Mujhe Kuchh Kahana Hai….
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Author:
Khwaja Ahmad AbbasPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
250
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बहुत कम लोग जानते हैं कि फ़िल्मकार-कहानीकार ख़्वाजा अहमद अब्बास की क़लम की दुनिया कितनी बड़ी थी। सत्तर साल की अपनी ज़िन्दगी में उन्होंने 70 ही किताबें भी लिखीं और असंख्य अख़बारों और रिसालों में आलेख भी। हर बुधवार को 'ब्लिट्ज' में उनका स्तम्भ, अंग्रेज़ी में 'द लास्ट पेज' और उर्दू में 'आज़ाद क़लम' शीर्षक से, छपता था। और आपको जानकर हैरानी होगी कि इसे उन्होंने चालीस साल लगातार लिखा, जिसमें दोनों ज़बानों के विषय भी अक्सर अलग होते थे। कहते हैं कि ये दुनिया में अपने ढंग का एक रिकॉर्ड है।</p> <p>आपके हाथों में जो है वह उनकी कहानियों का संकलन है। इस संकलन की सभी 17 कहानियों को उनकी नातिन और उनके साहित्य की अध्येता ज़ोया ज़ैदी ने संगृहीत किया है। इनमें कुछ कहानियाँ पहली बार हिन्दी में आ रही हैं। डॉ. ज़ैदी का कहना है कि अब्बास साहब ऐसे व्यक्ति थे जिनके ''जीवन का लक्ष्य होता है, एक उद्देश्य जिसके लिए वे जीते हैं। एक मक़सद मनुष्य के समाज में बदलाव लाने का, उसकी सोई हुई आत्मा को जगाने का।''</p> <p>यही काम उन्होंने अपनी कहानियों, फ़िल्मों और अपने स्तम्भों में आजीवन किया। आमजन से हमदर्दी, मानवीयता में अटूट विश्वास, स्त्री की पीड़ा की गहरी पारखी समझ और भ्रष्ट नौकरशाही से एक तीखी कलाकार-सुलभ जुगुप्सा, वे तत्त्व हैं जो इन कहानियों में देखने को मिलते हैं। डॉ. ज़ैदी के शब्दों में, ये कहानियाँ अब्बास साहब की आत्मा का दर्पण हैं। इन कहानियों में आपको वो अब्बास मिलेंगे जो इनसान को एक विकसित और अच्छे व्यक्ति के रूप में देखना चाहते थे।</p> <p>इस किताब का एक ख़ास आकर्षण ख़्वाजा अहमद अब्बास का एक साक्षात्कार है जिसे किसी और ने नहीं, कृश्न चन्दर ने लिया था।
Read moreAbout the Book
बहुत कम लोग जानते हैं कि फ़िल्मकार-कहानीकार ख़्वाजा अहमद अब्बास की क़लम की दुनिया कितनी बड़ी थी। सत्तर साल की अपनी ज़िन्दगी में उन्होंने 70 ही किताबें भी लिखीं और असंख्य अख़बारों और रिसालों में आलेख भी। हर बुधवार को 'ब्लिट्ज' में उनका स्तम्भ, अंग्रेज़ी में 'द लास्ट पेज' और उर्दू में 'आज़ाद क़लम' शीर्षक से, छपता था। और आपको जानकर हैरानी होगी कि इसे उन्होंने चालीस साल लगातार लिखा, जिसमें दोनों ज़बानों के विषय भी अक्सर अलग होते थे। कहते हैं कि ये दुनिया में अपने ढंग का एक रिकॉर्ड है।</p>
<p>आपके हाथों में जो है वह उनकी कहानियों का संकलन है। इस संकलन की सभी 17 कहानियों को उनकी नातिन और उनके साहित्य की अध्येता ज़ोया ज़ैदी ने संगृहीत किया है। इनमें कुछ कहानियाँ पहली बार हिन्दी में आ रही हैं। डॉ. ज़ैदी का कहना है कि अब्बास साहब ऐसे व्यक्ति थे जिनके ''जीवन का लक्ष्य होता है, एक उद्देश्य जिसके लिए वे जीते हैं। एक मक़सद मनुष्य के समाज में बदलाव लाने का, उसकी सोई हुई आत्मा को जगाने का।''</p>
<p>यही काम उन्होंने अपनी कहानियों, फ़िल्मों और अपने स्तम्भों में आजीवन किया। आमजन से हमदर्दी, मानवीयता में अटूट विश्वास, स्त्री की पीड़ा की गहरी पारखी समझ और भ्रष्ट नौकरशाही से एक तीखी कलाकार-सुलभ जुगुप्सा, वे तत्त्व हैं जो इन कहानियों में देखने को मिलते हैं। डॉ. ज़ैदी के शब्दों में, ये कहानियाँ अब्बास साहब की आत्मा का दर्पण हैं। इन कहानियों में आपको वो अब्बास मिलेंगे जो इनसान को एक विकसित और अच्छे व्यक्ति के रूप में देखना चाहते थे।</p>
<p>इस किताब का एक ख़ास आकर्षण ख़्वाजा अहमद अब्बास का एक साक्षात्कार है जिसे किसी और ने नहीं, कृश्न चन्दर ने लिया था।
Book Details
-
ISBN9788126728909
-
Pages264
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Parag Mandle
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- Description: ‘जीवन अधूरे क्षणों का समुच्चय होता है’—वे अपनी कहानी ‘मुकम्मल नहीं ख़ूबसूरत सफ़र हो’ में पराग मांदले लिखते हैं, जो कि एक प्रेम त्रिकोण की जटिल मनोवैज्ञानिक कथा है। इस संकलन की हर कथा स्त्री के मानसिक संघर्ष की कथा है, चाहे वह ‘चाह की गति न्यारी’ की ‘छाया’ हो या ‘बाक़ी सब तो माया है’ की नायिका जो सोशल मीडिया पर हुई मित्रता में प्रेम की परिभाषा गढ़ती-तोड़ती हुई खुद भी जुड़ती-टूटती है। ‘वस्ल की कोख में खिलता है फूल हिज्र का’ में वे समाज, राजनीति और प्रेम का त्रिकोण लाते हैं। इसी तरह ‘दूर है मंज़िल अभी’ एक गांधीवादी, न्यूनतम में जीने के अभिलाषी पिता की आधुनिकता और साधन प्रिय बच्चों से मुठभेड़ की कथामात्र नहीं है, यह भौतिकतावादी समाज के साथ न चल पाने की विडम्बना की कथा भी है जहाँ साधन आपके वर्ग की पहचान हैं। आदिवासी स्त्रियों के स्वास्थ्य को लेकर संघर्ष और आदिवासी अस्मिता को लेकर होती आई हिंसक झड़पों के बीच उनके लिए काम करने वाले चिकित्साकर्मियों की स्थिति पर लिखी गई कहानी इस संकलन की उपलब्धि है ये कहानियाँ उन्हें एक ऐसे लेखक के तौर पर स्थापित करती हैं, जो कहानी की आत्मा छूने के लिए हर बार कायान्तरण करता है। लेखक की भाषा मानो एक अच्छी तरह गूँथी किसी कर्मकार की मिट्टी है जिसे वे दृश्यात्मकता, आन्तरिक जटिलता, भावनात्मक संघर्ष और विडम्बना के लिए बख़ूबी ढालते हैं। हर कथा का अपना एक परिवेश और सामयिकता है कि पाठक उस कथा से भीतर तक जुड़े बिना नहीं रह सकता। —मनीषा कुलश्रेष्ठ
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