Biyaban Me
About the book
सारा राय की कहानियाँ अनेक स्तरों पर सजग चेतना द्वारा रचित संसार हैं। उनके यहाँ भीतर की सम्पन्नता और भीतर का ख़ालीपन, बाहर की सम्पन्नता और बाहर का उजाड़ एक-दूसरे के आमने-सामने होते रहते हैं, बल्कि एक-दूसरे के बरक्स रखे आईनों की तरह वे परस्पर को कई गुना करते चलते हैं। व्यक्त और अव्यक्त यथार्थ एक-दूसरे के साथ नाज़ुक सन्तुलन साधते हुए एक सम्पूर्ण अनुभव की रचना करते हैं। दृश्य, परिवेश, पात्र और अनुभव का ही नहीं, समय का भी एक पूरेपन के क़रीब ले जाता हुआ बोध, यानी एक साथ भंगुरता और अन्तहीनता का बोध उनकी कहानियों में आपको कभी भी हो सकता है। इसी तरह किसी सीमित घटना या क्रिया का अन्तहीनता में फिसल जाना उसे एक दूसरे ही आयाम में ले जाता है और सीमित जीवन-काल के आर-पार फैला अनन्त समय बड़ी सहजता से आपके समय-बोध का हिस्सा बन जाता है। एक साथ समय की रवानी और ठहराव का चित्र उनके यहाँ कुछ यों उभरता है—‘समय के बड़े-बड़े चकत्ते तैरते हुए निकल जाते हैं, जैसे वे कुछ हों ही ना। ऐसा लगता है जैसे दिन एक-एक करके नहीं, कई-कई के झुंड में बीत रहे हों, कभी-कभी पूरा एक मौसम एक अकेले दिन की तरह निकल जाता है।’ सारा राय की ताक़त उनके बहुत बारीक, बहुत मामूली मगर उन चुने हुए ब्यौरों में है, जिन्हें वे भीतरी और बाहरी दुनिया के तानों-बानों से कुछ इस तरह बुनती हैं कि एक रहस्य-सा उनके गिर्द घिर आता है। यह रहस्य उनकी कहानियों को हर बार पढ़ने पर नए सिरे से खुलता है। उनके बिम्ब, उनकी उपमाएँ हम सबकी जानी-पहचानी चीज़ों को एकदम अछूता-सा कोई सन्दर्भ देकर ऐसा एक मायालोक खड़ा कर देती हैं जिसमें—सेमल की फलियों से उड़ती रुई बर्फ़ के तूफ़ान में बदल जा सकती है, आसमान कुएँ में पड़े रूमाल में, लाल स्वेटर पहने स्कूल के फाटक से लुढ़कते-पुढ़कते बच्चे बीर-बहूटियों में और ‘आह सारा! द होल वर्ल्ड!’ कहते हुए पकड़ाई गई पनीर पूरी एक दुनिया में तब्दील हो जा सकती है। किसी भी सम्बन्ध को परिणति तक पहुँचाने की हड़बड़ी उनके यहाँ नहीं है। सम्बन्धों के महीन रेशों को वे हल्के इशारों से कहे-अनकहे शब्दों में, बिम्बों में थामती हैं। वे ‘बियाबान में’ कहानी की नायिका का अपने लेखन के साथ का रिश्ता हो या रश्मि किरण के साथ का, ‘परिदृश्य’ कहानी की सीमी का अनामिका और उसके भाई के साथ धीरे-धीरे अस्तित्व में आया सम्बन्ध हो, मकड़ी के जाले की सुन्दर संरचना के निमित्त, बाबू देवीदीन सहाय का अपनी रूह के साथ पहली बार स्थापित हुआ सम्बन्ध हो या अनामिका का गंगा के कछार के साथ शेष दूसरे फ़्लैप पर...का तादात्म्य हो—ये सम्बन्ध जितनी देर के लिए, जितने भी, जैसे भी होते हैं, अपनी सम्पूर्ण सत्ता के साथ होते हैं। गंगा का कछार अलग मौसम में, किसी दूसरे समय पर, किसी अलग मनःस्थितियों में अलग ही रूप धर ले सकता है। ‘भूलभुलैयाँ’ जैसी कहानी में वे भव्य अतीत के कोनों-अँतरों को तलाशती हैं। इस प्रक्रिया में अतीत के साथ-साथ सम्भावित का भी एक लोक खुलता चला जाता है। बनारस की साकिन नूर मंज़िल हवेली के उस प्राचीन वैभव—जब ‘हर कमरे में लोग अंगूर के गुच्छों की तरह’ होते थे—के बरक्स बची थीं किले की दीवार जैसे कन्धोंवाले सैयद हैदर की बड़ी बेटी कुलसूम बानो, जिन्हें नूर मंज़िल जैसी विशाल हवेली में बन्द रहने के बावजूद नाचने और नाचते-नाचते लट्टू की तरह एक जगह सिमट आने के तथा छत की काई लगी काली मुँडेर से डैनों की तरह बाजुओं को फैलाकर उड़ने के एहसास से कोई वंचित नहीं कर पाया था। दुनिया में कुछ भी ऐसा नहीं जिससे सारा को परहेज़ हो। आज की कहानी की तरह सिर्फ़ लोगों को ही नहीं, सब कुछ को उनकी कहानियों में आने की छूट है। लोगों के अलावा ‘बियाबान में’ का लुटा-पिटा पुराना खँडहर बस हो, कहीं नहीं से कहीं नहीं तक जाता पुल हो, मेक्वायरी का चार एकड़ का बीहड़ हो, गंगा के किनारे तम्बुओं, लाइटों का उग आया नया नगर हो, हरी आग की तरह सारे में फैल जानेवाली लम्बी-लम्बी घास हो, पूरी सृष्टि ही चली आती है जीवन की सी सहजता के साथ। रामबाँस पर तीस सालों में सिर्फ़ एक बार आनेवाला फूल भी नहीं बचता उनकी आँख से। सुनहरी कलियों का वह नज़ारा मालती को एक उपलब्धि की तरह लगता है और दो दीवारों के बीच तथा मकड़ी का जाला बाबू देवीदीन सहाय के साथ हमें भी एक करिश्मे की तरह लगता है। इन छोटी-छोटी चीज़ों की एक करिश्मे की शक्ल में पहचान और जीवन में इनकी जादुई उपस्थिति में सारा की गहरी आस्था है। उनके यहाँ हिन्दी के पूर्ववर्ती कथाकारों की अनुगूँज के साथ ख़ुद उनके रोयों की तरह संवेदनशील और उड़ानक्षम भाषा का विरल संयोजन है। चीज़ों को देखने का, उसे भाषा में सहेजने का सारा का ढंग अनोखा है। चीज़ें और उनके आस-पास वही है जिसे हम सब रोज़ देखते हैं या नहीं देखते। उन्हें सारा के साथ उनकी आँख से देखना आज की हिन्दी कहानी के परिदृश्य में एक अलग तरह का देखना है। ‘ऊपर का आकाश डालों से घटाटोप हो उठा और ज़मीन पर बरगद ने जड़ों के महल खड़े किए, कई-कई महल, एक-दूसरे की अनुगूँज की तरह।’ —ज्योत्स्ना मिलन
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About the Book
सारा राय की कहानियाँ अनेक स्तरों पर सजग चेतना द्वारा रचित संसार हैं। उनके यहाँ भीतर की सम्पन्नता और भीतर का ख़ालीपन, बाहर की सम्पन्नता और बाहर का उजाड़ एक-दूसरे के आमने-सामने होते रहते हैं, बल्कि एक-दूसरे के बरक्स रखे आईनों की तरह वे परस्पर को कई गुना करते चलते हैं। व्यक्त और अव्यक्त यथार्थ एक-दूसरे के साथ नाज़ुक सन्तुलन साधते हुए एक सम्पूर्ण अनुभव की रचना करते हैं।
दृश्य, परिवेश, पात्र और अनुभव का ही नहीं, समय का भी एक पूरेपन के क़रीब ले जाता हुआ बोध, यानी एक साथ भंगुरता और अन्तहीनता का बोध उनकी कहानियों में आपको कभी भी हो सकता है। इसी तरह किसी सीमित घटना या क्रिया का अन्तहीनता में फिसल जाना उसे एक दूसरे ही आयाम में ले जाता है और सीमित जीवन-काल के आर-पार फैला अनन्त समय बड़ी सहजता से आपके समय-बोध का हिस्सा बन जाता है। एक साथ समय की रवानी और ठहराव का चित्र उनके यहाँ कुछ यों उभरता है—‘समय के बड़े-बड़े चकत्ते तैरते हुए निकल जाते हैं, जैसे वे कुछ हों ही ना। ऐसा लगता है जैसे दिन एक-एक करके नहीं, कई-कई के झुंड में बीत रहे हों, कभी-कभी पूरा एक मौसम एक अकेले दिन की तरह निकल जाता है।’
सारा राय की ताक़त उनके बहुत बारीक, बहुत मामूली मगर उन चुने हुए ब्यौरों में है, जिन्हें वे भीतरी और बाहरी दुनिया के तानों-बानों से कुछ इस तरह बुनती हैं कि एक रहस्य-सा उनके गिर्द घिर आता है। यह रहस्य उनकी कहानियों को हर बार पढ़ने पर नए सिरे से खुलता है। उनके बिम्ब, उनकी उपमाएँ हम सबकी जानी-पहचानी चीज़ों को एकदम अछूता-सा कोई सन्दर्भ देकर ऐसा एक मायालोक खड़ा कर देती हैं जिसमें—सेमल की फलियों से उड़ती रुई बर्फ़ के तूफ़ान में बदल जा सकती है, आसमान कुएँ में पड़े रूमाल में, लाल स्वेटर पहने स्कूल के फाटक से लुढ़कते-पुढ़कते बच्चे बीर-बहूटियों में और ‘आह सारा! द होल वर्ल्ड!’ कहते हुए पकड़ाई गई पनीर पूरी एक दुनिया में तब्दील हो जा सकती है।
किसी भी सम्बन्ध को परिणति तक पहुँचाने की हड़बड़ी उनके यहाँ नहीं है। सम्बन्धों के महीन रेशों को वे हल्के इशारों से कहे-अनकहे शब्दों में, बिम्बों में थामती हैं। वे ‘बियाबान में’ कहानी की नायिका का अपने लेखन के साथ का रिश्ता हो या रश्मि किरण के साथ का, ‘परिदृश्य’ कहानी की सीमी का अनामिका और उसके भाई के साथ धीरे-धीरे अस्तित्व में आया सम्बन्ध हो, मकड़ी के जाले की सुन्दर संरचना के निमित्त, बाबू देवीदीन सहाय का अपनी रूह के साथ पहली बार स्थापित हुआ सम्बन्ध हो या अनामिका का गंगा के कछार के साथ शेष दूसरे फ़्लैप पर...का तादात्म्य हो—ये सम्बन्ध जितनी देर के लिए, जितने भी, जैसे भी होते हैं, अपनी सम्पूर्ण सत्ता के साथ होते हैं। गंगा का कछार अलग मौसम में, किसी दूसरे समय पर, किसी अलग मनःस्थितियों में अलग ही रूप धर ले सकता है।
‘भूलभुलैयाँ’ जैसी कहानी में वे भव्य अतीत के कोनों-अँतरों को तलाशती हैं। इस प्रक्रिया में अतीत के साथ-साथ सम्भावित का भी एक लोक खुलता चला जाता है। बनारस की साकिन नूर मंज़िल हवेली के उस प्राचीन वैभव—जब ‘हर कमरे में लोग अंगूर के गुच्छों की तरह’ होते थे—के बरक्स बची थीं किले की दीवार जैसे कन्धोंवाले सैयद हैदर की बड़ी बेटी कुलसूम बानो, जिन्हें नूर मंज़िल जैसी विशाल हवेली में बन्द रहने के बावजूद नाचने और नाचते-नाचते लट्टू की तरह एक जगह सिमट आने के तथा छत की काई लगी काली मुँडेर से डैनों की तरह बाजुओं को फैलाकर उड़ने के एहसास से कोई वंचित नहीं कर पाया था।
दुनिया में कुछ भी ऐसा नहीं जिससे सारा को परहेज़ हो। आज की कहानी की तरह सिर्फ़ लोगों को ही नहीं, सब कुछ को उनकी कहानियों में आने की छूट है। लोगों के अलावा ‘बियाबान में’ का लुटा-पिटा पुराना खँडहर बस हो, कहीं नहीं से कहीं नहीं तक जाता पुल हो, मेक्वायरी का चार एकड़ का बीहड़ हो, गंगा के किनारे तम्बुओं, लाइटों का उग आया नया नगर हो, हरी आग की तरह सारे में फैल जानेवाली लम्बी-लम्बी घास हो, पूरी सृष्टि ही चली आती है जीवन की सी सहजता के साथ। रामबाँस पर तीस सालों में सिर्फ़ एक बार आनेवाला फूल भी नहीं बचता उनकी आँख से। सुनहरी कलियों का वह नज़ारा मालती को एक उपलब्धि की तरह लगता है और दो दीवारों के बीच तथा मकड़ी का जाला बाबू देवीदीन सहाय के साथ हमें भी एक करिश्मे की तरह लगता है। इन छोटी-छोटी चीज़ों की एक करिश्मे की शक्ल में पहचान और जीवन में इनकी जादुई उपस्थिति में सारा की गहरी आस्था है।
उनके यहाँ हिन्दी के पूर्ववर्ती कथाकारों की अनुगूँज के साथ ख़ुद उनके रोयों की तरह संवेदनशील और उड़ानक्षम भाषा का विरल संयोजन है। चीज़ों को देखने का, उसे भाषा में सहेजने का सारा का ढंग अनोखा है। चीज़ें और उनके आस-पास वही है जिसे हम सब रोज़ देखते हैं या नहीं देखते। उन्हें सारा के साथ उनकी आँख से देखना आज की हिन्दी कहानी के परिदृश्य में एक अलग तरह का देखना है। ‘ऊपर का आकाश डालों से घटाटोप हो उठा और ज़मीन पर बरगद ने जड़ों के महल खड़े किए, कई-कई महल, एक-दूसरे की अनुगूँज की तरह।’
—ज्योत्स्ना मिलन
Book details
- Format
- Hardbound
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 2nd
- Publication year
- 2005
- Weight
- 330 grams
- ISBN-13
- 9788126710799
- Pages
- 144
- Reading time
- ~5 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14.5 × 22 cm
- Language
- Hindi
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