Kashmir Ek Prem Katha
(0)
Author:
Maharaj Krishna SantoshiPublisher:
Antika Prakashan Pvt. Ltd.Language:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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'कश्मीर एक प्रेम कथा' महाराज कृष्ण संतोषी का एक ऐसा कहानी-संग्रह है जिसमें अपने जड़ से कटने के दर्द विभिन्न रूपों और संदर्भों में अभिव्यक्त होता है। विस्थापन का दर्द छिन्नमूल होने का दर्द है जिससे वह आदमी प्राय: नहीं समझ सकता जिसके जीवन में इस तरह की पीड़ा का प्रत्यक्ष अनुभव न जुड़ा हो। चिनार के पेड़ और पत्ते किन-किन क्षणों और कितने संदर्भों में कश्मीर छोड़ चुके एक इंसान के स्वप्न में आते और वर्तमान परिवेश की विडंबनाओं के चलते ठहर भी न पाते यह एक प्रवासी कश्मीरी का कभी न समाप्त होने वाला दर्द है। इस संग्रह की तमाम कहानियों में मानवीय संवेदनाओं के सघन रेशों के साथ जड़ से जुड़ी हुई स्मृति के तार रह-रहकर झंकृत होते रहते हैं। यहाँ किसी बूढ़े का दर्द हो या किसी अल्पसंख्यक या इतिहास में विस्मृत पात्रों के दंश—सबकुछ कहानी में बेहद सहज ढंग से आते हैं और कहानी-कला का निर्वाह करते हुए पाठक मन में देर तक बसे रहने की कुव्वत रखते हैं।
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'कश्मीर एक प्रेम कथा' महाराज कृष्ण संतोषी का एक ऐसा कहानी-संग्रह है जिसमें अपने जड़ से कटने के दर्द विभिन्न रूपों और संदर्भों में अभिव्यक्त होता है। विस्थापन का दर्द छिन्नमूल होने का दर्द है जिससे वह आदमी प्राय: नहीं समझ सकता जिसके जीवन में इस तरह की पीड़ा का प्रत्यक्ष अनुभव न जुड़ा हो। चिनार के पेड़ और पत्ते किन-किन क्षणों और कितने संदर्भों में कश्मीर छोड़ चुके एक इंसान के स्वप्न में आते और वर्तमान परिवेश की विडंबनाओं के चलते ठहर भी न पाते यह एक प्रवासी कश्मीरी का कभी न समाप्त होने वाला दर्द है। इस संग्रह की तमाम कहानियों में मानवीय संवेदनाओं के सघन रेशों के साथ जड़ से जुड़ी हुई स्मृति के तार रह-रहकर झंकृत होते रहते हैं। यहाँ किसी बूढ़े का दर्द हो या किसी अल्पसंख्यक या इतिहास में विस्मृत पात्रों के दंश—सबकुछ कहानी में बेहद सहज ढंग से आते हैं और कहानी-कला का निर्वाह करते हुए पाठक मन में देर तक बसे रहने की कुव्वत रखते हैं।
Book Details
-
ISBN9788196975258
-
Pages96
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: 1975-2000 कथांतर 'कथांत'र दरअसल सन् 1975 और उसके आस-पास के काल से लेकर सन् 2000 तक के पच्चीस वर्षों में उभरे कथा-लेखकों की कहानियों का संग्रह होने के साथ-साथ इस काल खंड के कथा-कर्म की ऐतिहासिकता के दस्तावेज़ीकरण की भी एक कोशिश है। कहानी की दुनिया की सम्यक जानकारी रखने वाले इस तथ्य से परिचित हैं कि यह दौर स्वयं प्रकाश, रमेश उपाध्याय, असगर वजाहत, पंकज बिष्ट, नमिता सिंह, इसरायल, कामतानाथ, रमाकांत, सतीश जमाली, सुभाष पंत, मधुकर सिंह जैसे समर्थ कथा-लेखकों के दौर के तुरंत बाद शुरू हुआ है। यह दौर सामाजिक-राजनीतिक चेतना से सम्पन्न व्यापक सामाजिक बोध और गहरी अंतर्दष्टि रखने वाले कथा लेखकों का दौर रहा है। अगर वस्तुपरक दष्टि से देखा जाये तो विपुलता और गुणवत्ता की दष्टि से यह दौर पूर्ववर्ती और परवर्ती दौरों से बहुत विशिष्ट है। यह नई अंतर्वस्तु के संधान और अंतर्वस्तु और शिल्प की अन्विति के नये दष्टांतों का दौर भी है। इस पीढ़ी की रचनाशीलता इतनी प्रखर रही है कि इसने इक्कीसवीं शताब्दी में भी अपने लेखन से सतत मौजूदगी बनाये रखी है और कई अविस्मरणीय कहानियाँ रचकर कहानी के परिदश्य को समृद्ध किया है। हिन्दी कथा आलोचना में इस दौर का सम्यक मूल्यांकन नि:संदेह पूर्ववर्ती दौरों के मूल्यांकन सरीखा नहीं हुआ है और अभी इस दौर का मूल्यांकन होना बाकी है। 'कथांतर' के ये दोनों खंड पाठकों को हिन्दी कहानी के इस दौर की पूरी जानकारी देते हैं और कुछ उत्कृष्ट कहानियों से रूबरू कराते हैं। ये दोनों खंड हिन्दी कहानी में रुचि रखने वाले कथा-लेखकों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए अनिवार्य आधार-पुस्तकें हैं।
Ujali Aag
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

- Description: अनादि काल से ही बोधकथाओं की अपनी महत्ता रही है। इनका मुख्य उद्देश्य यही रहा है कि प्रेरक और गूढ़ प्रसंगों को रोचक शैली में जनमानस तक पहुँचाया जाए ताकि इनमें निहित नीतियों एवं उपदेशों से वे अपने जीवन में सृजनात्मक चेतना विकसित कर सकें। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की इस पुस्तक ‘उजली आग’ में इस तथ्य को सहज ही जाना-समझा जा सकता है। ‘उजली आग’ बच्चों और किशोरों से लेकर प्रौढ़ पाठकों तक की जीवन-शैली को कुतूहल, मनोरंजन, शिक्षा, मार्गदर्शन आदि के ज़रिए गहरे प्रभावित करनेवाली पुस्तक है। दिनकर की इस अनुपम कृति में जो भी बोधकथाएँ शामिल हैं, जैसे—आदमी का देवत्व, बीज बनने की राह, धर्म लोगे, धर्म? गुफावासी, अफ़सर और पैग़म्बर, उजला हाथी और गेहूँ के खेत, जीवन का बोझ, नर-नारी, माया की रचना, नारी की रुचि, अर्धनारीश्वर, नदी के पार की आग, कलाकार, बनिया और किसान, संसार का इतिहास, पत्थर के दूसरी ओर, पराजय, फूल की आरी, निर्माता और विजेता, सपनों का सपना, सुकरात का मकान, साहसी माता, घोड़ा और ऊँट, ऊँचाई के गीत, शासन और राजनीति आदि, वे सब पढ़ने वाले की जीवन-दृष्टि को गहरे प्रभावित करती है। राष्ट्रकवि की इस पुस्तक से आशा है कि यह जीवन और समाज में अपनी नवीनता से नए परिवेश के निर्माण में अवश्य सहायक सिद्ध होगी।
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