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Maan Darti Hai

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माँ इसलिए डरती है कि उसकी बेटी मर्दों से नहीं डरती, वह कुछ करना चाहती है, ऊपर उठना चाहती है जाति और लिंग के भेदभाव से, उस रोशनी में जाना चाहती है जिसे उसकी माँ ने, उसकी पूर्वजाओं ने नहीं देखा। यह डर सदियों से इकट्‌ठा होता आया है उन लोगों के दिलों में जिन्हें कमतर और कमज़ोर महसूस कराने के लिए समाज ने बाक़ायदा एक व्यवस्था बनाई है, सुनिश्चित किया है कि कुछ लोग हों जिन्हें डराने का अधिकार रहे और कुछ लोग हों जिन्हें अपना डर प्राकृतिक लगे। अंजली काजल की ये कहानियाँ इसी डर को समझने और पकड़ने की कोशिश करती हैं, वे जानना चाहती हैं कि एक देश, एक संस्कृति, एक समाज जिसकी जड़ें काल में इतनी दूर तक जाती हैं, आखिर उसने डर का यह समाजविज्ञान किसलिए गढ़ा होगा, कि अपनी ही आधी जनसंख्या को मनुष्य के स्तर से नीचे रखने में किसको किसका भला नजर आया होगा! कहीं स्त्री स्त्री होकर कुछ कम मनुष्य हो जाती है, कहीं कोई पूरा समुदाय ही उसे दी गई किसी पहचान के चलते हाशियों पर रहने-रेंगने लगता है; इन कहानियों में बिद्ध पीड़ा जानना चाहती है कि यह किसलिए और आख़िर कब तक? इसलिए ये कहानियाँ संघर्ष के उस संकल्प को भी पहचानती और रेखांकित करती हैं जो उत्पीड़ितों के हृदय में, उनकी आत्मा में इस उत्पीड़न के ही चलते पैदा होता है, और जो कहता है कि समय हमेशा बदलता है और समाज को भी बदलना होगा। ये कहानियाँ बताती हैं कि वे माँएँ आ रही हैं जो न डरेंगी, न अपने बच्चों को, अपनी बेटियों को डरना सिखाएँगी।

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माँ इसलिए डरती है कि उसकी बेटी मर्दों से नहीं डरती, वह कुछ करना चाहती है, ऊपर उठना चाहती है जाति और लिंग के भेदभाव से, उस रोशनी में जाना चाहती है जिसे उसकी माँ ने, उसकी पूर्वजाओं ने नहीं देखा। यह डर सदियों से इकट्‌ठा होता आया है उन लोगों के दिलों में जिन्हें कमतर और कमज़ोर महसूस कराने के लिए समाज ने बाक़ायदा एक व्यवस्था बनाई है, सुनिश्चित किया है कि कुछ लोग हों जिन्हें डराने का अधिकार रहे और कुछ लोग हों जिन्हें अपना डर प्राकृतिक लगे।

अंजली काजल की ये कहानियाँ इसी डर को समझने और पकड़ने की कोशिश करती हैं, वे जानना चाहती हैं कि एक देश, एक संस्कृति, एक समाज जिसकी जड़ें काल में इतनी दूर तक जाती हैं, आखिर उसने डर का यह समाजविज्ञान किसलिए गढ़ा होगा, कि अपनी ही आधी जनसंख्या को मनुष्य के स्तर से नीचे रखने में किसको किसका भला नजर आया होगा!

कहीं स्त्री स्त्री होकर कुछ कम मनुष्य हो जाती है, कहीं कोई पूरा समुदाय ही उसे दी गई किसी पहचान के चलते हाशियों पर रहने-रेंगने लगता है; इन कहानियों में बिद्ध पीड़ा जानना चाहती है कि यह किसलिए और आख़िर कब तक?

इसलिए ये कहानियाँ संघर्ष के उस संकल्प को भी पहचानती और रेखांकित करती हैं जो उत्पीड़ितों के हृदय में, उनकी आत्मा में इस उत्पीड़न के ही चलते पैदा होता है, और जो कहता है कि समय हमेशा बदलता है और समाज को भी बदलना होगा। ये कहानियाँ बताती हैं कि वे माँएँ आ रही हैं जो न डरेंगी, न अपने बच्चों को, अपनी बेटियों को डरना सिखाएँगी।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2025
Weight
170 grams
ISBN-13
9789360867911
Pages
160
Reading time
~5 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21.5 cm
Language
Hindi

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