Mansarover : Vols. 1-8
(0)
Author:
PremchandPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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जब हम एक बार लौटकर हिन्दी कहानी की यात्रा पर दृष्टि डालते हैं और पिछले सत्तर-अस्सी वर्षों के सामाजिक विकास की व्याख्या करते हैं, तो अगर कहना चाहें तो बहुत सुविधापूर्वक कह सकते हैं कि कहानी अब तक प्रेमचन्द से चलकर प्रेमचन्द तक ही पहुँची है। अर्थात् सिर्फ़ प्रेमचन्द के भीतर ही हिन्दी कहानी के इस लम्बे समय का पूरा सामाजिक वृत्तान्त समाहित है। समय की अर्थवत्ता जो सामाजिक सन्दर्भों के विकास से बनती है, वह आज भी, बहुत साधारण परिवर्तनों के साथ जस की तस बनी हुई है। आप कहेंगे कि क्या प्रेमचन्द के बाद समय जहाँ का तहाँ टिका रह गया है? क्या समय का यह कोई नया स्वभाव है? नहीं, ऐसा नहीं। फिर भी सन्दर्भों के विकास की प्रक्रिया जो सांस्थानिक परिवर्तनों से ही रेखांकित होती है और समय ही उसका कारक है, वह नहीं के बराबर हुई। आधारभूत सामाजिक बदलाव नहीं हुआ। इस लम्बे काल में नया समाज नहीं बन पाया। धार्मिक अन्धविश्वास और पारम्परिक कुंठाएँ जैसी की तैसी बनी रहीं। भूमि-सम्बन्ध नहीं बदले। अशिक्षा और सामाजिक कुरीतियों का अन्धकार लगातार छाया रहा।</p> <p>यत्र-तत्र परिस्थितियों और परिवेश के साथ ही सामान्य सामाजिक परिवर्तन अथवा मनोवैज्ञानिक बारीकियों को छोड़ दें तो शिल्प के क्षेत्र में भी जहाँ सीधे-सादे वाचन में ‘पूस की रात’, ‘कफ़न’, ‘सद्गति’ जैसी कहानियाँ वर्तमान हों, कोई परिवेश अथवा परिवर्तन की बारीक लक्षणा और चरित्रांकन की गहराई के लिए किसी दूसरी कहानी का नाम ले तो भी इन कहानियों को छोड़कर नहीं ले सकता। अपने समय और समाज का ऐतिहासिक सन्दर्भ तो जैसे प्रेमचन्द की कहानियों को समस्त भारतीय साहित्य में अमर बना देता है।</p> <p>—मार्कण्डेय
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जब हम एक बार लौटकर हिन्दी कहानी की यात्रा पर दृष्टि डालते हैं और पिछले सत्तर-अस्सी वर्षों के सामाजिक विकास की व्याख्या करते हैं, तो अगर कहना चाहें तो बहुत सुविधापूर्वक कह सकते हैं कि कहानी अब तक प्रेमचन्द से चलकर प्रेमचन्द तक ही पहुँची है। अर्थात् सिर्फ़ प्रेमचन्द के भीतर ही हिन्दी कहानी के इस लम्बे समय का पूरा सामाजिक वृत्तान्त समाहित है। समय की अर्थवत्ता जो सामाजिक सन्दर्भों के विकास से बनती है, वह आज भी, बहुत साधारण परिवर्तनों के साथ जस की तस बनी हुई है। आप कहेंगे कि क्या प्रेमचन्द के बाद समय जहाँ का तहाँ टिका रह गया है? क्या समय का यह कोई नया स्वभाव है? नहीं, ऐसा नहीं। फिर भी सन्दर्भों के विकास की प्रक्रिया जो सांस्थानिक परिवर्तनों से ही रेखांकित होती है और समय ही उसका कारक है, वह नहीं के बराबर हुई। आधारभूत सामाजिक बदलाव नहीं हुआ। इस लम्बे काल में नया समाज नहीं बन पाया। धार्मिक अन्धविश्वास और पारम्परिक कुंठाएँ जैसी की तैसी बनी रहीं। भूमि-सम्बन्ध नहीं बदले। अशिक्षा और सामाजिक कुरीतियों का अन्धकार लगातार छाया रहा।</p>
<p>यत्र-तत्र परिस्थितियों और परिवेश के साथ ही सामान्य सामाजिक परिवर्तन अथवा मनोवैज्ञानिक बारीकियों को छोड़ दें तो शिल्प के क्षेत्र में भी जहाँ सीधे-सादे वाचन में ‘पूस की रात’, ‘कफ़न’, ‘सद्गति’ जैसी कहानियाँ वर्तमान हों, कोई परिवेश अथवा परिवर्तन की बारीक लक्षणा और चरित्रांकन की गहराई के लिए किसी दूसरी कहानी का नाम ले तो भी इन कहानियों को छोड़कर नहीं ले सकता। अपने समय और समाज का ऐतिहासिक सन्दर्भ तो जैसे प्रेमचन्द की कहानियों को समस्त भारतीय साहित्य में अमर बना देता है।</p>
<p>—मार्कण्डेय
Book Details
-
ISBN9789393603159
-
Pages2400
-
Avg Reading Time80 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: A collage of stories the growing rebellion in the young and educated Savithri; the spontaneous love of Girija that burns downs the evil forces of the village; the adamant but nourishing affection of Shamala that wins over the Dalit Thippanna, the self-denying fetters of Nirmala's morality; the bewildered recognition of male exploitative in Stella; Basavaraj's longing to outgrow his insatiable thirst for womanising; Parvathi's irresistible calling the coconut tree Basalinga's traumatic touch of the untouchable doctor Thippanna... With the combined strength of the sceptic and saint, eminent Kannada literary culture figure Lankesh uncovers the invisible realities of politics and culture in contemporary India in these mediations on life's failure and fulfillment.
Lakshagrah
- Author Name:
Chitra Mudgal
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Description:
चित्रा मुद्गल समकालीन कहानी साहित्य की ऐसी विरल प्रतिभा हैं जिन्होंने विगत चालीस वर्षों में निरन्तर श्रेष्ठ कथा-लेखन किया है। इसीलिए उनके खाते में इतनी यादगार उम्दा कहानियाँ हैं जो सामान्यत: कथाकारों के पास नहीं होतीं। जिन लेखिकाओं ने इस मिथ को भंजित किया है कि उनका लेखन सीमित अनुभव-वृत्त से अलग गहरी सामाजिक संपृक्ति और सरोकारों का है, उनमें चित्रा मुद्गल का स्थान अप्रतिम है। अपने कथ्य की गहराई, बनावट-बुनता (टैक्सचर) की बारीकी और इन सबके ऊपर कथा-रस का ऋजु प्रवाह इनकी कहानियों को न केवल अनुपम बनाता है अपितु पाठक को अपना सहयात्री बनाकर उसकी सोच पर दस्तक देने का कार्य करता हुआ उसे संस्कारित करने का कार्य बहुत चुपचाप और अनजाने-से रूप में करता है, विचार को अनुभूति का अंग बनाते हुए, बिना किसी आरोपण के। इन कहानियों का फलक बहुत व्यापक है। ‘जगदम्बा बाबू गाँव आ रहे हैं’ में पूरी तरह रेणु की तरह लोक में बसकर वे गाँव में फैले राजनीतिक कदाचार की बखिया उधेड़ती हैं तो ‘भूख’, ‘चेहरे’ जैसी कहानियों में समाज के निम्नतम वर्ग की ‘त्रासद जिन्दगी’ को संवेदनात्मक रूप में उकेरती हैं। इससे आगे बढ़कर ‘वाइफ़ स्वैपी’ जैसी कहानी में वैश्विक गाँव की अपसंस्कृति में डूबे उच्चतम स्तर के उस समाज को अपनी पैनी दृष्टि से चित्रित करती हैं जहाँ हमारी संस्कृति के श्रेष्ठ का क्षरण पूरी तीव्रता में हुआ है। उनकी कहानियों में अपनी तरह का स्त्री-विमर्श है जो स्त्रीवाद के प्रचलित नारों के मुहावरों से अपने को अलग खड़ा करता है, वे पुरुष वर्चस्ववादी सामाजिक स्थितियों पर करारी चोट करती हैं किन्तु फिर भी उनके पात्र स्त्री-अस्मिता की रक्षा करते हुए जीवन में सामरस्य के पक्षधर हैं—रिश्तों की तोड़-फोड़ के नहीं। जीवन को पूर्ण वैविध्य में चित्रित करती उनकी कहानियाँ कहीं भी एकरेखीय और सपाट नहीं हैं, संश्लिष्ट रूप में वे बहुआयामी हैं, इसी कारण वे स्मृति में बस जाती हैं। स्मृति में बने रहना कहानी की बहुत बड़ी शक्ति है। वस्तुत: चित्रा की कहानियाँ हमारे समकालीन लेखन की गौरव हैं जिनका पाठ आश्वस्ति के साथ किया जा सकता है।
—पुष्पपाल सिंह
Nai Sadi Ki Pehchan : Shrestha Dalit Kahaniya
- Author Name:
Mudra Rakshas
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- Description: हिन्दी क्षेत्र में दलित लेखन शुरू तो बहुत पहले हो गया था पर उसकी पहचान बनने में देर लगी। पहले हिन्दी में दलित लेखकों और चिन्तकों द्वारा दलित चेतना और संघर्ष को लेकर वैचारिक, ऐतिहासिक और सामाजिक लेखन हुआ। हिन्दी में दलित लेखन का यह एक महत्त्वपूर्ण दौर माना जाएगा। इसके बाद रचनात्मक लेखन का दौर शुरू हुआ। हिन्दी में दलित रचनात्मक लेखन का इतिहास ज़्यादा लम्बा नहीं है। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में दलित लेखक हिन्दी में सामने आए। हिन्दी रचनाजगत में दलित लेखकों की सक्रियता तीन क्षेत्रों में सामने आई। उन्होंने बड़े पैमाने पर रचनात्मक साहित्य लिखा। दलित लेखकों की कविताएँ और कथाकृतियाँ प्रकाशित हुईं। राजेन्द्र यादव लिखते हैं—दलित साहित्यकारों की यह मजबूरी है कि वे सिर्फ़ अपने निजी अनुभवों को ज़मीन पर जीने के संघर्षों और स्थितियों का इन्दराज करें। हाँ, सबसे निचली गहराइयों से उछल-उछलकर आनेवाली ये तस्वीरें इतनी ख़ौफ़नाक हैं कि सारे समाज को दहलाकर रख देती हैं।” दलित कथा रचनाओं को इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। उनमें अपने समय और इतिहास का समाजशास्त्र भी है और स्थितियों से ऐसी मुठभेड़ भी जो व्यवस्था में बुनियादी परिवर्तन के लिए प्रयत्नशील है। इन कथा रचनाओं में मात्र यथार्थ नहीं है। उनकी कृतियाँ यथार्थ की शल्यक्रिया भी करती हैं। लेकिन इस सामाजिक शल्यक्रिया के बावजूद दलित रचनाकार की समस्याएँ जीवन में ही नहीं साहित्य की दुनिया में पहले से ज़्यादा जटिल और लगभग हिंसक हो गई हैं।
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