Everybody Loves A Good Drought
Author:
P. SainathPublisher:
Penguin IndiaLanguage:
EnglishCategory:
General-non-fiction0 Reviews
Price: ₹ 389.22
₹
499
Available
A CLASSIC OF REPORTAGE FROM RURAL INDIA BY AWARD-WINNING AUTHOR, WITH A FOREWORD BY GOPALKRISHNA GANDHI
– Prescribed in over 100 universities
– Reveals the human face of poverty
– Key to understanding issues of globalization, human rights, development economics in India
– One of the classics of journalism
Acclaimed across the world, prescribed in over 100 universities and colleges, and included in part in The Century’s Greatest Reportage (Ordfront, 2000), alongside the works of Gabriel Garcia Marquez, Studs Terkel and John Reed, Everybody Loves a Good Drought is the established classic on rural poverty in India. Twenty years after publication, it remains unsurpassed in the scope and depth of reportage, providing an intimate view of the daily struggles of the poor and the efforts, often ludicrous, made to uplift them.
An illuminating introduction accompanying this twentieth-anniversary edition reveals, alarmingly, how a large section of India continues to suffer in the name of development so that a small percentage may prosper. Besides exposing chronic misgovernance, it is also a devastating comment on the media’s failure to speak for the voiceless.
ISBN: 9780140259841
Pages: 512
Avg Reading Time: 17 hrs
Age: 18+
Country of Origin: IN
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भारतीय समाजवाद के आकाश में डॉ. राममनोहर लोहिया का उदय एक ऐतिहासिक घटना थी। उनका सम्पूर्ण जीवन सदियों से उपेक्षित रहे लोगों के प्रति समर्पित था—फिर चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या वर्ग का हो। यही कारण है कि समाजवाद के पुरोधा के रूप में उनका नाम हमेशा अग्रणी रहा है।
समाजवादी चिन्तक प्रो. रामगोपाल यादव द्वारा प्रणीत यह पुस्तक डॉ. लोहिया के अक्षय व्यक्तित्व एवं कृतित्व का बहुआयामी मूल्यांकन प्रस्तुत करती है। डॉ. लोहिया की वैश्विक दृष्टि की व्यापकता का संज्ञान कराती एवं सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में परिवर्तन के अग्रदूत के रूप में उन्हें प्रतिष्ठित करती हुई यह कृति एक नया चिन्तन प्रस्तुत करती है। डॉ. लोहिया का जीवन-संघर्ष निरन्तर सामाजिक या उत्थानवादी चेतना के द्वन्द्व को रूपायित करता है। आर्थिक ग़ैर-बराबरी दूर करने और समतामूलक समाज बनाने में उनका चिन्तन मार्क्सवादियों से भिन्न था।
भारतीय समाजवाद के प्रवर्तक डॉ. लोहिया की 105वीं जयन्ती के उपलक्ष्य में प्रो. यादव द्वारा रचित इस किताब की उपादेयता समाजवाद के विकास की दिशा में एक अमूल्य योगदान है। पुस्तक की उपादेयता इस अर्थ में भी बढ़ जाती है कि यह लोहिया जी के व्यक्तित्व और उनकी निज परिमार्जित की हुई विचारधारा और उनके योगदान सब पर समुचित प्रकाश डालती है।
Stree Kavita : Pahachan Aur Dwandwa -2-Hardcover
- Author Name:
Rekha Sethi
- Book Type:

- Description: एक मानवीय इकाई के रूप में स्त्री और पुरुष, दोनों अपने समय व यथार्थ के साझे भोक्ता हैं लेकिन परिस्थितियाँ समान होने पर भी स्त्री-दृष्टि दमन के जिन अनुभवों व मन:स्थितियों से बन रही है, मुक्ति की आकांक्षा जिस तरह करवटें बदल रही है, उसमें यह स्वाभाविक है कि साहित्यिक संरचना तथा आलोचना, दोनों की प्रणालियाँ बदलें। स्त्री-लेखन स्त्री की चिन्तनशील मनीषा के विकास का ही ग्राफ़ है जिससे सामाजिक इतिहास का मानचित्र गढ़ा जाता है और जेंडर तथा साहित्य पर हमारा दिशा-बोध निर्धारित होता है। भारतीय समाज में जाति एवं वर्ग की संरचना जेंडर की अवधारणा और स्त्री-अस्मिता को कई स्तरों पर प्रभावित करती है। स्त्री-कविता पर केन्द्रित प्रस्तुत अध्ययन जो कि तीन खंडों में संयोजित है, स्त्री-रचनाशीलता को समझने का उपक्रम है, उसका निष्कर्ष नहीं। पहले खंड, 'स्त्री-कविता : पक्ष और परिप्रेक्ष्य' में स्त्री-कविता की प्रस्तावना के साथ-साथ गगन गिल, कात्यायनी, अनामिका, सविता सिंह, नीलेश रघुवंशी, निर्मला पुतुल और सुशीला टाकभौरे पर विस्तृत लेख हैं। एक अर्थ में ये सभी वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य में विविध स्त्री-स्वरों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। उनकी कविता में स्त्री-पक्ष के साथ-साथ अन्य सभी पक्षों को आलोचना के केन्द्र में रखा गया है, जिससे स्त्री-कविता का बहुआयामी रूप उभरता है। दूसरा खंड, 'स्त्री-कविता : पहचान और द्वन्द्व' स्त्री-कविता की अवधारणा को लेकर स्त्री-पुरुष रचनाकारों से बातचीत पर आधारित है। इन रचनाकारों की बातों से उनकी कविताओं का मिलान करने पर उनके रचना-जगत को समझने में तो सहायता मिलती ही है, स्त्री-कविता सम्बन्धी उनकी सोच भी स्पष्ट होती है। स्त्री-कविता को लेकर स्त्री-दृष्टि और पुरुष-दृष्टि में जो साम्य और अन्तर है, उसे भी इन साक्षात्कारों में पढ़ा जा सकता है। तीसरा खंड, 'स्त्री-कविता : संचयन' के रूप में प्रस्तावित है...। इन सारे प्रयत्नों की सार्थकता इसी बात में है कि स्त्री-कविता के माध्यम से साहित्य और जेंडर के सम्बन्ध को समझते हुए मूल्यांकन की उदार कसौटियों का निर्माण हो सके जिसमें सबका स्वर शामिल हो।
Europe Mein Darshanshastra : Bacon Se Marx Tak
- Author Name:
Satinath Chakravorty
- Book Type:

- Description: ‘दर्शनशास्त्र : पूर्व और पश्चिम’ शृंखला की यह पुस्तक पुनर्जागरण एवं आधुनिक विज्ञान के उदय की चर्चा से प्रारम्भ होती है, और उस कालखंड की दार्शनिक प्रवृत्तियों का विवेचन प्रस्तुत करती है, जो आधुनिक यूरोपीय दर्शनशास्त्र के इतिहास में अत्यन्त विचारोत्तेजक माना जाता है। यह विचित्र बात है कि उस समय के दर्शनशास्त्री एक तरफ़ तो विज्ञान से प्रतिबद्ध थे और दूसरी तरफ़ वे आधुनिक विज्ञान को सामने लानेवाली बूर्ज्वाजी के अन्तर्विरोधों की पड़ताल कर रहे थे। साथ ही, क्रान्ति के जो बीज स्वयं आधुनिक विज्ञान में निहित हैं, उनके प्रतिकार के लिए वे धर्म और आस्था का अन्ध-समर्थन भी कर रहे थे। लेखक ने इस पूरी प्रक्रिया पर विस्तार से विचार करते हुए दर्शनशास्त्रियों की मूलभूत विशेषताओं को उजागर किया है। बीच-बीच में इतिहास के कुछ प्रसंगों की चर्चा से यह पुस्तक और अधिक रोचक तथा पठनीय बन गई है। इसमें कई ऐसे विषयों पर भी विचार किया गया है, जिन पर अभी तक यूरोपीय दर्शनशास्त्र के अध्ययन में या तो ध्यान नहीं दिया गया था, और अगर ध्यान दिया गया तो उनसे कतरा जाने की प्रवृत्ति रही। संक्षेप में, यह पुस्तक वैज्ञानिक विचारधारा और विज्ञान एवं समाज के अन्तस्सम्बन्धों को समझने के लिए आवश्यक रूप से पठनीय है।
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