Pratinidhi Kahaniyan : Balwant Singh
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Author:
Krishna Sobti, Balwant SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
199
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“...खेतों की मुँडेरों पर से दीखते बबूल, कीकर, कच्चे घरों से उठता धुआँ, रात के सुनसान में सरपट भागते घोड़े, छवियाँ लशकाते डाकू, घरों से पेटियाँ धकेलते चोर, कनखियों से एक-दूसरे को रिझाते जवान मर्द और औरतें, भोले-भाले बच्चे, लम्बे सफ़र समेटते डाची सवार—समय और स्थितियों से सीनाज़ोरी करते बलवन्त सिंह के पात्र पाठक को देसी दिलचस्पियों से घेरे रहते हैं। कुछ कर गुज़रने के लिए जिस साहस की ज़रूरत इन्हें है, उसे कलात्मक उर्जा से मंज़िल तक पहुँचाने का फ़न लेखक के पास मौजूद है। बलवन्त सिंह के यहाँ धुँधलके और ऊहापोह की झुरमुरी कहानियाँ नहीं, दिन के उजाले में, रात के एकान्त में स्थितियों को चुनौती देते साधारण जन और उनका असाधारण पुरुषार्थ है। बलवन्त सिंह सिर्फ़ आदमी को ही नहीं रचते, कहानी की शर्त पर उसके खेल और कर्म को भी तरतीब देते हैं। वे शोषण और संघर्ष का नाम नहीं लेते, इसे केन्द्र में लाते हैं। यही कारण है कि उनके यहाँ नुमाइशी-पात्र नहीं, जीते-जागते हाड़-मांस के साधारण खुरदरे लोग मिलते हैं। वह अपनी कोशिशों की कामयाबी और बड़ी नाकामयाबी को भी जिए जाते हैं किसी अगले मौक़े की उम्मीद में...” —कृष्णा सोबती (भूमिका से)
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“...खेतों की मुँडेरों पर से दीखते बबूल, कीकर, कच्चे घरों से उठता धुआँ, रात के सुनसान में सरपट भागते घोड़े, छवियाँ लशकाते डाकू, घरों से पेटियाँ धकेलते चोर, कनखियों से एक-दूसरे को रिझाते जवान मर्द और औरतें, भोले-भाले बच्चे, लम्बे सफ़र समेटते डाची सवार—समय और स्थितियों से सीनाज़ोरी करते बलवन्त सिंह के पात्र पाठक को देसी दिलचस्पियों से घेरे रहते हैं। कुछ कर गुज़रने के लिए जिस साहस की ज़रूरत इन्हें है, उसे कलात्मक उर्जा से मंज़िल तक पहुँचाने का फ़न लेखक के पास मौजूद है।
बलवन्त सिंह के यहाँ धुँधलके और ऊहापोह की झुरमुरी कहानियाँ नहीं, दिन के उजाले में, रात के एकान्त में स्थितियों को चुनौती देते साधारण जन और उनका असाधारण पुरुषार्थ है। बलवन्त सिंह सिर्फ़ आदमी को ही नहीं रचते, कहानी की शर्त पर उसके खेल और कर्म को भी तरतीब देते हैं। वे शोषण और संघर्ष का नाम नहीं लेते, इसे केन्द्र में लाते हैं।
यही कारण है कि उनके यहाँ नुमाइशी-पात्र नहीं, जीते-जागते हाड़-मांस के साधारण खुरदरे लोग मिलते हैं। वह अपनी कोशिशों की कामयाबी और बड़ी नाकामयाबी को भी जिए जाते हैं किसी अगले मौक़े की उम्मीद में...”
—कृष्णा सोबती (भूमिका से)
Book Details
-
ISBN9788126714643
-
Pages183
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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रेशम की-सी नरम ठंडी मगर उष्म शैली में प्रस्तुत इस उपन्यास में एक ऐसी लड़की की कहानी है जिसके फटे बचपन ने उसके सहज भोलेपन को असमय चाक कर दिया और उसके तन-मन के गिर्द दुश्मनी की कँटीली बाड़ खींच दी।
अन्दर और बाहर की दोहरी दुश्मनी में जकड़ी रत्ती की लड़ाई मानवीय-मन की नितान्त उलझी हुई चाहत और जीवन-भरे संघर्ष की दस्तावेज़ है।
‘मित्रो मरजानी‘, ‘डार से बिछुड़ी’ और ‘यारों के यार’ से अलग और आगे इस उपन्यास में कृष्णा सोबती ने गहन संवेदना के स्तर पर कलाकार की तीसरी आँख से पर्त-दर-पर्त तन-मन की साँवली प्यास को उकेरा है।
आधुनिक भाव-बोध की पीठिका पर मनोविज्ञान की गूढ़तम पहेलियों को सादगी से आँक कर सोबती ने एक ऐसे वयस्क माध्यम और शिल्प की स्थापना की है जो एक साथ परम्परागत शिल्प और मूल्यों को चुनौती है।
आदर्शों की भव्यता से अलग हटकर ‘सूरजमुखी अँधेरे के’ यथार्थ और सत्य के निरूपण की वह असाधारण सत्य-कथा है जिसका सत्य कभी मरता नहीं।
Samaya Sargam
- Author Name:
Krishna Sobti
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हम हैं तो समय है।
हमारी ही चेतना में संचित है हमारा काल-आयाम। हम हैं, क्योंकि धरती है, हवा है, धूप है, जल है और यह आकाश। इसीलिए हम जीवित हैं।
भीतर और बाहर—सब कहीं—सब कुछ को अपने में सँजोए। विलीन हो जाने को पल-पल अनन्त में...।
पुरानी और नई सदी के दो-दो छोरों को समेटता ‘समय सरगम’ जिए हुए अनुभव की तटस्थता और सामाजिक परिवर्तन से उभरा, उपजा एक अनूठा उपन्यास है; और फिर भारत की बुज़ुर्ग पीढ़ियों का एक ही साथ नया-पुराना आख्यान और प्रत्याख्यान। संयुक्त परिवारों के भीतर और बाहर वरिष्ठ नागरिकों के प्रति उपेक्षा और उदासीनता ‘समय सरगम’ की बन्दिश में अन्तर्निहित है। आज के बदलते भारतीय परिदृश्य में यह उपन्यास व्यक्ति की विश्वव्यापी स्वाधीनता, उसके वैचारिक विस्तार और कुछ नए संस्कार-सन्दर्भों को प्रतिध्वनित करता है। दूसरे शब्दों में, इससे उत्तर-आधुनिक काल की सम्भावनाओं को भी चीन्हा जा सकता है; और उन मूल्यों को भी जो मानवीय विकास को सार्थकता प्रदान करते हैं। ईशान और आरण्या जैसे बुज़ुर्ग परस्परविरोधी विश्वास और निजी आस्थाओं के बावजूद साथ होने के लिए जिस पर्यावरण की रचना करते हैं, वहाँ न पारिवारिक या सामाजिक उदासीनता है और न किसी प्रकार का मानसिक उत्पीड़न।
कृष्णा सोबती की प्रख्यात क़लम ने इस कथाकृति में अपने समय और समाज को जिस आन्तरिकता से रचा है, वह वर्तमान सामाजिक यथार्थ को तात्त्विक ऊँचाइयों तक ले जाता है, और ऐसा करते हुए वे जिस भविष्य की परिकल्पना या उसका संकेत करती हैं, उसी में निहित है एक उद्भास्वर आलोक-पुंज।
Marfat Dilli
- Author Name:
Krishna Sobti
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दिल्ली से कृष्णा सोबती का रिश्ता बचपन से है। आज़ादी से पूर्व उनका वेतनभोगी परिवार साल के छह माह शिमला और छह माह दिल्ली में निवास करता था। अपने किशोर दिनों में वे दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में हॉकी खेलती रही हैं। बँटवारे के बाद लाहौर से आकर वे स्थायी तौर पर दिल्ली की हो गईं। दिल्ली का नागरिक होने पर उन्हें गर्व भी है और इस शहर से प्रेम भी। यहाँ के इतिहास और भूगोल को वे बहुत गहरे से जानती रही हैं। दिल्ली के तीन सौ से ज़्यादा गाँवों को और उनके बदलने की प्रक्रिया को उन्होंने पारिवारिक भाव से देखा है। हर गाँव को उन्होंने पैदल घूमा है।
‘मार्फ़त दिल्ली’ में उन्होंने आज़ादी बाद के समय की कुछ सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक छवियों को अंकित किया है। यह वह समय था जब ब्रिटिश सरकार के पराए अनुशासन से निकलकर दिल्ली अपनी औपनिवेशिक आदतों और देसी जीवन-शैली के बीच कुछ नया गढ़ रही थी। सड़कों पर शरणार्थियों की चोट खाई टोलियाँ अपने लिए छत और रोज़ी-रोटी तलाशती घूमती थीं। और देश की नई-नई सरकार अपनी ज़िम्मेदारियों से दो-चार हो रही थी।
उस विराट परिदृश्य में साहित्य समाज भी नई आँखों से देश और दुनिया को देख रहा था। लेखकों-कवियों की एक नई पीढ़ी उभर रही थी। लोग मिलते थे। बैठते थे। बहस करते थे और अपने रचनात्मक दायित्वों को ताज़ा बनाए रखते थे। बैठने-बतियाने की जगहें, काफी हाउस और रेस्तराँ साथियों की-सी भूमिका निभाते थे। मंडी हाउस और कनाट प्लेस नए विचारों और विचारधाराओं की ऊष्मा का प्रसार करते थे।
कृष्णा जी ने उस पूरे समय को सघन नागरिक भाव से जिया। भारतीय इतिहास की कुछ निर्णायक घटनाओं को उन्होंने उनके बीच खड़े होकर देखा। आज़ादी के पहले उत्सव का उल्लास और उसमें तैरती विभाजन की सिसकियों को उन्होंने छूकर महसूस किया। बापू की अन्तिम यात्रा में लाखों आँखों की नमी से वे भीगीं। दिल्ली में हिन्दी को एक बड़ी भाषा के रूप में उभरते हुए भी देखा। इन पन्नों में उन्होंने उस दौर की कुछ यादों को ताज़ा किया है।
Aai Larki
- Author Name:
Krishna Sobti
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यह एक लम्बी कहानी है—यों तो मृत्यु की प्रतीक्षा में एक बूढ़ी स्त्री की, पर वह फैली हुई है उसकी समूची ज़िन्दगी के आर-पार, जिसे मरने के पहले अपनी अचूक जिजीविषा से वह याद करती है। उसमें घटनाएँ, बिम्ब, तस्वीरें और यादें अपने सारे ताप के साथ पुनरवतरित होते चलते हैं—नज़दीक आती मृत्यु का उसमें कोई भय नहीं है बल्कि मानो फिर से घिरती-घुमड़ती सारी ज़िन्दगी एक निर्भय न्योता है कि वह आए, उसके लिए पूरी तैयारी है। पर यह तैयारी अपने मोह और स्मृतियों, अपनी ज़िद और अनुभवों का पल्ला झाड़कर किसी वैरागी सादगी में नहीं है बल्कि पिछले किये-धरे को एकबारगी अपने साथ लेकर मोह के बीचोबीच धँसते हुए प्रतीक्षा है—एक भयातुर समय में, जिसमें हम जीवन और मृत्यु, दोनों से लगातार डरते रहते हैं, उसमें सहज स्वीकार, उसकी विडम्बना और उसकी ट्रैजीकॉमिक अवस्थिति का पूरा और तीखा अवसाद है।
यह कथा अपनी स्मृति में पूरी तरह डूबी स्त्री का जगत् को छोड़ते हुए अपनी बेटी को दिया निर्मोह का उपहार है। राग और विराग के बीच चढ़ती-उतरती घाटी को भाषा की चमक में पार करते हुए कोई यह सब जंजाल छोड़कर चला जानेवाला है। लेकिन तब भी यहाँ सब कुछ ठहरा हुआ है : भाषा में।
कोई भी कृति सबसे पहले और सबके अन्त में भाषा में ही रहती है—उसी में उसका सच मिलता, चरितार्थ और विलीन होता है। कथा-भाषा का इस कहानी में एक नया उत्कर्ष है। उसमें होने, डूबने-उतराने, गढ़ने-रचने की कविता है—उसमें अपनी हालत को देखता-परखता, जीवन के अनेक अप्रत्याशित क्षणों को सहेजता और सच्चाई की सख़्ती को बखानता गद्य है। प्रूस्त ने कहीं लिखा है कि लेखक निरन्तर सामान्य चेतना और विक्षिप्तता की सरहद के आर-पार तस्करी करता है। ‘ऐ लड़की’ कविता के इलाक़े से गद्य का, मृत्यु के क्षेत्र से जीवन का चुपचाप उठाकर लाया-सहेजा गया अनुभव है।
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