Jati Vyavstha
(0)
Author:
Sachchidanand SinhaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences₹
350
₹ 280 (20% off)
Available
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यह पुस्तक देश में चलनेवाली सामाजिक मारकाट, ख़ासकर जातीय दंगों और आदिवासी समूहों के आन्दोलनों के कारणों को समझने की कोशिश में शुरू हुई। इन समस्याओं को अलग–अलग ढंग से देखने की जगह पूरी दुनिया में उभरे संकीर्णतावाद और सामाजिक समूहों के टकराव की आम प्रवृत्ति के सन्दर्भ में देखने की कोशिश की गई है। इस परिप्रेक्ष्य में यह पुस्तक मुख्यत: जाति व्यवस्था की उत्पत्ति और उसकी वास्तविकता पर ध्यान केन्द्रित करती है।</p> <p>इस पुस्तक का सबसे बड़ा हिस्सा जाति व्यवस्था की वास्तविकता की जाँच–पड़ताल वाला है। यह महसूस किया गया है कि जाति के सन्दर्भ में जिन बातों को वास्तविक मान लिया जाता है, उनका काफ़ी बड़ा हिस्सा काल्पनिक ही है और इससे ग़लत धारणा बनती है, ग़लत निष्कर्ष तक पहुँचा जाता है। ‘जाति पूर्वाग्रह और पराक्रम’ शीर्षकवाला अध्ययन इस मामले में कुछ बातों को बहुत खुले ढंग से बताता है। और एक अर्थ में यही इस अध्ययन का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा है जिससे अन्य निष्कर्ष भी निकाले जाने चाहिए।</p> <p>इसमें जाति व्यवस्था से सम्बन्धित कुछ महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तों की भी परीक्षा की गई है। होमो–हायरार्किकस वाले सिद्धान्त की कुछ ज़्यादा विस्तार से इसमें चर्चा की गई है, क्योंकि इससे इस विनाशकारी दृष्टि को बल मिल सकता है कि जाति व्यवस्था भारतीय मानस में व्याप्त स्वाभाविक भेदभाव का ही एक प्रतिफल है।</p> <p>यह पुस्तक प्रमुख समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों के ऊपर भी गम्भीर सवाल खड़े करती है जो सामाजिक यथार्थ के तार्किक और कार्यकारी पहलुओं पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर देते हैं। विचारोत्तेजक सामग्री से भरपूर यह पुस्तक निश्चय ही पाठकों को पसन्द आएगी।</p> <p>
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यह पुस्तक देश में चलनेवाली सामाजिक मारकाट, ख़ासकर जातीय दंगों और आदिवासी समूहों के आन्दोलनों के कारणों को समझने की कोशिश में शुरू हुई। इन समस्याओं को अलग–अलग ढंग से देखने की जगह पूरी दुनिया में उभरे संकीर्णतावाद और सामाजिक समूहों के टकराव की आम प्रवृत्ति के सन्दर्भ में देखने की कोशिश की गई है। इस परिप्रेक्ष्य में यह पुस्तक मुख्यत: जाति व्यवस्था की उत्पत्ति और उसकी वास्तविकता पर ध्यान केन्द्रित करती है।</p>
<p>इस पुस्तक का सबसे बड़ा हिस्सा जाति व्यवस्था की वास्तविकता की जाँच–पड़ताल वाला है। यह महसूस किया गया है कि जाति के सन्दर्भ में जिन बातों को वास्तविक मान लिया जाता है, उनका काफ़ी बड़ा हिस्सा काल्पनिक ही है और इससे ग़लत धारणा बनती है, ग़लत निष्कर्ष तक पहुँचा जाता है। ‘जाति पूर्वाग्रह और पराक्रम’ शीर्षकवाला अध्ययन इस मामले में कुछ बातों को बहुत खुले ढंग से बताता है। और एक अर्थ में यही इस अध्ययन का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा है जिससे अन्य निष्कर्ष भी निकाले जाने चाहिए।</p>
<p>इसमें जाति व्यवस्था से सम्बन्धित कुछ महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तों की भी परीक्षा की गई है। होमो–हायरार्किकस वाले सिद्धान्त की कुछ ज़्यादा विस्तार से इसमें चर्चा की गई है, क्योंकि इससे इस विनाशकारी दृष्टि को बल मिल सकता है कि जाति व्यवस्था भारतीय मानस में व्याप्त स्वाभाविक भेदभाव का ही एक प्रतिफल है।</p>
<p>यह पुस्तक प्रमुख समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों के ऊपर भी गम्भीर सवाल खड़े करती है जो सामाजिक यथार्थ के तार्किक और कार्यकारी पहलुओं पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर देते हैं। विचारोत्तेजक सामग्री से भरपूर यह पुस्तक निश्चय ही पाठकों को पसन्द आएगी।</p>
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Book Details
-
ISBN9788126729487
-
Pages232
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: On 22 April 2025, the Baisaran Valley in Pahalgam, south Kashmir, witnessed a horrifying attack when heavily armed terrorists from the Resistance Front, a proxy of Lashkar-e-Taiba (LeT), fully sponsored by the Pakistan Army and Inter-Services Intelligence (ISI), shattered its serenity with gunfire, killing twenty-six innocent individuals and injuring several others. The victims included newlyweds, elderly parents and solo trekkers. A Hindu professor narrowly escaped death by reciting the kalma, a Christian sacrificed his life to save his family and a local Muslim was killed while saving others. This was an attempt to rupture India’s religious harmony and create widespread outrage in the country. India chose to respond to this incident, which shook not just the nation but the world, with Operation SINDOOR, showcasing its military modernization and might. The mission targeted terror camps, including the ones in Bahawalpur and Muridke, linked to Jaish-e-Mohammed and LeT, respectively, and terrorist launch pads in Pakistan-occupied Jammu and Kashmir. India’s response demonstrated military professionalism, technological maturity and diplomatic sagacity, ensuring regional stability while delivering a powerful message against Pakistan and its terror factory. This book carries minute details and a blow-by-blow account of the ‘Four-Day War’ between two hostile nuclear powers. The author underscores the intelligent use of media and social media in the battle of narratives, discusses the ‘new normal’ and emerging rules of engagement, and suggests a way forward. Offering hitherto unrevealed information, Lt Gen. ‘Tiny’ Dhillon (Retd) opens a window to Operation SINDOOR, a testament to the strength of the Indian military and the unity of India when confronted with an adverse situation. With visuals from the destroyed target areas, this book is a powerful reminder of the impact of terrorism and the enduring hope for peace and justice. Operation SINDOOR is a must-read for everyone.
Sochiye To Sahi
- Author Name:
Narendra Dabholkar
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Description:
साने गुरुजी द्वारा ‘साधना’ पत्रिका की शुरुआत 15 अगस्त, 1948 को की गई थी। इसी पत्रिका की स्वर्ण जयंती (1 मई,1998) पर डॉ. नरेंद्र दाभोलकर और जयदेव डोले को इसके संपादक पद की जिम्मेदारी सौंपी गई। छह महीने बाद जयदेव डोले ने संपादक पद छोड़ दिया। इसके बाद 15 साल (20 अगस्त, 2013 तक) डॉ. दाभोलकर ने संपादक पद की जिम्मेदारी बखूबी निभाई। लगभग डेढ़ दशक के इस काल में उन्होंने दो सौ से ज्यादा संपादकीय लेख लिखे। उन्हीं लेखों में से चुनिंदा 60 लेखों का संकलन इस पुस्तक में किया गया है जो मराठी में ‘समता संगर’ नाम से छपी थी।
जिस समय डॉ. दाभोलकर ‘साधना’ के संपादक बने, उस समय उनकी पहचान राज्य स्तर पर ‘अंधविश्वास निर्मूलन समिति’ के आंदोलन के प्रवर्तक के रूप में थी। समूचा महाराष्ट्र उनसे परिचित था। अंधविश्वास उन्मूलन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जातिवाद आदि विषयों पर उनका यह लेखन अत्यंत प्रभावशाली रहा। इन विषयों पर लिखी उनकी किताबें भी बड़ी लोकप्रिय हुई थीं। यहाँ संकलित उनके ये संपादकीय स्पष्ट कथन, सीधे सवाल-जवाब और अपने व्यंग्य के लिए बहुत सराहे जाते हैं। लेकिन उनके अन्य लेखन की तरह इन आलेखों में भी जोर सामाजिक परिवर्तन पर ही है।
Marx Aur Pichhade Huye Samaj
- Author Name:
Ramvilas Sharma
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Description:
हिन्दी के सुविख्यात समालोचक, भाषाविद् और इतिहासवेत्ता डॉ. रामविलास शर्मा का यह महत्तम ग्रन्थ ‘भूमिका’ और ‘उपसंहार’ के अलावा आठ अध्यायों में नियोजित है। इनमें से पहले में उन्होंने आधुनिक चिन्तन के पुरातन स्रोतों, मार्क्स के ‘व्यक्तित्व-निर्माण’ की दार्शनिक पृष्ठभूमि तथा मार्क्स-एंगेल्स की धर्म विषयक स्थापनाओं के प्रति ध्यान आकर्षित किया है। दूसरे में, सौदागरी पूँजी की विशेषताओं के सन्दर्भ में सम्पत्ति और परिवार-व्यवस्था की कतिपय समस्याओं का विवेचन हुआ है। तीसरे में, मध्यकालीन यूरोपीय ग्राम-समाजों और भारतीय ग्राम-समाजों में भिन्नता को रेखांकित किया गया है। चौथे में, प्राचीन रोमन-यूनानी समाज और प्राचीन भारतीय समाज में श्रम-सम्बन्धी दृष्टिभेद का खुलासा हुआ है। पाँचवें में, मार्क्स-एंगेल्स पर हीगेल के दार्शनिक प्रभाव के बावजूद इतिहास-सम्बन्धी उनकी स्थापनाओं में अन्तर को विस्तार से विेवेचित किया गया है, ताकि हीगेल के यूरोप-केन्द्रित नस्लवादी इतिहास-दर्शन को समझा जा सके। छठा अध्याय मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन के जनवादी क्रान्ति-सम्बन्धी विचारों, कार्यों से परिचित कराता है। सातवें में, क्रान्ति-पश्चात् सर्वहारा अधिनायकवाद, राज्यसत्ता में सर्वहारा पार्टी की भूमिका, फासिस्ट तानाशाही से लड़ने की रणनीति तथा राज्यसत्ता के दो रूपों—जनतंत्र एवं तानाशाही—को अलगाकर देखने की माँग है और आठवाँ अध्याय दूसरे विश्वयुद्ध के बाद एशियाई क्रान्ति के सन्दर्भ में लेनिन की स्थापनाओं को गम्भीरता से न लेने के कारण साम्राज्यविरोधी आन्दोलन में विघटन का गम्भीर विश्लेषण करता है।
संक्षेप में कहें तो डॉ. शर्मा की यह कृति विश्व पूँजीवाद और उसके सर्वग्रासी आर्थिक साम्राज्यवाद के विरुद्ध मार्क्सवादी समाज-चिन्तन की रोशनी में विश्वव्यापी पिछड़े समाजों के दायित्व पर दूर तक विचार करती है, ताकि समस्त मनुष्य-जाति को विनाश से बचाया जा सके।
Bolna Hi Hai
- Author Name:
Ravish Kumar
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- Book Type:

- Description: रवीश कुमार की यह किताब ‘बोलना ही है’ इस बात की पड़ताल करती है कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किस-किस रूप में बाधित हुई है, परस्पर संवाद और सार्थक बहस की गुंजाइश कैसे कम हुई है और इससे देश में नफ़रत और असहिष्णुता को कैसे बढ़ावा मिला है। कैसे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि, मीडिया और अन्य संस्थान एक मज़बूत लोकतंत्र के रूप में हमें विफल कर रहे हैं। इन स्थितियों से उबरने की राह खोजती यह किताब हमारे वर्तमान समय का वह दस्तावेज़ है जो स्वस्थ लोकतंत्र के हर हिमायती के लिए संग्रहणीय है। हिन्दी में आने से पहले ही यह किताब अंग्रेज़ी, मराठी और कन्नड़ में प्रकाशित हो चुकी है।
Parivartan Aur Vikas Ke Sanskritik Ayaam
- Author Name:
Puran Chandra Joshi
- Book Type:

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Description:
समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और सांस्कृतिक क्षेत्र के मर्मज्ञ विद्वान प्रो. पूरनचन्द्र जोशी की यह कृति भारतीय सामाजिक परिवर्तन और विकास के सन्दर्भ में कुछ बुनियादी सवालों और समस्याओं पर किए गए चिन्तन का नतीजा है। चार भागों में संयोजित इस कृति में कुल पन्द्रह निबन्ध हैं, जो एक ओर आधुनिक आर्थिक विकास और सामाजिक परिवर्तन को सांस्कृतिक आयामों पर और दूसरी ओर सांस्कृतिक जगत की उभरती समस्याओं के आर्थिक और राजनीतिक पहलुओं पर नया प्रकाश डालते हैं।
हिन्दी पाठकों के लिए यह कृति विभिन्न दृष्टियों से मौलिक और नए ढंग का प्रयास है। एक ओर तो यह सांस्कृतिक सवालों को अर्थ, समाज और राजनीति के सवालों से जोड़कर संस्कृतिकर्मियों तथा अर्थ एवं समाजशास्त्रियों के बीच सेतुबन्धन के लिए नए विचार, अवधारणाएँ और मूलदृष्टि विचारार्थ प्रस्तुत करती है और दूसरी ओर उभरते हुए नए यथार्थ से विचार एवं व्यवहार—दोनों स्तरों पर जूझने में असमर्थ पुरानी बौद्धिक प्रणालियों, स्थापित मूलदृष्टियों और व्यवहारों की निर्मम विवेचना का भी आग्रह करती है। दूसरे शब्दों में, यह पुस्तक-संस्कृति, अर्थ और राजनीति को अलग-अलग कर खंडित रूप में नहीं, बल्कि इन तीनों के भीतरी सम्बन्धों और अन्तर्विरोधों के आधार पर समग्र रूप में समझने का आग्रह करती है।
प्रो. जोशी के अनुसार स्वातंत्र्योत्तर भारत में जो एक दोहरे समाज का उदय हुआ है, उसका मुख्य परिणाम है नवधनाढ्य वर्ग का उभार, जो पुराने सामन्ती वर्ग से समझौता कर सभी क्षेत्रों में प्रभुतावान होता जा रहा है और जिसका सामाजिक दर्शन, मानसिकता एवं व्यवहार गांधी और नेहरू-युग के मूल्य-मान्यताओं के पूर्णतया विरुद्ध हैं। वह पश्चिम के निर्बन्ध भोगवाद, विलासवाद और व्यक्तिवाद के साथ निरन्तर एकमेक होता जा रहा है। फलस्वरूप उसके और बहुजन समाज के बीच अलगाव ही नहीं, तनाव और संघर्ष भी विस्फोटक रूप ले रहे हैं। प्रो. जोशी सवाल उठाते हैं कि भारतीय समाज में बढ़ रहा यह तनाव और संघर्ष उसके अपकर्ष का कारण बनेगा या इसी में एक नए पुनर्जागरण की सम्भावनाएँ निहित हैं? वस्तुत: प्रो. जोशी की यह कृति पाठकों से इन प्रश्नों से वैचारिक स्तर पर ही नहीं, व्यावहारिक स्तर पर भी जूझने का आग्रह करती है।
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