Akeli
(0)
Author:
Mannu BhandariPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
350
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नई कहानी को समृद्ध बनाने में जिन कथा-लेखिकाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है, मन्नू भंडारी का नाम उनमें सर्वोपरि है। उन्होंने आधुनिक नारी की अस्मिता, उसकी अपनी स्वतंत्र पहचान और सामाजिक जड़ताओं से लड़ने के उसके साहस को बिना किसी आरोपित क्रान्तिकारिता के बड़े सहज भाव से चित्रित किया है। पर उनकी दृष्टि केवल नारी तक ही सीमित होकर नहीं रह गई बल्कि अपने गहरे सामाजिक सरोकारों के चलते ही उन्होंने आज के अर्धसामन्ती, अर्धपूँजीवादी समाज में मूल्यों के विघटन, सम्बन्धों के बदलते स्वरूप, सामाजिक-राजनैतिक चेतना के नित नए आयामों को भी अपनी रचनाओं में उद्घाटित किया है।</p> <p>मन्नू भंडारी की कहानियों के पात्र ओढ़ी हुई बौद्धिकता के अहंकार में अपने परिवेश से कट नहीं जाते बल्कि उनकी सहज मानवीयता पाठकों के साथ एक ऐसी आत्मीयता स्थापित कर लेती है कि पाठकों को वे बिलकुल अपने लगने लगते हैं। जटिल से जटिल मनोवैज्ञानिक स्थितियों के चित्रण-विश्लेषण में भी मन्नू जी की पारदर्शी भाषा की यह सहजता बनी रहती है, साथ ही वे एक स्वतःस्फूर्त कलात्मक संयम को भी हाथ से नहीं जाने देतीं।</p> <p>गहन विचार, सूक्ष्म निरीक्षण और सहज मानवीय संवेदना में लिपटे अपने अनुभवों के तटस्थ बेबाक चित्रण के कारण ही मन्नू भंडारी की ये कहानियाँ पाठक के साथ एक आत्मीयता स्थापित कर लेती हैं।
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नई कहानी को समृद्ध बनाने में जिन कथा-लेखिकाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है, मन्नू भंडारी का नाम उनमें सर्वोपरि है। उन्होंने आधुनिक नारी की अस्मिता, उसकी अपनी स्वतंत्र पहचान और सामाजिक जड़ताओं से लड़ने के उसके साहस को बिना किसी आरोपित क्रान्तिकारिता के बड़े सहज भाव से चित्रित किया है। पर उनकी दृष्टि केवल नारी तक ही सीमित होकर नहीं रह गई बल्कि अपने गहरे सामाजिक सरोकारों के चलते ही उन्होंने आज के अर्धसामन्ती, अर्धपूँजीवादी समाज में मूल्यों के विघटन, सम्बन्धों के बदलते स्वरूप, सामाजिक-राजनैतिक चेतना के नित नए आयामों को भी अपनी रचनाओं में उद्घाटित किया है।</p>
<p>मन्नू भंडारी की कहानियों के पात्र ओढ़ी हुई बौद्धिकता के अहंकार में अपने परिवेश से कट नहीं जाते बल्कि उनकी सहज मानवीयता पाठकों के साथ एक ऐसी आत्मीयता स्थापित कर लेती है कि पाठकों को वे बिलकुल अपने लगने लगते हैं। जटिल से जटिल मनोवैज्ञानिक स्थितियों के चित्रण-विश्लेषण में भी मन्नू जी की पारदर्शी भाषा की यह सहजता बनी रहती है, साथ ही वे एक स्वतःस्फूर्त कलात्मक संयम को भी हाथ से नहीं जाने देतीं।</p>
<p>गहन विचार, सूक्ष्म निरीक्षण और सहज मानवीय संवेदना में लिपटे अपने अनुभवों के तटस्थ बेबाक चित्रण के कारण ही मन्नू भंडारी की ये कहानियाँ पाठक के साथ एक आत्मीयता स्थापित कर लेती हैं।
Book Details
-
ISBN9788189914523
-
Pages240
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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स्त्री-लेखन स्त्री ही कर सकती है, यह सच है लेकिन ‘स्त्रीवादी’ लेखन पुरुष भी कर सकता है—यह भी सच है। यह तभी सम्भव है, जब वह लिंग भेद के प्रति आवश्यक संवेदनशील हो, क्योंकि वह पितृसत्ता की नस-नस बेहतर जानता है। मर्दवादी चालें! मर्दों की दुनिया में औरत एक जिस्म, एक योनि, एक कोख भर है और मर्दों के बिछाए बाज़ार में वह बहुत सारे ब्रांडों में बन्द एक विखंडित इकाई है।
अरविन्द, जो बहुत कम कहानी लिखते हैं, इस औरत को हर तरह से, हर जगह पूरी तदाकारिता से खोजते हैं। अरविन्द कहीं पजैसिव हैं, कहीं कारुणिक हैं, लेकिन प्रायः बहुत बेचैन हैं। यहाँ स्त्री के अभिशाप हैं जिनसे हम गुज़रते हैं। मर्दों की दुनिया द्वारा गढ़े गए अभिशाप, आज़ादी चाहकर भी औरत को कहीं आज़ाद होने दिया जाता है?
अरविन्द की इन वस्तुतः छोटी कहानियों में मर्दों की दुनिया के भीतर, औरत के अनन्त आखेटों के इशारे हैं। यह ‘रसमय’ जगत नहीं, मर्दों की निर्मित स्त्री का ‘विषमय’ जगत है। अरविन्द की कहानी इशारों की नई भाषा है। उनकी संज्ञाएँ, सर्वनाम, विशेषण सब सांकेतिक बनते जाते हैं। वे विवरणों, घटनाओं में न जाकर संकेतों, व्यंजकों में जाते हैं और औरत की ओर से एक ज़बर्दस्त जिरह खड़ी करते हैं। स्त्री को हिन्दी कथा में किसी भी पुरुष लेखक ने इतनी तदाकारिता से नहीं पढ़ा जितना अरविन्द ने।
इन कहानियों को पढ़ने के बाद पुरुष पाठकर्ता सन्तप्त होगा एवं तदाकारिता की ओर बढ़ेगा और स्त्री पाठकर्ता अपने पक्ष में नई क़लम को पाएगी—वहाँ भी, जहाँ स्त्री सीधा विषय नहीं है।
अरविन्द जैन का यह कथा-संग्रह बताता है कि हिन्दी कहानी में निर्णायक ढंग से फिर बहुत कुछ बदल गया है।
—सुधीश पचौरी
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