Premchand Rachna Sanchayan
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An Anthology of Hindi writing of Premchand, compiled and edited by Nirmal Verma and Kamal Kishore Goenka
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An Anthology of Hindi writing of Premchand, compiled and edited by Nirmal Verma and Kamal Kishore Goenka
Book Details
-
ISBN9788172016630
-
Pages830
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Avg Reading Time28 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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"प्रेमचंद आधुनिक हिंदी साहित्य के कालजयी कथाकार हैं। कथा-कुल की सभी विधाओं—कहानी, उपन्यास, लघुकथा आदि सभी में उन्होंने लिखा और अपनी लगभग पैंतीस वर्ष की साहित्य-साधना तथा लगभग चौदह उपन्यासों एवं तीन सौ कहानियों की रचना करके ‘प्रेमचंद युग’ के रूप में स्वीकृत होकर सदैव के लिए अमर हो गए। प्रेमचंद का ‘सेवासदन’ उपन्यास इतना लोकप्रिय हुआ कि वह हिंदी का बेहतरीन उपन्यास माना गया। ‘सेवासदन’ में वेश्या-समस्या और उसके समाधान का चित्रण है, जो हिंदी मानस के लिए नई विषयवस्तु थी। ‘प्रेमाश्रम’ में जमींदार-किसान के संबंधों तथा पश्चिमी सभ्यता के पड़ते प्रभाव का उद्घाटन है। ‘रंगभूमि’ में सूरदास के माध्यम से गांधी के स्वाधीनता संग्राम का बड़ा व्यापक चित्रण है। ‘कायाकल्प’ में शारीरिक एवं मानसिक कायाकल्प की कथा है। ‘निर्मला’ में दहेज-प्रथा तथा बेमेल-विवाह के दुष्परिणामों की कथा है। ‘प्रतिज्ञा’ उपन्यास में पुनः ‘प्रेमा’ की कथा को कुछ परिवर्तन के साथ प्रस्तुत किया गया है। ‘गबन’ में युवा पीढ़ी की पतन-गाथा है और ‘कर्मभूमि’ में देश के राजनीति संघर्ष को रेखांकित किया गया है। ‘गोदान’ में कृषक और कृषि-जीवन के विध्वंस की त्रासद कहानी है। उपन्यासकार के रूप में प्रेमचंद का महान् योगदान है। उन्होंने हिंदी उपन्यास को भारतीय मुहावरा दिया और उसे समाज और संस्कृति से जोड़ा तथा साधारण व्यक्ति को नायक बनाकर नया आदर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने हिंदी भाषा को मानक रूप दिया और देश-विदेश में हिंदी उपन्यास को भारतीय रूप देकर सदैव के लिए अमर बना दिया। —डॉ. कमल किशोर गोयनका "
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Book
What distinguishes Premchand Rachna Sanchayan is not merely its comprehensive sweep of Premchand's prose, but the editorial vision of Nirmal Verma and Kamal Kishore Goenka — two editors who understood that Premchand's genius lay in his ability to render the texture of rural and urban life with equal compassion. Published by Sahitya Akademi, this anthology does not privilege the famous stories alone; it recovers pieces that reveal the arc of Premchand's evolving empathy for farmers, widows, Dalits, and the morally compromised. The selection reflects a curatorial intelligence attuned to both literary merit and social conscience, making this volume not a monument but a living conversation with the writer who gave Hindi fiction its moral vocabulary. For readers approaching Premchand for the first time or returning after years, this edition offers a reliable, authoritative entry into a body of work that shaped modern Indian realism.
इस पुस्तक को पढ़ते समय मुझे किस तरह का अनुभव मिलेगा?
यह संचयन आपको भारतीय ग्रामीण और शहरी जीवन की जटिलताओं के बीच ले जाएगा, जहाँ करुणा, विडंबना और नैतिक द्वंद्व एक साथ चलते हैं। प्रेमचंद की भाषा सरल है, लेकिन उनके पात्रों का आंतरिक संघर्ष गहरा और स्थायी है। यह पाठ अनुभव भावुकता से अधिक चिंतन की मांग करता है — आप हर कहानी के बाद ठहर कर सोचेंगे कि मनुष्य की गरिमा और परिस्थितियों के बीच कितना नाजुक संतुलन है। पढ़ने की गति धीमी होगी, क्योंकि हर वाक्य समाज के किसी कोने को उजागर करता है।
यह पुस्तक किन पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है और इसे पढ़ने के लिए किस तरह की तैयारी चाहिए?
- उन पाठकों के लिए जो भारतीय समाज के औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक काल को साहित्य के माध्यम से समझना चाहते हैं।
- जो पाठक यथार्थवाद की परंपरा में रुचि रखते हैं और मनोरंजन से अधिक सामाजिक आत्मावलोकन की अपेक्षा करते हैं।
- हिंदी साहित्य के शैलीगत विकास को समझने की इच्छा रखने वाले विद्यार्थी और शोधार्थी।
- यह अपेक्षा करता है कि पाठक धैर्य और खुले मन से पढ़ें, क्योंकि कुछ कहानियाँ असहज सवाल उठाती हैं।
इस पुस्तक की विषय-वस्तु का आज के भारतीय पाठकों के लिए सांस्कृतिक या ऐतिहासिक महत्व क्या है?
प्रेमचंद ने जाति, भूमि स्वामित्व, लैंगिक असमानता और आर्थिक शोषण पर जो लिखा, वे विषय आज भी भारतीय जीवन में सक्रिय हैं। किसानों की आत्महत्याएं, दलित अधिकारों की लड़ाई, विधवाओं की सामाजिक स्थिति — ये सब आज भी समाचारों में हैं। यह संचयन एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एक नैतिक दर्पण है जो दिखाता है कि हमने क्या बदला और क्या नहीं। समकालीन भारत के लिए, प्रेमचंद की रचनाएँ एक अनिवार्य संदर्भ बिंदु हैं जो हमें याद दिलाती हैं कि सामाजिक न्याय का संघर्ष कितना पुराना और कितना अधूरा है।
निर्मल वर्मा और कमल किशोर गोयनका के संपादन में इस संचयन की विशेषता क्या है?
निर्मल वर्मा और कमल किशोर गोयनका ने केवल लोकप्रिय कहानियों को नहीं चुना, बल्कि प्रेमचंद के विकसित होते सामाजिक दृष्टिकोण और शैलीगत प्रयोगों को भी स्थान दिया। उनका चयन साहित्यिक गुणवत्ता और सामाजिक प्रासंगिकता के संतुलन पर आधारित है। साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित यह संस्करण विश्वसनीय पाठ प्रस्तुत करता है, जिसमें कम ज्ञात रचनाएँ भी शामिल हैं जो प्रेमचंद की वैचारिक यात्रा को पूर्णता से दर्शाती हैं। यह संपादकीय निर्णय इस संचयन को एक शैक्षणिक और साहित्यिक संदर्भ ग्रंथ बनाता है।
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