Bechain Patton Ka Chorus
(0)
Author:
Kunwar Narayan, Amrendra Nath TripathiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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कुँवर नारायण उन अत्यल्प साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों में हैं जिन्होंने अपने लेखन में भारतीय और वैश्विक विचार, चिन्तन, संवेदना और सरोकारों से गहन संवाद किया है। यह संवाद किसी एक साहित्यिक विधा तक सीमित नहीं रहा। उनकी काव्येतर कृतियाँ इस बात की पुष्टि करती हैं। कुँवर नारायण ने जैसे विश्वस्तरीय कविताएँ लिखी हैं वैसे ही कहानियाँ भी। 'बेचैन पत्तों का कोरस' कुँवर नारायण का दूसरा कहानी-संग्रह है। पहला कहानी-संग्रह, 'आकारों के आसपास', सत्तर के दशक में आया था। अपनी असाधारण मौलिकता के चलते यह संग्रह ख़ासा ध्यानाकर्षक रहा। उस वक़्त रघुवीर सहाय, श्रीकान्त वर्मा, श्रीलाल शुक्ल, नेमिचन्द्र जैन जैसे साहित्यकारों ने इन कहानियों को सुखद आश्चर्य के साथ सराहा।</p> <p>वर्तमान समय के कथाकारों और समीक्षकों तक के लिए ये कहानियाँ निरन्तर आकर्षण और प्रेरणा का विषय बनी हुई हैं। इसी उपलब्धि का विस्तार हम इस दूसरे संकलन में पाते हैं, जो कि एक लम्बे अन्तराल के बाद आ रहा है।</p> <p>वर्तमान कथा-परिदृश्य को यह संकलन कई मानों में समृद्ध करेगा। इन कहानियों में अन्तर्वस्तु की विविधता ही नहीं, भाषा, संरचना और रूप का वैविध्य भी उत्कृष्टता का प्रमाण है। हर कहानी स्वयं में नई है और दूसरी से पृथक् भी। ये कहानियाँ औपचारिक और परम्परागत तरीक़े से अलग, कहानी विधा में प्रयोग और नवाचार हैं। बहुविधात्मक प्रभाव का सुन्दर समन्वय इन कहानियों को बहुस्तरीय बनाता है, और निबन्ध, संस्मरण, रेखाचित्र, चारित्रिकी, कविता आदि विधाओं की सम्मिलित शक्ति इन कहानियों के क्षितिज को विस्तृत करती है।
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कुँवर नारायण उन अत्यल्प साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों में हैं जिन्होंने अपने लेखन में भारतीय और वैश्विक विचार, चिन्तन, संवेदना और सरोकारों से गहन संवाद किया है। यह संवाद किसी एक साहित्यिक विधा तक सीमित नहीं रहा। उनकी काव्येतर कृतियाँ इस बात की पुष्टि करती हैं। कुँवर नारायण ने जैसे विश्वस्तरीय कविताएँ लिखी हैं वैसे ही कहानियाँ भी। 'बेचैन पत्तों का कोरस' कुँवर नारायण का दूसरा कहानी-संग्रह है। पहला कहानी-संग्रह, 'आकारों के आसपास', सत्तर के दशक में आया था। अपनी असाधारण मौलिकता के चलते यह संग्रह ख़ासा ध्यानाकर्षक रहा। उस वक़्त रघुवीर सहाय, श्रीकान्त वर्मा, श्रीलाल शुक्ल, नेमिचन्द्र जैन जैसे साहित्यकारों ने इन कहानियों को सुखद आश्चर्य के साथ सराहा।</p>
<p>वर्तमान समय के कथाकारों और समीक्षकों तक के लिए ये कहानियाँ निरन्तर आकर्षण और प्रेरणा का विषय बनी हुई हैं। इसी उपलब्धि का विस्तार हम इस दूसरे संकलन में पाते हैं, जो कि एक लम्बे अन्तराल के बाद आ रहा है।</p>
<p>वर्तमान कथा-परिदृश्य को यह संकलन कई मानों में समृद्ध करेगा। इन कहानियों में अन्तर्वस्तु की विविधता ही नहीं, भाषा, संरचना और रूप का वैविध्य भी उत्कृष्टता का प्रमाण है। हर कहानी स्वयं में नई है और दूसरी से पृथक् भी। ये कहानियाँ औपचारिक और परम्परागत तरीक़े से अलग, कहानी विधा में प्रयोग और नवाचार हैं। बहुविधात्मक प्रभाव का सुन्दर समन्वय इन कहानियों को बहुस्तरीय बनाता है, और निबन्ध, संस्मरण, रेखाचित्र, चारित्रिकी, कविता आदि विधाओं की सम्मिलित शक्ति इन कहानियों के क्षितिज को विस्तृत करती है।
Book Details
-
ISBN9788119835751
-
Pages152
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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जीवन को अनुभूति और चिन्तन के विभिन्न धरातलों पर ग्रहण करनेवाले कवि कुँवर नारायण अपनी कविताओं में सीमाएँ नहीं बनाते; उनकी ज़्यादातर कविताएँ किसी एक ही तरह की भाषा या विषय में विसर्जित-सी हो गई नहीं लगतीं—दोनों को विस्तृत करती लगती हैं। अनेक कविताएँ मानो समाप्त नहीं होतीं, एक ख़ास तरह की हमारी बेचैनियों का हिस्सा बन जाती हैं। इस तरह से देखें तो वे अपने को सिद्ध करनेवाले कवि हमें नहीं नज़र आते। वे बराबर अपनी कविताओं में मुहावरों से बचते हैं और अपने ढंग से उनसे लड़ते भी हैं। उनकी कविता की भाषा में धोखे नहीं हैं। अधिकांश कविताओं का पैनापन ज़िन्दगी के कई हिस्सों को बिलकुल नये ढंग से छूता है।
वे मानते हैं कि दैनिक यथार्थ के साथ कविता का रिश्ता नज़दीक का भी हो सकता है और दूर का भी और दोनों ही तरह वह जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकता है—सवाल है, कविता कितने सच्चे और उदार अर्थों में हमें आदमी बनाने की ताक़त रखती है। कविता उनके लिए जीवन का प्रतिबिम्ब मात्र नहीं, जीवन का सबसे आत्मीय प्रसंग है—कविता, जो अपने चारों तरफ़ भी देखती है और अपने को सामने रखकर भी। उनकी कविताओं में हमें बहुत सतर्क क़िस्म की भाषा का इस्तेमाल मिलता है; वह कभी बहुत गहराई से किसी ऐतिहासिक या दार्शनिक अनुभव की तहों में चली जाती है और कभी इतनी सरल दिखती है कि वह हमें अपने बहुत क़रीब नज़र आती है। बहुआयामी स्तरों पर भाषा से यह लड़ाई और प्यार कुँवर नारायण को चुनौती देता है, ख़ास तौर पर एक ऐसे वक़्त में जब कविता का एक बड़ा हिस्सा एक ही तरह की भाषा में अपने को अभिव्यक्त किए चला जा रहा है।
हिन्दी के अग्रणी आधुनिक कवि कुँवर नारायण की कविता की दुनिया में जाने का मतलब ज़िन्दगी को गहराई और विस्तार से देखने और जानने का अच्छा मौक़ा पा लेना है।
Jiye Hue Se Zyaadaa
- Author Name:
Kunwar Narayan
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अग्रणी कवि और विचारक कुँवर नारायण भेंटवार्ताओं को पर्याप्त धैर्य और गम्भीरता से लेते हैं। उनके संवाद नकेवल हमारे साहित्यबोध को विभिन्न स्तरों पर उकसाते हैं, बल्कि वे हमें साहित्य, जीवन और अन्य कलाओं के आपसी सम्बन्धों की एक अत्यन्त समृद्ध दुनिया में ले जाते हैं। उनके संवाद केवल साहित्य तक सीमित नहीं हैं, वे बाहर की एक ज़्यादा बड़ी दुनिया में प्रवेश की राहें खोलते हैं; हमारी साहित्यिक तथा चिन्तन संवेदना को इस तरह विस्तृत करते हैं कि विचारों और आत्मान्वेषण का बहुत बड़ा परिप्रेक्ष्य धीरे-धीरे खुलता चला जाता है। उनकी भाषा में स्पष्टता है। वे जटिल विचारों को भी बहुत ही सरलता और नरमी से पाठक तक पहुँचाते हैं, और उन विषयों से पाठक का संवाद कराते हैं। यह उनकी भेंटवार्ताओं की तीसरी पुस्तक है। इसको पढ़ना अपने समय के शीर्षस्थ तथा अत्यन्त सजग और जानकार लेखक के न केवल रचना-जगत बल्कि उनके निजी संसार और दृष्टिकोण से भी निकट परिचय प्राप्त करना है। यह उनके और हमारे बारे में एक मूल्यवान दस्तावेज़ है।
Pratinidhi Kavitayen : Kunwar Narayan
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Kunwar Narayan
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शुरू से लेकर अब तक की कविताएँ सिलसिलेवार पढ़ी जाएँ तो कुँवर नारायण की भाषा में बदलते मिज़ाज को लक्ष्य किया जा सकता है। आरम्भिक कविताओं पर नई कविता के दौर की काव्य-भाषा की स्वाभाविक छाप स्पष्ट है। इस छाप के बावजूद छटपटाहट है—कविता के वाक्य-विन्यास को आरोपित सजावट से मुक्त कर सहज वाक्य-विन्यास के निकट लाने की। आगे चलकर यह वाक्य-विन्यास कुँवर नारायण की कविता के लिए स्वभाव-सिद्ध हो गया है। लेकिन उनकी विशेषता यह है कि उन्होंने सहज वाक्य-विन्यास को बोध के सरलीकरण का पर्याय अधिकांशत: नहीं बनने दिया। सहज रहते हुए सरलीकरण से बचे रहना, साधना के कठिन अभ्यास की माँग करता है। 'सहज-सहज सब कोई कहै—सहज न चीन्हे कोय!' बाल-भाषा में 'प्रौढ़ व्यक्तित्व को अभिव्यक्ति' देने की चुनौती को कुँवर नारायण ने बहुत गहरे में लिया और जिया है। परम्परा की स्मृति और 'सैकड़ों नए-नए' पहलुओं को धारण करनेवाली काव्य-भाषा सम्भव करने के लिए जो साधना उन्होंने की होगी, उसका अनुमान ही किया जा सकता है। कुँवर नारायण इस महत्त्वपूर्ण सचाई के प्रति सजग हैं कि ‘कलाकार-वैज्ञानिक के लिए कुछ भी असाध्य नहीं।’ वे इस गहरी सचाई से भी वाक़िफ़ हैं कि चिन्तन चाहे दार्शनिक प्रश्नों पर किया जाए चाहे वैज्ञानिक तथ्यों पर, काव्यात्मक भाषा ही प्रत्यक्ष दिखने वाले विरोधों के परे जाकर मूलभूत सत्यों को धारण करने का हौसला कर पाती है।
—पुरुषोत्तम अग्रवाल
Aadhunik Awadhi Kavita : Pratinidhi Chayan : 1850 Se Ab Tak
- Author Name:
Amrendra Nath Tripathi
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अवधी भाषा की कविता-यात्रा हज़ार वर्षों से कहीं अधिक लम्बी रही है जिसे अब तक गतिमान भाषा की महायात्रा के रूप में देखा जाना चाहिए। सभी आधुनिक आर्यभाषाओं की तरह अवधी की शुरुआत भी दसवीं शताब्दी से मानी जाती है। भाषा के लिखित रूप के साक्ष्य पर। लेकिन इस भाषा का उद्भव दसवीं सदी के कितने सैकड़े पहले हुआ, ठीक-ठीक कह पाना कठिन है। अवधी में लोकसाहित्य कब से लिखा जा रहा है, यह भी कोई नहीं बता सकता। परन्तु यह अनुमान हवाई नहीं है कि जो भाषा दसवीं-ग्यारहवीं सदी के आसपास अपने लिखित रूप में मौजूद दिखती है, उसका मौखिक रूप भी कहीं और पहले से आकार लेता हुआ, विस्तृत, ऊर्जावान और आकर्षक रहा होगा। भाषा से 'बोली' के दर्जे में पहुँचा दिए जाने के बावजूद आधुनिक काल में अवधी रचनात्मकता रुकी नहीं। कवियों ने अपने घर, गाँव और अवध की भाषा में लिखा और असरदार लिखा। कोई उन्हें देख रहा है कि नहीं, रचना कहीं से छपेगी कि नहीं, कोई कभी मूल्यांकन करेगा कि नहीं; इन सबसे बेख़बर होकर अवधी साहित्यकारों ने सिर्फ़ लिखा। इसका सुपरिणाम यह हुआ कि अवधी के आधुनिक काम में रचनाकारों और रचनाओं की कमी नहीं है। पूरे अवध में, और अवध से बाहर भी, अवधी रचनाकारों ने विपुल साहित्य रचा। वह कितना मूल्यवान है, यह अलग मसला है, लेकिन नाना नकारात्मकताओं के मध्य अवधी की रचनात्मक चेष्टा की सराहना की जानी चाहिए। यह किताब उसी दिशा में एक प्रयास है।
Aadhunik Awadhi Kavita : Pratinidhi Chayan : 1850 Se Ab Tak
Amrendra Nath Tripathi
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₹ 159.2
Available
Prem Ke Pahle Basant Me
- Author Name:
Rashmi Bhardwaj
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ख़ुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार। जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।।
Achchhe Aadmee
- Author Name:
Phanishwarnath Renu +1
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रेणु ने अपने आत्म-कथ्य में चित्रगुप्त महाराज द्वारा निर्मित भाग्य-लेख के अंशों में अपना परिचय देते हुए कहा है कि यह आदमी ‘एक ही साथ सुर और असुर, सुन्दर और असुन्दर, पापी और विवेकी, दुरात्मा और सन्त, आदमी और साँप, जड़ और चेतन—सब कुछ होगा।’ क्या यही परिचय अपने विविध और विस्तृत रूप में उनकी समस्त रचनाओं में नहीं लहरा रहा है? जड़ीभूत सौन्दर्याभिरुचि को गतिशील और व्यापक फ़लक प्रदान करनेवाली रेणु की कहानियों ने हिन्दी कथा-साहित्य को एक नई दिशा दी है—सामाजिक परिवर्तन ही एकमात्र विकल्प है। यह दिशा ही रेणु की रचनाओं की मूल सोच है। बड़े चुपके से कभी उनकी कहानियाँ किसानों और खेत मज़दूरों के कान में कह देती हैं कि ज़मींदारी प्रथा अब नहीं रह सकती और ज़मीन जोतनेवाले की ही होनी चाहिए। कभी मज़दूरों को यह सन्देश देने लगती हैं कि तुम्हारी मुक्ति में ही असली सुराज का अर्थ छिपा है—भूल-भुलैया में पड़ने की जरूरत नहीं। क्या कला, क्या भाषा, क्या अन्तर्वस्तु और विचारधारा, कोई भी कसौटी क्यों न हो, रेणु की कहानियाँ एकदम खरी उतरती हैं, लोगों का रुझान बदल देती हैं और यही रचनात्मक गतिविधि रेणु के साहित्य में उनके अप्रतिम योगदान को अक्षुण्ण बनाती है। ‘अच्छे आदमी’ में संग्रहीत विधित रंगों की ये कहानियाँ रेणु की इसी विशिष्ट रचना-यात्रा का अगला पड़ाव हैं।
Sandigdh
- Author Name:
Tejendra Sharma
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पंद्रह बेहतरीन कहानियों का संग्रह।
Anugoonj
- Author Name:
Geetanjali Shree
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‘माई’, ‘हमारा शहर उस बरस’, ‘तिरोहित’, ‘वैराग्य’ एवं ‘ख़ाली जगह’ जैसी विविध व सशक्त कृतियों की मार्फ़त पिछले पन्द्रह सालों में एक विशिष्ट पहचान बनी है गीतांजलि श्री की हिन्दी कथा-जगत में। ‘अनुगूँज’ में संकलित इन दस कहानियों से ही शुरू हुआ था इस पहचान का सिलसिला। एक नई संवेदना जो विद्रोह और प्रतिरोध को उजागर करते वक़्त भी उनको कमज़ोर बनाती हताशा को अनदेखा नहीं करती, इशारों और बिम्बों के सहारे चित्रण करनेवाला शिल्प, और शिक्षित वर्ग की आधुनिक मानसिकता को दिखाती उनकी बोलचाल की भाषा, ऐसे तत्त्वों से बनती है गीतांजलि श्री की लेखकीय पहचान।
यूँ तो इन कहानियों का केन्द्र लगभग हर बार—एक ‘दरार’ को छोड़कर—बनता है शिक्षित मध्यवर्गीय नारियों से, पर इनमें वर्णित होते हैं हमारे आधुनिक नागरिक जीवन के विभिन्न पक्ष। जैसे वैवाहिक तथा विवाहेतर स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, पारिवारिक परिस्थितियाँ, सामाजिक रूढ़ियाँ, हिन्दू-मुस्लिम समस्या, स्त्रियों की पारस्परिक मैत्री इत्यादि। यहाँ सीधा, सपाट कुछ भी नहीं है। हर स्थिति, हर सम्बन्ध, हर संघर्ष में व्याप्त रहते हैं परस्पर विरोधी स्वर। यही विरोधी स्वर रचते हैं हरेक कहानी का एक अलग राग।
Ek Ladki, Paanch Deevane
- Author Name:
Harishankar Parsai
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एक लड़की है जिसे उसके दीवानों ने और मुहल्ले-भर की भूखी नज़रों ने जवान और चतुर बना दिया; फिर एक चूहा है जो रोज़ रात में गृह-निवासी के सिरहाने तब तक सत्याग्रह करता रहा जब तक कि उसे नियमित खाना नहीं दिया जाने लगा; अकाल का उत्सव है जिसके लिए जमाखोर, मुनाफ़ाखोर और नौकरशाही सालभर अनुष्ठान कराते हैं कि कब अकाल पड़े, कब दिन फिरें...और फिर नाक है, एक नहीं कई-कई तरह की। कुछ कट जाती हैं, फिर बढ़ जाती हैं, कुछ ऐसी कि चाहे जो जतन करो, कटती ही नहीं; फिर एक आदमी है जिसके भीतर दो आदमी हैं; कभी एक ऊपर आ जाता है, कभी दूसरा हावी हो जाता है।
आगे सड़े हुए आलू प्रवेश करते हैं। वे सुबह से टोकरे में पड़े हैं, पर बिक नहीं पाए। उनसे पूछा गया कि अब तुम क्या करोगे तो बोले कि हम विद्रोह करेंगे। चाहे आधी रात तक टोकरे में पड़े रहें, बिकेंगे नहीं। हम भी आत्मसम्मान रखते हैं। देखने में वे कुछ बुद्धिजीवी मालूम पड़ रहे थे लेकिन एक सस्ते होटल वाला आया और उन्हें ख़रीद ले गया।
इनके अलावा भी इस किताब में कई पात्र और परिस्थितियाँ हैं जिन्हें परसाई जी की निर्मम लेखनी ने यहाँ संग्रहीत व्यंग्य-कथाओं में उनकी तमाम विडम्बनाओं और विकृतियों के साथ अंकित किया है।
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