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Manav Aur Sanskriti

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मानवीय अध्ययनों में ‘नृतत्त्व’ अथवा ‘मानवशास्त्र’ का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस विषय का विकास बड़ी तीव्र गति से हुआ है और अब तो यह अनेक स्वयंपूर्ण उपभागों में विभाजित होता जा रहा है। प्रस्तुत पुस्तक नृतत्त्व की उस शाखा की परिचयात्मक रूपरेखा है जो मानवीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों का अध्ययन करती है। मानव और संस्कृति में विद्वान लेखक ने सांस्कृतिक नृतत्त्व के सर्वमान्य तथ्यों को भारतीय पृष्ठभूमि में प्रस्तुत करने का यत्न किया है। इस सीमित उद्देश्य के कारण, जहाँ तक हो सका है, समकालीन सैद्धान्तिक वाद-विवादों के प्रति तटस्थता का दृष्टिकोण अपनाया गया है। हिन्दी के माध्यम से आधुनिक वैज्ञानिक विषयों पर लिखने में अनेक कठिनाइयाँ हैं। प्रामाणिक पारिभाषिक शब्दावली का अभाव उनमें सबसे अधिक उल्लेखनीय है। इस पुस्तक में प्रचलित हिन्दी शब्दों के साथ अन्तरराष्ट्रीय शब्दावली का उपयोग स्वतंत्रतापूर्वक किया गया है। ‘मानव और संस्कृति में’ सात खंडों में विषय के उद्घाटन के बाद मानव का प्रकृति, समाज, अदृश्य जगत, कला और संस्कृति से सम्बन्ध दर्शाया गया है। अन्त में भारत के आदिवासियों के समाज-संगठन पर प्रकाश डाला गया है और उसकी समस्याओं पर विचार किया गया है। पुस्तक अद्यतन जानकारी से पूर्ण है और लेखक ने अब तक की खोजों के आधार पर जो कुछ लिखा है, वह साधिकार लिखा है।

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मानवीय अध्ययनों में ‘नृतत्त्व’ अथवा ‘मानवशास्त्र’ का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस विषय का विकास बड़ी तीव्र गति से हुआ है और अब तो यह अनेक स्वयंपूर्ण उपभागों में विभाजित होता जा रहा है। प्रस्तुत पुस्तक नृतत्त्व की उस शाखा की परिचयात्मक रूपरेखा है जो मानवीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों का अध्ययन करती है।

मानव और संस्कृति में विद्वान लेखक ने सांस्कृतिक नृतत्त्व के सर्वमान्य तथ्यों को भारतीय पृष्ठभूमि में प्रस्तुत करने का यत्न किया है। इस सीमित उद्देश्य के कारण, जहाँ तक हो सका है, समकालीन सैद्धान्तिक वाद-विवादों के प्रति तटस्थता का दृष्टिकोण अपनाया गया है।

हिन्दी के माध्यम से आधुनिक वैज्ञानिक विषयों पर लिखने में अनेक कठिनाइयाँ हैं। प्रामाणिक पारिभाषिक शब्दावली का अभाव उनमें सबसे अधिक उल्लेखनीय है। इस पुस्तक में प्रचलित हिन्दी शब्दों के साथ अन्तरराष्ट्रीय शब्दावली का उपयोग स्वतंत्रतापूर्वक किया गया है।

‘मानव और संस्कृति में’ सात खंडों में विषय के उद्घाटन के बाद मानव का प्रकृति, समाज, अदृश्य जगत, कला और संस्कृति से सम्बन्ध दर्शाया गया है। अन्त में भारत के आदिवासियों के समाज-संगठन पर प्रकाश डाला गया है और उसकी समस्याओं पर विचार किया गया है।

पुस्तक अद्यतन जानकारी से पूर्ण है और लेखक ने अब तक की खोजों के आधार पर जो कुछ लिखा है, वह साधिकार लिखा है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
6th
Publication year
1993
Weight
506 grams
ISBN-13
9788126719136
Pages
287
Reading time
~10 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 22 cm
Language
Hindi

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