Aaranyak

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आरण्यक भारतीय साहित्यमे अनेक एहन महान विभूति लोकनि छथी जे अपना कृतित्व साँ अपन युग आ समकालीन परिदृष्क समृद्ध कयलनि अछि आ ओकरा एक नव दृष्टि प्रदान कयलनि अछि। एहि उपन्यासमे उपन्यासकार 'प्रकृत प्रदत' वन-संपादमे प्रकृति चित्रण, मानवीय संवेदनाक घटित घटनाकाँ अनुभवक आधार पर मनुष्यक लेल एक एहन कथानकक निर्माण कयलनि अछि, जाहिसाँ जीवन-जगतक सत्यता बहुत लग साँ देखल गेल अछि। ई एक अनुपम, अनुभूतिपूर्ण स्मृति-कथा अछि जे मनुष्य जीवनक आख्यान आ ओकर यात्राकाँ सार्थक करैत अछि। ई एक प्रकरें मानव जीवक एकांत समानुभूतिशील साहचर्यक आख्यान थीक।

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ISBN
9789389467024
Pages
224
Avg Reading Time
7 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

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About the Book

आरण्यक भारतीय साहित्यमे अनेक एहन महान विभूति लोकनि छथी जे अपना कृतित्व साँ अपन युग आ समकालीन परिदृष्क समृद्ध कयलनि अछि आ ओकरा एक नव दृष्टि प्रदान कयलनि अछि।
एहि उपन्यासमे उपन्यासकार 'प्रकृत प्रदत' वन-संपादमे प्रकृति चित्रण, मानवीय संवेदनाक घटित घटनाकाँ अनुभवक आधार पर मनुष्यक लेल एक एहन कथानकक निर्माण कयलनि अछि, जाहिसाँ जीवन-जगतक सत्यता बहुत लग साँ देखल गेल अछि। ई एक अनुपम, अनुभूतिपूर्ण स्मृति-कथा अछि जे मनुष्य जीवनक आख्यान आ ओकर यात्राकाँ सार्थक करैत अछि। ई एक प्रकरें मानव जीवक एकांत समानुभूतिशील साहचर्यक आख्यान थीक।

Book Details

  • ISBN
    9789389467024
  • Pages
    224
  • Avg Reading Time
    7 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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Aaranyak distinguishes itself by treating the forest not as backdrop but as witness—a prakrit-pradat (nature-given) repository where human sensibility confronts its own truths. Written in Maithili, this novel is structured as a smriti-katha, a memory-narrative that locates lived experience within dense woodland solitude. The narrator does not dramatise events; instead, incidents emerge as they were felt, rendering the forest both spatial and psychological terrain.

What makes Aaranyak singular is its refusal to romanticise isolation. The novelist observes human vulnerability with precision—how silence sharpens loneliness, how natural beauty coexists with existential weight. Published by Sahitya Akademi, the work reads less like fiction and more like testimony, a meditative account of what it means to live at the edge of society and self. Readers seeking lyrical introspection grounded in place will find in Aaranyak a rare union of ecological consciousness and interior life.

ई पोथी पढ़लाक बाद हमरा केहन अनुभूति होयत?

ई पोथी पढ़लाक बाद अहाँकेँ एकटा शांत, गहींर मनन आ आत्म-चिंतनक अनुभूति होयत। आरण्यक तेज गतिक कथानक नहि अछि—ई धीरे-धीरे, स्मृतिक रूपमे, प्रकृतिक बीच मनुष्यक एकांतताकेँ प्रस्तुत करैत अछि। अहाँ वनक मौन, ओकर सौंदर्य, आ ओहिमे रहैत मनुष्यक भीतरी संघर्षकेँ अनुभव करब। ई एकटा ध्यानपूर्ण, भावनात्मक यात्रा अछि जे पाठककेँ जीवनक सत्यताक लग लऽ जाइत अछि। जे पाठक प्रकृति, स्मृति, आ एकांतताक गहन विवरण पसंद करैत छथि, हुनका लेल ई एकटा अविस्मरणीय अनुभव अछि।

ई उपन्यास कोन तरहक पाठक लेल उपयुक्त अछि?

आरण्यक ओहि पाठक लेल उपयुक्त अछि जे कथानकक तेज गतिक बदला गहींर भावनात्मक अन्वेषण चाहैत छथि। जे पाठक प्रकृतिक वर्णन, मनुष्यक भीतरी जीवन, आ स्मृति-आधारित कथाकथनमे रुचि रखैत छथि, हुनका लेल ई आदर्श अछि। ई उपन्यास मैथिली भाषाक साहित्यिक परंपरामे रुचि राखनिहार, आ जे एकांतता आ प्रकृतिक बीच मनुष्यक स्थितिकेँ समझय चाहैत छथि, हुनका लेल विशेष रूपसँ महत्वपूर्ण अछि। ई धैर्य आ ध्यानपूर्ण पठनक माँग करैत अछि।

भारतीय पाठक लेल एहि उपन्यासक सांस्कृतिक महत्व की अछि?

आरण्यक आधुनिक भारतक शहरीकरण आ प्रकृतिसँ दूरीक युगमे मनुष्य आ वनक संबंधकेँ पुनः जीवित करैत अछि। भारतीय संस्कृतिमे आरण्यक जीवन चरणक अवधारणा—समाजसँ दूर, प्रकृतिक बीच आत्म-चिंतन—एहि उपन्यासमे साकार होइत अछि। आइक समयमे, जखन लोक तनाव, शोर, आ भौतिकतासँ घेरल छथि, ई पोथी एकटा विकल्प प्रस्तुत करैत अछि—प्रकृतिक संग मौन संवाद। ई मैथिली साहित्यमे एकटा विशिष्ट स्थान रखैत अछि, किएक तँ ई आंचलिक संवेदना आ सार्वभौमिक मानवीय अनुभवकेँ जोड़ैत अछि।

एहि विषयक प्रति उपन्यासकारक दृष्टिकोण की विशिष्ट बनबैत अछि?

उपन्यासकार प्रकृतिकेँ केवल पृष्ठभूमि नहि, बल्कि एकटा साक्षी आ सहभागीक रूपमे प्रस्तुत करैत छथि। आरण्यकमे वन केवल दृश्य नहि अछि—ई मनुष्यक भावना, स्मृति, आ अस्तित्वक संग घुलमिल जाइत अछि। उपन्यासकारक दृष्टिकोण अनुभवजनित अछि—कल्पना नहि, बल्कि वास्तविक अनुभवक आधार पर घटनाक चित्रण। ई प्रकृतिक रोमांटिकरण नहि करैत अछि, बल्कि ओकर सत्यता—सौंदर्य आ कठोरता दुनू—केँ ईमानदारीसँ देखबैत अछि। एहिसँ ई उपन्यास एकटा गवाहीक रूपमे पढ़ल जा सकैत अछि।

ई पोथी पाठककेँ पढ़लाक बाद की सोगात दैत अछि?

पोथी समाप्त भेलाक बाद पाठककेँ प्रकृति आ एकांतताक प्रति एकटा नव संवेदनशीलता भेटैत अछि। आरण्यक केवल कथा नहि, एकटा अनुभव अछि जे मनुष्यक भीतरी जीवनक जटिलताकेँ उजागर करैत अछि। ई पाठककेँ सोचय लेल प्रेरित करैत अछि—जीवनक अर्थ, एकांतताक मूल्य, आ प्रकृतिक संग संबंधक आवश्यकता। भावनात्मक रूपसँ, ई शांति आ गहींर मनन दैत अछि। बौद्धिक रूपसँ, ई मनुष्य आ पर्यावरणक बीचक संबंधकेँ फेरसँ परिभाषित करय लेल आमंत्रित करैत अछि।

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