Vimukt Janjatiyon Ki Vikas-Yatra : Niti Evam Vyavhar
(0)
Author:
Malli Gandhi, Yugank DhirPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences₹
995
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सिद्धपुरम और स्टुअर्टपुरम की बस्तियों के अध्ययन पर आधारित यह पुस्तक आन्ध्र प्रदेश की पूर्व-अपराधी और विमुक्त जनजातियों से सम्बद्ध साहित्य में एक स्वागत योग्य इजाफा है। भारतीय जनजातियों को लेकर प्रामाणिक अध्ययन बहुत कम हुए हैं, आन्ध्र प्रदेश की विमुक्त जनजातियों पर और भी कम। पूर्व-अपराधी जनजातियों पर तो कोई अच्छा काम मिलता ही नहीं है। इन जनजातियों की कुल पाँच बस्तियाँ है जिनमें से दो की देखरेख साल्वेशन आर्मी करती है। उन्हीं में से एक का नाम स्टुअर्टपुरम है जो आन्ध्र प्रदेश के वर्तमान जिले गुंटूर के तहत आती है और जिसका नाम मद्रास सरकार के तत्कालीन सचिव मि. स्टुअर्ट के नाम पर पड़ा है। इस बस्ती से कई नामी-गिरामी डकैतों के आने के चलते कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का ध्यान इसकी तरफ गया और उन्होंने बहुत लगन और समर्पण के भाव से अपना समय और ऊर्जा इस बस्ती के आपराधिक माहौल को बदलने के लिए खर्च किये। इनमें एथीस्ट सेंटर, विजयवाड़ा के लवानम और हेमलता लवानम के नाम प्रमुख हैं। इनके और सरकार के सतत प्रयासों के परिणामस्वरूप आज यहाँ रहनेवालों के जीवन में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। मल्ली गांधी ने राष्ट्रीय तथा तमिलनाडु व आन्ध्र प्रदेश के अभिलेखागारों से कुछ दुर्लभ दस्तावेजों के साथ इस पुस्तक के लिए द्वितीयक स्रोतों के सर्वेक्षणों का भी उपयोग किया है। इसके अलावा जो चीज इस पुस्तक को और महत्त्वपूर्ण बनाती है, वह हैं वे मौखिक साक्ष्य जिन्हें जुटाने में लेखक ने कड़ा परिश्रम किया और जिनके कारण इस पुस्तक को और भी प्रामाणिक रूप मिला।
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सिद्धपुरम और स्टुअर्टपुरम की बस्तियों के अध्ययन पर आधारित यह पुस्तक आन्ध्र प्रदेश की पूर्व-अपराधी और विमुक्त जनजातियों से सम्बद्ध साहित्य में एक स्वागत योग्य इजाफा है। भारतीय जनजातियों को लेकर प्रामाणिक अध्ययन बहुत कम हुए हैं, आन्ध्र प्रदेश की विमुक्त जनजातियों पर और भी कम। पूर्व-अपराधी जनजातियों पर तो कोई अच्छा काम मिलता ही नहीं है। इन जनजातियों की कुल पाँच बस्तियाँ है जिनमें से दो की देखरेख साल्वेशन आर्मी करती है। उन्हीं में से एक का नाम स्टुअर्टपुरम है जो आन्ध्र प्रदेश के वर्तमान जिले गुंटूर के तहत आती है और जिसका नाम मद्रास सरकार के तत्कालीन सचिव मि. स्टुअर्ट के नाम पर पड़ा है।
इस बस्ती से कई नामी-गिरामी डकैतों के आने के चलते कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का ध्यान इसकी तरफ गया और उन्होंने बहुत लगन और समर्पण के भाव से अपना समय और ऊर्जा इस बस्ती के आपराधिक माहौल को बदलने के लिए खर्च किये। इनमें एथीस्ट सेंटर, विजयवाड़ा के लवानम और हेमलता लवानम के नाम प्रमुख हैं। इनके और सरकार के सतत प्रयासों के परिणामस्वरूप आज यहाँ रहनेवालों के जीवन में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है।
मल्ली गांधी ने राष्ट्रीय तथा तमिलनाडु व आन्ध्र प्रदेश के अभिलेखागारों से कुछ दुर्लभ दस्तावेजों के साथ इस पुस्तक के लिए द्वितीयक स्रोतों के सर्वेक्षणों का भी उपयोग किया है। इसके अलावा जो चीज इस पुस्तक को और महत्त्वपूर्ण बनाती है, वह हैं वे मौखिक साक्ष्य जिन्हें जुटाने में लेखक ने कड़ा परिश्रम किया और जिनके कारण इस पुस्तक को और भी प्रामाणिक रूप मिला।
Book Details
-
ISBN9788119159376
-
Pages272
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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*राष्ट्र-निर्माण में आदिवासी* लेखक: डॉ. जितेंद्र मीणा यह पुस्तक उनके लिए है: जो इतिहास को सिर्फ विजेताओं की कथा नहीं मानते जो भारत की सामूहिक स्मृति में आदिवासियों की उपस्थिति दर्ज करना चाहते हैं जो वैकल्पिक और समावेशी विमर्श की तलाश में हैं *"इतिहास में किसी को नज़रअंदाज़ करना, वर्तमान में उसकी हिस्सेदारी छीनने का सबसे महीन तरीका होता है।"* यह पुस्तक उसी ऐतिहासिक अन्याय के विरुद्ध एक सशक्त हस्तक्षेप है- जो सदियों से भारत के आदिवासी समुदायों के साथ होता आया है। उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम तक फैले इन समुदायों ने अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ सबसे शुरुआती और सबसे दीर्घकालिक विद्रोह किए, लेकिन मुख्यधारा के इतिहास में उन्हें वह स्थान नहीं मिला जिसके वे अधिकारी थे। ‘राष्ट्र-निर्माण में आदिवासी’ सिर्फ एक इतिहास पुस्तक नहीं, बल्कि एक वैचारिक यात्रा है जो हमें भारत के भूले-बिसरे जननायकों से मिलवाती है। यह किताब पूछती है- क्यों आदिवासी विद्रोह, बलिदान और संघर्ष हमारी ऐतिहासिक चेतना का हिस्सा नहीं बन सके? लेखक डॉ. जितेंद्र मीणा इतिहास के प्रोफ़ेसर और सामाजिक विमर्शकार हैं। उन्होंने प्रमाणों और वैकल्पिक इतिहास दृष्टि से भारत के हर हिस्से से आदिवासी संघर्ष की बहुरंगी छवियाँ प्रस्तुत की है। यह पुस्तक न केवल पाठकों को एक भुला दिए गए इतिहास से जोड़ती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि आदिवासी भारत के राष्ट्र-निर्माण में कैसे केंद्रीय भूमिका निभाते रहे हैं।
Rashtra Nirman Mein Adivasi By Dr. Jitendra Meena
Dr. Jitendra Meena
17% off₹ 249
₹ 206.67
Available
Bolna Hi Hai
- Author Name:
Ravish Kumar
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रवीश कुमार की यह किताब ‘बोलना ही है’ इस बात की पड़ताल करती है कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किस-किस रूप में बाधित हुई है, परस्पर संवाद और सार्थक बहस की गुंजाइश कैसे कम हुई है और इससे देश में नफ़रत और असहिष्णुता को कैसे बढ़ावा मिला है। कैसे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि, मीडिया और अन्य संस्थान एक मज़बूत लोकतंत्र के रूप में हमें विफल कर रहे हैं। इन स्थितियों से उबरने की राह खोजती यह किताब हमारे वर्तमान समय का वह दस्तावेज़ है जो स्वस्थ लोकतंत्र के हर हिमायती के लिए संग्रहणीय है। हिन्दी में आने से पहले ही यह किताब अंग्रेज़ी, मराठी और कन्नड़ में प्रकाशित हो चुकी है।
Mahila Lekhan Ke Sau Varsh
- Author Name:
Mamta Kaliya +1
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लेखन में बीसवीं सदी से आज तक का समय यदि एक प्रस्थान-बिन्दु के रूप में लिया जाए तो यह स्पष्ट है कि इन सौ वर्षों में स्त्रियों की लेखनी में सबसे अधिक परिवर्तन की प्रक्रिया दिखी। पुरुष-लेखन में मात्र एक पात्र होने की भूमिका से निकलकर स्त्री-लेखक ने स्वयं अपनी क़लम से अस्तित्व, व्यक्तित्व और विचार को अभिव्यक्ति देना अभीष्ट समझा। प्रस्तुत संकलन में स्त्री-रचनाकारों के कोमल संवेगों के साथ-साथ आत्मसजग सृजन और विकास-प्रक्रिया का परिचय मिलता है। राजेन्द्र बाला घोष (बंग महिला) से लेकर अलका सरावगी तक एक लम्बी परम्परा तैयार हुई है जहाँ क़लम की साँकलें कहीं अनायास तो कहीं सायास खुली हैं। हर्ष और गर्व का विषय है कि महिला-लेखन अब हिन्दी साहित्य में एक सशक्त सचेत और संवेदनायुक्त धारा है। आनेवाला समय यह याद रखे कि अपने इर्द-गिर्द खड़े किए समस्त चौखटे और कोष्ठक तोड़कर इक्कीसवीं सदी की स्त्री अपने पूरे तेवर के साथ हर क्षेत्र में उठ खड़ी हुई है। प्रस्तुत संकलन में हमें कहानी और निबन्ध, जीवनी और संस्मरण, आलोचना और विमर्श, गोया हर विधा और विषय पर स्त्री की तेजस्विता का परिचय मिलेगा। महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी से लेकर गीतांजलि श्री, मधु कांकरिया, सारा राय और अलका सरावगी तक अपने पूरे तेवर के साथ यहाँ मौजूद हैं। पृष्ठ सीमा के चलते कई विधाओं का मात्र उल्लेख ही कर पाये हैं। यहीं से अगले खंड की सम्भावना नज़र आती है।
Jung Andhvishwaso Ki
- Author Name:
Narendra Dabholkar +4
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कुशेरा के नेत्रोपचार करनेवाले गुरव बंधु हों, निःसन्तानों को सन्तान प्रदान करानेवाली पार्वती माँ हों, या एक ही प्रयास में व्यसनमुक्त करानेवाले शेषराव महाराज हों, थोड़ा-सा विचार करें, तो समझ में आता है कि लोग असहाय होते हैं। अतः वे दैववादी बनते हैं। इसी से अंधविश्वास का जन्म होता है। समाज जागरूक नहीं है। लोग अविवेकी, व्याकुल हैं, यह बिल्कुल सच है; लेकिन क्या लोगों की इस कमज़ोरी का इस्तेमाल उनकी लूट करने के लिए किया जाए? क्या लोगों की पीड़ा से अपनी झोली भरी जाए?
लोग श्रद्धा रखते हैं, देवाचार माननेवाले हैं, इसका यह मतलब नहीं कि लोग मूर्ख हैं और इसी कारण वे श्रद्धा, देवाचार, नैतिकता, पवित्रता आदि से सम्बन्धित बन्धनों का पालन करते हैं। हम देवताओं की ओर जाते हैं, वह चमत्कार के डर से नहीं बल्कि प्रेमभाव के कारण होता है। लेकिन प्रेम में भय और दहशत का कोई स्थान नहीं है। इस श्रद्धा में जो चीज़ें ग़ैरज़रूरी और अतार्किक हैं, उनका परीक्षण क्यों न किया जाए? कालबाह्य मूल्यों के प्रभावहीन होने से तथा नवविचारों के प्रभावी व्यवहार से लोग परिवर्तन चाहते हैं। हम जब ऐसा कहते हैं कि हिन्दू धर्म की बुनियादी मूल्य-व्यवस्था ही असमानता पर आधारित है, तो वास्तव में यह विधान भूतकाल को सम्बोधित करके किया गया होता है। जन्म से जातीय वरीयता का पुनरुज्जीवन आज कोई नहीं चाहता। प्रत्येक धर्म में मूल नीति तत्त्व बहुतांश रूप में समान हैं। प्रखर नास्तिक भी इसे स्वीकार करेगा। धर्म जब कर्मकांड मात्र रह जाता है, तब उसका विकृतिकरण होता है। क्या चमत्कार धर्मश्रद्धा का हिस्सा है?
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, "जिस शुद्ध हिन्दू धर्म का सम्मान मैं करता हूँ, वह चमत्कार पर आधारित नहीं है। चमत्कार एवं गूढ़ता के पीछे मत पड़ो। चमत्कार सत्य-प्राप्ति के मार्ग में आनेवाला सबसे बड़ा रोड़ा है। चमत्कारों का पागलपन हमें नादान और कमज़ोर बनाता है।"
इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में 'महाराष्ट्र अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति' विगत 24 वर्षों से कार्यरत है। अपने नि:स्वार्थ कार्यकर्ताओं के साथ उसने इस दौरान अनेक बार आन्दोलन किए हैं, अनेक बार अपनी जान जोखिम में डालकर और अपनी जेब से पैसा ख़र्च करके समाज में चल रहे अन्धविश्वासों के व्यापार का विरोध किया है। इस पुस्तक में ऐसे ही कुछ आन्दोलनों की रपट है। इन घटनाओं का विवरण पढ़कर पाठक स्वयं ही समझ सकता है कि अन्धविश्वासों से यह जंग कितनी ख़तरनाक लेकिन कितनी ज़रूरी है।
Gatiman Bharat
- Author Name:
K.J. Alphons +1
- Book Type:

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गतिमान भारत' पुस्तक मोदी सरकार के विगत आठ वर्षो में सरकार की नीतियों और नागरिकों के साथ ही देश पर उनके प्रभाव का अत्यंत व्यावहारिक और वस्तुपरक मूल्यांकन करती है। यह शिक्षा, डिजिटल क्रांति, कृषि, उद्योग, पर्यावरण, ग्रामीण विकास, स्वच्छता, बुनियादी ढाँचे, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था सहित पच्चीस प्रमुख क्षेत्रों पर विहंगम दृष्टि डालती है। प्रत्येक अध्याय में संबंधित क्षेत्र का अनुभव रखनेवाले विशेषज्ञों एवं प्रख्यात सिविल सेवकों ने अपने गहन अध्ययन के आधार पर भारत को गति देने में विभिन्न सरकारी नीतियों और योजनाओं के प्रभाव की विवचना की है। इनमें से कुछ क्षेत्रों में पूर्ण सुधार हुआ है, जबकि अन्य क्षेत्रों को दक्ष बनाने के लिए उन्हें फिर से व्यवस्थित किया गया है। प्रधानमंत्री मोदीजी के नेतृत्व में भारतीय लोकतंत्र ने जो सफर तय किया है और प्रत्येक क्षेत्र में आगे की जो राह है, उस पर एक वस्तुनिष्ठ एवं अनुभवजन्य विश्लेषण को प्रस्तुत करना ही इस पुस्तक का उद्देश्य है। भारत के चहुँमुखी विकास और विश्व में भारत के बढ़ते सम्मान और स्वीकार्यता का दिग्दर्शन करवाती यह पुस्तक हर भारतीय को स्वर्णिम भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है। Hindi Translation of Accelerating India
Man-Man Ke Sawal
- Author Name:
Narendra Dabholkar +4
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मनोविकार एक ऐसा विषय है जिसको लेकर भारतीय समाज में कई तरह के अन्धविश्वास व्याप्त हैं। मानसिक बीमारियाँ भी शरीर की अन्य व्याधियों की ही तरह होती हैं, इस तथ्य को आज भी भारत के लोग स्वीकार नहीं कर पाते। शिक्षित समाज का व्यवहार भी इस मामले में कुछ अलग नहीं है। पहले तो वे हर मनोविकार को पागलपन से जोड़ देते हैं, और इसे छिपाने की कोशिश करने लगते हैं। दूसरे ऐसे अनेक मनोरोग जो व्यक्ति के जीवन पर दीर्घकालीन प्रभाव डालते रहते हैं, उन्हें इलाज के योग्य ही नहीं माना जाता। यही वजह है कि हमारे यहाँ मनोरोग-विशेषज्ञों की भी भारी कमी है, और उनके स्थान पर झाड़-फूँक और गंडा-ताबीज का बोलबाला है।
अपने मौजूदा हालात से सामंजस्य न बिठा पाने की स्थिति को मानसिक तनाव कहा जाता है, इस परिभाषा की रोशनी में देखें तो हमारे आसपास कोई भी ऐसा नहीं है जो आज की बदलती हुई सामाजिक-पारिवारिक-नैतिक और आर्थिक परिस्थितियों के चलते तनाव से पूरी तरह मुक्त हो। तनाव की शुरुआती अवस्थाओं से लेकर सिज़ोफ्रेनिया और पागलपन तक मनोविकारों की एक लम्बी शृंखला होती है। इसलिए यह जरूरी है कि इस समस्या को गंभीरता से लिया जाए और तनाव कम करने की आध्यात्मिक विधियाँ बेचनेवाले गुरुओं और बाबाओं की शरण में जाने के बजाय इसे वैज्ञानिक ढंग से देखा-समझा जाए।
तार्किक जीवन-पद्धति के जुझारू पैरोकार नरेंद्र दाभोलकर की यह पुस्तक इसी विषय पर केन्द्रित है। इस पुस्तक का लेखन उन्होंने मनोविकार विशेषज्ञ हमीद दाभोलकर के साथ संयुक्त रूप से किया है। इस तरह एक तरफ़ जहाँ हम इसमें मानसिक विकारों की संरचना का वैज्ञानिक परिचय पाते हैं, वहीं भारतीय समाज में मनोरोगों को लेकर जो धार्मिक-सामाजिक और आध्यात्मिक अन्धविश्वास व्याप्त हैं, उनकी विसंगतियों को भी समझ पाते हैं। साथ ही मनोविकारों और उनके उपचार, मन के व्यवहार, बच्चों और स्त्रियों के मनोविकार तथा व्यसनों से जुड़े मानसिक दोषों को भी तर्कसंगत रूप में यहाँ विश्लेषित किया गया है?
Dharma Ki Sadhana
- Author Name:
Swami Vivekanand
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स्वामी विवेकानंद ने भारत में उस समय अवतार लिया, जब यहाँ हिंदू धर्म के अस्तित्व पर संकट के बादल मँडरा रहे थे। पंडित-पुरोहितों ने हिंदू धर्म को घोर आडंबरवादी और अंधविश्वासपूर्ण बना दिया था। ऐसे में स्वामी विवेकानंद ने हिंदू धर्म को एक अलग पहचान दिलाई। स्वामीजी का विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है। यहीं बड़े-बड़े महात्माओं तथा ऋषियों का जन्म हुआ; यह संन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यहीं आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिए जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है। प्रस्तुत पुस्तक ' धर्म की साधना' में स्वामीजी ने भारत के प्राचीन गौरव का उल्लेख करते हुए देश के युवकों का आह्वान किया है कि यही उचित समय है, जब वे हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना में जुट जाएँ और भारतीय पुनर्जागरण में सहभागी बनें। सही अर्थों में धर्म की साधना करना, उस पर चलना सिखाने वाली प्रेरणादायी पुस्तक!
Jati Vyavstha Aur Pitri Satta
- Author Name:
Periyar E.V. Ramasamy +1
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‘जाति और पितृसत्ता’ ई.वी. रामासामी नायकर 'पेरियार' के चिन्तन, लेखन और संघर्षों की केन्द्रीय धुरी रही है। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि इन दोनों के विनाश के बिना किसी आधुनिक समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता है। जाति और पितृसत्ता के सम्बन्ध में पेरियार क्या सोचते थे और क्यों वे इसके विनाश को आधुनिक भारत के निर्माण के लिए अपरिहार्य एवं अनिवार्य मानते थे? इन प्रश्नों का हिन्दी में एक मुकम्मल जवाब पहली बार यह किताब देती है।
इस संग्रह के लेख पाठकों को न केवल पेरियार के नज़रिए से बख़ूबी परिचित कराते हैं बल्कि इसकी भी झलक प्रस्तुत करते हैं कि पेरियार जाति एवं पितृसत्ता के विनाश के बाद किस तरह के सामाजिक सम्बन्धों की कल्पना करते थे। इन लेखों को पढ़ते हुए स्त्री-पुरुष के बीच कैसे रिश्ते होने चाहिए, इसकी एक पूरी तस्वीर सामने आ जाती है। इस किताब के परिशिष्ट खंड में पेरियार के सम्पूर्ण जीवन का वर्षवार लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है। पेरियार क़रीब 94 वर्षों तक जीवित रहे और अनवरत अन्याय के सभी रूपों के ख़िलाफ़ संघर्ष करते रहे। इस दौरान उन्होंने जो कुछ लिखा-कहा, उसमें से उनके कुछ प्रमुख उद्धरणों का चयन भी परिशिष्ट खंड में है। यही नहीं, इस खंड में तीन लेख पेरियार के अध्येताओं द्वारा लिखे गए हैं। पहले लेख में प्रसिद्ध विदुषी ललिता धारा ने महिलाओं के सन्दर्भ में पेरियार के चिन्तन, लेखन और संघर्षों के विविध आयामों को प्रस्तुत किया है। दूसरा और तीसरा लेख पेरियार के सामाजिक सघर्षों का एक गहन और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इनके लेखक टी. थमराईकन्न और वी. गीता तथा एस.वी. राजादुरै हैं। ये तीनों लेखक पेरियार के गम्भीर अध्येता माने जाते हैं। किताब का यह अन्तिम हिस्सा उनके चिन्तन, लेखन और संघर्षों के विविध चरणों की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत करता है।
Andhavishwas Unmoolan : Vol. 3 : Siddhant
- Author Name:
Narendra Dabholkar +3
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अंधविश्वास उन्मूलन और डॉ. नरेंद्र दाभोलकर एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। निरन्तर 25 वर्षों की मेहनत का फल है यह। अंधविश्वास उन्मूलन का कार्य महाराष्ट्र में विचार, उच्चार, आचार, संघर्ष, सिद्धान्त जैसे पंचसूत्र से होता आ रहा है। भारतवर्ष में ऐसा कार्य कम ही नज़र आता है।
'अंधविश्वास उन्मूलन : सिद्धांत' पुस्तक में गहन विचार-मंथन है। ईश्वर, धर्म, अध्यात्म, धर्मनिपेक्षता जैसे विषयों पर समाज-सुधारकों और विवेकवादी चिन्तकों ने समय-समय पर जो विचार व्यक्त किए, उनके मतभेदों को आन्दोलन के अनुभवों के आधार पर और व्यक्तिगत चिन्तन द्वारा परिभाषित किया गया है। ईश्वर के अस्तित्व पर विचार करते हुए लेखक का मुख्य उद्देश्य है कि—'व्यक्ति को विवेकशील बनाकर ही विवेकवादी समाज-निर्माण का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।'
अंधविश्वास के तिमिर से विवेक और विज्ञान के तेज की ओर ले जानेवाली यह पुस्तक परम्परा का तिमिर-भेद भी है और विज्ञान का लक्ष्य भी।
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