Pratinidhi Kahaniyan : Swayam Prakash
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स्वयं प्रकाश की कहानियाँ भारतीय, विशेष रूप से हिन्दी मध्यवर्ग के जीवन की एक तस्वीर पेश करती हैं—मनुष्यता से लबरेज़ पर दब्बू और डरपोक मध्यवर्ग, छोटी-छोटी आकांक्षाओं के लिए भी संघर्षरत, अन्ततः उन्हें स्थगित करता मध्यवर्ग, स्वार्थों की अन्धी दौड़ में भागता-गिरता-पड़ता मध्यवर्ग, निम्नवर्गीय जनों से विराग रखता मध्यवर्ग। यूँ तो स्वयं प्रकाश का कथाफ़लक गाँव से शहर तक फैला है, परन्तु उसका केन्द्र मध्यवर्ग ही है। यह मध्यवर्ग स्वतंत्रता आन्दोलन के दौर का मध्यवर्ग नहीं है जिसमें निम्नवर्ग के प्रति एक सदाशयता और सहभाव मौजूद था। इसमें निम्नवर्ग के प्रति वितृष्णा और घृणा निर्णायक हद तक मौजूद है। इस मध्यवर्ग में एक छोटी संख्या, उन लोगों की भी है, जिनमें समाज को बदलने की इच्छा मौजूद है। ऐसे चरित्र स्वयं प्रकाश के यहाँ प्रमुखता से मौजूद हैं। स्वयं प्रकाश की गहरी सहानुभूति इनके साथ है। इसीलिए इनके प्रति एक तरह का आलोचनात्मक भाव भी मौजूद है। परिवर्तनकामी चेतना जब मध्यवर्गीय स्वार्थपरता, पर्सनाल्टी कल्ट, या थोथे आदर्शवाद से घिर जाती है, स्वयं प्रकाश इन चरित्रों के प्रति तीखे हो जाते हैं। उनकी कहानियों में भारतीय स्त्री के जीवन की गहरी आलोचनात्मक पड़ताल भी मौजूद है। वे स्त्री-चरित्रों को प्रायः एक टाइप की तरह नहीं, एक व्यक्ति की तरह अंकित करते हैं। ये स्त्री-चरित्र पुरुष-चरित्रों की तरह ही निजी विशिष्टताओं के मालिक हैं। उन पर सामाजिक संरचना के दबाव हैं, परन्तु वे उनके विरुद्ध जीते हुए अपनी तरह का संसार रचने को आतुर हैं। स्वयं प्रकाश ने कहानीपन की रक्षा करते हुए, उसे रोचक बनाते हुए एक ज्ञानी की तरह नहीं एक क़िस्सागो की तरह अपनी कहानियाँ कही हैं।
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About the Book
स्वयं प्रकाश की कहानियाँ भारतीय, विशेष रूप से हिन्दी मध्यवर्ग के जीवन की एक तस्वीर पेश करती हैं—मनुष्यता से लबरेज़ पर दब्बू और डरपोक मध्यवर्ग, छोटी-छोटी आकांक्षाओं के लिए भी संघर्षरत, अन्ततः उन्हें स्थगित करता मध्यवर्ग, स्वार्थों की अन्धी दौड़ में भागता-गिरता-पड़ता मध्यवर्ग, निम्नवर्गीय जनों से विराग रखता मध्यवर्ग। यूँ तो स्वयं प्रकाश का कथाफ़लक गाँव से शहर तक फैला है, परन्तु उसका केन्द्र मध्यवर्ग ही है। यह मध्यवर्ग स्वतंत्रता आन्दोलन के दौर का मध्यवर्ग नहीं है जिसमें निम्नवर्ग के प्रति एक सदाशयता और सहभाव मौजूद था। इसमें निम्नवर्ग के प्रति वितृष्णा और घृणा निर्णायक हद तक मौजूद है। इस मध्यवर्ग में एक छोटी संख्या, उन लोगों की भी है, जिनमें समाज को बदलने की इच्छा मौजूद है। ऐसे चरित्र स्वयं प्रकाश के यहाँ प्रमुखता से मौजूद हैं। स्वयं प्रकाश की गहरी सहानुभूति इनके साथ है। इसीलिए इनके प्रति एक तरह का आलोचनात्मक भाव भी मौजूद है। परिवर्तनकामी चेतना जब मध्यवर्गीय स्वार्थपरता, पर्सनाल्टी कल्ट, या थोथे आदर्शवाद से घिर जाती है, स्वयं प्रकाश इन चरित्रों के प्रति तीखे हो जाते हैं। उनकी कहानियों में भारतीय स्त्री के जीवन की गहरी आलोचनात्मक पड़ताल भी मौजूद है। वे स्त्री-चरित्रों को प्रायः एक टाइप की तरह नहीं, एक व्यक्ति की तरह अंकित करते हैं। ये स्त्री-चरित्र पुरुष-चरित्रों की तरह ही निजी विशिष्टताओं के मालिक हैं। उन पर सामाजिक संरचना के दबाव हैं, परन्तु वे उनके विरुद्ध जीते हुए अपनी तरह का संसार रचने को आतुर हैं। स्वयं प्रकाश ने कहानीपन की रक्षा करते हुए, उसे रोचक बनाते हुए एक ज्ञानी की तरह नहीं एक क़िस्सागो की तरह अपनी कहानियाँ कही हैं।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 2nd
- Publication year
- 2020
- Weight
- 138 grams
- ISBN-13
- 9789389598070
- Pages
- 152
- Reading time
- ~5 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 12 × 18 cm
- Language
- Hindi
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‘सम्मुख’ नामवर सिंह के साक्षात्कारों की महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। नामवर सिंह आधुनिक हिन्दी के सबसे बड़े संवादी थे। जिस अर्थ में महात्मा गाँधी आधुनिक भारत के। वाद-विवाद-संवाद को अनिवार्य मानते हुए संवाद के प्रत्येक रूप के लिए प्रस्तुत। संवादी आलोचक। साहित्य-समाज में छिड़ी चर्चाओं में अपनी मान्यताओं और तर्कों के साथ उपस्थित होकर उसमें अपने ढंग से हस्तक्षेप करना उन्हें ज़रूरी लगता था। सम्भवतः इसीलिए उन्होंने ‘साक्षात्कार’ विधा को उसके उभार के दौर से ही गम्भीरता से लिया। साक्षात्कार विधा के उभार का गहरा सम्बन्ध आठवें दशक में पत्रकारिता और साहित्य की आन्तरिक ज़रूरतों और उनके रिश्तों के साथ ही भारतीय लोकतंत्र में आए बुनियादी परिवर्तन से है। पुस्तक में संकलित साक्षात्कारों का विषय क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है। मार्क्सवाद, समकालीन विश्व, पूँजीवाद, नवसाम्राज्यवाद, नवफासीवाद और भारतीय लोकतंत्र के विरूपीकरण से लेकर कविता और कहानी तक। साहित्य और देश-दुनिया की उनकी समझ का एक स्पष्ट प्रतिबिम्ब यहाँ मिलता है। उनकी विश्वदृष्टि का रूपायन इनमें हुआ है। पुस्तक दो खंडों में है। दीर्घ और विषय केन्द्रित साक्षात्कार पहले खंड में हैं। इनमें एक तरह की तार्किक पूर्णता है। उठाए गए प्रश्नों पर नामवर जी का अभिमत समग्रता के साथ अभिव्यक्त हुआ है। दूसरे खंड में प्रकाशित साक्षात्कारों में ‘तेज चाल बातचीत’ का बोध होता है। इनमें एक तरह की क्षिप्रता है। विलक्षण नुकीलापन। ये साक्षात्कार हिन्दी के शीर्ष आलोचक नामवर सिंह की विचार-प्रक्रिया को भी रेखांकित करते हैं।
Zamane Se Do Do Hath
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Namvar Singh +2
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प्रो. नामवर सिंह हिन्दी का चेहरा हैं। उनमें हिन्दी समाज, साहित्य-परम्परा और सर्जना की संवेदना रूपायित होती है। वे न सीमित अर्थों में साहित्यकार हैं और न आलोचक। वे हिन्दी में मानवतावादी, लोकतांत्रिक और समाजवादी विचारों की व्यापक स्वीकृति के लिए सतत संघर्षशील प्रगतिशील आन्दोलन के अग्रणी विचारक थे। स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज और राजनीति की जनपक्षधर शक्तियों को उन्होंने अपनी वैचारिकता, आलोचकीय प्रतिभा और लोकसंवेदी-तर्कप्रवण वक्तृता से निरन्तर मज़बूत किया। वे देश में समतावादी समाज का सपना सँजोये रखनेवाली सामाजिक शक्तियों के पक्ष में सामन्तवादी-पुनरुत्थानवादी शक्तियों और पूँजीवादी शक्तियों से निरन्तर मुठभेड़ जारी रखनेवाले वैचारिक योद्धा थे। उन्होंने जहाँ एक ओर धर्म, लोक, परम्परा और संस्कृति के मानवीय मूल्यों पर ज़ोर देनेवाली विरासत की सटीक व्याख्या की है, वहीं इनको उपकरण बनाकर सामाजिक भेदों को स्वीकृत करानेवाले बौद्धिक प्रयत्नों के ख़िलाफ़ हमलावर तेवर भी अपनाए। उन्होंने परम्परा और आधुनिकता के मूल्यांकन की प्रगतिशील परम्परा को आगे बढ़ाया। प्रस्तुत संग्रह में नामवर जी के विगत दो दशकों में दिए गए अनेक व्याख्यानों एवं वाचिक टिप्पणियों के साथ दो आलेख शामिल हैं, जिनमें भूमंडलीकरण, फासीवाद, साम्प्रदायिकता भाषा और संस्कृति के ज्वलन्त सवालों पर नामवर जी के विचार हिन्दी समाज की जड़ता को तोड़ने के क्रम में हमारे सामने आते हैं।
Tumhara Namvar
- Author Name:
Namvar Singh +2
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नामवर सिंह आधुनिक हिन्दी के सबसे बड़े संवादी थे। इस पुस्तक में संकलित पत्र उनके संवादी-भाव को समझने की एक नई दृष्टि देते हैं। ‘तुम्हारा नामवर’ के पहले खंड में परिजनों को लिखे पत्र हैं। मझले भाई रामजी सिंह को सम्बोधित पत्र अनेक दृष्टियों से विशिष्ट हैं। इन पत्रों में आधुनिक एवं पारम्परिक जीवन के द्वन्द्वों के दबावों की अनेक झलकें संकेत रूप में मौजूद हैं। सबसे छोटे भाई काशीनाथ सिंह को लिखे पत्र उन स्थितियों और जीवन-प्रसंगों पर रोशनी डालते हैं जिनमें नामवर सिंह का निर्माण हुआ। व्यक्तिगत पत्रों में बेटी समीक्षा को दार्जिलिंग से लिखे गए दस पत्रों का एक अलग ही महत्त्व है। अठहत्तर वर्ष की अवस्था में गहन भावनाओं से भरे हुए ये पत्र ‘चिट्ठी भी हैं और डायरी भी’। इन्हें हिन्दी की हँसमुख और दिलख़ुश गद्य परम्परा में सम्मान के साथ रखा जा सकता है। दूसरे खंड में साहित्य-सहचरों—केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध, राजेन्द्र यादव, विश्वनाथ त्रिपाठी, रवीन्द्र कालिया, कमला प्रसाद, नंदकिशोर नवल और महेन्द्रनाथ राय—को लिखे गए पत्र संकलित हैं। इन पत्रों में एक पाठक के रूप में नामवर जी अपने समय-साहित्य के विभिन्न मुद्दों पर न सिर्फ़ बातचीत की एक वृहद् ज़मीन तैयार करते दिखते हैं, बल्कि लेखक व सम्पादक के रूप में अपनी ज़िम्मेदारी भी निभाते नज़र आते हैं। तीसरे खंड में श्रीनारायण पांडेय के नाम लिखे गए पत्रों को व्यक्तिगत-पारिवारिक पत्रों की शृंखला में ही रखा जा सकता है। पांडेय जी 1952-1954 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में नामवर जी के छात्र रहे हैं। ये पत्र काशीनाथ सिंह के नाम पत्रों की ही तरह महत्त्वपूर्ण हैं। नामवर जी के व्यक्तित्व के छिपे हुए रूपों के साथ ही उनके राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक विचारों की गम्भीर झलक इन पत्रों में मौजूद है। इस पुस्तक से बाहर भी अभी हज़ारों पत्र लोगों के निजी संग्रह में मौजूद होंगे। उन्हें भी प्राप्त होने के बाद अगले संस्करण में शामिल कर लिया जाएगा। बावजूद इसके ‘तुम्हारा नामवर’ में संकलित पत्र हिन्दी आलोचना में ‘दूसरी परम्परा की खोज’ करनेवाले नामवर सिंह के जीवन-अनुभव से निकला वह जीवन-दर्शन हैं जिनके आलोक में केवल अतीत, वर्तमान ही नहीं बल्कि भविष्य का भी बहुत कुछ पढ़ा, समझा और रचा जा सकता है।
Yathaprasang
- Author Name:
Namwar Singh +1
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हिन्दी क्षेत्र में फासीवाद इसलिए ताकतवर हो सका है, क्योंकि शिक्षित लोग सुपढ़ होने के बजाय कुपढ़ हुए हैं। उन्होंने परम्परा, संस्कृति, धर्म, आधुनिकता, ज्ञान-विज्ञान—सबकी अतार्किक और अतिरेकी सम्प्रदायवादी-फासीवादी व्याख्याओं पर भरोसा किया है। इसलिए शिक्षित लोगों के पास जाना और उनसे बात करना जरूरी है। उनके बीच जाकर धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और जनवादी विचारों को पहुँचाना जरूरी है। उनके दिमागों में छाए हुए वैचारिक जालों को साफ करना जरूरी है। इस बात की जरूरत को प्रगतिशील आन्दोलन और नामवर जी बहुत गम्भीरता से समझते थे। इसीलिए अपने हजारों व्याख्यानों के माध्यम से नामवर जी ने प्रगतिशील नवजागरण को आगे बढ़ाया। कहना न होगा कि नामवर सिंह आधुनिक हिन्दी के सबसे बड़े संवादी हैं। जिस अर्थ में महात्मा गांधी आधुनिक भारत के। वाद-विवाद संवाद को अनिवार्य मानते हुए संवाद के प्रत्येक रूप के लिए प्रस्तुत। संवादी आलोचक। साहित्य-समाज में छिड़ी चर्चाओं में अपनी मान्यताओं और तर्कों के साथ उपस्थित होकर उनमें अपने ढंग से हस्तक्षेप करना उन्हें जरूरी लगता था। रुचिकर भी। वाद-विवाद संवाद की इस प्रक्रिया में नामवर जी ने साहित्यिक और साहित्येतर विषयों, व्यक्तियों और प्रकरणों पर अपने विचार विस्तार से व्यक्त किये। कहना न होगा कि इस प्रक्रिया में वे साहित्यिक आलोचक की सीमित परिधि से बाहर निकलकर हिन्दी समाज में एक विचारक के तौर पर उभरे। यह मुख्यतः नामवर जी के व्याख्यानों का संकलन है, कुछ महत्त्वपूर्ण साक्षात्कार भी इसमें शामिल हैं। इस पुस्तक में संकलित सामग्री से गुजरते हुए आप नामवर जी की प्रतिभा के विविध आयामों से संवाद कर सकेंगे।
Samay Se Samvad
- Author Name:
Namwar Singh +1
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नामवर सिंह की विचार-यात्रा और आलोचना-यात्रा को प्रगतिशील आन्दोलन की यात्रा से जोड़कर देखा जाना चाहिए। वे इस आन्दोलन की सबसे प्रभावशाली आवाज़ों में से एक थे। जन-पक्षधर और प्रतिबद्ध विचारों के लिए संघर्ष करने का साहस उन्हें इसी से मिलता था। आज आन्दोलन पर चौतरफा दबाव है। भारतीय समाज और राजनीति में लोकतांत्रिकता, जनवाद और संवाद पर गहरा आक्रमण हो रहा है। फ़ासीवाद, कट्टरपन्थी और अधिनायकवादी विचारों को प्रतिबन्ध, दुष्प्रचार और शक्ति-प्रयोग से लादा जा रहा है। प्रगतिशील, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष विचारों को कैद, हिंसा और हत्या के रास्ते चुप कराने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में विभिन्न विचारधाराओं को माननेवाले लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और जन-पक्षधर लोगों को ‘अप्रतिहत गरज रहा अम्बुधि विशाल’ आन्दोलन पैदा करना ही होगा। नामवर जी अतीत में इस ‘गरज’ में एक अनिवार्य 'स्वर' की तरह मौजूद थे। ‘समय से संवाद’ नामवर जी की निर्भ्रान्त समझ और बौद्धिक संघर्षशीलता का आइना है। इस पुस्तक को सामयिक विषयों पर प्रकाशित स्वतंत्र पुस्तक ‘जमाने से दो दो हाथ’ की शृंखला में देखा जा सकता है।
Hamsafarnama
- Author Name:
Swayam Prakash
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Sketches on Contemp. Authors
Sath-Sath
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Namvar Singh +2
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‘साथ-साथ’ मुख्यतः परिसंवादों का संकलन है। इन परिसंवादों में नामवर सिंह एक पक्ष के रूप में शामिल हुए हैं। परिसंवाद उपनिषदों और संगीतियों की परम्परा का ही आधुनिक रूप है। संवाद का सर्वाधिक लोकतांत्रिक रूप। इसमें वक्ता को वार्ताकारों के अन्य पक्षों के साथ अपनी बात कहनी होती है। यह एक तरह की बहुपक्षी जुगलबन्दी है। पुस्तक में चार परिचर्चाएँ हैं। इनसे गुज़रते हुए हम सहज ही देख पाते हैं कि आलोचक के रूप में नामवर सिंह ‘संवाद’ को कितना महत्त्व देते थे। साथी वार्ताकारों के व्यक्तित्व और विचारों को पूरी विनम्रता के साथ सुनना, उनकी उपस्थिति को स्वीकारना और उनके विचारों को ‘लोकतांत्रिक’ जगह के भीतर ही तर्क-वितर्क की परिधि में लाना—उनके संवादी व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा था। सभी संवादों को एक साथ देखने पर हम पाते हैं, ये किसी एक विषय से बँधे नहीं हैं। बातचीत का समय भी दूर तक फैला हुआ है। इस अर्थ में यह पुस्तक एक राग-माला की तरह है। हिन्दी आलोचना के अनेक पक्षों के बीच नामवर जी की पक्षधरताएँ यहाँ स्पष्ट रूप से व्यक्त हुई हैं। पुस्तक में विशेष महत्त्व के दो साक्षात्कार सम्मिलित हैं। पहला साक्षात्कार रामविलास शर्मा से लिया गया है। रामविलास शर्मा से दूसरी बातचीत एक परिचर्चा है। पहली बातचीत के क्रम में इसे पढ़ने पर अनेक ऐतिहासिक बहसों के सन्दर्भ में रामविलास शर्मा और नामवर सिंह की वैचारिक स्थिति स्पष्ट होती है। इस बातचीत से वामपंथी बुद्धिजीवियों के बीच मौजूद स्वस्थ लोकतांत्रिकता और ईमानदार बहस-धर्मिता सामने आती है। स्पष्ट होता है कि हमारे समय में क्षीण हो रहे इस निर्भय आलोचनात्मक विवेक के बग़ैर वामपंथी विचार परम्परा का विकास नहीं हो सकता है।
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