Myrrh
(0)
Author:
Ayesha ArfeenPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
250
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आयशा आरफ़ीन की कहानियाँ मेरे लिए ख़ुशगवार हैरत और मसर्रत का सबब बनी हैं। किसी भी नए लिखने वाले से ऐसी उम्मीद करना कि उनकी कहानियाँ मज़बूत और पुख़्ता हों, मुश्किल है लेकिन आयशा आरफ़ीन की कहानियों में एक ख़ास क़िस्म की मज़बूती भी है और इनकी बुनावट भी पुख़्ता है। ‘मिर्र’ की कहानियों की सतह बुलन्द है और प्लॉट, थीम और चरित्र-चित्रण के हवाले से भी ये कहानियाँ मुकम्मल हैं। इन सब से बढ़ कर आयशा आरफ़ीन के आख्यान एक अजीब से असरार से भरे हुए हैं जिसे हम रहस्य का नाम दे सकते हैं। यही तत्व उनकी कहानियों का सब से बड़ा जौहर (Essence) है जिसकी जड़ें उनके किरदारों के वजूदी-संकट (Existential Crisis) में अन्दर तक समाई हुई हैं। मैं आयशा आरफ़ीन को इतनी उम्दा और दिल को छू लेने वाली कहानियाँ लिखने के लिए दिल से मुबारकबाद पेश करता हूँ और मुझे यक़ीन है कि उनका ये कहानी-संग्रह संजीदा साहित्यिक गलियारों में बड़े पैमाने पर स्वीकृति हासिल करेगा। — ख़ालिद जावेद
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आयशा आरफ़ीन की कहानियाँ मेरे लिए ख़ुशगवार हैरत और मसर्रत का सबब बनी हैं। किसी भी नए लिखने वाले से ऐसी उम्मीद करना कि उनकी कहानियाँ मज़बूत और पुख़्ता हों, मुश्किल है लेकिन आयशा आरफ़ीन की कहानियों में एक ख़ास क़िस्म की मज़बूती भी है और इनकी बुनावट भी पुख़्ता है। ‘मिर्र’ की कहानियों की सतह बुलन्द है और प्लॉट, थीम और चरित्र-चित्रण के हवाले से भी ये कहानियाँ मुकम्मल हैं। इन सब से बढ़ कर आयशा आरफ़ीन के आख्यान एक अजीब से असरार से भरे हुए हैं जिसे हम रहस्य का नाम दे सकते हैं। यही तत्व उनकी कहानियों का सब से बड़ा जौहर (Essence) है जिसकी जड़ें उनके किरदारों के वजूदी-संकट (Existential Crisis) में अन्दर तक समाई हुई हैं।
मैं आयशा आरफ़ीन को इतनी उम्दा और दिल को छू लेने वाली कहानियाँ लिखने के लिए दिल से मुबारकबाद पेश करता हूँ और मुझे यक़ीन है कि उनका ये कहानी-संग्रह संजीदा साहित्यिक गलियारों में बड़े पैमाने पर स्वीकृति हासिल करेगा।
— ख़ालिद जावेद
Book Details
-
ISBN9789349180383
-
Pages152
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
परिन्दे निर्मल वर्मा का पहला कहानी-संग्रह है। सात कहानियों के इस संग्रह के पहले प्रकाशन (1958) के बाद जैसे हिन्दी कहानी को एक नया प्रस्थान मिला था। न सिर्फ़ इन कहानियों की भाषा के कारण, बल्कि इतिहास और समय के विशाल फलक पर मानव-नियति को समझने की एक नई दृष्टि और प्रविधि के कारण भी।
नामवर सिंह ने ‘परिन्दे’ को नई कहानी धारा की पहली कहानी ठहराया था। उन्होंने सही ही कहा था कि हिन्दी भाषा के लिए जो काम कविता नहीं कर सकी, वह इन कहानियों के गद्य ने कर दिखाया।
निर्मल जी के पात्र अपने वातावरण में इतने प्राकृतिक होते हैं कि वे यथार्थवादी कही जानेवाली कहानियों के विवरण-बहुल चरित्रों से ज़्यादा वास्तविक लगने लगते हैं। अपनी व्यक्ति-सत्ता में वे इतने सजीव और सम्भव लोग हैं कि उनका वर्णन करने के लिए कथाकार की भाषा को लम्बी-लम्बी डिटेल्स देने की जरूरत नहीं पड़ती, वह बस उन्हें उनकी जगह पर आलोकित भर कर देती है, और हम देखते हैं कि ये हमारे अपने किसी हिस्से के कितने करीब हैं। वे हमारी स्मृति का हिस्सा हो जाते हैं, जैसे अपनी जिन्दगी के कुछ महीन अनुभव।
‘परिन्दे’ में संकलित सभी कहानियों में मनुष्य की ऐतिहासिक अवस्थिति से उत्पन्न अस्तित्वगत प्रश्नों को, स्वतंत्रता और मुक्ति की उसकी आन्तरिक व्याकुलता को समग्र अभिव्यक्ति मिली है। रोज़मर्रा जीवन की परिस्थितियों और पात्रों को निर्मल वर्मा यहाँ इस तरह अंकित करते हैं कि उनके पीछे हमें मानव की जिजीविषा की सुदीर्घ यात्रा अपने तमाम प्रश्नों और सन्देहों के साथ आती दिखाई देती है।
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