Bharat Ke Madhya Varg Ki Ajeeb Dastan
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Abhay Kumar Dube, Pawan Kumar VermaPublisher:
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HindiCategory:
Society-social-sciences₹
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भारत 1991 में जैसे ही आर्थिक सुधारों और भूमंडलीकरण की डगर पर चला, वैसे ही इस देश के मध्यवर्ग को एक नया महत्त्व प्राप्त हो गया। नई अर्थनीति के नियोजकों ने मध्यवर्ग को ‘शहरी भारत’ के रूप में देखा जो उनके लिए विश्व के सबसे बड़े बाज़ारों में से एक था। एक सर्वेक्षण ने घोषित कर दिया कि यह ‘शहरी भारत अपने आप में दुनिया के तीसरे सबसे बड़े देश के बराबर है।’ लेकिन, भारतीय मध्यवर्ग कोई रातोंरात बन जानेवाली सामाजिक संरचना नहीं थी<strong>।</strong> उपभोक्तावादी परभक्षी के रूप में इसकी खोज किए जाने से कहीं पहले इस वर्ग का एक अतीत और एक इतिहास भी था<strong>।</strong> भारत के मध्यवर्ग की अजीब दास्ताँ में पवन कुमार वर्मा ने इसी प्रस्थान बिन्दु से बीसवीं शताब्दी में मध्यवर्ग के उद्भव और विकास की विस्तृत जाँच-पड़ताल की है<strong>।</strong> उन्होंने आज़ादी के बाद के पचास वर्षों को ख़ास तौर से अपनी विवेचना का केन्द्र बनाया है<strong>।</strong> वे आर्थिक उदारीकरण से उपजे समृद्धि के आशावाद को इस वर्ग की मानसिकता और प्रवृत्तियों की रोशनी में देखते हैं<strong>।</strong> उन्होंने रातोंरात अमीर बन जाने की मध्यवर्गीय स्वैर कल्पना को नितान्त ग़रीबी में जीवन-यापन कर रहे असंख्य भारतवासियों के निर्मम यथार्थ की कसौटी पर भी कसा है<strong>।</strong></p> <p>मध्यवर्ग की यह अजीब दास्ताँ आज़ादी के बाद हुए घटनाक्रम का गहराई से जायज़ा लेती है<strong>।</strong> भारत-चीन युद्ध और नेहरू की मृत्यु से लेकर आपातकाल व मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने की घोषणा तक इस दास्ताँ में मध्यवर्ग एक ऐसे ख़ुदग़र्ज़ तबक़े के रूप में उभरता है जिसने बार-बार न्यायपूर्ण समाज बनने के अपने ही घोषित लक्ष्यों के साथ ग़द्दारी की है<strong>।</strong> लोकतंत्र और चुनाव-प्रक्रिया के प्रति मध्यवर्ग की प्रतिबद्धता दिनोंदिन कमज़ोर होती जा रही है<strong>।</strong> मध्यवर्ग ऐसी किसी गतिविधि या सच्चाई से कोई वास्ता नहीं रखना चाहता जिसका उसकी आर्थिक ख़ुशहाली से सीधा वास्ता न हो<strong>।</strong> आर्थिक उदारीकरण ने उसके इस रवैये को और भी बढ़ावा दिया है<strong>।</strong></p> <p>पुस्तक के आख़िरी अध्याय में पवन कुमार वर्मा ने बड़ी शिद्दत के साथ दलील दी है कि कामयाब लोगों द्वारा समाज से अपने-आपको काट लेने की यह परियोजना भारत जैसे देश के लिए ख़तरनाक ही नहीं, बल्कि यथार्थ से परे भी है<strong>।</strong> अगर भारत के मध्यवर्ग ने दरिद्र भारत की ज़रूरतों के प्रति अपनी संवेदनहीनता ज़ारी रखी तो इससे वह भरी राजनीतिक उथल-पुथल की आफ़त को ही आमंत्रित करेगा<strong>।</strong> किसी भी राजनीतिक अस्थिरता का सीधा नुकसान मध्यवर्ग द्वारा पाली गई समृद्धि की महत्त्वाकांक्षाओं को ही झेलना होगा<strong>।</strong></p> <p>
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About the Book
भारत 1991 में जैसे ही आर्थिक सुधारों और भूमंडलीकरण की डगर पर चला, वैसे ही इस देश के मध्यवर्ग को एक नया महत्त्व प्राप्त हो गया। नई अर्थनीति के नियोजकों ने मध्यवर्ग को ‘शहरी भारत’ के रूप में देखा जो उनके लिए विश्व के सबसे बड़े बाज़ारों में से एक था। एक सर्वेक्षण ने घोषित कर दिया कि यह ‘शहरी भारत अपने आप में दुनिया के तीसरे सबसे बड़े देश के बराबर है।’ लेकिन, भारतीय मध्यवर्ग कोई रातोंरात बन जानेवाली सामाजिक संरचना नहीं थी<strong>।</strong> उपभोक्तावादी परभक्षी के रूप में इसकी खोज किए जाने से कहीं पहले इस वर्ग का एक अतीत और एक इतिहास भी था<strong>।</strong> भारत के मध्यवर्ग की अजीब दास्ताँ में पवन कुमार वर्मा ने इसी प्रस्थान बिन्दु से बीसवीं शताब्दी में मध्यवर्ग के उद्भव और विकास की विस्तृत जाँच-पड़ताल की है<strong>।</strong> उन्होंने आज़ादी के बाद के पचास वर्षों को ख़ास तौर से अपनी विवेचना का केन्द्र बनाया है<strong>।</strong> वे आर्थिक उदारीकरण से उपजे समृद्धि के आशावाद को इस वर्ग की मानसिकता और प्रवृत्तियों की रोशनी में देखते हैं<strong>।</strong> उन्होंने रातोंरात अमीर बन जाने की मध्यवर्गीय स्वैर कल्पना को नितान्त ग़रीबी में जीवन-यापन कर रहे असंख्य भारतवासियों के निर्मम यथार्थ की कसौटी पर भी कसा है<strong>।</strong></p>
<p>मध्यवर्ग की यह अजीब दास्ताँ आज़ादी के बाद हुए घटनाक्रम का गहराई से जायज़ा लेती है<strong>।</strong> भारत-चीन युद्ध और नेहरू की मृत्यु से लेकर आपातकाल व मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने की घोषणा तक इस दास्ताँ में मध्यवर्ग एक ऐसे ख़ुदग़र्ज़ तबक़े के रूप में उभरता है जिसने बार-बार न्यायपूर्ण समाज बनने के अपने ही घोषित लक्ष्यों के साथ ग़द्दारी की है<strong>।</strong> लोकतंत्र और चुनाव-प्रक्रिया के प्रति मध्यवर्ग की प्रतिबद्धता दिनोंदिन कमज़ोर होती जा रही है<strong>।</strong> मध्यवर्ग ऐसी किसी गतिविधि या सच्चाई से कोई वास्ता नहीं रखना चाहता जिसका उसकी आर्थिक ख़ुशहाली से सीधा वास्ता न हो<strong>।</strong> आर्थिक उदारीकरण ने उसके इस रवैये को और भी बढ़ावा दिया है<strong>।</strong></p>
<p>पुस्तक के आख़िरी अध्याय में पवन कुमार वर्मा ने बड़ी शिद्दत के साथ दलील दी है कि कामयाब लोगों द्वारा समाज से अपने-आपको काट लेने की यह परियोजना भारत जैसे देश के लिए ख़तरनाक ही नहीं, बल्कि यथार्थ से परे भी है<strong>।</strong> अगर भारत के मध्यवर्ग ने दरिद्र भारत की ज़रूरतों के प्रति अपनी संवेदनहीनता ज़ारी रखी तो इससे वह भरी राजनीतिक उथल-पुथल की आफ़त को ही आमंत्रित करेगा<strong>।</strong> किसी भी राजनीतिक अस्थिरता का सीधा नुकसान मध्यवर्ग द्वारा पाली गई समृद्धि की महत्त्वाकांक्षाओं को ही झेलना होगा<strong>।</strong></p>
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Book Details
-
ISBN9788126716388
-
Pages209
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अन्धविश्वासों की मानव-समाजों में एक समानान्तर सत्ता चली आई है। शिक्षा, विज्ञान और सामाजिक चेतना के विस्तार के साथ इसके औचित्य पर लगातार प्रश्नचिन्ह लगते रहे हैं और लम्बे समय तक इसका शिकार बनते रहे लोगों ने एक समय पर आकर अन्धविश्वासों की जड़ों को मज़बूत करके अपना कारोबार चलानेवाले पाखंडी बाबाओं से मुक्ति भी पाई है, लेकिन वे नए-नए रूपों में आकर वापस लोगों के मानस पर अपना अधिकार जमा लेते हैं।
आज इक्कीसवीं सदी के इस दौर में भी जब तकनीक और संचार के साधनों ने बहुत सारी चीज़ों को समझना आसान कर दिया है, ऐसे बाबाओं की कमी नहीं है जो किसी मनोशारीरिक कमज़ोरी के किसी क्षण में अच्छे-खासे शिक्षित लोगों को भी अपनी तरफ़ खींचने में कामयाब हो जाते हैं। डॉ. नरेंद्र दाभोलकर और उनकी 'अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति' ने महाराष्ट्र में इन बाबाओं और जनसाधारण की सहज अन्धानुकरण वृत्ति को लेकर लगातार संघर्ष किया। लोगों से सीधे सम्पर्क करके, आन्दोलन करके और लगातार लेखन के द्वारा उन्होंने कोशिश की कि तर्क और ज्ञान से अन्धविश्वास की जड़ें काटी जाएँ ताकि भोले-भाले लोग चालाक और चरित्रहीन बाबाओं के चंगुल में फँसकर अपनी ख़ून-पसीने की कमाई और जीवन तथा स्वास्थ्य को ख़तरे में न डालें।
इस पुस्तक में उन्होंने क़िस्म-क़िस्म के बाबाओं, गुरुओं, अपने आप को भगवान या भगवान का अवतार कहकर भ्रम फैलानेवालों का नाम ले-लेकर उनकी चालाकियों का पर्दाफाश किया है। इनमें भगवान रजनीश और साईं बाबा जैसे नाम भी शामिल हैं जो इधर शिक्षित लोगों में भी ख़ासे लोकप्रिय हैं। बाबाओं की ठगी का शिकार होनेवाले अनेक लोगों की कहानियाँ भी उन्होंने यहाँ दी हैं।
Jati Vyavstha Aur Pitri Satta
- Author Name:
Periyar E.V. Ramasamy +1
- Book Type:

- Description:
‘जाति और पितृसत्ता’ ई.वी. रामासामी नायकर 'पेरियार' के चिन्तन, लेखन और संघर्षों की केन्द्रीय धुरी रही है। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि इन दोनों के विनाश के बिना किसी आधुनिक समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता है। जाति और पितृसत्ता के सम्बन्ध में पेरियार क्या सोचते थे और क्यों वे इसके विनाश को आधुनिक भारत के निर्माण के लिए अपरिहार्य एवं अनिवार्य मानते थे? इन प्रश्नों का हिन्दी में एक मुकम्मल जवाब पहली बार यह किताब देती है।
इस संग्रह के लेख पाठकों को न केवल पेरियार के नज़रिए से बख़ूबी परिचित कराते हैं बल्कि इसकी भी झलक प्रस्तुत करते हैं कि पेरियार जाति एवं पितृसत्ता के विनाश के बाद किस तरह के सामाजिक सम्बन्धों की कल्पना करते थे। इन लेखों को पढ़ते हुए स्त्री-पुरुष के बीच कैसे रिश्ते होने चाहिए, इसकी एक पूरी तस्वीर सामने आ जाती है। इस किताब के परिशिष्ट खंड में पेरियार के सम्पूर्ण जीवन का वर्षवार लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है। पेरियार क़रीब 94 वर्षों तक जीवित रहे और अनवरत अन्याय के सभी रूपों के ख़िलाफ़ संघर्ष करते रहे। इस दौरान उन्होंने जो कुछ लिखा-कहा, उसमें से उनके कुछ प्रमुख उद्धरणों का चयन भी परिशिष्ट खंड में है। यही नहीं, इस खंड में तीन लेख पेरियार के अध्येताओं द्वारा लिखे गए हैं। पहले लेख में प्रसिद्ध विदुषी ललिता धारा ने महिलाओं के सन्दर्भ में पेरियार के चिन्तन, लेखन और संघर्षों के विविध आयामों को प्रस्तुत किया है। दूसरा और तीसरा लेख पेरियार के सामाजिक सघर्षों का एक गहन और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इनके लेखक टी. थमराईकन्न और वी. गीता तथा एस.वी. राजादुरै हैं। ये तीनों लेखक पेरियार के गम्भीर अध्येता माने जाते हैं। किताब का यह अन्तिम हिस्सा उनके चिन्तन, लेखन और संघर्षों के विविध चरणों की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत करता है।
Political Observer
- Author Name:
Varun Sakhaji
- Book Type:

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द पॉलिटिकल ऑब्जर्वर में 1998 से लेकर 2022 तक के विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक बड़े घटनाक्रम पर समकाल में लिखे गए आलेखों का विराट संकलन है। इसमें छत्तीसगढ़ की सियासत से लेकर देश की बदलती, ढहरती राजनीतिक तस्वीर को सिनेमा की तरह फ्रेम दर फ्रेम पेश किया गया है। रोमांचक राजनीतिक, सामाजिक घटनाओं का ऐसा कोलाज है जहां आप महसूस करेंग जैसे टाइम मशीन में बैठकर अतीत के वर्तमान में जा पहुंचे हैं। द पॉलिटिकिल ऑब्जर्वर भारत की सियासत की गवाह ही नहीं बल्कि यहां हो रहे हर घटना पर मुखरता से दखल भी है। लगभग 100 घटनाक्रम और उन पर लेखक व वरिष्ठ पत्रकार बरुण सखाजी की पैनी कलम सियासत को अपना रवैया बदलने को मजबूर कर देती है। तोहमतों और अविश्वास के इस दौर में भी मीडिया में ऐसे पत्रकार और विचारशील राजनीैतिक विश्लेषक हैं, यह तसल्ली की बात है। इस पुस्तक की भूमिका देश के प्रख्यात साहित्यकार व वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध ने लिखी है। लेखक व पत्रकार बरुण सखाजी छत्तीसगढ़ के स्थापित पत्रकार व राजनीतिक चिंतन, विश्लेषण और परामर्श के क्षेत्र में प्रमुखता से सक्रिय हैं।
Man-Man Ke Sawal
- Author Name:
Narendra Dabholkar +4
- Book Type:

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मनोविकार एक ऐसा विषय है जिसको लेकर भारतीय समाज में कई तरह के अन्धविश्वास व्याप्त हैं। मानसिक बीमारियाँ भी शरीर की अन्य व्याधियों की ही तरह होती हैं, इस तथ्य को आज भी भारत के लोग स्वीकार नहीं कर पाते। शिक्षित समाज का व्यवहार भी इस मामले में कुछ अलग नहीं है। पहले तो वे हर मनोविकार को पागलपन से जोड़ देते हैं, और इसे छिपाने की कोशिश करने लगते हैं। दूसरे ऐसे अनेक मनोरोग जो व्यक्ति के जीवन पर दीर्घकालीन प्रभाव डालते रहते हैं, उन्हें इलाज के योग्य ही नहीं माना जाता। यही वजह है कि हमारे यहाँ मनोरोग-विशेषज्ञों की भी भारी कमी है, और उनके स्थान पर झाड़-फूँक और गंडा-ताबीज का बोलबाला है।
अपने मौजूदा हालात से सामंजस्य न बिठा पाने की स्थिति को मानसिक तनाव कहा जाता है, इस परिभाषा की रोशनी में देखें तो हमारे आसपास कोई भी ऐसा नहीं है जो आज की बदलती हुई सामाजिक-पारिवारिक-नैतिक और आर्थिक परिस्थितियों के चलते तनाव से पूरी तरह मुक्त हो। तनाव की शुरुआती अवस्थाओं से लेकर सिज़ोफ्रेनिया और पागलपन तक मनोविकारों की एक लम्बी शृंखला होती है। इसलिए यह जरूरी है कि इस समस्या को गंभीरता से लिया जाए और तनाव कम करने की आध्यात्मिक विधियाँ बेचनेवाले गुरुओं और बाबाओं की शरण में जाने के बजाय इसे वैज्ञानिक ढंग से देखा-समझा जाए।
तार्किक जीवन-पद्धति के जुझारू पैरोकार नरेंद्र दाभोलकर की यह पुस्तक इसी विषय पर केन्द्रित है। इस पुस्तक का लेखन उन्होंने मनोविकार विशेषज्ञ हमीद दाभोलकर के साथ संयुक्त रूप से किया है। इस तरह एक तरफ़ जहाँ हम इसमें मानसिक विकारों की संरचना का वैज्ञानिक परिचय पाते हैं, वहीं भारतीय समाज में मनोरोगों को लेकर जो धार्मिक-सामाजिक और आध्यात्मिक अन्धविश्वास व्याप्त हैं, उनकी विसंगतियों को भी समझ पाते हैं। साथ ही मनोविकारों और उनके उपचार, मन के व्यवहार, बच्चों और स्त्रियों के मनोविकार तथा व्यसनों से जुड़े मानसिक दोषों को भी तर्कसंगत रूप में यहाँ विश्लेषित किया गया है?
Vishwas Aur Andhvishwas
- Author Name:
Narendra Dabholkar +3
- Book Type:

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विश्वास क्या है? कब वह अन्धविश्वास का रूप ले लेता है? हमारे संस्कार हमारे विचारों और विश्वासों पर क्या असर डालते हैं? समाज में प्रचलित धारणाएँ कैसे धीरे-धीरे सामूहिक श्रद्धा और विश्वास का रूप ले लेती हैं। टेलीविज़न जैसे आधुनिक आविष्कार के सामने मोबाइल साथ में लेकर बैठा व्यक्ति भी चमत्कारों, भविष्यवाणियों और भूत-प्रेतों से सम्बन्धित कहानियों पर क्यों विश्वास करता रहता है? क्यों कोई समाज लौट-लौटकर धार्मिक जड़तावाद और प्रतिक्रियावादी-पश्चमुखी राजनीतिक और सामाजिक धारणाओं की तरफ़ जाता रहता है?
क्या यह संसार किसी ईश्वर द्वारा की गई रचना है? या अपने कार्य-कारण के नियमों से चलनेवाला एक यंत्र है? ईश्वर के होने या न होने से हमारी सोच तथा जीवन-शैली पर क्या असर पड़ेगा? वह हमारे लिए क्या करता है और क्या नहीं करता? क्या वह ख़ुद ही हमारी रचना है? मन क्या है, उसके रहस्य हमें कैसे प्रकाशित या दिग्भ्रमित करते हैं? फल-ज्योतिष और भूत-प्रेत हमारे मन के किस ख़ाली और असहाय कोने में सहारा बनकर आते हैं? क्या अन्धविश्वासों का विरोध नैतिकता का विरोध है? क्या धार्मिक जड़ताओं पर कुठाराघात करना सामाजिक व्यक्ति को नीति से स्खलित करता है? या इससे वह ज्यादा स्वनिर्भर, स्वायत्त, स्वतंत्र और सुखी होता है?
स्त्रियों के जीवन में अन्धविश्वासों और अन्धश्रद्धा की क्या भूमिका होती है? वे ही क्यों अनेक अन्धविश्वासों की कर्ता और विषय दोनों हो जाती हैं? इस पुस्तक की रचना इन तथा इन जैसे ही अनेक प्रश्नों को लेकर की गई है। नरेंद्र दाभोलकर के अन्धविश्वास या अन्धश्रद्धा आन्दोलन की वैचारिक-सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक पृष्ठभूमि इस पुस्तक में स्पष्ट तौर पर आ गई है जिसकी रचना उन्होंने आन्दोलन के दौरान उठाए जानेवाले प्रश्नों और आशंकाओं का जवाब देने के लिए की।
Dharma Ki Sadhana
- Author Name:
Swami Vivekanand
- Book Type:

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स्वामी विवेकानंद ने भारत में उस समय अवतार लिया, जब यहाँ हिंदू धर्म के अस्तित्व पर संकट के बादल मँडरा रहे थे। पंडित-पुरोहितों ने हिंदू धर्म को घोर आडंबरवादी और अंधविश्वासपूर्ण बना दिया था। ऐसे में स्वामी विवेकानंद ने हिंदू धर्म को एक अलग पहचान दिलाई। स्वामीजी का विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है। यहीं बड़े-बड़े महात्माओं तथा ऋषियों का जन्म हुआ; यह संन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यहीं आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिए जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है। प्रस्तुत पुस्तक ' धर्म की साधना' में स्वामीजी ने भारत के प्राचीन गौरव का उल्लेख करते हुए देश के युवकों का आह्वान किया है कि यही उचित समय है, जब वे हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना में जुट जाएँ और भारतीय पुनर्जागरण में सहभागी बनें। सही अर्थों में धर्म की साधना करना, उस पर चलना सिखाने वाली प्रेरणादायी पुस्तक!
Vivek Ki Pratibaddhata
- Author Name:
Narendra Dabholkar +3
- Book Type:

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वैज्ञानिक दृष्टिकोण अर्थात् कार्यकारण भाव। चमत्कार अर्थात् वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव। यह सम्बन्ध प्रकाश और अँधेरे के समान है। एक का होना याने अनिवार्यतः दूसरे का ना होना। विज्ञान में चमत्कार नहीं होते। चमत्कार या तो रासायनिक, भौतिक प्रक्रिया होती है या हाथ की सफ़ाई होती है। बदमाशी भी हो सकती है और प्रसंग के अनुसार प्रकृति की अनसुलझी पहेली भी चमत्कार में शामिल होती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण जीवन में स्वीकारने का अर्थ है, आज या कल समझ में आनेवाली वैज्ञानिक विचार-पद्धति पर समाज का विश्वास होना।
चमत्कारों को चुनौती देने की भूमिका को ठीक से समझना चाहिए। संविधान ने हर व्यक्ति को उपासना, अलौकिक जीवन, आध्यात्मिक कल्याण की आज़ादी दी है, इसका सम्मान करना चाहिए। लेकिन चमत्कार पर विश्वास करना, उसकी जाँच-पड़ताल का विरोध और ऐसे चमत्कारों का प्रसार करते रहना, यह धर्म का हिस्सा नहीं हो सकता। भारतीय समाज बहुत जल्द भयग्रस्त हो जाता है। दैववादी मानसिकता के कारण लोग संकट को भाग्य का परिणाम मानते हैं। कई लोगों को लगता है कि दैवी-शक्ति प्राप्त कोई बाबा या कोई धार्मिक तीर्थ उन्हें कठिनाई से उबार लेगा। इस मानसिकता में रहनेवाला समाज स्वाभिमानशून्य, भगौड़ा, डरपोक और बुद्धि को रेहन पर रखनेवाला होता है। स्वाभिमानी, प्रयत्नवादी और निर्भय समाज बनाने के लिए चमत्कार का विरोध आवश्यक है।
मानसिक ग़ुलामी की सबसे बड़ी भयानकता यह है कि उस अवस्था में व्यक्ति की बुद्धि से प्रश्न पूछना तो दूर की बात है, व्यक्ति की बुद्धि, निर्णय-शक्ति, सम्पूर्ण विचार-क्षमता ये सभी बातें चमत्कार के आगे शून्य हो जाती हैं। व्यक्ति दासता में चला जाता है और फिर परिवर्तन की लड़ाई अधिक कठिन हो जाती है।
इस किताब में दाभोलकर जी के 2003 से 08 के दौरान लिखे आलेख शामिल हैं जो उन्होंने अन्धविश्वास और अवैज्ञानिकता के विरोध में विभिन्न मोर्चों और आन्दोलनों में काम करते हुए लिखे। उनके आन्दोलन का एकमात्र उद्देश्य एक विवेकशील मन का निर्माण था ताकि भारतीय लोग अपनी भौतिक लाचारगी और लिप्साओं के कारण धन्धेबाजों का शिकार न हों। उनके लेखन को पढ़ते हुए हम इक्कीसवीं सदी के भारत की धार्मिक-आध्यात्मिक-आर्थिक-सामाजिक विडम्बनाओं से भी परिचित होते हैं।
Vidhyarthiyon Ke Liye Gita
- Author Name:
Acharya Mayaram 'Patang'
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‘गीता’ कालजयी ग्रंथ है। यह भक्ति के साथ-साथ कर्म की ओर प्रवृत्त करती है। अपने कर्तव्य-पथ से भटक रहे अर्जुन को श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान देकर ही कर्म-पथ पर प्रवृत्त किया। इसलिए हमारे जीवन में गीता का बहुत व्यावहारिक उपयोग है, महती योगदान है। विद्यार्थी काल में ही गीता का भाव समझ गए तो यह जीवन में पग-पग पर काम आएगा। जीने की कला आ जाएगी। आपत्तियों तथा कष्टकर परिस्थितियों में निराशा नहीं घेरेगी। अपने-पराए और मित्र-शत्रु के मोह से मुक्त होने का ज्ञान हो जाएगा। अधिकांश लोग सेवानिवृत्त होकर गीता पढ़ते हैं। जब सारा जीवन मोह, लोभ, काम, क्रोध और अहंकार की भेंट चढ़ गया, दुःख और संतापों का ताप सह लिया, तिल-तिल कर मरते रहे, फिर गीता पढ़ी तो क्या लाभ हुआ? पाप और पुण्य कर्मों का फल तो भोगना निश्चित ही हो गया! इस पुस्तक को विशेष रूप से छात्रों-विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। गीता के हर अध्याय में जो महत्त्वपूर्ण श्लोक हैं, जिन्हें स्मरण किया जा सके, गाया जा सके, उन्हें संकलित किया गया है। स्पष्ट है कि यह संपूर्ण गीता नहीं है, बल्कि मात्र प्रेरणा है। इसे पढ़कर छात्र सन्मति पाएँ, नैतिक मूल्यों का पालन करते हुए सन्मार्ग पर चलकर जीवन में सफलता के शिखर पर पहुँचें, यही इस पुस्तक के लेखन का उद्देश्य है। विद्यार्थियों के चरित्र-निर्माण तथा कर्तव्य-पथ पर सतत चलने की प्रेरणा देनेवाली एक अनुपम पुस्तक।
Andhavishwas Unmoolan : Vol. 2 : Aachar
- Author Name:
Narendra Dabholkar +3
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अंधविश्वास उन्मूलन और डॉ. नरेंद्र दाभोलकर एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। निरन्तर 25 वर्षों की मेहनत का फल है यह। अंधविश्वास उन्मूलन का कार्य महाराष्ट्र में विचार, उच्चार, आचार, संघर्ष, सिद्धान्त जैसे पंचसूत्र से होता आ रहा है। भारतवर्ष में ऐसा कार्य कम ही नज़र आता है।
'अंधविश्वास उन्मूलन : आचार' पुस्तक में धर्म के नाम पर कर्मकांड और पाखंडों के ख़िलाफ़ आन्दोलन, जन-जागृति कार्यक्रम और भंडाफोड़ जैसे प्रयासों का ब्योरा है।
पुस्तक में भूत से साक्षात्कार कराने का पर्दाफाश, ओझाओं की पोल खोलती घटनाएँ, मंदिर में जाग्रत देवता और गणेश देवता के दूध पीने के चमत्कार के विवरण पठनीय तो हैं ही, उनसे देखने, सोचने और समझने की पुख्ता ज़मीन भी उजागर होती है। निस्सन्देह अपने विषयों के नवीन विश्लेषण से यह पुस्तक पाठकों में अहम भूमिका निभाने जैसी है।
अंधविश्वास के तिमिर से विवेक और विज्ञान के तेज की ओर ले जानेवाली यह पुस्तक परम्परा का तिमिर-भेद भी है और विज्ञान का लक्ष्य भी।
Andhavishwas Unmoolan : Vol. 1 : Vichar
- Author Name:
Narendra Dabholkar +3
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अंधविश्वास उन्मूलन और डॉ. नरेंद्र दाभोलकर एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। निरन्तर 25 वर्षों की मेहनत का फल है यह। अंधविश्वास उन्मूलन का कार्य महाराष्ट्र में विचार, उच्चार, आचार, संघर्ष, सिद्धान्त जैसे पंचसूत्र से होता आ रहा है। भारतवर्ष में ऐसा कार्य कम ही नज़र आता है।
'अंधविश्वास उन्मूलन : विचार' पुस्तक में अंधविश्वास उन्मूलन से सम्बन्धित बुनियादी बातों का ज़िक्र है। इसमें 'वैज्ञानिक दृष्टिकोण', 'विज्ञान की कसौटी पर फलित ज्योतिष', 'वास्तुशास्त्र नहीं वास्तुश्रद्धाशास्त्र', 'छद्म विज्ञान अर्थात् स्यूडो साइंस', 'मनोविकार', 'भूतप्रेत बाधा या भूतावेश', 'सम्मोहन', 'देवी सवारना' जैसे विषयों पर विचार और विवेचन किया गया है जिससे यथार्थ और भ्रम का सदियों पुराना अन्तर स्पष्ट होता है।
लेखक के आत्मप्रत्यय और चेतना की नींव पर खड़ी यह पुस्तक अंधविश्वास के तिमिर से विवेक और विज्ञान के तेज की ओर ले जानेवाली परम्परा का तिमिर-भेद भी है और विज्ञान का लक्ष्य भी।
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