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जब समय और वस्तुजगत को किसी भाषा में व्यक्त या उत्कीर्ण करने की तमाम प्रविधियाँ आजमाई जा चुकी हों और उनकी असफलताएँ हर जगह दर्ज हो रही हों, ऐसे समय में कैफ़ी हाशमी का हिन्दी कहानी के परिक्षेत्र में आना किसी महत्वपूर्ण घटना की तरह है। अवाक् और अचम्भित करनेवाली प्रामाणिक-विश्वसनीयता के साथ, भाषिक अवबोध और उसे विन्यस्त करने में सक्षम मौलिक संरचना के साथ ‘शिया बटर’, ‘कैफ़े कॉफ़ी डे’, ‘बंकर’ जैसी कहानियों का आना कहानियों की प्रचलित निरन्तरता में एक नए प्रस्थान की तरह है। जैसे किसी ट्रेन ने अपनी पटरी और यात्री ने अपना रास्ता बदल दिया हो। पिछली सदी के एक विख्यात और हमारे भर्तृहरि जैसे भाषा-चिन्तक ने कहा था कि कोई भी भाषा असंख्य पगडंडियों की एक लम्बी और रहस्यपूर्ण सुरंग जैसी होती है। आप एक दरवाज़े से इसमें दाख़िल होते हैं, तो सब कुछ वहाँ जाना-पहचाना, स्मृतियों में पहले से ही मौजूद गली-मोहल्लों, पड़ोसियों-परिजनों, चौराहों-बाज़ारों और उनमें घूमते-टहलते पात्रों के साथ दृश्यमान होता है। सारे लैंडस्केप वही होते हैं, लेकिन अगर कहीं आप दूसरे दरवाज़े से दाख़िल हुए तो वही जगह एक ऐसे मायालोक या भूल-भुलैयाँ में तब्दील हो जाती है, जिससे बाहर निकल पाना न सिर्फ़ असम्भव-सा हो जाता है, बल्कि किसी एडिक्ट जैसे खुमार में आप वहीं रह जाना चाहते हैं, मुक्ति की किसी भी आशा और कामना को त्याग कर। कैफ़ी हाशमी की कहानियाँ बहुत गहरी और एकाग्र संवेदना के साथ उस दुर्लभ संरचना को प्रत्यक्ष करती हैं, जहाँ बाह्य वस्तुजगत की समस्त सचल और अचल उपस्थितियाँ एक-दूसरे में पिघलती और विलीन होती हुई क़िस्से के उस जादू को पैदा करती हैं, जो पुरानी फ़ैंटसी और जादुई यथार्थवाद के बाद का जादू है। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण यह तथ्य है कि ये कहानियाँ हमारे आज के ही जीवन की भयग्रस्त, मार्मिक लेकिन फिर भी ख़ुशियों, प्यार, उम्मीदों से भरी हुई टाइमलाइन की अनमोल कहानियाँ हैं। —उदय प्रकाश

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जब समय और वस्तुजगत को किसी भाषा में व्यक्त या उत्कीर्ण करने की तमाम प्रविधियाँ आजमाई जा चुकी हों और उनकी असफलताएँ हर जगह दर्ज हो रही हों, ऐसे समय में कैफ़ी हाशमी का हिन्दी कहानी के परिक्षेत्र में आना किसी महत्वपूर्ण घटना की तरह है। अवाक् और अचम्भित करनेवाली प्रामाणिक-विश्वसनीयता के साथ, भाषिक अवबोध और उसे विन्यस्त करने में सक्षम मौलिक संरचना के साथ ‘शिया बटर’, ‘कैफ़े कॉफ़ी डे’, ‘बंकर’ जैसी कहानियों का आना कहानियों की प्रचलित निरन्तरता में एक नए प्रस्थान की तरह है। जैसे किसी ट्रेन ने अपनी पटरी और यात्री ने अपना रास्ता बदल दिया हो।

पिछली सदी के एक विख्यात और हमारे भर्तृहरि जैसे भाषा-चिन्तक ने कहा था कि कोई भी भाषा असंख्य पगडंडियों की एक लम्बी और रहस्यपूर्ण सुरंग जैसी होती है। आप एक दरवाज़े से इसमें दाख़िल होते हैं, तो सब कुछ वहाँ जाना-पहचाना, स्मृतियों में पहले से ही मौजूद गली-मोहल्लों, पड़ोसियों-परिजनों, चौराहों-बाज़ारों और उनमें घूमते-टहलते पात्रों के साथ दृश्यमान होता है। सारे लैंडस्केप वही होते हैं, लेकिन अगर कहीं आप दूसरे दरवाज़े से दाख़िल हुए तो वही जगह एक ऐसे मायालोक या भूल-भुलैयाँ में तब्दील हो जाती है, जिससे बाहर निकल पाना न सिर्फ़ असम्भव-सा हो जाता है, बल्कि किसी एडिक्ट जैसे खुमार में आप वहीं रह जाना चाहते हैं, मुक्ति की किसी भी आशा और कामना को त्याग कर।

कैफ़ी हाशमी की कहानियाँ बहुत गहरी और एकाग्र संवेदना के साथ उस दुर्लभ संरचना को प्रत्यक्ष करती हैं, जहाँ बाह्य वस्तुजगत की समस्त सचल और अचल उपस्थितियाँ एक-दूसरे में पिघलती और विलीन होती हुई क़िस्से के उस जादू को पैदा करती हैं, जो पुरानी फ़ैंटसी और जादुई यथार्थवाद के बाद का जादू है। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण यह तथ्य है कि ये कहानियाँ हमारे आज के ही जीवन की भयग्रस्त, मार्मिक लेकिन फिर भी ख़ुशियों, प्यार, उम्मीदों से भरी हुई टाइमलाइन की अनमोल कहानियाँ हैं।

—उदय प्रकाश

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2025
Weight
172 grams
ISBN-13
9789349180420
Pages
168
Reading time
~6 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
13 × 20 cm
Language
Hindi

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