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Tamasha Tatha Anya Kahaniyan

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पिछले दो दशकों में ‘सूखा बरगद’ और ‘दास्तान-ए-लापता’ जैसे श्रेष्ठ उपन्यासों के लिए चर्चित मंज़ूर एहतेशाम ने एक महत्त्वपूर्ण कथाकार के रूप में भी अलग पहचान अर्जित की है। यह कहना कि उनकी कहानियाँ मध्यवर्गीय (मुस्लिम) वर्ग के बारे में हैं, उनके कथानक का अति-सरलीकरण होगा। दरअसल मंज़ूर एहतेशाम उन थोड़े-से कथाकारों में हैं, जिन्होंने इधर की साहित्यिक बहसों के बुनियादी मुद्दे ही बदल दिए हैं। प्रस्तुत कहानी-संग्रह ‘तमाशा तथा अन्य कहानियाँ’ में शामिल कहानियाँ, विषयों की नहीं, एक व्यक्ति के होने-न-होने की कहानियाँ हैं। अक्सर इनके केन्द्र में एक संस्कारवान, संवेदनशील व्यक्ति है। और उसे बनाता-ढहाता एक परिवेश। कुछ इस तरह कि कभी काँच के हाथ में पत्थर और कभी पत्थर के हाथ में काँच होने का अहसास बराबर बना रहता है। मध्यवर्गीय अस्तित्व की विडम्बना की ये कहानियाँ कभी शोर और कभी सन्नाटे से स्वयं को बुनती-उधेड़ती हैं। यूँ इनका कथानक बहुत बारीक़ी से अपना उपकथन, अपना सब-टेक्स्ट बनाता-मिटाता चलता है। अपने अल्पकथन के बावजूद ये आश्चर्यजनक रूप से मार्मिक कथाएँ हैं। यहाँ प्रस्तुत बहुचर्चित ‘रमजान में मौत’ से लेकर ‘तमाशा’ तक ये कहानियाँ अपनी यात्रा भी हैं, और पड़ाव भी।

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पिछले दो दशकों में ‘सूखा बरगद’ और ‘दास्तान-ए-लापता’ जैसे श्रेष्ठ उपन्यासों के लिए चर्चित मंज़ूर एहतेशाम ने एक महत्त्वपूर्ण कथाकार के रूप में भी अलग पहचान अर्जित की है। यह कहना कि उनकी कहानियाँ मध्यवर्गीय (मुस्लिम) वर्ग के बारे में हैं, उनके कथानक का अति-सरलीकरण होगा। दरअसल मंज़ूर एहतेशाम उन थोड़े-से कथाकारों में हैं, जिन्होंने इधर की साहित्यिक बहसों के बुनियादी मुद्दे ही बदल दिए हैं।

प्रस्तुत कहानी-संग्रह ‘तमाशा तथा अन्य कहानियाँ’ में शामिल कहानियाँ, विषयों की नहीं, एक व्यक्ति के होने-न-होने की कहानियाँ हैं। अक्सर इनके केन्द्र में एक संस्कारवान, संवेदनशील व्यक्ति है। और उसे बनाता-ढहाता एक परिवेश। कुछ इस तरह कि कभी काँच के हाथ में पत्थर और कभी पत्थर के हाथ में काँच होने का अहसास बराबर बना रहता है। मध्यवर्गीय अस्तित्व की विडम्बना की ये कहानियाँ कभी शोर और कभी सन्नाटे से स्वयं को बुनती-उधेड़ती हैं। यूँ इनका कथानक बहुत बारीक़ी से अपना उपकथन, अपना सब-टेक्स्ट बनाता-मिटाता चलता है। अपने अल्पकथन के बावजूद ये आश्चर्यजनक रूप से मार्मिक कथाएँ हैं। यहाँ प्रस्तुत बहुचर्चित ‘रमजान में मौत’ से लेकर ‘तमाशा’ तक ये कहानियाँ अपनी यात्रा भी हैं, और पड़ाव भी।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2001
Weight
296 grams
ISBN-13
9788126701230
Pages
148
Reading time
~5 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

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