Tumne Kyon Kaha Tha Main Sunder Hoon
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Author:
YashpalPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ, कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी <br />है।</p> <p>‘तुमने क्यों कहा था मैं सुन्दर हूँ’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘कोकला डकैत’, ‘हुकूमत का जुनून’, ‘चोरबाज़ारी के दाम’, ‘गवाही’, ‘तगमे की चोट’, ‘मिट्ठों के आँसू’, ‘तीस मिनट’, ‘अख़बार में नाम’, ‘असली चित्र’, ‘कम्बलदान’, ‘आबरू’, ‘ग़मी में ख़ुशी’ और ‘तुमने क्यों कहा था मैं सुन्दर हूँ’।
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यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ, कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी <br />है।</p>
<p>‘तुमने क्यों कहा था मैं सुन्दर हूँ’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘कोकला डकैत’, ‘हुकूमत का जुनून’, ‘चोरबाज़ारी के दाम’, ‘गवाही’, ‘तगमे की चोट’, ‘मिट्ठों के आँसू’, ‘तीस मिनट’, ‘अख़बार में नाम’, ‘असली चित्र’, ‘कम्बलदान’, ‘आबरू’, ‘ग़मी में ख़ुशी’ और ‘तुमने क्यों कहा था मैं सुन्दर हूँ’।
Book Details
-
ISBN9788180314421
-
Pages131
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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यह बात सच है कि पैदाइश और परवरिश का माहौल ज़िन्दगी भर ज़ेहन पर हावी रहता है। और अगर तालीम का रंग भी इनमें शामिल हो जाए तो सोच का मुकम्मल ख़ाक़ा तैयार हो जाता है। ज़किया ज़ुबैरी की कहानियों का संग्रह ‘साँकल’ पढ़ते हुए बारहा यही महसूस होता है। इन कहानियों पर राजेन्द्र यादव की यह राय दुरुस्त है कि, ‘उनकी कहानियाँ ऐसे नारी मन के विभिन्न पहलुओं पर केन्द्रित हैं जो अभी भी भारत को अपने भीतर बसाए हुए है। वे द्वन्द्व और नॉस्टेल्जिया की कहानियाँ हैं।’
ज़किया औरतों की ज़िन्दगी में आहिस्ता से दाख़िल होकर उनके मन की परतों को खोलती हैं। भीतरी तहों में दबे सच कभी ‘बाबुल मोरा’ की लिसा, तो कभी ‘मेरे हिस्से की धूप’ की शम्मो के रूप में सामने आते हैं। अगर लेखिका की संवेदना परखनी हो तो ‘मारिया’, ‘साँकल’, ‘लौट आओ तुम’ जैसी कहानियाँ पढ़नी चाहिए।
सरोकार के साथ भाषा लेखिका की बहुत बड़ी ताक़त है। बड़ी सहजता से पूरा मंज़र सामने खड़ा हो जाता है, ‘किसी से डर न ख़ौफ़—बिन्दास! छोटी-छोटी आँखों को टेढ़ी करके बात किया करती, बात-बात पर खिलखिलाकर हँस देती और हँसते हुए झूल-सी जाती। वो जो कपड़े पहने होती, ऊँचे-नीचे, बेमेल-से, कहीं-कहीं से सिलाई खुले हुए कपड़ों से जवानी झाँक रही होती। वह एक ऐसी बेटी थी जिसके कारण घर में कंकरों की आमद बनी रहती।’ बेहद दिलचस्प कहानियों का संग्रह।
Chhanh
- Author Name:
Maitreyi Pushpa
- Book Type:

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Description:
अपने समय और समाज, विशेषकर स्त्री समाज से जुड़े रचनाकारों की यों तो कहने के लिए बहुत बड़ी जमात है लेकिन स्त्री तथा स्त्री के तमाम धूप-छाँह को समझने का उनका अनुभव परिपक्व नहीं होता। पुरुष, स्त्री को हमेशा भोग या करुणा की नजर से देखता आया है। और यह सिर्फ स्त्रियों के बारे में ही नहीं पूरे काल और समाज के विश्लेषण के बारे में भी सच है। सतही मूल्यांकन करनेवाले लेखकों में जैसे एक होड़ लगी हुई है। ऐसी ही अराजक भीड़ के कारण वास्तविक साहित्य-सृजन का मार्ग अवरुद्ध-सा नजर आता है। मगर ऐसे काल-खंड में मैत्रेयी पुष्पा जैसी लेखिकाओं की उपस्थिति इस बात की आश्वस्ति है कि उन जैसे साहित्यकारों के कारण पाठकों को समाज की सच्चाइयों से परिचित होने का मौका मिलता है और समस्याओं से जूझने का दिशा-निर्देश भी। मैत्रेयी पुष्पा की कहानियों में बनावट नहीं मिलती और उनकी बुनावट में घटनाओं का ऐसा तीव्र प्रवाह मिलता है जो अन्त तक पाठकों को तल्लीन किये रहता है। उनका बुन्देलखंडी समाज कब सम्पूर्ण हिन्दीभाषी समाज में बदल जाता है, इसका पता ही नहीं चलता।
मैत्रेयी जी की कहानियाँ एक खास लीक पर चलने के बजाय जीवन की सभी ऋतुओं से युक्त होती हैं। उनकी कहानियों की विशेषता है कि उनमें निराशा में भी आशा का संयोजन होता है। स्त्रियाँ मैत्रेयी पुष्पा की कहानियों की बड़ी शक्ति हैं। वे उनके साहित्य में जहाँ भी हैं पूरी दबंगता और जीवन्तता से हैं। वे अपनी छाप छोड़ती हैं। उनकी कुछ ऐसी ही उल्लेखनीय कहानियों का यह संकलन ‘छाँह’ प्रस्तुत है ।
Katha Saptak - Anju Sharma
- Author Name:
Anju Sharma
- Book Type:

- Description: Description Awaited
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