Ek Doosra Alaska
(0)
Author:
Anita RakeshPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
195
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अनीता ने कहानी-लेखन की शुरुआत उन दिनों की थी, जब कहानी अनुभव की प्रामाणिकता को अपना अभीष्ट मानती थी, लेकिन इसे अनीता की जागरूकता ही माना जाएगा कि आज, जबकि कहानी अनुभव की प्रामाणिकता नहीं, अनुभव के अर्थों को विश्लेषित करती है, वह समय-सापेक्ष कहानियाँ लिख रही हैं। उनकी पहले की कहानियों—‘लाल परांदा’, ‘न जाने क्यों’, ‘चरागाहों के बाद’ आदि में ‘नई कहानी’ का हैंग-ओवर ज़रूर मौजूद है, लेकिन इन्हीं के समानान्तर ‘दिन से दिन’ और ‘बेग़ज़ल’ जैसी कहानियों में वह निजी शिनाख़्त भी मौजूद है, जो उन्हें आज के समान्तर लेखन से जोड़ देती है।</p> <p>अनीता की इधर की कहानियों में व्यक्ति के अकेले पड़ जाने का एहसास तीव्र हुआ है, लेकिन इसके साथ ही हमारे आसपास जो ग़लत और गलित है, जो कुछ रुग्ण और रूढ़िगत है, उसके प्रति नकार का स्वर भी उभरा है। इस नकार के स्वर ने अनीता की कहानियों को संश्लिष्टता तो दी ही है, एहसास की तल्ख़ी भी दी है। अब वह पात्रों और उनकी स्थितियों पर चुटकी लेने के बजाय उनकी मानसिकता में गहरे उतरने का प्रयास करती हैं। अनीता की कहानियों की सबसे बड़ी सफलता यही है कि वे इस मानसिकता को समय-सापेक्ष सत्य की कसौटी पर लगातार कसती हैं और आज के आदमी को उसकी अन्दरूनी और बाहरी शक्ल का सही साक्षात्कार कराती हैं।</p> <p>—कमलेश्वर
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अनीता ने कहानी-लेखन की शुरुआत उन दिनों की थी, जब कहानी अनुभव की प्रामाणिकता को अपना अभीष्ट मानती थी, लेकिन इसे अनीता की जागरूकता ही माना जाएगा कि आज, जबकि कहानी अनुभव की प्रामाणिकता नहीं, अनुभव के अर्थों को विश्लेषित करती है, वह समय-सापेक्ष कहानियाँ लिख रही हैं। उनकी पहले की कहानियों—‘लाल परांदा’, ‘न जाने क्यों’, ‘चरागाहों के बाद’ आदि में ‘नई कहानी’ का हैंग-ओवर ज़रूर मौजूद है, लेकिन इन्हीं के समानान्तर ‘दिन से दिन’ और ‘बेग़ज़ल’ जैसी कहानियों में वह निजी शिनाख़्त भी मौजूद है, जो उन्हें आज के समान्तर लेखन से जोड़ देती है।</p>
<p>अनीता की इधर की कहानियों में व्यक्ति के अकेले पड़ जाने का एहसास तीव्र हुआ है, लेकिन इसके साथ ही हमारे आसपास जो ग़लत और गलित है, जो कुछ रुग्ण और रूढ़िगत है, उसके प्रति नकार का स्वर भी उभरा है। इस नकार के स्वर ने अनीता की कहानियों को संश्लिष्टता तो दी ही है, एहसास की तल्ख़ी भी दी है। अब वह पात्रों और उनकी स्थितियों पर चुटकी लेने के बजाय उनकी मानसिकता में गहरे उतरने का प्रयास करती हैं। अनीता की कहानियों की सबसे बड़ी सफलता यही है कि वे इस मानसिकता को समय-सापेक्ष सत्य की कसौटी पर लगातार कसती हैं और आज के आदमी को उसकी अन्दरूनी और बाहरी शक्ल का सही साक्षात्कार कराती हैं।</p>
<p>—कमलेश्वर
Book Details
-
ISBN9788171197613
-
Pages171
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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सागर यारा की कहानियाँ हमें बीसवीं सदी के उस दौर में ले जाती हैं जब रूमान की हैसियत एक समाजी ताक़त की होती थी। ज़िन्दगी की हक़ीक़तों से वह बराबर की टक्कर लेता था। किताबें पढ़ना, सपने देखना, ख़ुद के दायरे से निकलकर पूरी दुनिया के भविष्य के बारे में सोचना, पैसे की क़ुदरत को चुनौती देना और ज़िन्दगी के इस तरीक़े पर सवाल उठानेवाली रुकावटों से जान पर खेलकर लड़ना उस दौर के रौशन दिमाग़ों की अपनी जीवन-शैली थी, जो आज के संचार-सम्पन्न इकहरे माहौल में दूर की चीज़ लगती है।
लेकिन ऐसा नहीं कि ये आज की कहानियाँ नहीं हैं। वे सवाल, जो इन कहानियों के लिखे जाने की वजह बने, आज भी हमारे सामने हैं। आज भी आख़िरी कहानी के सफ़दर की तरह हर देशी भाषा के लेखक पूछ सकते हैं कि ‘इस मुल्क में हर आदमी, हर पेशेवाला अपना काम कर सकता है, सिर्फ़ लेखक, लेखक नहीं रह सकता। उसे या तो टीचर बनना पड़ता है या क्लर्क या मैकेनिक।’ या फिर मेरे भाईजान की शबनम जो परम्परागत मुस्लिम घर की दीवारों से निकलकर जब दुनिया देखती है तो ज़िन्दगी से वापस प्यार करने लगती है।
सागर सरहदी मूलत: नाटककार थे, उन्होंने अनेक सफल फ़िल्मों के संवाद भी लिखे, इसलिए इन कहानियों की दृश्य और संवाद योजना हमें कहानीपन के एक अलग ही आस्वाद तक ले जाती है। ऊपर से उर्दू अफ़सानानिगारी की रवानी और अपने किरदारों से लेखक की मुहब्बत इन कहानियों को एक खास पाठ बना देता है। इस लिहाज से देखें तो डायलॉग लिखवा लो, बाबूजी की बस निकल गई, रामलीला का राम, हर्षद मेहता का सूटकेस आदि कहानियाँ गहरा और देर तक रहनेवाला असर छोड़ती हैं। सरहदी साहब को सन् ’47 के विभाजन और शरणार्थी जीवन का भी निजी तजुर्बा रहा, इस किताब में उसकी भी कुछ झलकें दिखाई देती हैं, और हिन्दी फ़िल्म-संसार की भी जहाँ उनकी रचनात्मकता के कई पहलू उजागर हुए और जिसके विरोधाभासों को भी उन्होंने जिया-झेला।
Fengshui
- Author Name:
Kabir Sanjay
- Book Type:

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Description:
कबीर संजय की कहानियाँ अछूते अनुभवों, विषयों और ब्योरों का खजाना हैं, ऐसा उनके पहले संग्रह ‘सुरखाब के पंख’ को पढ़ते हुए महसूस हुआ था। यह नया संग्रह उस अहसास को दुबारा पुष्ट करता है। उनकी कहानियाँ आपको आपकी ही परिचित दुनिया में किसी नए दरवाजे से दाखिल कराती हैं और अक्सर ऐसे धूल-अँटे कोनों तक ले जाती हैं जो कहानी विधा के लिए अड्डेबाजी के पसन्दीदा ठिकाने नहीं रहे। गरज कि उनके विषय और ब्योरे विचित्र होने के अर्थ में नहीं, उपेक्षित होने के अर्थ में अछूते हैं। अक्सर वे कहानीकार को अपने बचपन और कैशोर्य की स्मृतियों में भटकते हुए हाथ लगते हैं और वह जब उन्हें साफ-सुथरा करके आपके सामने पेश करते हैं तो आप वैसी ही उत्तेजना अनुभव करते हैं जैसी अपनी किसी खोई हुई अनमोल वस्तु के मिल जाने पर होनी चाहिए। इस संग्रह की एक कहानी ‘थप्पड़’ में वाचक कहता है, ‘बचपन में ज्यादा कुछ कहा नहीं। बस हर वक्त चुप ही रहा। इसलिए अब मन कहता है कि हर वक्त कुछ न कुछ कहता रहूँ। अगर थोड़ा ज्यादा भी हो जाए तो आप लोग बुरा नहीं मानेंगे, इसका मुझे भरोसा है।’ अगर यह वाचक की ही नहीं, कबीर संजय की भी अपनी बात है, तो कहना चाहिए कि भरोसा लाज़िमी है। उन्हें कहानी कहना आता है और वे जैसी अकृत्रिम, अतिरेकों से रहित, रवाँ जुबान में कहानी कहते हैं, उन्हें कौन नहीं सुनना चाहेगा!
—संजीव कुमार
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