Wo Rain Lili Khilane Ke Din The
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KavitaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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वो रेन लिली खिलने के दिन थे कथाकार कविता की नयी कहानियों का संकलन है। अति-सम्प्रेषण और अकेलेपन से भरे सोशल मीडिया के इस समय में ये कहानियाँ समकालीन स्त्री-अनुभव की उस सघन और जटिल दुनिया में प्रवेश करती हैं, जहाँ निजी जीवन, सामाजिक संरचनाएँ और समय की नई चुनौतियाँ एक-दूसरे से लगातार टकराती रहती हैं। संवाद के संकट को सूक्ष्मता से पकड़ती ये कहानियाँ विवाह और परिवार जैसी संस्थाओं को चेतना और निर्णय के संयुक्त धरातल पर पुनर्परिभाषित करने का प्रयास करती हैं और स्त्री के सम्मान और पहचान जैसे जटिल राजनैतिक प्रश्नों को दैनिक जीवन की छोटी-छोटी स्थितियों में गहरे उतरकर सम्बोधित करती हैं। कविता इन कहानियों में बाहरी घटनाओं से अधिक उस भीतरी भूगोल को रेखांकित कर रही हैं, जहाँ स्त्री का मन, स्मृति और विवेक सामाजिक संरचनाओं से निरन्तर संवाद और संघर्ष में रहते हैं। यह उस नई बनती स्त्री की दुनिया है जो स्वयं को किसी एक भूमिका में सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि अपने लिए नए अर्थ और नए रास्ते तलाश कर रही है। संग्रह की कुछ कहानियों में महामारी के दौर का विस्थापन, भय और असुरक्षा भी दर्ज है, जहाँ पीड़ा है, अनिश्चितता है, मृत्यु है लेकिन उसके समानान्तर जीवन को थामे रखने की जिद भी है। प्रवाहमान और सघन स्त्री-भाषा में रची गई ये कहानियाँ एक नए और सम्भावनाशील समाज की ओर संकेत करती हैं, खासकर स्त्री के सन्दर्भ में।
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वो रेन लिली खिलने के दिन थे
कथाकार कविता की नयी कहानियों का संकलन है। अति-सम्प्रेषण और अकेलेपन से भरे सोशल मीडिया के इस समय में ये कहानियाँ समकालीन स्त्री-अनुभव की उस सघन और जटिल दुनिया में प्रवेश करती हैं, जहाँ निजी जीवन, सामाजिक संरचनाएँ और समय की नई चुनौतियाँ एक-दूसरे से लगातार टकराती रहती हैं।
संवाद के संकट को सूक्ष्मता से पकड़ती ये कहानियाँ विवाह और परिवार जैसी संस्थाओं को चेतना और निर्णय के संयुक्त धरातल पर पुनर्परिभाषित करने का प्रयास करती हैं और स्त्री के सम्मान और पहचान जैसे जटिल राजनैतिक प्रश्नों को दैनिक जीवन की छोटी-छोटी स्थितियों में गहरे उतरकर सम्बोधित करती हैं।
कविता इन कहानियों में बाहरी घटनाओं से अधिक उस भीतरी भूगोल को रेखांकित कर रही हैं, जहाँ स्त्री का मन, स्मृति और विवेक सामाजिक संरचनाओं से निरन्तर संवाद और संघर्ष में रहते हैं। यह उस नई बनती स्त्री की दुनिया है जो स्वयं को किसी एक भूमिका में सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि अपने लिए नए अर्थ और नए रास्ते तलाश कर रही है।
संग्रह की कुछ कहानियों में महामारी के दौर का विस्थापन, भय और असुरक्षा भी दर्ज है, जहाँ पीड़ा है, अनिश्चितता है, मृत्यु है लेकिन उसके समानान्तर जीवन को थामे रखने की जिद भी है।
प्रवाहमान और सघन स्त्री-भाषा में रची गई ये कहानियाँ एक नए और सम्भावनाशील समाज की ओर संकेत करती हैं, खासकर स्त्री के सन्दर्भ में।
Book Details
-
ISBN9789360861230
-
Pages176
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Kailash Banwasi
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- Description: कैलाश बनवासी ऐसे विरल कथाकार हैं जिनकी कहानियों में समाज के हाशिए के लोग बुलंद होकर बोलते हैं। ‘हवा बहुत तेज़ है’ उनका आठवाँ कहानी-संग्रह है जिसमें कुल ग्यारह कहानियाँ संकलित हैं। इन कहानियों के नायक एक तरफ़ मिस्त्री, प्लम्बर, चपरासी, वार्ड ब्वाय और रोज़गार की जद्दोजहद में फँसे युवा हैं तो दूसरी तरफ़ मध्यवर्ग के ऐसे अधेड़ हैं जिन्होंने बाज़ार और भ्रष्टाचार के बीच अपना ईमान और अच्छाइयाँ बचा रखी हैं या कि ऐसे मध्यवर्गीय लोग जो नए ज़माने की हवा के असर में तो हैं पर देश, काल और समाज का यथार्थ उन्हें अपनी तरफ़ खींच रहा है। ‘दाग़ अच्छे हैं’, ‘एक पुराना आदमी’, ‘मथुरा प्रसाद उर्फ़ राहत का एक नाम’, ‘गोपाल का गाना’ जैसी कहानियाँ कामगार वर्ग के बारे में अनेक शहरी मध्यवर्गीय पूर्वाग्रहों को तार-तार करने का काम करती हैं। ‘सब कुछ ठीक-ठाक है’ में कुछ भी ठीक-ठाक नहीं है। यह पहले से ही तबाह लोगों के कोरोना काल में बर्बाद हो जाने की कहानी है। यह उस लालची विसंगति की भी कहानी है जहाँ बहुतेरे प्लांट मालिकों ने कोरोना के नाम पर कंपनी को दिवालिया घोषित करवा के जनता का धन डकार लिया। दूसरी ओर उनमें काम करने वाले लोग सड़क पर आ गए। रोजगार की स्थितियाँ और उनके लिए संघर्ष दिन पर दिन बदतर ही होते गए हैं। ‘उन आँखों में अब कोई सपना नहीं है’ पढ़ते हुए बरबस अमरकान्त की कालजयी कहानी ‘डिप्टी कलेक्टरी’ याद आती है। ‘ज्ञान-विज्ञान-संज्ञान’ आज की उस उलटबाँसी को मानीख़ेज तरीक़े से रचती है जहाँ चीज़ों को देखने का एक अवैज्ञानिक रवैया सब तरफ़ पसर रहा है और विडम्बना यह है कि उसे विज्ञान के दम पर ही सत्य भी बताने की कोशिश की जा रही है। इन कहानियों में कुछ लोगों के किसी भी क़ीमत पर बहुत तेज़ आगे बढ़ते जाने के बीच उन लोगों का जीवन-संघर्ष और सुख-दुःख दर्ज हुआ जिन्होंने अपने जीवन-मूल्यों से समझौता नहीं किया और दिशाहीन बदलाव की तेज़ हवा के बीच तनकर खड़े हैं। कैलाश को अमरकान्त और स्वयंप्रकाश जैसे सिद्ध कथाकारों की पंक्ति में रखकर देखा जाना चाहिए। इन कहानियों को पढ़ना अपने आसपास की दुनिया से नए सिरे से परिचित होना है, एक तेज़ भागमभाग में जिसकी तरफ़ से हमने निगाह फेर ली है।
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