Pani Ka Shap : Bihar Mein Badh-Sukhad
(0)
Author:
Dinesh Kumar MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences₹
599
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जो प्रायः हर साल बाढ़ या सूखे के कारण और कभी-कभी दोनों कारणों से चर्चा में बना रहता है। उत्तर बिहार में जहाँ सहायक धाराओं समेत नदियों की संख्या बहुत अधिक है, बाढ़ का क्षेत्र बना रहता है। ऐसा भी होता है कि नेपाल के क्षेत्र में अच्छी-खासी वर्षा हो जाने पर बिहार में बाढ़ आ जाती है और ऐसे समय में अगर स्थानीय वर्षा यहाँ न हो तो जहाँ-जहाँ नदी का पानी पहुँच जाता है वहाँ तो बाढ़ रहती है पर उसके ठीक बगल में आधे-पौने किलोमीटर के फासले पर सूखे का ही साम्राज्य बना रहता है। राज्य में गंगा के दक्षिण वाला इलाका, अगर आसमान से पानी न बरसे तो वर्षाभाव से त्रस्त रहता है। सिंचाई के क्षेत्र में आजादी के बाद बहुत प्रगति हुई है पर मौसम की अनिश्चितता अभी भी इन प्रयासों पर भारी पड़ती है। समय से अगर खेतों में बीज पड़ जाएँ, धान की रोपनी हो जाए, कुछ-कुछ भी पानी बरसता रहे और हथिया नक्षत्र की वर्षा समय से हो जाए तो किसान गंगा नहाएँ। 5 जनवरी, 1950 को पटना में पूना की सेंट्रल वाटरवेज, इरिगेशन एंड नेविगेशन कमीशन के एक्सीक्यूटिव इंजीनियर का बयान प्रमुखता से बिहार के अखबारों में छपा था जिसमें कहा गया था कि नेपाल में बराहक्षेत्र में कुतुबमीनार से तीन गुना ऊँचा बाँध बनेगा। उसके निर्माण से बिहार की बाढ़ और सिंचाई की समस्या का समाधान हो जाएगा। न यह बाँध बना और न समस्या का समाधान हुआ। यह अगर बन भी जाए तो इससे हमारी कितनी जरूरतें पूरी होंगी, यह विचारणीय विषय है। इतना जरूर हुआ कि विपत्ति के समय राहत-सामग्री मिलने लगी पर वह तो समाधान नहीं है। राहत सामग्री कितने दिन तक चल पाती है, यह तो हम सब जानते हैं। एक बदलाव जरूर स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि हमारे श्रमिक जो पहले बंगाल या असम की तरफ जाते थे वे अब देश के पश्चिम और दक्षिण के राज्यों की तरफ जाने लगे हैं। रेलगाड़ियों के नाम श्रमजीवी एक्सप्रेस, गरीब रथ, श्रमशक्ति एक्सप्रेस आदि रखकर हमने अपनी स्थिति देश के सामने स्पष्ट कर दी है। विकल्प के रूप में हमने राज्य की नदियों के किनारे तटबन्ध बनाए जिनकी लम्बाई 1950 के दशक में 160 कि.मी. थी और अब लगभग 3800 कि.मी. है। परिणाम हुआ कि तब राज्य का बाढ़ प्रवण क्षेत्र 25 लाख हेक्टेयर था, अब लगभग 74 लाख हेक्टेयर है। परिणाम की दृष्टि से यह एक चिन्ता का विषय होना चाहिए था पर इस पर कोई बहस नहीं होती। इस प्रयास का मूल्यांकन आवश्यक है और इसके विकल्पों की तलाश होनी चाहिए।
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जो प्रायः हर साल बाढ़ या सूखे के कारण और कभी-कभी दोनों कारणों से चर्चा में बना रहता है। उत्तर बिहार में जहाँ सहायक धाराओं समेत नदियों की संख्या बहुत अधिक है, बाढ़ का क्षेत्र बना रहता है। ऐसा भी होता है कि नेपाल के क्षेत्र में अच्छी-खासी वर्षा हो जाने पर बिहार में बाढ़ आ जाती है और ऐसे समय में अगर स्थानीय वर्षा यहाँ न हो तो जहाँ-जहाँ नदी का पानी पहुँच जाता है वहाँ तो बाढ़ रहती है पर उसके ठीक बगल में आधे-पौने किलोमीटर के फासले पर सूखे का ही साम्राज्य बना रहता है। राज्य में गंगा के दक्षिण वाला इलाका, अगर आसमान से पानी न बरसे तो वर्षाभाव से त्रस्त रहता है। सिंचाई के क्षेत्र में आजादी के बाद बहुत प्रगति हुई है पर मौसम की अनिश्चितता अभी भी इन प्रयासों पर भारी पड़ती है। समय से अगर खेतों में बीज पड़ जाएँ, धान की रोपनी हो जाए, कुछ-कुछ भी पानी बरसता रहे और हथिया नक्षत्र की वर्षा समय से हो जाए तो किसान गंगा नहाएँ।
5 जनवरी, 1950 को पटना में पूना की सेंट्रल वाटरवेज, इरिगेशन एंड नेविगेशन कमीशन के एक्सीक्यूटिव इंजीनियर का बयान प्रमुखता से बिहार के अखबारों में छपा था जिसमें कहा गया था कि नेपाल में बराहक्षेत्र में कुतुबमीनार से तीन गुना ऊँचा बाँध बनेगा। उसके निर्माण से बिहार की बाढ़ और सिंचाई की समस्या का समाधान हो जाएगा। न यह बाँध बना और न समस्या का समाधान हुआ। यह अगर बन भी जाए तो इससे हमारी कितनी जरूरतें पूरी होंगी, यह विचारणीय विषय है। इतना जरूर हुआ कि विपत्ति के समय राहत-सामग्री मिलने लगी पर वह तो समाधान नहीं है। राहत सामग्री कितने दिन तक चल पाती है, यह तो हम सब जानते हैं। एक बदलाव जरूर स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि हमारे श्रमिक जो पहले बंगाल या असम की तरफ जाते थे वे अब देश के पश्चिम और दक्षिण के राज्यों की तरफ जाने लगे हैं। रेलगाड़ियों के नाम श्रमजीवी एक्सप्रेस, गरीब रथ, श्रमशक्ति एक्सप्रेस आदि रखकर हमने अपनी स्थिति देश के सामने स्पष्ट कर दी है।
विकल्प के रूप में हमने राज्य की नदियों के किनारे तटबन्ध बनाए जिनकी लम्बाई 1950 के दशक में 160 कि.मी. थी और अब लगभग 3800 कि.मी. है। परिणाम हुआ कि तब राज्य का बाढ़ प्रवण क्षेत्र 25 लाख हेक्टेयर था, अब लगभग 74 लाख हेक्टेयर है। परिणाम की दृष्टि से यह एक चिन्ता का विषय होना चाहिए था पर इस पर कोई बहस नहीं होती। इस प्रयास का मूल्यांकन आवश्यक है और इसके विकल्पों की तलाश होनी चाहिए।
Book Details
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ISBN9789360863494
-
Pages434
-
Avg Reading Time14 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: दीर्घकाल तक भारतवर्ष का विश्व के श्रेष्ठ राष्ट्रों में सम्मानित स्थान था। कालांतर में आक्रांताओं के कारण भारत की प्रतिष्ठा धूमिल हुई। स्वाधीनता के पश्चात् देश का पुनरुत्थान एवं विकास तीक्रगति से हुआ है। स्वाधीनता के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आगामी 25 वर्षों के पश्चात् अर्थात् स्वाधीनता के 100वें वर्ष में भारत कैसा होगा? कैसा होना चाहिए? हमारे संकल्प कया हैं ? ये सब संवाद एवं विमर्श इस पुस्तक का मुख्य विषय है, जिसमें राष्ट्र जीवन के विभिन्न आयामों पर बुद्धिशील वर्ग के 16 प्रतिनिधियों ने सपनों के भारत और संभावित वास्तविकता पर लेखन के माध्यम से संवाद किया है। ग्रामीण जीवन से लेकर वैश्विक भारत, धर्म-संस्कृति के साथ-साथ टेक्नोलॉजी, वित्तीय व्यवस्थाओं व राष्ट्रीय सुरक्षा आदि से संबंधित 100 वर्ष की आयु के भारत के स्वरूप की कल्पना शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत की गई है। कुल मिलाकर भारतीय समाज का सामूहिक सपना इन प्रकाशनों में प्रस्तुत है। पंचनद शोध संस्थान द्वारा आयोजित इस संवाद में राष्ट्र के बौद्धिक योद्धाओं ने मन की बात की है। संस्थान मानता है कि आलेखों में केवल सपना या कल्पना नहीं है, इसे कार्ययोजना भी माना जा सकता है।
Gatiman Bharat
- Author Name:
K.J. Alphons +1
- Book Type:

- Description: गतिमान भारत' पुस्तक मोदी सरकार के विगत आठ वर्षो में सरकार की नीतियों और नागरिकों के साथ ही देश पर उनके प्रभाव का अत्यंत व्यावहारिक और वस्तुपरक मूल्यांकन करती है। यह शिक्षा, डिजिटल क्रांति, कृषि, उद्योग, पर्यावरण, ग्रामीण विकास, स्वच्छता, बुनियादी ढाँचे, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था सहित पच्चीस प्रमुख क्षेत्रों पर विहंगम दृष्टि डालती है। प्रत्येक अध्याय में संबंधित क्षेत्र का अनुभव रखनेवाले विशेषज्ञों एवं प्रख्यात सिविल सेवकों ने अपने गहन अध्ययन के आधार पर भारत को गति देने में विभिन्न सरकारी नीतियों और योजनाओं के प्रभाव की विवचना की है। इनमें से कुछ क्षेत्रों में पूर्ण सुधार हुआ है, जबकि अन्य क्षेत्रों को दक्ष बनाने के लिए उन्हें फिर से व्यवस्थित किया गया है। प्रधानमंत्री मोदीजी के नेतृत्व में भारतीय लोकतंत्र ने जो सफर तय किया है और प्रत्येक क्षेत्र में आगे की जो राह है, उस पर एक वस्तुनिष्ठ एवं अनुभवजन्य विश्लेषण को प्रस्तुत करना ही इस पुस्तक का उद्देश्य है। भारत के चहुँमुखी विकास और विश्व में भारत के बढ़ते सम्मान और स्वीकार्यता का दिग्दर्शन करवाती यह पुस्तक हर भारतीय को स्वर्णिम भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है। Hindi Translation of Accelerating India
Sangharsh Narmada Ka
- Author Name:
Nandini Oza
- Book Type:

- Description: ‘संघर्ष नर्मदा का’ नर्मदा बचाओ आन्दोलन में नर्मदा घाटी के लोगों, ख़ासकर आदिवासी समुदाय के योगदान, संघर्ष और बलिदानों की कहानी को उनके ही नज़रिये से सामने लाती है। सरदार सरोवर बाँध से प्रभावित आदिवासियों के जीवन, विस्थापन और पुनर्स्थापन की पीड़ाजनक प्रक्रिया के ब्योरे इस किताब में दर्ज हैं जो प्रकृति-अनुकूल जीवनशैली और विनाशकारी विकास-प्रक्रिया के द्वन्द्व के हवाले से, मानव समाज की भावी चुनौतियों और समाधान की ओर संकेत करते हैं। वाचिक इतिहास की अहमियत को रेखांकित करती हुई यह किताब बतलाती है कि स्मृति को सुनना एक राजनीतिक कर्म भी हो सकता है और परिवर्तनकारी भी। कार्यकर्ताओं, पयार्वरण-अध्येताओं, नृतत्त्व में रुचि रखनेवालों तथा मानवाधिकारों की पैरवी करनेवाले लोगों के लिए यह किताब एक ज़रूरी पाठ है।
Man-Man Ke Sawal
- Author Name:
Narendra Dabholkar
- Book Type:

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Description:
मनोविकार एक ऐसा विषय है जिसको लेकर भारतीय समाज में कई तरह के अन्धविश्वास व्याप्त हैं। मानसिक बीमारियाँ भी शरीर की अन्य व्याधियों की ही तरह होती हैं, इस तथ्य को आज भी भारत के लोग स्वीकार नहीं कर पाते। शिक्षित समाज का व्यवहार भी इस मामले में कुछ अलग नहीं है। पहले तो वे हर मनोविकार को पागलपन से जोड़ देते हैं, और इसे छिपाने की कोशिश करने लगते हैं। दूसरे ऐसे अनेक मनोरोग जो व्यक्ति के जीवन पर दीर्घकालीन प्रभाव डालते रहते हैं, उन्हें इलाज के योग्य ही नहीं माना जाता। यही वजह है कि हमारे यहाँ मनोरोग-विशेषज्ञों की भी भारी कमी है, और उनके स्थान पर झाड़-फूँक और गंडा-ताबीज का बोलबाला है।
अपने मौजूदा हालात से सामंजस्य न बिठा पाने की स्थिति को मानसिक तनाव कहा जाता है, इस परिभाषा की रोशनी में देखें तो हमारे आसपास कोई भी ऐसा नहीं है जो आज की बदलती हुई सामाजिक-पारिवारिक-नैतिक और आर्थिक परिस्थितियों के चलते तनाव से पूरी तरह मुक्त हो। तनाव की शुरुआती अवस्थाओं से लेकर सिज़ोफ्रेनिया और पागलपन तक मनोविकारों की एक लम्बी शृंखला होती है। इसलिए यह जरूरी है कि इस समस्या को गंभीरता से लिया जाए और तनाव कम करने की आध्यात्मिक विधियाँ बेचनेवाले गुरुओं और बाबाओं की शरण में जाने के बजाय इसे वैज्ञानिक ढंग से देखा-समझा जाए।
तार्किक जीवन-पद्धति के जुझारू पैरोकार नरेंद्र दाभोलकर की यह पुस्तक इसी विषय पर केन्द्रित है। इस पुस्तक का लेखन उन्होंने मनोविकार विशेषज्ञ हमीद दाभोलकर के साथ संयुक्त रूप से किया है। इस तरह एक तरफ़ जहाँ हम इसमें मानसिक विकारों की संरचना का वैज्ञानिक परिचय पाते हैं, वहीं भारतीय समाज में मनोरोगों को लेकर जो धार्मिक-सामाजिक और आध्यात्मिक अन्धविश्वास व्याप्त हैं, उनकी विसंगतियों को भी समझ पाते हैं। साथ ही मनोविकारों और उनके उपचार, मन के व्यवहार, बच्चों और स्त्रियों के मनोविकार तथा व्यसनों से जुड़े मानसिक दोषों को भी तर्कसंगत रूप में यहाँ विश्लेषित किया गया है?
Operation SINDOOR
- Author Name:
Lt Gen KJS 'Tiny' Dhillon
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- Book Type:

- Description: On 22 April 2025, the Baisaran Valley in Pahalgam, south Kashmir, witnessed a horrifying attack when heavily armed terrorists from the Resistance Front, a proxy of Lashkar-e-Taiba (LeT), fully sponsored by the Pakistan Army and Inter-Services Intelligence (ISI), shattered its serenity with gunfire, killing twenty-six innocent individuals and injuring several others. The victims included newlyweds, elderly parents and solo trekkers. A Hindu professor narrowly escaped death by reciting the kalma, a Christian sacrificed his life to save his family and a local Muslim was killed while saving others. This was an attempt to rupture India’s religious harmony and create widespread outrage in the country. India chose to respond to this incident, which shook not just the nation but the world, with Operation SINDOOR, showcasing its military modernization and might. The mission targeted terror camps, including the ones in Bahawalpur and Muridke, linked to Jaish-e-Mohammed and LeT, respectively, and terrorist launch pads in Pakistan-occupied Jammu and Kashmir. India’s response demonstrated military professionalism, technological maturity and diplomatic sagacity, ensuring regional stability while delivering a powerful message against Pakistan and its terror factory. This book carries minute details and a blow-by-blow account of the ‘Four-Day War’ between two hostile nuclear powers. The author underscores the intelligent use of media and social media in the battle of narratives, discusses the ‘new normal’ and emerging rules of engagement, and suggests a way forward. Offering hitherto unrevealed information, Lt Gen. ‘Tiny’ Dhillon (Retd) opens a window to Operation SINDOOR, a testament to the strength of the Indian military and the unity of India when confronted with an adverse situation. With visuals from the destroyed target areas, this book is a powerful reminder of the impact of terrorism and the enduring hope for peace and justice. Operation SINDOOR is a must-read for everyone.
Jaati Janaganana
- Author Name:
Dr. Laxman Yadav
- Book Type:

- Description: जाति जनगणना का सवाल सिर्फ़ आँकड़ों का सवाल नहीं है। यह सत्ता, संसाधन, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय का सवाल है। यह किताब इसी सवाल को इतिहास की गहराई, राजनीति की जटिलता और समाज की संरचना के साथ जोड़कर देखती है। डॉ. लक्ष्मण यादव की यह पुस्तक जाति जनगणना को किसी ख़ास दौर तक सीमित नहीं करती, बल्कि उसे मानव सभ्यता की शुरुआती गिनतियों से लेकर आज़ाद भारत की राजनीतिक बहसों तक फैले लंबे सामाजिक-सांस्कृतिक प्रवाह में रखती है। किताब का बड़ा हिस्सा आधुनिक भारत में जाति जनगणना के इर्द-गिर्द खड़े आंदोलनों और विचारधाराओं पर केंद्रित है। फुले-शाहू-आंबेडकर, अय्यंकाली, नारायण गुरु, त्रिवेणी संघ, अर्जक संघ, समाजवादी आंदोलन, पिछड़ा वर्ग आयोगों, मंडल आयोग और मंडल आंदोलन से होते हुए कांशीराम के बहुजन विचार तक। यह किताब दिखाती है कि जाति जनगणना कैसे ‘जात से जमात बनाने’ का बुनियादी ज़रिया है। जाति जनगणना ने बहुजन गोलबंदी, राजनीतिक चेतना और सामाजिक परिवर्तन का औज़ार बनी। शैली के स्तर पर यह किताब आम पाठकों के लिए लिखी गई है, मगर इसके भीतर मौजूद सवाल पूरी तरह अकादमिक हैं। ये किताब उन तमाम सवालों का जवाब देती है, जिनको लेकर या तो भ्रम की स्थितियाँ हैं या अज्ञानता की। इस किताब सबसे बड़ी खासियत है— जटिल सामाजिक और ऐतिहासिक विमर्श को सरल, प्रवाहपूर्ण और संवादात्मक भाषा में प्रस्तुत करना। जाति जनगणना दरअसल जाति की राजनीति, सामाजिक न्याय के वैचारिक संघर्ष और भारतीय लोकतंत्र की अधूरी परियोजना पर एक गंभीर, मगर पठनीय हस्तक्षेप है।
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