Girgit
(0)
Author:
Akhilesh Nigam 'Akhil'Publisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
250
₹ 200 (20% off)
Available
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‘गिरगिट’ कथा-संग्रह की सभी कहानियाँ जिज्ञासा, रोचकता, भाव-सबलता एवं युगबोध से सम्पन्न हैं। आधुनिक भावबोध से युग के सन्दर्भों के यथार्थ को सूक्ष्म विवेचन और विषय वैविध्य के साथ व्यापक बनाया गया है। सभी कहानियाँ वैचारिक एवं अनुमूल्यात्मक संयोग से युक्त एवं अत्यन्त लोकप्रिय हैं। जीवन के सन्दर्भों का यथार्थ चित्रण विषयगत विविधता परिवेशगत विस्तार, वैचारिक संयोग एवं शिल्पगत वैशिष्ट्य इस संग्रह की कहानियों की विशेषताएँ हैं। इसमें समाज में बदलते हुए सम्बन्धों का सूक्ष्म अध्ययन भी है, जिसकी अभिव्यक्ति चारुता से इन कहानियों में हुई है।</p> <p>गिरगिट रंग बदलने के लिए प्रसिद्धि पा चुका है, किन्तु मानवाकृति को स्वयं से अधिक रंगों में देखकर स्वयं गिरगिट लज्जित बन पराजित है, यही अखिलेश निगम द्वारा विरचित कहानियों में दर्शनीय है।</p> <p>इन सभी कहानियों का विषय राष्ट्रीय दृष्टिकोण के परिप्रेक्ष्य में मानव जीवन की समस्याओं से जुड़ा है। कहानीकार का उद्देश्य सर्वत्र सुधारवादी और आशावादी है। इन कहानियों में कहीं-कहीं एक ही पात्र एक समय में मन के विभिन्न स्तरों पर जीता है, जहाँ चारित्रिक विसंगतियाँ ही कहानी की विशेषता बन गई हैं।
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‘गिरगिट’ कथा-संग्रह की सभी कहानियाँ जिज्ञासा, रोचकता, भाव-सबलता एवं युगबोध से सम्पन्न हैं। आधुनिक भावबोध से युग के सन्दर्भों के यथार्थ को सूक्ष्म विवेचन और विषय वैविध्य के साथ व्यापक बनाया गया है। सभी कहानियाँ वैचारिक एवं अनुमूल्यात्मक संयोग से युक्त एवं अत्यन्त लोकप्रिय हैं। जीवन के सन्दर्भों का यथार्थ चित्रण विषयगत विविधता परिवेशगत विस्तार, वैचारिक संयोग एवं शिल्पगत वैशिष्ट्य इस संग्रह की कहानियों की विशेषताएँ हैं। इसमें समाज में बदलते हुए सम्बन्धों का सूक्ष्म अध्ययन भी है, जिसकी अभिव्यक्ति चारुता से इन कहानियों में हुई है।</p>
<p>गिरगिट रंग बदलने के लिए प्रसिद्धि पा चुका है, किन्तु मानवाकृति को स्वयं से अधिक रंगों में देखकर स्वयं गिरगिट लज्जित बन पराजित है, यही अखिलेश निगम द्वारा विरचित कहानियों में दर्शनीय है।</p>
<p>इन सभी कहानियों का विषय राष्ट्रीय दृष्टिकोण के परिप्रेक्ष्य में मानव जीवन की समस्याओं से जुड़ा है। कहानीकार का उद्देश्य सर्वत्र सुधारवादी और आशावादी है। इन कहानियों में कहीं-कहीं एक ही पात्र एक समय में मन के विभिन्न स्तरों पर जीता है, जहाँ चारित्रिक विसंगतियाँ ही कहानी की विशेषता बन गई हैं।
Book Details
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ISBN9788119996384
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
कुसुम खेमानी की कहानियों का यह पहला संग्रह हिन्दी कथा-संसार के लिए एक घटना से कम नहीं। सम्भवतः पहली बार इतनी मार्मिक कौटुम्बिक कहानियाँ हिन्दी पाठकों को उपलब्ध हो रही हैं। यह सच कहती कहानियाँ नहीं; बल्कि स्वयं सच हैं; सच का तना रूप। भिन्न-भिन्न सामाजिक स्तरों के प्रसंगों एवं अनुभवों से बुनी गई ये कहानियाँ समकालीन जीवन का एक अद्भुत कसीदा जड़ती हैं। चाहे ‘लावण्यदेवी’ हो या ‘रश्मिरथी माँ’ या ‘एक माँ धरती-सी’, इन सबमें सूक्ष्मता और अन्तरंगता से घर-परिवार के भीतर के जीवन को यथार्थ के साथ अंकित किया गया है।
कुसुम खेमानी भाव से कथा कहती हैं, लोक कथा की तरह। उनकी कहन शैली से पाठक इतना बँध जाता है कि हुंकारी भरे बिना नहीं रह पाता। इन कहानियों की सबसे बड़ी ख़ूबी है इनकी भाषा और शैली। हिन्दी में होते हुए भी ये कहानियाँ एक ही साथ बांग्ला, राजस्थानी और उर्दू का भी विपुल व्यवहार करती हैं जो इन्हें एक महानगरीय संस्कार प्रदान करता है। कुसुम खेमानी के पहले ऐसा प्रयोग शायद कभी नहीं हुआ। इन कहानियों की बुनावट और अन्त भी सहज, किन्तु अप्रत्याशित होता है। हर कहानी अपने आपमें एक स्वतंत्र लोक है।
इस संग्रह के साथ कुसुम खेमानी के रूप में हिन्दी को एक अत्यन्त सशक्त शैलीकार एवं संवेदनशील क़िस्सागो मिला है। निश्चय ही यह संग्रह सहृदय पाठकों एवं साहित्य के अध्येताओं द्वारा अंगीकार किया जाएगा।
—अरुण कमल
Beetate Huye
- Author Name:
Madhu Kankariya
- Book Type:

- Description: हमारे समाज में प्रचलित रूढ़ मान्यताओं के बरक्स मानवीय स्वतंत्रता का सवाल सदा ही अनदेखा किया जाता रहा है लेकिन मधु कांकरिया की कहानियाँ सिर्फ़ परम्परागत मान्यताओं की ही नहीं, अधुनिकता के आवरण में लिपटे जीवन-मूल्यों की भी पड़ताल करती हैं और हमारे सामने कई सुलगते हुए सवाल खड़ी कर सोच को रचनात्मक आयाम प्रदान करती हैं। चाहे नक्सलवादी आन्दोलन पर आधारित ‘लेकिन कामरेड’ हो, दाम्पत्य जीवन में परस्पर विश्वास को रेखांकित करती ‘चूहे को चूहा ही रहने दो’ हो या बच्चे के स्कूल में दाख़िले के लिए एक स्त्री की व्यथा-कथा हो; मधु काँकरिया कहीं भी विचार और संवेदना के स्तर पर पाठकों को निराश नहीं करतीं, बल्कि कथारस के प्रवाह में बहाए चलती हैं। औपन्यासिक विस्तार की सम्भावना से युक्त ये कहानियाँ भाषा, शिल्प एवं विचार-तत्त्व के अनूठेपन और भाव एवं विचार के अद्भुत सन्तुलन के कारण निश्चय ही उल्लेखनीय बनी रहेंगी, ऐसा हमारा विश्वास है।
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