Maan Darti Hai
(0)
Author:
Anjali KajalPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
299
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माँ इसलिए डरती है कि उसकी बेटी मर्दों से नहीं डरती, वह कुछ करना चाहती है, ऊपर उठना चाहती है जाति और लिंग के भेदभाव से, उस रोशनी में जाना चाहती है जिसे उसकी माँ ने, उसकी पूर्वजाओं ने नहीं देखा। यह डर सदियों से इकट्ठा होता आया है उन लोगों के दिलों में जिन्हें कमतर और कमज़ोर महसूस कराने के लिए समाज ने बाक़ायदा एक व्यवस्था बनाई है, सुनिश्चित किया है कि कुछ लोग हों जिन्हें डराने का अधिकार रहे और कुछ लोग हों जिन्हें अपना डर प्राकृतिक लगे। अंजली काजल की ये कहानियाँ इसी डर को समझने और पकड़ने की कोशिश करती हैं, वे जानना चाहती हैं कि एक देश, एक संस्कृति, एक समाज जिसकी जड़ें काल में इतनी दूर तक जाती हैं, आखिर उसने डर का यह समाजविज्ञान किसलिए गढ़ा होगा, कि अपनी ही आधी जनसंख्या को मनुष्य के स्तर से नीचे रखने में किसको किसका भला नजर आया होगा! कहीं स्त्री स्त्री होकर कुछ कम मनुष्य हो जाती है, कहीं कोई पूरा समुदाय ही उसे दी गई किसी पहचान के चलते हाशियों पर रहने-रेंगने लगता है; इन कहानियों में बिद्ध पीड़ा जानना चाहती है कि यह किसलिए और आख़िर कब तक? इसलिए ये कहानियाँ संघर्ष के उस संकल्प को भी पहचानती और रेखांकित करती हैं जो उत्पीड़ितों के हृदय में, उनकी आत्मा में इस उत्पीड़न के ही चलते पैदा होता है, और जो कहता है कि समय हमेशा बदलता है और समाज को भी बदलना होगा। ये कहानियाँ बताती हैं कि वे माँएँ आ रही हैं जो न डरेंगी, न अपने बच्चों को, अपनी बेटियों को डरना सिखाएँगी
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माँ इसलिए डरती है कि उसकी बेटी मर्दों से नहीं डरती, वह कुछ करना चाहती है, ऊपर उठना चाहती है जाति और लिंग के भेदभाव से, उस रोशनी में जाना चाहती है जिसे उसकी माँ ने, उसकी पूर्वजाओं ने नहीं देखा। यह डर सदियों से इकट्ठा होता आया है उन लोगों के दिलों में जिन्हें कमतर और कमज़ोर महसूस कराने के लिए समाज ने बाक़ायदा एक व्यवस्था बनाई है, सुनिश्चित किया है कि कुछ लोग हों जिन्हें डराने का अधिकार रहे और कुछ लोग हों जिन्हें अपना डर प्राकृतिक लगे।
अंजली काजल की ये कहानियाँ इसी डर को समझने और पकड़ने की कोशिश करती हैं, वे जानना चाहती हैं कि एक देश, एक संस्कृति, एक समाज जिसकी जड़ें काल में इतनी दूर तक जाती हैं, आखिर उसने डर का यह समाजविज्ञान किसलिए गढ़ा होगा, कि अपनी ही आधी जनसंख्या को मनुष्य के स्तर से नीचे रखने में किसको किसका भला नजर आया होगा!
कहीं स्त्री स्त्री होकर कुछ कम मनुष्य हो जाती है, कहीं कोई पूरा समुदाय ही उसे दी गई किसी पहचान के चलते हाशियों पर रहने-रेंगने लगता है; इन कहानियों में बिद्ध पीड़ा जानना चाहती है कि यह किसलिए और आख़िर कब तक?
इसलिए ये कहानियाँ संघर्ष के उस संकल्प को भी पहचानती और रेखांकित करती हैं जो उत्पीड़ितों के हृदय में, उनकी आत्मा में इस उत्पीड़न के ही चलते पैदा होता है, और जो कहता है कि समय हमेशा बदलता है और समाज को भी बदलना होगा। ये कहानियाँ बताती हैं कि वे माँएँ आ रही हैं जो न डरेंगी, न अपने बच्चों को, अपनी बेटियों को डरना सिखाएँगी
Book Details
-
ISBN9789360867911
-
Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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ग़ौर करने वाली बात है कि जिस अनुभव जगत को नासिरा शर्मा ने अपनी रचनात्मकता के केन्द्र में रखा है, वह उन्हें और उनकी संवेदना को पीढ़ियों और देश-काल के ओर-छोर तक फैला देता है। एक रूढ़िग्रस्त समाज में उसके बुनियादी अर्धांश—नारी जाति की घुटन, बेबसी और मुक्तिकामी छटपटाहट का जैसा चित्रण इन कहानियों में हुआ है, अन्यत्र दुर्लभ है। बल्कि ईमानदारी से स्वीकार किया जाए तो ये कहानियाँ नारी की जातीय त्रासदी का मर्मान्तक दस्तावेज़ हैं, फिर चाहे वह किसी भी सामन्ती समाज में क्यों न हो। दिन-रात टुकड़े-टुकड़े होकर बँटते रहना और दम तोड़ जाना ही जैसे उसकी नियति है। रचना-शिल्प की दृष्टि से भी ये कहानियाँ बेहद सधी हुई हैं। इनसे उद्घाटित होता हुआ यथार्थ अपने आनुभूतिक आवेग के कारण काव्यात्मकता से सराबोर है, यही कारण है कि लेखिका अपनी बात कहने के लिए न तो भाषायी आडम्बर का सहारा लेती है, न किसी अमूर्तन का और न किसी आरोपित प्रयोग और विचार का। उसमें अगर विस्तार भी है तो वह एक त्रासद स्थिति के काल-विस्तार को ही प्रतीकित करता है। कहना न होगा कि नासिरा शर्मा की ये कहानियाँ हमें अपने चरित्रों की तरह गहन अवसाद, छटपटाहट और बदलाव की चेतना से भर जाती हैं।
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- Description: कुछ कहानीकार आलोचकों के प्रिय होते हैं, कुछ पाठकों के। अरुण प्रकाश पाठकों के ज़्यादा प्रिय लेखक रहे हैं। उनके लिखे की सराहना करने वाले पाठक बहुतायत मिलते हैं। भैया एक्सप्रेस, जल-प्रांतर, बेला एक्का लौट रही है, गज पुराण, नहान, भासा आदि उनकी बहुपठित-बहुचर्चित कहानियाँ रही हैं। इनकी 'हिचक' कहानी 'बहाव' पत्रिका में छापते हुए संपादक के रूप में अमरकांत ने लिखा था, 'छोटे-छोटे वाक्यों से रचना करना अरुण प्रकाश की विशेषता है जैसे चिडिय़ा अपार धैर्य के साथ तिनकों से खूबसूरत घोंसला बनाती है। इस कहानी में एक लड़की जूडो सीखना चाहती है और उसके माँ-बाप हिचक रहे हैं। मामूली जीवन से रचनाकार कुछ धागे निकालकर कला-कौशल से ऐसी कहानी बुनता है जिससे सार्थकता व आनंद दोनों प्राप्त होते हैं।' अरुण प्रकाश की कहानियों में हमारे समाज की विडंबना और विद्रुपता के चित्र अलग से नहीं दिखाए जाते बल्कि वे अंतर्गुम्फित होते हैं। सहजता के साथ गौरतलब और सार्थक बात कहना ही इस कथाकार की बड़ी विशेषता है। इस संग्रह में अरुण प्रकाश की आखरी दौर में लिखी गयी उन कहानियों को संकलित किया गया है जो उनके जीवनकाल में पुस्तकाकार नहीं आ पायी थीं। ये नयी सदी के आरंभिक काल में बदल रहे भारतीय समाज की कहानियाँ हैं। निश्चित रूप से इन कहानियों के बिना कथाकार अरुण प्रकाश पर समग्रता में बात नहीं हो सकती है।
Mahboob Jamana Aur Jamane Mein Ve
- Author Name:
Alpana Mishr
- Book Type:

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Description:
अल्पना मिश्र हिन्दी कहानी के सूची-समाज में अनिवार्य रूप से शामिल नहीं हैं लेकिन वे उसकी सबसे मज़बूत परम्परा का एक विद्रोही और दमकता हुआ नाम हैं। उन्हें उखड़े और बाज़ार प्रिय लोगों द्वारा सूचीबद्ध नहीं किया जा सका। कहानी का यह धीमा सितारा मिटने वाला, धुँधला होने वाला नहीं है, निश्चय ही यह स्थायी दूरियों तक जाएगा।
अल्पना मिश्र की कहानियों में अधूरे, तकलीफ़देह, बेचैन, खंडित और संघर्ष करते मानव जीवन के बहुसंख्यक चित्र हैं। वे अपनी कहानियों के लिए, बहुत दूर नहीं जातीं, निकटवर्ती दुनिया में रहती हैं। आज, पाठक और कथाकार के बीच की दूरी कुछ अधिक ही बढ़ती जा रही है, अल्पना मिश्र की कहानियों में यह दूरी नहीं मिलेगी। आज बहुतेरे नए कहानीकार प्रतिभाशाली तो हैं पर कहानी तत्व उनका दुर्बल है, वे अपनी निकटस्थ, खलबलाती, उजड़ती, दुनिया को छोड़कर नए और आकर्षक भूमंडल में जा रहे हैं। इस नज़रिये से देखें तो अल्पना मिश्र उड़ती नहीं हैं, वे प्रचलित के साथ नहीं हैं, वे ढूँढ़ती हुई, खोजती हुई, धीमे-धीमे अँगुली पकड़कर लोगों यानी अपने पाठकों के साथ चलती हैं।
‘ग़ैरहाज़िरी में हाज़िर’, ‘गुमशुदा’, ‘रहगुज़र की पोटली’, ‘महबूब ज़माना और ज़माने में वे’, ‘सड़क मुस्तकिल’, ‘उनकी व्यस्तता’, ‘मेरे हमदम मेरे दोस्त’, ‘पुष्पक विमान’ और ‘ऐ अहिल्या’ कहानियाँ इस संग्रह में हैं। इन सभी में किसी-न-किसी प्रकार के हादसे हैं। भूस्खलन, पलायन, छद्म आधुनिकता, जुल्म, दहेज हत्याएँ, स्त्री-शोषण से जुड़ी घटनाएँ अल्पना मिश्र की कहानियों के केन्द्र में हैं। इन सभी कहानियों में लेखिका की तरफ़दारी और आग्रह तीखे और स्पष्ट हैं। वे अत्याधुनिक अदाओं और स्थापत्य के लिए विकल नहीं हैं। उनकी कहानियाँ आलंकारिक नहीं हैं, वे उत्पीड़न के ख़िलाफ़ मानवीय आन्दोलन का पक्ष रखती हैं और इस तरह सामाजिक कायरता से हमें मुक्त कराने का रचनात्मक प्रयास करती हैं। मुझे इस तरह की कहानियाँ प्रिय हैं।
—ज्ञानरंजन
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