Meh Ki Saundh
(0)
Author:
Sweta Parmar "Nikki"Publisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
200
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‘मेह की सौंध’ उन कहानियों का संकलन है, जो कथाकार स्वेता परमार ‘निक्की’ द्वारा वर्षों से लिखी गई कहानियों के संग्रह से चुनी गई हैं। इन कहानियों को पाठकवृंद अपनी जिंदगी से भी जोड़कर देख सकते हैं, क्योंकि लेखिका ने इन्हें अपने संपूर्ण दिल की भावनाओं से ओतप्रोत हो, आत्मा से शब्दों में बाँधा है। लेखिका का मानना है कि हमें हमेशा एक बात पर यकीन रखना चाहिए कि जिंदगी में वक्त कब, कहाँ, कैसे, कौन सी करवट ले, यह कोई नहीं जानता; पर कभी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहिए, साथ नहीं छोड़ना चाहिए। तभी हमारे सपने एवं सोच साकार होते नजर आएँगे। बस जरूरत है एक साथ की, चाहे वह हमारी अपनी परछाई ही क्यों न हो! लघुकथाओं का संग्रह ‘मेह की सौंध’ अपनी अलग-अलग कथावस्तु के चलते पाठकों को नई ताजगी का एहसास कराएगा, पाठकों के हृदय में स्थान बनाएगा, ऐसा हमारा विश्वास है।
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‘मेह की सौंध’ उन कहानियों का संकलन है, जो कथाकार स्वेता परमार ‘निक्की’ द्वारा वर्षों से लिखी गई कहानियों के संग्रह से चुनी गई हैं। इन कहानियों को पाठकवृंद अपनी जिंदगी से भी जोड़कर देख सकते हैं, क्योंकि लेखिका ने इन्हें अपने संपूर्ण दिल की भावनाओं से ओतप्रोत हो, आत्मा से शब्दों में बाँधा है।
लेखिका का मानना है कि हमें हमेशा एक बात पर यकीन रखना चाहिए कि जिंदगी में वक्त कब, कहाँ, कैसे, कौन सी करवट ले, यह कोई नहीं जानता; पर कभी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहिए, साथ नहीं छोड़ना चाहिए। तभी हमारे सपने एवं सोच साकार होते नजर आएँगे। बस जरूरत है एक साथ की, चाहे वह हमारी अपनी परछाई ही क्यों न हो!
लघुकथाओं का संग्रह ‘मेह की सौंध’ अपनी अलग-अलग कथावस्तु के चलते पाठकों को नई ताजगी का एहसास कराएगा, पाठकों के हृदय में स्थान बनाएगा, ऐसा हमारा विश्वास है।
Book Details
-
ISBN9789386001429
-
Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Omprakash Valmiki
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- Description: ओमप्रकाश वाल्मीकि अपनी कहानियों को अपने अनुभव-जगत की त्रासदियों और दुखों से उपजी सामाजिक संवेदना का प्रतिबिम्ब कहते थे। वे उनके भोगे हुए यथार्थ से उपजी हैं और उस यथार्थ को बदलने की प्रतिबद्धता को रेखांकित करती हैं। उनके किरदारों को हम आज भी अपने आसपास देख सकते हैं। ये किरदार अपने स्वाभिमान और आत्मविश्वास के लिए संघर्ष करते हैं, अपने हीनताबोध से लड़ते हुए समाज में मनुष्यता की आधारभूत भावना को भी स्थापित करते हैं। दलित समाज के अपने अन्तर्विरोधों और कमज़ोरियों को भी उन्होंने अनदेखा नहीं किया। अपनी कहानियों के ज़रिये उन्होंने इस विडम्बना की तरफ़ भी ध्यान खींचा कि सवर्ण समाज की व्यवस्था थोड़े बदले हुए रूप में दलितों के भीतर भी मौजूद है जिससे मुक्ति के लिए भीतर और बाहर दोनों जगह संघर्ष करने की ज़रूरत है। उल्लेखनीय है कि आदिवासी विमर्श के मुख्यधारा में आने से कई वर्ष पूर्व उनकी कहानियों में आदिवासी पात्र और उनका जीवन देखने को मिलने लगा। इसी तरह मुस्लिम पात्र भी उनकी कथा-संरचना से कभी तिरोहित नहीं हुए। उनकी कहानियाँ दरअसल शोषित और दमित के साथ खड़ी होती हैं। सवर्ण स्त्रियाँ भी अपने परिवार के पुरुषों के अत्याचार का शिकार कैसे बनती हैं, इसे भी उनकी कहानियों में देखा जा सकता है। ओमप्रकाश वाल्मीकि की सम्पूर्ण कहानियों की यह प्रस्तुति, आशा है, उनकी साहित्य-संवेदना और विचार-दृष्टि की व्यापकता को समझने में मददगार साबित होगी।
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