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पंकज मित्र हिन्दी के सर्वप्रिय कथाकारों में हैं जिन्हें हमेशा ही पढ़ा जाता है। ग्रामीण और क़स्बाई समाज की गहरी पड़ताल और सघन संवेदना तथा थोड़े व्यंग्य के साथ समाज के ठेठ देसी यथार्थ की अक्काशी करनेवाले कथाकार के रूप में उन्होंने अपना एक विशेष स्थान बनाया है। इस संग्रह में शामिल कहानियाँ गाँव-समाज में होनेवाले नित नए बदलावों को रेखांकित करते हुए देश का एक नया कथा-वृत्तान्त रचती हैं जिसमें युवा पीढ़ी, उसकी उम्मीदें, निराशाएँ, बदलते जीवन-मूल्य और चाकू के फल की तरह गाँव की हवा में घुसता शहर कई तरह से उजागर हुआ है। ये कहानियाँ बताती हैं कि गाँव या कहें वह भारतीय चेतना जो एक भाव-धारा की तरह गाँव से चलकर क़स्बों और फिर शहरों तक में हमारी ख़ास पहचान होती हैं, भूमंडलीय वास्तविकता के सामने जो रूप धारण करती हैं, वह एक अलग ही भाव-भूमि है। उसका सम्बन्ध न योरोप-अमेरिका से जुड़ता है और न भारत की अपनी मिट्टी से। यह एक ख़तरनाक भूगोल है जिसके समतल होने तक शायद हम बहुत कुछ गँवा दें। ‘फ़ेसबुक मेन्स पार्लर’, ‘अधिग्रहण’ आदि कहानियाँ इस यथार्थ को बहुत कलात्मकता के साथ रेखांकित करती हैं। देश के इस बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक भूगोल में स्त्री फिर एक उम्मीद की तरह दिखती है, वह शायद इसलिए कि उसे अपना रास्ता बनाना है, ऐसा कोई रास्ता उसके पास था नहीं जिसके खो जाने का भय उसे हो। ‘जलेबीबाई डॉट कॉम’ इस सन्दर्भ में पठनीय है। ‘मनेकि लबरा नाई की दास्तान’ अपने शिल्प और अपने मंतव्य दोनों में कथाकार की क्षमता को गहराई से रेखांकित करती है।

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पंकज मित्र हिन्दी के सर्वप्रिय कथाकारों में हैं जिन्हें हमेशा ही पढ़ा जाता है। ग्रामीण और क़स्बाई समाज की गहरी पड़ताल और सघन संवेदना तथा थोड़े व्यंग्य के साथ समाज के ठेठ देसी यथार्थ की अक्काशी करनेवाले कथाकार के रूप में उन्होंने अपना एक विशेष स्थान बनाया है।

इस संग्रह में शामिल कहानियाँ गाँव-समाज में होनेवाले नित नए बदलावों को रेखांकित करते हुए देश का एक नया कथा-वृत्तान्त रचती हैं जिसमें युवा पीढ़ी, उसकी उम्मीदें, निराशाएँ, बदलते जीवन-मूल्य और चाकू के फल की तरह गाँव की हवा में घुसता शहर कई तरह से उजागर हुआ है। ये कहानियाँ बताती हैं कि गाँव या कहें वह भारतीय चेतना जो एक भाव-धारा की तरह गाँव से चलकर क़स्बों और फिर शहरों तक में हमारी ख़ास पहचान होती हैं, भूमंडलीय वास्तविकता के सामने जो रूप धारण करती हैं, वह एक अलग ही भाव-भूमि है। उसका सम्बन्ध न योरोप-अमेरिका से जुड़ता है और न भारत की अपनी मिट्टी से। यह एक ख़तरनाक भूगोल है जिसके समतल होने तक शायद हम बहुत कुछ गँवा दें। ‘फ़ेसबुक मेन्स पार्लर’, ‘अधिग्रहण’ आदि कहानियाँ इस यथार्थ को बहुत कलात्मकता के साथ रेखांकित करती हैं।

देश के इस बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक भूगोल में स्त्री फिर एक उम्मीद की तरह दिखती है, वह शायद इसलिए कि उसे अपना रास्ता बनाना है, ऐसा कोई रास्ता उसके पास था नहीं जिसके खो जाने का भय उसे हो। ‘जलेबीबाई डॉट कॉम’ इस सन्दर्भ में पठनीय है। ‘मनेकि लबरा नाई की दास्तान’ अपने शिल्प और अपने मंतव्य दोनों में कथाकार की क्षमता को गहराई से रेखांकित करती है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2017
Weight
322 grams
ISBN-13
9788126730070
Pages
140
Reading time
~5 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 22 cm
Language
Hindi

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