Yadon Se Racha Gaon
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Author:
Naresh 'Nadeem', M.N. Shrinivas, M. N. ShrinivasPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences₹
895
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‘यादों से रचा गाँव’ अतीत के दुर्घटनाग्रस्त ब्यौरों को सामने लाने के रचनात्मक संकल्प का परिणाम है। एक हादसे में सारे काग़ज़ात जलकर राख हो जाने के बाद एम.एन. श्रीनिवास ने इस पुस्तक में पूरी तरह अपनी यादों के सहारे अपने क्षेत्रकार्य के अनुभवों की पुनर्रचना की है।</p> <p>प्रस्तुत पुस्तक में यूँ तो दक्षिण भारत के एक बहुजातीय ग्राम का नृतत्त्वशास्त्रीय अध्ययन दिया गया है, लेकिन एक बदलते ग्राम का प्रौद्योगिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और अन्तर्जातीय सम्बन्धों का जिस प्रकार विवेचन किया गया है, वह पूरे भारत के गाँवों की स्थिति को दर्शाता है।</p> <p>‘यादों से रचा गाँव’ में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों, धर्म, परिवार, और कृषि से सम्बन्धित मामलों का भी व्यापक विश्लेषण है। वस्तुत: प्रस्तुत पुस्तक एक ऐसी कृति है जिसे मूल आँकड़ों के समुद्र में गोता लगाकर गाँव की अपनी शब्दावली में रचा गया है।</p> <p>श्रीनिवास जी ने इस पुस्तक में बहुजातीय भारतीय समुदाय के क्षेत्र-अध्ययन का जिस ढंग से वैज्ञानिक विश्लेषण किया है, वह न केवल मानवशास्त्रियों, बल्कि दूसरे सामान्य पाठकों के लिए भी उपयोगी है। इस कृति का प्रमुख आकर्षण इसकी रचनात्मक शैली है।
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‘यादों से रचा गाँव’ अतीत के दुर्घटनाग्रस्त ब्यौरों को सामने लाने के रचनात्मक संकल्प का परिणाम है। एक हादसे में सारे काग़ज़ात जलकर राख हो जाने के बाद एम.एन. श्रीनिवास ने इस पुस्तक में पूरी तरह अपनी यादों के सहारे अपने क्षेत्रकार्य के अनुभवों की पुनर्रचना की है।</p>
<p>प्रस्तुत पुस्तक में यूँ तो दक्षिण भारत के एक बहुजातीय ग्राम का नृतत्त्वशास्त्रीय अध्ययन दिया गया है, लेकिन एक बदलते ग्राम का प्रौद्योगिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और अन्तर्जातीय सम्बन्धों का जिस प्रकार विवेचन किया गया है, वह पूरे भारत के गाँवों की स्थिति को दर्शाता है।</p>
<p>‘यादों से रचा गाँव’ में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों, धर्म, परिवार, और कृषि से सम्बन्धित मामलों का भी व्यापक विश्लेषण है। वस्तुत: प्रस्तुत पुस्तक एक ऐसी कृति है जिसे मूल आँकड़ों के समुद्र में गोता लगाकर गाँव की अपनी शब्दावली में रचा गया है।</p>
<p>श्रीनिवास जी ने इस पुस्तक में बहुजातीय भारतीय समुदाय के क्षेत्र-अध्ययन का जिस ढंग से वैज्ञानिक विश्लेषण किया है, वह न केवल मानवशास्त्रियों, बल्कि दूसरे सामान्य पाठकों के लिए भी उपयोगी है। इस कृति का प्रमुख आकर्षण इसकी रचनात्मक शैली है।
Book Details
-
ISBN9788126701070
-
Pages206
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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मनोविकार एक ऐसा विषय है जिसको लेकर भारतीय समाज में कई तरह के अन्धविश्वास व्याप्त हैं। मानसिक बीमारियाँ भी शरीर की अन्य व्याधियों की ही तरह होती हैं, इस तथ्य को आज भी भारत के लोग स्वीकार नहीं कर पाते। शिक्षित समाज का व्यवहार भी इस मामले में कुछ अलग नहीं है। पहले तो वे हर मनोविकार को पागलपन से जोड़ देते हैं, और इसे छिपाने की कोशिश करने लगते हैं। दूसरे ऐसे अनेक मनोरोग जो व्यक्ति के जीवन पर दीर्घकालीन प्रभाव डालते रहते हैं, उन्हें इलाज के योग्य ही नहीं माना जाता। यही वजह है कि हमारे यहाँ मनोरोग-विशेषज्ञों की भी भारी कमी है, और उनके स्थान पर झाड़-फूँक और गंडा-ताबीज का बोलबाला है।
अपने मौजूदा हालात से सामंजस्य न बिठा पाने की स्थिति को मानसिक तनाव कहा जाता है, इस परिभाषा की रोशनी में देखें तो हमारे आसपास कोई भी ऐसा नहीं है जो आज की बदलती हुई सामाजिक-पारिवारिक-नैतिक और आर्थिक परिस्थितियों के चलते तनाव से पूरी तरह मुक्त हो। तनाव की शुरुआती अवस्थाओं से लेकर सिज़ोफ्रेनिया और पागलपन तक मनोविकारों की एक लम्बी शृंखला होती है। इसलिए यह जरूरी है कि इस समस्या को गंभीरता से लिया जाए और तनाव कम करने की आध्यात्मिक विधियाँ बेचनेवाले गुरुओं और बाबाओं की शरण में जाने के बजाय इसे वैज्ञानिक ढंग से देखा-समझा जाए।
तार्किक जीवन-पद्धति के जुझारू पैरोकार नरेंद्र दाभोलकर की यह पुस्तक इसी विषय पर केन्द्रित है। इस पुस्तक का लेखन उन्होंने मनोविकार विशेषज्ञ हमीद दाभोलकर के साथ संयुक्त रूप से किया है। इस तरह एक तरफ़ जहाँ हम इसमें मानसिक विकारों की संरचना का वैज्ञानिक परिचय पाते हैं, वहीं भारतीय समाज में मनोरोगों को लेकर जो धार्मिक-सामाजिक और आध्यात्मिक अन्धविश्वास व्याप्त हैं, उनकी विसंगतियों को भी समझ पाते हैं। साथ ही मनोविकारों और उनके उपचार, मन के व्यवहार, बच्चों और स्त्रियों के मनोविकार तथा व्यसनों से जुड़े मानसिक दोषों को भी तर्कसंगत रूप में यहाँ विश्लेषित किया गया है?
Gatiman Bharat
- Author Name:
K.J. Alphons +1
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गतिमान भारत' पुस्तक मोदी सरकार के विगत आठ वर्षो में सरकार की नीतियों और नागरिकों के साथ ही देश पर उनके प्रभाव का अत्यंत व्यावहारिक और वस्तुपरक मूल्यांकन करती है। यह शिक्षा, डिजिटल क्रांति, कृषि, उद्योग, पर्यावरण, ग्रामीण विकास, स्वच्छता, बुनियादी ढाँचे, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था सहित पच्चीस प्रमुख क्षेत्रों पर विहंगम दृष्टि डालती है। प्रत्येक अध्याय में संबंधित क्षेत्र का अनुभव रखनेवाले विशेषज्ञों एवं प्रख्यात सिविल सेवकों ने अपने गहन अध्ययन के आधार पर भारत को गति देने में विभिन्न सरकारी नीतियों और योजनाओं के प्रभाव की विवचना की है। इनमें से कुछ क्षेत्रों में पूर्ण सुधार हुआ है, जबकि अन्य क्षेत्रों को दक्ष बनाने के लिए उन्हें फिर से व्यवस्थित किया गया है। प्रधानमंत्री मोदीजी के नेतृत्व में भारतीय लोकतंत्र ने जो सफर तय किया है और प्रत्येक क्षेत्र में आगे की जो राह है, उस पर एक वस्तुनिष्ठ एवं अनुभवजन्य विश्लेषण को प्रस्तुत करना ही इस पुस्तक का उद्देश्य है। भारत के चहुँमुखी विकास और विश्व में भारत के बढ़ते सम्मान और स्वीकार्यता का दिग्दर्शन करवाती यह पुस्तक हर भारतीय को स्वर्णिम भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है। Hindi Translation of Accelerating India
Vishwas Aur Andhvishwas
- Author Name:
Narendra Dabholkar +3
- Book Type:

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विश्वास क्या है? कब वह अन्धविश्वास का रूप ले लेता है? हमारे संस्कार हमारे विचारों और विश्वासों पर क्या असर डालते हैं? समाज में प्रचलित धारणाएँ कैसे धीरे-धीरे सामूहिक श्रद्धा और विश्वास का रूप ले लेती हैं। टेलीविज़न जैसे आधुनिक आविष्कार के सामने मोबाइल साथ में लेकर बैठा व्यक्ति भी चमत्कारों, भविष्यवाणियों और भूत-प्रेतों से सम्बन्धित कहानियों पर क्यों विश्वास करता रहता है? क्यों कोई समाज लौट-लौटकर धार्मिक जड़तावाद और प्रतिक्रियावादी-पश्चमुखी राजनीतिक और सामाजिक धारणाओं की तरफ़ जाता रहता है?
क्या यह संसार किसी ईश्वर द्वारा की गई रचना है? या अपने कार्य-कारण के नियमों से चलनेवाला एक यंत्र है? ईश्वर के होने या न होने से हमारी सोच तथा जीवन-शैली पर क्या असर पड़ेगा? वह हमारे लिए क्या करता है और क्या नहीं करता? क्या वह ख़ुद ही हमारी रचना है? मन क्या है, उसके रहस्य हमें कैसे प्रकाशित या दिग्भ्रमित करते हैं? फल-ज्योतिष और भूत-प्रेत हमारे मन के किस ख़ाली और असहाय कोने में सहारा बनकर आते हैं? क्या अन्धविश्वासों का विरोध नैतिकता का विरोध है? क्या धार्मिक जड़ताओं पर कुठाराघात करना सामाजिक व्यक्ति को नीति से स्खलित करता है? या इससे वह ज्यादा स्वनिर्भर, स्वायत्त, स्वतंत्र और सुखी होता है?
स्त्रियों के जीवन में अन्धविश्वासों और अन्धश्रद्धा की क्या भूमिका होती है? वे ही क्यों अनेक अन्धविश्वासों की कर्ता और विषय दोनों हो जाती हैं? इस पुस्तक की रचना इन तथा इन जैसे ही अनेक प्रश्नों को लेकर की गई है। नरेंद्र दाभोलकर के अन्धविश्वास या अन्धश्रद्धा आन्दोलन की वैचारिक-सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक पृष्ठभूमि इस पुस्तक में स्पष्ट तौर पर आ गई है जिसकी रचना उन्होंने आन्दोलन के दौरान उठाए जानेवाले प्रश्नों और आशंकाओं का जवाब देने के लिए की।
Dharma Ki Sadhana
- Author Name:
Swami Vivekanand
- Book Type:

- Description:
स्वामी विवेकानंद ने भारत में उस समय अवतार लिया, जब यहाँ हिंदू धर्म के अस्तित्व पर संकट के बादल मँडरा रहे थे। पंडित-पुरोहितों ने हिंदू धर्म को घोर आडंबरवादी और अंधविश्वासपूर्ण बना दिया था। ऐसे में स्वामी विवेकानंद ने हिंदू धर्म को एक अलग पहचान दिलाई। स्वामीजी का विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है। यहीं बड़े-बड़े महात्माओं तथा ऋषियों का जन्म हुआ; यह संन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यहीं आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिए जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है। प्रस्तुत पुस्तक ' धर्म की साधना' में स्वामीजी ने भारत के प्राचीन गौरव का उल्लेख करते हुए देश के युवकों का आह्वान किया है कि यही उचित समय है, जब वे हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना में जुट जाएँ और भारतीय पुनर्जागरण में सहभागी बनें। सही अर्थों में धर्म की साधना करना, उस पर चलना सिखाने वाली प्रेरणादायी पुस्तक!
Mahila Lekhan Ke Sau Varsh
- Author Name:
Mamta Kaliya +1
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लेखन में बीसवीं सदी से आज तक का समय यदि एक प्रस्थान-बिन्दु के रूप में लिया जाए तो यह स्पष्ट है कि इन सौ वर्षों में स्त्रियों की लेखनी में सबसे अधिक परिवर्तन की प्रक्रिया दिखी। पुरुष-लेखन में मात्र एक पात्र होने की भूमिका से निकलकर स्त्री-लेखक ने स्वयं अपनी क़लम से अस्तित्व, व्यक्तित्व और विचार को अभिव्यक्ति देना अभीष्ट समझा। प्रस्तुत संकलन में स्त्री-रचनाकारों के कोमल संवेगों के साथ-साथ आत्मसजग सृजन और विकास-प्रक्रिया का परिचय मिलता है। राजेन्द्र बाला घोष (बंग महिला) से लेकर अलका सरावगी तक एक लम्बी परम्परा तैयार हुई है जहाँ क़लम की साँकलें कहीं अनायास तो कहीं सायास खुली हैं। हर्ष और गर्व का विषय है कि महिला-लेखन अब हिन्दी साहित्य में एक सशक्त सचेत और संवेदनायुक्त धारा है। आनेवाला समय यह याद रखे कि अपने इर्द-गिर्द खड़े किए समस्त चौखटे और कोष्ठक तोड़कर इक्कीसवीं सदी की स्त्री अपने पूरे तेवर के साथ हर क्षेत्र में उठ खड़ी हुई है। प्रस्तुत संकलन में हमें कहानी और निबन्ध, जीवनी और संस्मरण, आलोचना और विमर्श, गोया हर विधा और विषय पर स्त्री की तेजस्विता का परिचय मिलेगा। महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी से लेकर गीतांजलि श्री, मधु कांकरिया, सारा राय और अलका सरावगी तक अपने पूरे तेवर के साथ यहाँ मौजूद हैं। पृष्ठ सीमा के चलते कई विधाओं का मात्र उल्लेख ही कर पाये हैं। यहीं से अगले खंड की सम्भावना नज़र आती है।
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