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Author:
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HindiCategory:
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स्टुअर्टपुरम और कप्पाराला टिप्पा पूर्व-अपराधी जनजातियों की बस्तियों के सम्बन्ध में प्रस्तुत यह पुस्तक आन्ध्र प्रदेश की विमुक्त जनजातियों के सम्बन्ध में उपलब्ध साहित्य के भंडार में एक स्वागत योग्य योगदान है। इन विमुक्त जनजातियों की कुल पाँच बस्तियाँ हैं। प्रस्तुत अध्ययन इनमें से दो—स्टुअर्टपुरम और कप्पाराला टिप्पा पर केन्द्रित है। स्टुअर्टपुरम मुख्य रूप से एक कृषि बस्ती है, यद्यपि चिराला कस्बे की निकटता के कारण इसका स्वरूप अर्द्धशहरी है। यहाँ इंडियन लीफ टोबैको कम्पनी स्थित है। स्टुअर्टपुरम की देखभाल साल्वेशन आर्मी को सौंपी गई थी जिसने यहाँ एक स्कूल और अस्पताल स्थापित किया है। आदिवासियों के लिए एक छात्रावास भी है। मुक्ति-सेना आज भी सेवा कार्य कर रही है। कप्पाराला टिप्पा की बस्ती अथवा बिट्रागुंटा सुधार बस्ती नेल्लोर जिले में है। पूर्व-अपराधी जनजाति बस्तियों में कप्पाराला की बस्ती सबसे पुरानी है। यह 1912 में स्थापित कावाली बस्ती से विकसित हुई है, जिसे अमरीका के बैपटिस्ट मिशनरियों ने बसाया था। इन बस्तियों से निकले कुख्यात डाकुओं की अपराध-प्रखरता के कारण अनेक सामाजिक रूप से सक्रिय जनों, जैसे विजयवाड़ा के नास्तिक केन्द्र के लवानम और श्रीमती हेमलता लवानम का ध्यान इसकी ओर गया जो यहाँ के निवासियों की अपराध-संस्कृति में बदलाव लाने के लिए दिन-रात अपना समय और ऊर्जा व्यय कर रहे हैं। प्रस्तुत कृति के लेखकों ने संग्रहालयों में अनुपलब्ध रिकॉर्ड और अभिलेख प्राप्त करने में सफलता पाई है। उन्होंने इस कृति से सम्बन्धित द्वितीयक स्रोतों की भी गहराई से छानबीन की है। इस पुस्तक को असाधारण बनाने वाली बात यह है कि उन्होंने विचाराधीन बस्तियों का अध्ययन दो भिन्न परिप्रेक्ष्यों के अन्तर्गत किया है। स्टुअर्टपुरम का अध्ययन ऐतिहासिक दृष्टिकोण से तो कप्पाराला टिप्पा का अध्ययन समाजशास्त्रीय दृष्टि से हुआ है। दोनों ही लेखकों को विमुक्त जनजातियों से सम्बन्धित विषयों पर शोध करने का व्यापक अनुभव है। उनके अनेक लेख और निबन्ध विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। यह पुस्तक उन अध्येताओं और शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी रहेगी जो औपनिवेशिक नृतत्त्व, अपराध विधि, औपनिवेशिक इतिहास, समाजविज्ञान, नृतत्त्वविज्ञान, कानून, राजनीति और विमुक्त जनजातियों में रुचि रखते हैं, विशेष रूप से जिनका सम्बन्ध अनुसूचित जातियों, घुमन्तू, अर्द्ध घुमन्तू जनजातियों और भारत के सीमान्त वर्गों से है।
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स्टुअर्टपुरम और कप्पाराला टिप्पा पूर्व-अपराधी जनजातियों की बस्तियों के सम्बन्ध में प्रस्तुत यह पुस्तक आन्ध्र प्रदेश की विमुक्त जनजातियों के सम्बन्ध में उपलब्ध साहित्य के भंडार में एक स्वागत योग्य योगदान है। इन विमुक्त जनजातियों की कुल पाँच बस्तियाँ हैं। प्रस्तुत अध्ययन इनमें से दो—स्टुअर्टपुरम और कप्पाराला टिप्पा पर केन्द्रित है।
स्टुअर्टपुरम मुख्य रूप से एक कृषि बस्ती है, यद्यपि चिराला कस्बे की निकटता के कारण इसका स्वरूप अर्द्धशहरी है। यहाँ इंडियन लीफ टोबैको कम्पनी स्थित है। स्टुअर्टपुरम की देखभाल साल्वेशन आर्मी को सौंपी गई थी जिसने यहाँ एक स्कूल और अस्पताल स्थापित किया है। आदिवासियों के लिए एक छात्रावास भी है। मुक्ति-सेना आज भी सेवा कार्य कर रही है। कप्पाराला टिप्पा की बस्ती अथवा बिट्रागुंटा सुधार बस्ती नेल्लोर जिले में है। पूर्व-अपराधी जनजाति बस्तियों में कप्पाराला की बस्ती सबसे पुरानी है। यह 1912 में स्थापित कावाली बस्ती से विकसित हुई है, जिसे अमरीका के बैपटिस्ट मिशनरियों ने बसाया था। इन बस्तियों से निकले कुख्यात डाकुओं की अपराध-प्रखरता के कारण अनेक सामाजिक रूप से सक्रिय जनों, जैसे विजयवाड़ा के नास्तिक केन्द्र के लवानम और श्रीमती हेमलता लवानम का ध्यान इसकी ओर गया जो यहाँ के निवासियों की अपराध-संस्कृति में बदलाव लाने के लिए दिन-रात अपना समय और ऊर्जा व्यय कर रहे हैं।
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Book Details
-
ISBN9789393768940
-
Pages304
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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विश्वास क्या है? कब वह अन्धविश्वास का रूप ले लेता है? हमारे संस्कार हमारे विचारों और विश्वासों पर क्या असर डालते हैं? समाज में प्रचलित धारणाएँ कैसे धीरे-धीरे सामूहिक श्रद्धा और विश्वास का रूप ले लेती हैं। टेलीविज़न जैसे आधुनिक आविष्कार के सामने मोबाइल साथ में लेकर बैठा व्यक्ति भी चमत्कारों, भविष्यवाणियों और भूत-प्रेतों से सम्बन्धित कहानियों पर क्यों विश्वास करता रहता है? क्यों कोई समाज लौट-लौटकर धार्मिक जड़तावाद और प्रतिक्रियावादी-पश्चमुखी राजनीतिक और सामाजिक धारणाओं की तरफ़ जाता रहता है?
क्या यह संसार किसी ईश्वर द्वारा की गई रचना है? या अपने कार्य-कारण के नियमों से चलनेवाला एक यंत्र है? ईश्वर के होने या न होने से हमारी सोच तथा जीवन-शैली पर क्या असर पड़ेगा? वह हमारे लिए क्या करता है और क्या नहीं करता? क्या वह ख़ुद ही हमारी रचना है? मन क्या है, उसके रहस्य हमें कैसे प्रकाशित या दिग्भ्रमित करते हैं? फल-ज्योतिष और भूत-प्रेत हमारे मन के किस ख़ाली और असहाय कोने में सहारा बनकर आते हैं? क्या अन्धविश्वासों का विरोध नैतिकता का विरोध है? क्या धार्मिक जड़ताओं पर कुठाराघात करना सामाजिक व्यक्ति को नीति से स्खलित करता है? या इससे वह ज्यादा स्वनिर्भर, स्वायत्त, स्वतंत्र और सुखी होता है?
स्त्रियों के जीवन में अन्धविश्वासों और अन्धश्रद्धा की क्या भूमिका होती है? वे ही क्यों अनेक अन्धविश्वासों की कर्ता और विषय दोनों हो जाती हैं? इस पुस्तक की रचना इन तथा इन जैसे ही अनेक प्रश्नों को लेकर की गई है। नरेंद्र दाभोलकर के अन्धविश्वास या अन्धश्रद्धा आन्दोलन की वैचारिक-सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक पृष्ठभूमि इस पुस्तक में स्पष्ट तौर पर आ गई है जिसकी रचना उन्होंने आन्दोलन के दौरान उठाए जानेवाले प्रश्नों और आशंकाओं का जवाब देने के लिए की।
Mahila Lekhan Ke Sau Varsh
- Author Name:
Mamta Kaliya +1
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लेखन में बीसवीं सदी से आज तक का समय यदि एक प्रस्थान-बिन्दु के रूप में लिया जाए तो यह स्पष्ट है कि इन सौ वर्षों में स्त्रियों की लेखनी में सबसे अधिक परिवर्तन की प्रक्रिया दिखी। पुरुष-लेखन में मात्र एक पात्र होने की भूमिका से निकलकर स्त्री-लेखक ने स्वयं अपनी क़लम से अस्तित्व, व्यक्तित्व और विचार को अभिव्यक्ति देना अभीष्ट समझा। प्रस्तुत संकलन में स्त्री-रचनाकारों के कोमल संवेगों के साथ-साथ आत्मसजग सृजन और विकास-प्रक्रिया का परिचय मिलता है। राजेन्द्र बाला घोष (बंग महिला) से लेकर अलका सरावगी तक एक लम्बी परम्परा तैयार हुई है जहाँ क़लम की साँकलें कहीं अनायास तो कहीं सायास खुली हैं। हर्ष और गर्व का विषय है कि महिला-लेखन अब हिन्दी साहित्य में एक सशक्त सचेत और संवेदनायुक्त धारा है। आनेवाला समय यह याद रखे कि अपने इर्द-गिर्द खड़े किए समस्त चौखटे और कोष्ठक तोड़कर इक्कीसवीं सदी की स्त्री अपने पूरे तेवर के साथ हर क्षेत्र में उठ खड़ी हुई है। प्रस्तुत संकलन में हमें कहानी और निबन्ध, जीवनी और संस्मरण, आलोचना और विमर्श, गोया हर विधा और विषय पर स्त्री की तेजस्विता का परिचय मिलेगा। महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी से लेकर गीतांजलि श्री, मधु कांकरिया, सारा राय और अलका सरावगी तक अपने पूरे तेवर के साथ यहाँ मौजूद हैं। पृष्ठ सीमा के चलते कई विधाओं का मात्र उल्लेख ही कर पाये हैं। यहीं से अगले खंड की सम्भावना नज़र आती है।
Jati Vyavstha Aur Pitri Satta
- Author Name:
Periyar E.V. Ramasamy +1
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‘जाति और पितृसत्ता’ ई.वी. रामासामी नायकर 'पेरियार' के चिन्तन, लेखन और संघर्षों की केन्द्रीय धुरी रही है। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि इन दोनों के विनाश के बिना किसी आधुनिक समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता है। जाति और पितृसत्ता के सम्बन्ध में पेरियार क्या सोचते थे और क्यों वे इसके विनाश को आधुनिक भारत के निर्माण के लिए अपरिहार्य एवं अनिवार्य मानते थे? इन प्रश्नों का हिन्दी में एक मुकम्मल जवाब पहली बार यह किताब देती है।
इस संग्रह के लेख पाठकों को न केवल पेरियार के नज़रिए से बख़ूबी परिचित कराते हैं बल्कि इसकी भी झलक प्रस्तुत करते हैं कि पेरियार जाति एवं पितृसत्ता के विनाश के बाद किस तरह के सामाजिक सम्बन्धों की कल्पना करते थे। इन लेखों को पढ़ते हुए स्त्री-पुरुष के बीच कैसे रिश्ते होने चाहिए, इसकी एक पूरी तस्वीर सामने आ जाती है। इस किताब के परिशिष्ट खंड में पेरियार के सम्पूर्ण जीवन का वर्षवार लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है। पेरियार क़रीब 94 वर्षों तक जीवित रहे और अनवरत अन्याय के सभी रूपों के ख़िलाफ़ संघर्ष करते रहे। इस दौरान उन्होंने जो कुछ लिखा-कहा, उसमें से उनके कुछ प्रमुख उद्धरणों का चयन भी परिशिष्ट खंड में है। यही नहीं, इस खंड में तीन लेख पेरियार के अध्येताओं द्वारा लिखे गए हैं। पहले लेख में प्रसिद्ध विदुषी ललिता धारा ने महिलाओं के सन्दर्भ में पेरियार के चिन्तन, लेखन और संघर्षों के विविध आयामों को प्रस्तुत किया है। दूसरा और तीसरा लेख पेरियार के सामाजिक सघर्षों का एक गहन और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इनके लेखक टी. थमराईकन्न और वी. गीता तथा एस.वी. राजादुरै हैं। ये तीनों लेखक पेरियार के गम्भीर अध्येता माने जाते हैं। किताब का यह अन्तिम हिस्सा उनके चिन्तन, लेखन और संघर्षों के विविध चरणों की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत करता है।
Andhavishwas Unmoolan : Vol. 3 : Siddhant
- Author Name:
Narendra Dabholkar +3
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अंधविश्वास उन्मूलन और डॉ. नरेंद्र दाभोलकर एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। निरन्तर 25 वर्षों की मेहनत का फल है यह। अंधविश्वास उन्मूलन का कार्य महाराष्ट्र में विचार, उच्चार, आचार, संघर्ष, सिद्धान्त जैसे पंचसूत्र से होता आ रहा है। भारतवर्ष में ऐसा कार्य कम ही नज़र आता है।
'अंधविश्वास उन्मूलन : सिद्धांत' पुस्तक में गहन विचार-मंथन है। ईश्वर, धर्म, अध्यात्म, धर्मनिपेक्षता जैसे विषयों पर समाज-सुधारकों और विवेकवादी चिन्तकों ने समय-समय पर जो विचार व्यक्त किए, उनके मतभेदों को आन्दोलन के अनुभवों के आधार पर और व्यक्तिगत चिन्तन द्वारा परिभाषित किया गया है। ईश्वर के अस्तित्व पर विचार करते हुए लेखक का मुख्य उद्देश्य है कि—'व्यक्ति को विवेकशील बनाकर ही विवेकवादी समाज-निर्माण का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।'
अंधविश्वास के तिमिर से विवेक और विज्ञान के तेज की ओर ले जानेवाली यह पुस्तक परम्परा का तिमिर-भेद भी है और विज्ञान का लक्ष्य भी।
Vivek Ki Pratibaddhata
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Narendra Dabholkar +3
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वैज्ञानिक दृष्टिकोण अर्थात् कार्यकारण भाव। चमत्कार अर्थात् वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव। यह सम्बन्ध प्रकाश और अँधेरे के समान है। एक का होना याने अनिवार्यतः दूसरे का ना होना। विज्ञान में चमत्कार नहीं होते। चमत्कार या तो रासायनिक, भौतिक प्रक्रिया होती है या हाथ की सफ़ाई होती है। बदमाशी भी हो सकती है और प्रसंग के अनुसार प्रकृति की अनसुलझी पहेली भी चमत्कार में शामिल होती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण जीवन में स्वीकारने का अर्थ है, आज या कल समझ में आनेवाली वैज्ञानिक विचार-पद्धति पर समाज का विश्वास होना।
चमत्कारों को चुनौती देने की भूमिका को ठीक से समझना चाहिए। संविधान ने हर व्यक्ति को उपासना, अलौकिक जीवन, आध्यात्मिक कल्याण की आज़ादी दी है, इसका सम्मान करना चाहिए। लेकिन चमत्कार पर विश्वास करना, उसकी जाँच-पड़ताल का विरोध और ऐसे चमत्कारों का प्रसार करते रहना, यह धर्म का हिस्सा नहीं हो सकता। भारतीय समाज बहुत जल्द भयग्रस्त हो जाता है। दैववादी मानसिकता के कारण लोग संकट को भाग्य का परिणाम मानते हैं। कई लोगों को लगता है कि दैवी-शक्ति प्राप्त कोई बाबा या कोई धार्मिक तीर्थ उन्हें कठिनाई से उबार लेगा। इस मानसिकता में रहनेवाला समाज स्वाभिमानशून्य, भगौड़ा, डरपोक और बुद्धि को रेहन पर रखनेवाला होता है। स्वाभिमानी, प्रयत्नवादी और निर्भय समाज बनाने के लिए चमत्कार का विरोध आवश्यक है।
मानसिक ग़ुलामी की सबसे बड़ी भयानकता यह है कि उस अवस्था में व्यक्ति की बुद्धि से प्रश्न पूछना तो दूर की बात है, व्यक्ति की बुद्धि, निर्णय-शक्ति, सम्पूर्ण विचार-क्षमता ये सभी बातें चमत्कार के आगे शून्य हो जाती हैं। व्यक्ति दासता में चला जाता है और फिर परिवर्तन की लड़ाई अधिक कठिन हो जाती है।
इस किताब में दाभोलकर जी के 2003 से 08 के दौरान लिखे आलेख शामिल हैं जो उन्होंने अन्धविश्वास और अवैज्ञानिकता के विरोध में विभिन्न मोर्चों और आन्दोलनों में काम करते हुए लिखे। उनके आन्दोलन का एकमात्र उद्देश्य एक विवेकशील मन का निर्माण था ताकि भारतीय लोग अपनी भौतिक लाचारगी और लिप्साओं के कारण धन्धेबाजों का शिकार न हों। उनके लेखन को पढ़ते हुए हम इक्कीसवीं सदी के भारत की धार्मिक-आध्यात्मिक-आर्थिक-सामाजिक विडम्बनाओं से भी परिचित होते हैं।
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