Barho Mas

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Maithili

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बारहो मास उपन्यास साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत मराठी उपन्यास बारोमास मैथिली अनुवाद अछी। एही उपन्यास भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था रीढ़ - हमरा सभक किसानक ओही सभ समस्या पर व्यापक दृष्टि देल गेल अछी जे ओ लोकनि खुजल व्यापार नीति आ भूमण्डलीकरण कारणे भोगी रहलाह अछी। बारह महीनामे समेटल किसानक वेदना-कथाके एहि उपन्यासमे महाराष्ट्रक किसान सुभाराव आ हुनक परिवार इर्द-गिर्द बुनल गेल अछी उपन्यास अन्तमे सुभाराव निपत्ता होयब प्रतीकात्मक रूपसै किसानक मुख्यधारासै “निपत्ता” होयबाक एकटा दुखद परिदृश्य प्रस्तुत करैत अछी।

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ISBN
9789389195026
Pages
372
Avg Reading Time
12 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

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About the Book

बारहो मास उपन्यास साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत मराठी उपन्यास बारोमास मैथिली अनुवाद अछी। एही उपन्यास भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था रीढ़ - हमरा सभक किसानक ओही सभ समस्या पर व्यापक दृष्टि देल गेल अछी जे ओ लोकनि खुजल व्यापार नीति आ भूमण्डलीकरण कारणे भोगी रहलाह अछी। बारह महीनामे समेटल किसानक वेदना-कथाके एहि उपन्यासमे महाराष्ट्रक किसान सुभाराव आ हुनक परिवार इर्द-गिर्द बुनल गेल अछी
उपन्यास अन्तमे सुभाराव निपत्ता होयब प्रतीकात्मक रूपसै किसानक मुख्यधारासै “निपत्ता” होयबाक एकटा दुखद परिदृश्य प्रस्तुत करैत अछी।

Book Details

  • ISBN
    9789389195026
  • Pages
    372
  • Avg Reading Time
    12 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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Barho Mas structures the slow erasure of India's agricultural backbone across twelve months in the life of Subharao, a Maharashtra farmer, and his family. This Maithili translation of the Sahitya Akademi-winning Marathi novel examines not just poverty but invisibility — the symbolic disappearance of Subharao at the novel's end mirrors how liberalization policies and open trade have pushed farmers to the margins of national consciousness. The narrative unfolds through seasonal cycles, each month revealing how globalization reshapes rural economics and breaks generational ties to land. Barho Mas refuses melodrama; instead, it documents with precision the quiet structural violence of policy on communities whose labor feeds the nation. For Maithili readers, this translation brings urgent questions about agrarian distress into a literary tradition deeply rooted in rural life and economic observation.

बारहो मास उपन्यास पढ़लासँ की तरहक अनुभूति भेटैत अछि?

ई उपन्यास पाठकके बारहो महीनाक धीर-धीर होइत विनाशक यात्रापर लऽ जाइत अछि। एकरा पढ़नाइ तीव्र नहि अछि — ई धैर्यपूर्वक, मासक बाद मास, देखबैत अछि जे कोना नीतिगत बदलाव एकटा परिवारके टुकड़ा-टुकड़ा कऽ दैत अछि। सुभारावक अन्तमे गायब भऽ जायब एकटा प्रतीकात्मक झटका अछि जे पाठकके किसानक मुख्यधारासँ बाहर भेल जायबाक वास्तविकताक सामना करबाक लेल मजबूर करैत अछि। ई भावनात्मक रूपसँ शान्त मुदा बौद्धिक रूपसँ परेशान करऽ वला अनुभव अछि।

बारहो मास उपन्यास कोन पाठकक लेल सभसँ उपयुक्त अछि?

  • जे पाठक भारतीय कृषि संकटक संरचनात्मक कारणके समझय चाहैत छथि, भावुकता नहि
  • जे लोक मराठी साहित्यक सामाजिक यथार्थवादी परम्पराके मैथिलीमे अन्वेषण करय चाहैत छथि
  • जे पाठक मौसमी चक्र आ ग्रामीण अर्थव्यवस्थाक परस्पर सम्बन्धके धैर्यपूर्वक देखय लेल तैयार छथि
  • जे लोक भूमण्डलीकरण आ खुजल व्यापार नीतिक मानवीय प्रभावमे रुचि राखैत छथि

भारतीय पाठकक लेल आइ ई उपन्यासक विषय-वस्तुक की सांस्कृतिक प्रासंगिकता अछि?

आजुक भारतमे किसान आत्महत्याक दर आ कृषि संकट लगातार सुर्खियोंमे रहैत अछि। बारहो मास ओहि प्रक्रियाके दस्तावेजीकृत करैत अछि जाहिसँ किसान आर्थिक नीतिक केन्द्रसँ "निपत्ता" भऽ गेलाह — शहरी उपभोक्ता वर्गक लेल अदृश्य भऽ गेलाह। भूमण्डलीकरण आ कृषि सुधारक तीन दशकक बाद, ई उपन्यास पूछैत अछि जे कोन आर्थिक आधुनिकता एकर उत्पादकके मेटा दैत अछि। ओहि देशमे जतय किसान राजनीतिक बयानबाजीमे पूजनीय छथि मुदा नीतिमे उपेक्षित छथि, सुभारावक कथा भयावह रूपसँ समकालीन अछि।

ई मैथिली अनुवाद साहित्य अकादेमी पुरस्कृत मूल मराठी उपन्याससँ की भिन्नता राखैत अछि?

ई अनुवाद मराठी मूलक संरचनात्मक दृष्टिकोणके बरकरार राखैत अछि — बारह महीनाक खंडमे विभाजित — मुदा एकरा मैथिली साहित्यक ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहन परम्परामे राखैत अछि। मैथिली पाठकक लेल, जे क्षेत्रमे भूमि सम्बन्ध आ कृषि पहचान सांस्कृतिक रूपसँ केन्द्रीय अछि, ई अनुवाद महाराष्ट्रक विशिष्ट संकटके व्यापक भारतीय किसानक अनुभवसँ जोड़ैत अछि। भाषा चयन किसानक वेदनाके स्थानीय समझक संग सार्वभौमिक बनबैत अछि।

ई उपन्यास पाठकक संग पढ़लाक बाद की छोड़ि जाइत अछि?

बारहो मास पाठकके सुभारावक गायब होयबाक प्रतीकक संग छोड़ैत अछि — एकटा खालीपन जे राष्ट्रीय कथामे किसानक स्वयंक गायब होयबाक प्रतिध्वनित करैत अछि। भावनात्मक रूपसँ, ई क्रोध आ शोकक संयोजन उत्पन्न करैत अछि। बौद्धिक रूपसँ, ई पाठकके आर्थिक प्रगतिक गणनाक पुनर्विचार करय लेल मजबूर करैत अछि — के गिनल जाइत अछि, के नहि। सांस्कृतिक रूपसँ, ई भारतीय पहचानमे कृषिक केन्द्रीयताक आ ओकर वर्तमान संकटक गहन चेतना पैदा करैत अछि जे नीतिगत उपेक्षासँ जन्मल अछि।

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