Bharat Mein Bandhua Mazdoor
Author:
Mahashweta DeviPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction0 Ratings
Price: ₹ 476
₹
595
Available
देश की जिन गम्भीर समस्याओं पर मुख्यधारा का मीडिया ख़ामोश रहता है और सरकार उदासीन, उनमें बँधुआ मज़दूरों की समस्या भी एक है। सरकारी घोषणाओं में यह समस्या ख़त्म हो चुकी है और मीडिया के लिए इसमें सनसनी नहीं रही। लेकिन समस्या अभी जहाँ की तहाँ है। 1975 में राष्ट्रपति के एक अध्यादेश के ज़रिए औपचारिक तौर पर बँधुआ मज़दूरी पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था, लेकिन देश के लगभग सभी राज्यों में आज भी यह प्रथा बिना किसी रोक-टोक के जारी है। बीच-बीच में सरकारें बँधुआ तौर पर काम कर रहे मज़दूरों की मुक्ति और पुनर्वास का स्वाँग भी रचती हैं, लेकिन मुक्त कराए गए मज़दूरों को पुन: एक नई तरह की बँधुआ मज़दूरी का शिकार होना पड़ा है। न तो उनकी जीविका के लिए पर्याप्त साधन मुहैया कराए गए और न ही शक्तिशाली भूमिपतियों से उनकी हिफ़ाज़त का कोई विश्वसनीय इन्तज़ाम हो पाया।</p>
<p>‘भारत में बँधुआ मज़दूर’ इस समस्या का सर्वांग अध्ययन प्रस्तुत करती है। प्रख्यात बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी यहाँ पूर्णतया एक शोधकर्मी के तौर पर प्रकट हुई हैं, ज़ाहिर है, उत्पीड़ितों-उपेक्षितों के लिए अपनी सर्वज्ञात संवेदना के साथ। शोधकर्म की निर्मम असंलग्नता से बचते हुए, विषय के साथ नितान्त मानवीय लगाव के साथ यह शोध किया गया है।
ISBN: 9788171194834
Pages: 158
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Kedarnath Pandey
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- Description: ‘शिक्षा के सामाजिक सरोकार’ शिक्षा, शिक्षक, छात्र और विद्यालय पर केन्द्रित वैयक्तिक निबन्धों का संग्रह है। केदारनाथ पाण्डेय की यह पुस्तक साहित्य की कई विधाओं का आस्वाद देती है। यह संस्मरण भी है, यात्रा-वृत्तान्त भी और शिक्षा के सामाजिक सरोकारों का आख्यान भी। शिक्षा के क्षेत्र में एक शिक्षक द्वारा किए गए अभिनव प्रयासों का यह ऐसा वृत्तान्त है, जिसे छात्र, शिक्षक और अभिभावक सभी के लिए पढ़ना ज़रूरी है। केदारनाथ पाण्डेय की इस पुस्तक का मूल स्वर है—सबको शिक्षा, सबको काम। लेखक न सिर्फ़ बच्चों को पढ़ा-लिखा देखना चाहता है बल्कि आम जन के लिए न्याय भी चाहता है। लेखक किसानों के लिए ज़मीन, ग़रीबों के लिए घर और सभी के लिए आशाएँ चाहता है। वह सुन्दर भविष्य का सपना देखता है जो परम्परा और संस्कृति के बिना अधूरा है। समाज की कई कल्पनाएँ, योजनाएँ पुस्तक में स्थान पाती हैं। स्मृतियों को सहेजकर रखने में लेखक माहिर है और उसका यथेष्ट इस्तेमाल इस पुस्तक में किया गया है।
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