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यथार्थवादी कथाकार अमरकान्त के इस चर्चित उपन्यास के केन्द्र में आज़ादी के बाद का भारतीय मुस्लिम समाज, उसकी संस्कृति, उसकी सोच और उसके सामाजिक-पारिवारिक मरहले हैं। मुस्लिम महिलाओं के हालात पर लेखक ने इस उपन्यास में ख़ासतौर पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है। भारत और पाकिस्तान का बँटवारा इस कथा में बार-बार विचार के केन्द्र में आता है और वह माहौल भी जो बँटवारे के वक़्त विशेष तौर पर उन इलाक़ों में मौजूद था जहाँ हिन्दू-मुस्लिम बरसों से साथ रहते आए थे। उपन्यास का एक पात्र मुनीर अहमद इन हालात के मद्देनज़र कहता है कि आज़ादी के पहले मज़हब और जात-पाँत के अलगाव तो थे, मगर सभी अपनी-अपनी हद में रहते हुए आज़ादी की लड़ाई में शामिल थे, लेकिन आज़ादी के बाद यह चीज़ गायब हो गई। साम्प्रदायिक दंगों के दौरान आम लोगों की स्थितियाँ भी इस उपन्यास में दिखाई देती हैं। इस उपन्यास के बारे में मशहूर है कि अमरकान्त जी ने इसकी पांडुलिपि को तब तक छपने नहीं दिया था जब तक इस्लामी समाज और धार्मिक पहलुओं के जानकार लोगों को इसे पढ़वा नहीं लिया। भारतीय मुस्लिम समाज के सांस्कृतिक, सामाजिक व आर्थिक मसलों पर केन्द्रित एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास।
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यथार्थवादी कथाकार अमरकान्त के इस चर्चित उपन्यास के केन्द्र में आज़ादी के बाद का भारतीय मुस्लिम समाज, उसकी संस्कृति, उसकी सोच और उसके सामाजिक-पारिवारिक मरहले हैं। मुस्लिम महिलाओं के हालात पर लेखक ने इस उपन्यास में ख़ासतौर पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है।
भारत और पाकिस्तान का बँटवारा इस कथा में बार-बार विचार के केन्द्र में आता है और वह माहौल भी जो बँटवारे के वक़्त विशेष तौर पर उन इलाक़ों में मौजूद था जहाँ हिन्दू-मुस्लिम बरसों से साथ रहते आए थे।
उपन्यास का एक पात्र मुनीर अहमद इन हालात के मद्देनज़र कहता है कि आज़ादी के पहले मज़हब और जात-पाँत के अलगाव तो थे, मगर सभी अपनी-अपनी हद में रहते हुए आज़ादी की लड़ाई में शामिल थे, लेकिन आज़ादी के बाद यह चीज़ गायब हो गई।
साम्प्रदायिक दंगों के दौरान आम लोगों की स्थितियाँ भी इस उपन्यास में दिखाई देती हैं। इस उपन्यास के बारे में मशहूर है कि अमरकान्त जी ने इसकी पांडुलिपि को तब तक छपने नहीं दिया था जब तक इस्लामी समाज और धार्मिक पहलुओं के जानकार लोगों को इसे पढ़वा नहीं लिया।
भारतीय मुस्लिम समाज के सांस्कृतिक, सामाजिक व आर्थिक मसलों पर केन्द्रित एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास।
Book Details
-
ISBN9789360869236
-
Pages224
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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लोहे के पंख दलित समुदाय से आने वाले एक व्यक्ति की आपबीती के जरिये भारतीय किसान-मजदूरों के कठिन-कठोर जीवन-संघर्ष का जैसा ज़मीनी और विशद चित्र प्रस्तुत करता है, वैसा कम ही उपन्यासों में देखने को मिलता है। आज़ादी के पहले और बाद के लगभग तीन दशकों की पृष्ठभूमि में विन्यस्त और बिहार के ग्रामीण और शहरी समाज को समेटे यह उपन्यास तत्कालीन परिस्थितियों को अंकित करते हुए जिन सामाजिक-राजनीतिक विषमताओं को उजागर करता है वे आज भी समाप्त नहीं हुई हैं। सामन्ती वर्चस्व और अत्याचार, दलितों का शोषण-उत्पीड़न, राजनीतिक दलों की कथनी-करनी का अन्तर...आज भी आम हैं। ‘लोहे के पंख’ जिस समय—बीसवीं सदी के छठे दशक में—लिखा गया था उस समय हिन्दी साहित्य में दलित प्रश्न इतना केन्द्रीय और मुखर नहीं था। इस नजरिये से देखें तो हिमांशु श्रीवास्तव का एक दलित पात्र को अपने उपन्यास का नायक बनाकर उसके मुख से ही समय-समाज की पड़ताल कराना विशेष महत्व रखता है।
Mujhe Pahchano
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Sanjeev
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‘मुझे पहचानो’ परम्परा और संस्कृति को एक नई रोशनी में देखने वाला उपन्यास है। इसकी कथा एक ऐसी रियासत से शुरू होती है जिसके लिए सती जैसी नृशंस प्रथा सांस्कृतिक गौरव की हैसियत रखती है। इसके पात्र एक ऐसे समाज में साँस ले रहे हैं जिसमें समानता, स्वतंत्रता और बन्धुत्व जैसे मानवीय मूल्य आकाशकुसुम बने हुए हैं, लेकिन जिसका प्रभुवर्ग अपने कथित सांस्कृतिक गौरव को यथावत रखने के लिए शुचिता को एक अपरिहार्य आवश्यकता बनाकर थोपे हुए है। यह शुचिता है वर्ण की, वर्ग की और रक्त की। लैंगिक और यौन शुचिताएँ भी इसमें शामिल हैं। आश्चर्य नहीं कि पुरुष-वर्चस्व पर टिके इस समाज में सती-प्रथा को व्याधि नहीं, अपनी विशेषता समझा जाता है और उसका धार्मिक-सांस्कृतिक महिमामंडन किया जाता है। इस जड़ता की जड़ें इतने गहरे धँसी हैं कि अधिकतर स्त्रियाँ भी सती को श्रद्धा की निगाह से देखती हैं। यह उपन्यास इसी छद्म गौरवबोध को अनावृत करता है। पुरुष-सत्ता की चालाकियों और उससे उत्पन्न सामाजिक ठहराव को तोड़ते हुए इस उपन्यास की कथा धर्म और धन के घातक गठजोड़ को भी बहुत ठोस रूप में पाठकों के सामने रखती है। संजीव का कथा-लेखन समूचे हिन्दी कथा-संसार में विशिष्ट इसलिए है कि उनकी लेखनी अविचलित भाव से न सिर्फ समाज की कथा कहती है, बल्कि हमें एक वैज्ञानिक दृष्टि देते हुए तर्कों और तथ्यों से भी समृद्ध करती है।
Parth Tumhen Jina Hoga
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Nishpran Gawaah
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Kadambari Mehra
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