Pani Ka Shap : Bihar Mein Badh-Sukhad
About the book
जो प्रायः हर साल बाढ़ या सूखे के कारण और कभी-कभी दोनों कारणों से चर्चा में बना रहता है। उत्तर बिहार में जहाँ सहायक धाराओं समेत नदियों की संख्या बहुत अधिक है, बाढ़ का क्षेत्र बना रहता है। ऐसा भी होता है कि नेपाल के क्षेत्र में अच्छी-खासी वर्षा हो जाने पर बिहार में बाढ़ आ जाती है और ऐसे समय में अगर स्थानीय वर्षा यहाँ न हो तो जहाँ-जहाँ नदी का पानी पहुँच जाता है वहाँ तो बाढ़ रहती है पर उसके ठीक बगल में आधे-पौने किलोमीटर के फासले पर सूखे का ही साम्राज्य बना रहता है। राज्य में गंगा के दक्षिण वाला इलाका, अगर आसमान से पानी न बरसे तो वर्षाभाव से त्रस्त रहता है। सिंचाई के क्षेत्र में आजादी के बाद बहुत प्रगति हुई है पर मौसम की अनिश्चितता अभी भी इन प्रयासों पर भारी पड़ती है। समय से अगर खेतों में बीज पड़ जाएँ, धान की रोपनी हो जाए, कुछ-कुछ भी पानी बरसता रहे और हथिया नक्षत्र की वर्षा समय से हो जाए तो किसान गंगा नहाएँ। 5 जनवरी, 1950 को पटना में पूना की सेंट्रल वाटरवेज, इरिगेशन एंड नेविगेशन कमीशन के एक्सीक्यूटिव इंजीनियर का बयान प्रमुखता से बिहार के अखबारों में छपा था जिसमें कहा गया था कि नेपाल में बराहक्षेत्र में कुतुबमीनार से तीन गुना ऊँचा बाँध बनेगा। उसके निर्माण से बिहार की बाढ़ और सिंचाई की समस्या का समाधान हो जाएगा। न यह बाँध बना और न समस्या का समाधान हुआ। यह अगर बन भी जाए तो इससे हमारी कितनी जरूरतें पूरी होंगी, यह विचारणीय विषय है। इतना जरूर हुआ कि विपत्ति के समय राहत-सामग्री मिलने लगी पर वह तो समाधान नहीं है। राहत सामग्री कितने दिन तक चल पाती है, यह तो हम सब जानते हैं। एक बदलाव जरूर स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि हमारे श्रमिक जो पहले बंगाल या असम की तरफ जाते थे वे अब देश के पश्चिम और दक्षिण के राज्यों की तरफ जाने लगे हैं। रेलगाड़ियों के नाम श्रमजीवी एक्सप्रेस, गरीब रथ, श्रमशक्ति एक्सप्रेस आदि रखकर हमने अपनी स्थिति देश के सामने स्पष्ट कर दी है। विकल्प के रूप में हमने राज्य की नदियों के किनारे तटबन्ध बनाए जिनकी लम्बाई 1950 के दशक में 160 कि.मी. थी और अब लगभग 3800 कि.मी. है। परिणाम हुआ कि तब राज्य का बाढ़ प्रवण क्षेत्र 25 लाख हेक्टेयर था, अब लगभग 74 लाख हेक्टेयर है। परिणाम की दृष्टि से यह एक चिन्ता का विषय होना चाहिए था पर इस पर कोई बहस नहीं होती। इस प्रयास का मूल्यांकन आवश्यक है और इसके विकल्पों की तलाश होनी चाहिए।
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About the Book
जो प्रायः हर साल बाढ़ या सूखे के कारण और कभी-कभी दोनों कारणों से चर्चा में बना रहता है। उत्तर बिहार में जहाँ सहायक धाराओं समेत नदियों की संख्या बहुत अधिक है, बाढ़ का क्षेत्र बना रहता है। ऐसा भी होता है कि नेपाल के क्षेत्र में अच्छी-खासी वर्षा हो जाने पर बिहार में बाढ़ आ जाती है और ऐसे समय में अगर स्थानीय वर्षा यहाँ न हो तो जहाँ-जहाँ नदी का पानी पहुँच जाता है वहाँ तो बाढ़ रहती है पर उसके ठीक बगल में आधे-पौने किलोमीटर के फासले पर सूखे का ही साम्राज्य बना रहता है। राज्य में गंगा के दक्षिण वाला इलाका, अगर आसमान से पानी न बरसे तो वर्षाभाव से त्रस्त रहता है। सिंचाई के क्षेत्र में आजादी के बाद बहुत प्रगति हुई है पर मौसम की अनिश्चितता अभी भी इन प्रयासों पर भारी पड़ती है। समय से अगर खेतों में बीज पड़ जाएँ, धान की रोपनी हो जाए, कुछ-कुछ भी पानी बरसता रहे और हथिया नक्षत्र की वर्षा समय से हो जाए तो किसान गंगा नहाएँ।
5 जनवरी, 1950 को पटना में पूना की सेंट्रल वाटरवेज, इरिगेशन एंड नेविगेशन कमीशन के एक्सीक्यूटिव इंजीनियर का बयान प्रमुखता से बिहार के अखबारों में छपा था जिसमें कहा गया था कि नेपाल में बराहक्षेत्र में कुतुबमीनार से तीन गुना ऊँचा बाँध बनेगा। उसके निर्माण से बिहार की बाढ़ और सिंचाई की समस्या का समाधान हो जाएगा। न यह बाँध बना और न समस्या का समाधान हुआ। यह अगर बन भी जाए तो इससे हमारी कितनी जरूरतें पूरी होंगी, यह विचारणीय विषय है। इतना जरूर हुआ कि विपत्ति के समय राहत-सामग्री मिलने लगी पर वह तो समाधान नहीं है। राहत सामग्री कितने दिन तक चल पाती है, यह तो हम सब जानते हैं। एक बदलाव जरूर स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि हमारे श्रमिक जो पहले बंगाल या असम की तरफ जाते थे वे अब देश के पश्चिम और दक्षिण के राज्यों की तरफ जाने लगे हैं। रेलगाड़ियों के नाम श्रमजीवी एक्सप्रेस, गरीब रथ, श्रमशक्ति एक्सप्रेस आदि रखकर हमने अपनी स्थिति देश के सामने स्पष्ट कर दी है।
विकल्प के रूप में हमने राज्य की नदियों के किनारे तटबन्ध बनाए जिनकी लम्बाई 1950 के दशक में 160 कि.मी. थी और अब लगभग 3800 कि.मी. है। परिणाम हुआ कि तब राज्य का बाढ़ प्रवण क्षेत्र 25 लाख हेक्टेयर था, अब लगभग 74 लाख हेक्टेयर है। परिणाम की दृष्टि से यह एक चिन्ता का विषय होना चाहिए था पर इस पर कोई बहस नहीं होती। इस प्रयास का मूल्यांकन आवश्यक है और इसके विकल्पों की तलाश होनी चाहिए।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2026
- Weight
- 530 grams
- ISBN-13
- 9789360863494
- Pages
- 434
- Reading time
- ~14 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 17.5 × 24 cm
- Language
- Hindi
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