। जवाब सही हो, यह भी जरूरी नहीं है। मैं लगातार सीखता जाता हूँ। मामूली आदमी हूँ।’ समग्रतः इस पुस्तक में ज्ञान, प्रेरणा और रोचकता का एक भरा-पूरा संसार पाठकों के लिए सुरक्षित है।
Tyag, Tapasya Aur Balidan Ki Parampara Ke Vahak Shri Guru Tegabahadur
- Author Name:
Dr. Kuldip Chand Agnihotri
- Book Type:

- Description: सप्तसिंधु क्षेत्र की कुछ घटनाएँ ऐसी हैं, जिन्होंने संपूर्ण भारतवर्ष के इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनमें सबसे पहली घटना तो मोहनजोदड़ो, हड़प्पा सभ्यता का उदय था, जिससे कालांतर में सिंधु सरस्वती सभ्यता का विकास हुआ। दरअसल वर्तमान भारतीय विश्वासों, आस्थाओं एवं पूजा-पद्धति का आधार सिंधु-सरस्वती घाटी में ही मिलता है। कुरुक्षेत्र में हुआ महाभारत का युद्ध इस क्षेत्र की ऐसा घटना है, जिसने पूरे हिंदुस्थान की सेनाओं को सप्तसिंधु के मैदानों में लाकर खड़ा कर दिया था। इन्हीं वैदिक परंपराओं का विकास श्रवण परंपराओं में हुआ, जिनके संश्लेषण की आधार भूमि भी सप्तसिंधु क्षेत्र ही बना। उसके सैकड़ों साल बाद यही सप्तसिंधु का क्षेत्र अरब से उठी सामी चिंतन की आँधी का शिकार हुआ। हमले क्योंकि सप्तसिंधु क्षेत्र से ही होते थे, इसलिए इसका सर्वाधिक दंश भी इसे ही झेलना पड़ा । लेकिन इस नई आफत का सामना कैसे किया जाए? यह उस युग की सबसे बड़ी चुनौती थी। इस मरहले पर दशगुरु परंपरा का उदय होना दैवी योजना ही कही जा सकती है। गुरु नानक देवजी इस परंपरा के संस्थापक थे। दशगुरु परंपरा का मूल्यांकन आध्यात्मिक क्षेत्र में तो हुआ है, लेकिन उसके ऐतिहासिक व सामाजिक क्षेत्र में योगदान को वरीयता नहीं दी गई। यह ऐसा क्षेत्र है, जिसमें कुदाल चलाने की आवश्यकता है। यह पुस्तक दशगुरु परंपरा के इसी क्षेत्र में किए गए योगदान को प्रकाश में लाने का स्तुत्य प्रयास है।
Janjatiya Navjagran
- Author Name:
Rahul Singh
- Book Type:

- Description: ‘जनजातीय नवजागरण’ पुस्तक जनजातीय यानी आदिवासी सन्दर्भों के इतिहास में बिखरे पड़े तथ्यों को जुटाकर जनजातीय नवजागरण का एक नैरेटिव खड़ा करती है; बांग्ला, मराठी और हिन्दी क्षेत्रों के बहुश्रुत नवजागरणों के बरक्स जनजातीय नवजागरण की एक सैद्धान्तिकी निर्मित करती है; और प्रादेशिक नवजागरणों से जनजातीय नवजागरण को अलगाने के सूत्र प्रस्तावित करती है। इसके लिए यह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी और रानी विक्टोरिया के अधीन औपनिवेशिक भारत में हुए जनजातीय सामाजिक-धार्मिक आन्दोलनों की गहरी पड़ताल करती है और उससे हासिल निष्कर्षों को साझा करती है।औपनिवेशिक दबावों के विरुद्ध जनजातीय समूह कैसे संगठित होकर प्रतिरोध और परिवर्तन की इबारत लिखते हैं? कम्पनी राज और अंग्रेजी राज के बढ़ते अमानवीय दमन के समान्तर वे कैसे अपनी रणनीति में बदलाव करते चले जाते हैं? ऐसे अनेक प्रश्नों पर विचार करते हुए यह पुस्तक उजागर करती है कि शेष भारत की तुलना में आदिवासी समुदायों के लिए अंग्रेजी राज एक गहन सभ्यतागत संकट बनकर आया था जो उनके लिए अस्तित्वगत संकट का सबब बन गया था। उनका अभूतपूर्व प्रतिरोध इसी संकट की तीव्रतर प्रतिक्रिया था। उसका आधार थी उनकी स्वाधीनता की चेतना जो उनकी सहजीवी-समावेशी जीवनदृष्टि, सदियों पुराने सामुदायिक अनुभवों और परम्पराओं से उपजी थी, न कि किसी कथित आधुनिक विचार अथवा संस्थान के सम्पर्क से। इस ऐतिहासिक परिघटना की पूरी प्रक्रिया को यह पुस्तक उसकी सामाजिकता और ऐतिहासिकता के साथ दर्ज करती है। अंग्रेजी राज ने आदिवासी समुदायों की पूरी विरासत को जिस व्यवस्थित तरीके से ध्वस्त किया उसकी एक बानगी झारखंड के सन्दर्भ में इस पुस्तक में देखी जा सकती है। तथ्यों को विमर्शों के ताने-बाने में यह पुस्तक बहुत सावधानीपूर्वक पिरोती है। वस्तुतः यह एक विचारोत्तेजक किताब है, जो इतिहास की प्रचलित समझदारी को चुनौती देते हुए विमर्श की एक नई जमीन विकसित करती है। यह अकादमिक और गैर-अकादमिक दोनों समूहों के लिए जरूरी है।
Siddhartha
- Author Name:
Hermann Hesse
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