Urdu-Hindi Hashya-Vyangya
(1)
₹
250
₹ 200 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
हिन्दी व्यंग्यकारों में सुपरिचित रवीन्द्रनाथ त्यागी द्वारा संकलित-सम्पादित यह कृति उर्दू और हिन्दी के क़रीब चौबीस चुनिन्दा लेखकों की हास्य-व्यंग्य रचनाएँ प्रस्तुत करती है।</p> <p>यह पुस्तक कुछ लोगों की इस धारणा को झुठलाती है कि श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य की परम्परा उर्दू में तो है, हिन्दी में नहीं; अथवा यदि है तो भी स्तरीय नहीं है। वस्तुतः हिन्दी-उर्दू व्यंग्य लेखन पर इस तरह विचार करना ग़लत है, क्योंकि सम्पादक के ही शब्दों में कहें तो “कम-से-कम अब यह स्थिति ज़रूर आ गई है, जब लिपि को छोड़कर उर्दू और हिन्दी, दोनों भाषाओं में और कोई अन्तर नहीं रहा।” इसलिए यदि उर्दू के पतरस बुखारी से लेकर कृष्ण चंदर तक तथा हिन्दी के अन्नपूर्णानन्द से लेकर लतीफ़ घोंघी तक की व्यंग्य रचनाओं को यहाँ देखा जाएगा तो अपने समय की धड़कनें उनमें समान रूप से सुनी जा सकेंगी।</p> <p>वर्तमान जीवन के विविध क्षेत्रों में निहित जड़ीभूत संस्कारों और विद्रूपताओं पर ये रचनाएँ कसकर प्रहार करती हैं। इस प्रक्रिया में अनेकानेक दुर्लभ व्यंग्य-स्थितियाँ, धारदार भाषा-शैली, शिल्पगत अनूठे प्रयोग तथा यथार्थ को पारदर्शी बनाती हुई वैचारिकता संकलित निबन्धों को सहज ही अविस्मरणीय बना देती है। दूसरे शब्दों में हम हँसी-हँसी में ही सोच के गम्भीर बिन्दुओं का स्पर्श करने लगते हैं।
Read moreAbout the Book
हिन्दी व्यंग्यकारों में सुपरिचित रवीन्द्रनाथ त्यागी द्वारा संकलित-सम्पादित यह कृति उर्दू और हिन्दी के क़रीब चौबीस चुनिन्दा लेखकों की हास्य-व्यंग्य रचनाएँ प्रस्तुत करती है।</p>
<p>यह पुस्तक कुछ लोगों की इस धारणा को झुठलाती है कि श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य की परम्परा उर्दू में तो है, हिन्दी में नहीं; अथवा यदि है तो भी स्तरीय नहीं है। वस्तुतः हिन्दी-उर्दू व्यंग्य लेखन पर इस तरह विचार करना ग़लत है, क्योंकि सम्पादक के ही शब्दों में कहें तो “कम-से-कम अब यह स्थिति ज़रूर आ गई है, जब लिपि को छोड़कर उर्दू और हिन्दी, दोनों भाषाओं में और कोई अन्तर नहीं रहा।” इसलिए यदि उर्दू के पतरस बुखारी से लेकर कृष्ण चंदर तक तथा हिन्दी के अन्नपूर्णानन्द से लेकर लतीफ़ घोंघी तक की व्यंग्य रचनाओं को यहाँ देखा जाएगा तो अपने समय की धड़कनें उनमें समान रूप से सुनी जा सकेंगी।</p>
<p>वर्तमान जीवन के विविध क्षेत्रों में निहित जड़ीभूत संस्कारों और विद्रूपताओं पर ये रचनाएँ कसकर प्रहार करती हैं। इस प्रक्रिया में अनेकानेक दुर्लभ व्यंग्य-स्थितियाँ, धारदार भाषा-शैली, शिल्पगत अनूठे प्रयोग तथा यथार्थ को पारदर्शी बनाती हुई वैचारिकता संकलित निबन्धों को सहज ही अविस्मरणीय बना देती है। दूसरे शब्दों में हम हँसी-हँसी में ही सोच के गम्भीर बिन्दुओं का स्पर्श करने लगते हैं।
Book Details
-
ISBN9788126704590
-
Pages218
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Meer Bimar Hue
- Author Name:
Fikr Tonswi
- Book Type:

- Description: "दिल्ली के चटख़ारे" शाहिद अहमद देहलवी की उन मज़ामीन का मज्मूआ है जिनमें गुज़रे ज़माने के दिल्ली शहर को बड़े ही दिलचस्प तरीक़े से बयान किया गया है। इन मज़ामीन में दिल्ली के बाज़ार, कटरे, मुहल्ले की खिड़कियाँ, फेरी वालों की सदाएँ, देग़ों और भट्टियों से उठने वाली महक का ऐसा बयान है कि पढ़ते हुए सारा मंज़र आँखों के सामने आ जाता है।
Shesh Agle Prishth Par
- Author Name:
K. D. Singh
- Book Type:

-
Description:
यह किताब एक ऐसे लेखक की है जो लेखन की दुनिया का पेशेवर बाशिन्दा नहीं है, फिर भी गद्य की एकदम ताज़ा पृष्ठभूमि से आया है, जहाँ विद्यार्थी जीवन के हल्के-फुल्के और रोचक अनुभवों के छोटे-छोटे टुकड़े हैं। उसने स्वयं कहा है कि ‘यह उपन्यास नहीं है’ और मैं इस तरह की कोशिश को ‘विधाओं में एक तोड़-फोड़’ कहता हूँ। यह तोड़-फोड़ सार्थक है, समर्थ है और पठनीय है। नये लोग कविता की तरह गद्य में भी नई संरचना लेकर आएँगे तो निश्चित ही समृद्धि आएगी—भाषा में, रूप में और विन्यास
में भी।
—दूधनाथ सिंह
Vikalang Shraddha Ka Daur
- Author Name:
Harishankar Parsai
- Book Type:

- Description: हरिशंकर परसाई ने अपनी एक पुस्तक के लेखकीय वक्तव्य में कहा था–‘व्यंग्य’ अब ‘शूद्र’ से ‘क्षत्रिय’ मान लिया गया है। विचारणीय है कि वह शूद्र से क्षत्रिय हुआ है, ब्राह्मण नहीं, क्योंकि ब्राह्मण ‘कीर्तन’ करता है। निस्सन्देह व्यंग्य कीर्तन करना नहीं जानता, पर कीर्तन को और कीर्तन करनेवालों को खूब पहचानता है। कैसे-कैसे अवसर, कैसे-कैसे वाद्य और कैसी-कैसी तानें–जरा-सा ध्यान देंगे तो अचीन्हा नहीं रहेगा विकलांग श्रद्धा का (यह) दौर। विकलांग श्रद्धा का दौर के व्यंग्य अपनी कथात्मक सहजता और पैनेपन में अविस्मरणीय हैं, ऐसे कि एक बार पढक़र इनका मौखिक पाठ किया जा सके। आए दिन आसपास घट रही सामान्य-सी घटनाओं से असामान्य समय-सन्दर्भों और व्यापक मानव-मूल्यों की उद्भावना न सिर्फ रचनाकार को मूल्यवान बनाती है बल्कि व्यंग्य-विधा को भी नई ऊँचाइयाँ सौंपती है। इस दृष्टि से प्रस्तुत कृति का महत्त्व और भी ज्यादा है।
Desh Sewa Ka Dhandha
- Author Name:
Vishnu Nagar
- Rating:
- Book Type:

- Description: विष्णु नागर ने एक कवि के अलावा ख़ुद को एक व्यंग्यकार के रूप में भी प्रतिष्ठित किया है। उन्होंने अपने समय को कविता, कहानी, निबन्ध, लेख, व्यंग्य आदि अनेक विधाओं में पकड़ने की कोशिश की है। दरअसल व्यंग्य उनका इतना सहज भाव है कि वह इन सभी विधाओं में बिखरा पड़ा है जिनमें उन्होंने रचनाएँ की हैं। अपने समय की तीखी राजनीतिक-सामाजिक विडम्बनाओं को उन्होंने इस पुस्तक में शामिल सभी व्यंग्यों के माध्यम से पकड़ा है। इनके व्यंग्य की यह विशेषता है कि इनमें एक निर्भीक भाव है। विष्णु नागर शब्दों का खेल करके व्यंग्य या हास्य पैदा करने की कोशिश नहीं करते। वह अपनी बात को स्पष्टता से कहते हैं, शायद इसी कारण ये व्यंग्य अपने समकालीन व्यंग्यकारों के व्यंग्यों से अलग नज़र आते हैं। इनमें कविता की कोमलता और करुणा भी है और कहानी का आख्यान भी। निबन्ध का लालित्य भी है और लेख की विचारशीलता भी। इनमें भाषा का विलक्षण रचाव और सधाव देखने को मिलता है। व्यंग्यकार किसी भी राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति को उसके विभिन्न आयामों में देखने की सतर्क सजग कोशिश करता है इसलिए ये व्यंग्य समकालीन स्थिति पर होकर भी महज़ समसामयिक बनकर नहीं रह गए हैं। इनमें अपने समय के क्रूर तथा नंगे यथार्थ का इतिहास और भूगोल दोनों मिलेंगे। ये व्यंग्य तत्कालीन राजनीतिक स्थितियों के बारे में होकर भी चूँकि कोरे राजनीतिक-सामाजिक नहीं हैं, इसलिए राजनीतिक-सामाजिक यथार्थ का बाहरी स्वरूप किंचित् बदलने के बावजूद हम पाते हैं कि कुल मिलाकर यथार्थ अपने मूल आशय में वैसा ही आज भी है जैसा कि वह इन व्यंग्यों में दिखता है। विष्णु नागर उन व्यंग्यकारों में हैं जिन्होंने हरिशंकर परसाई, रघुवीर सहाय, बर्टोल्ट ब्रेख़्त आदि से सीखा है और उसे अपने ढंग से एक बिलकुल नया स्वरूप देने की कोशिश की है।
Rag Darbari
- Author Name:
Shrilal Shukla
- Rating:
- Book Type:

- Description: ‘राग दरबारी’ एक ऐसा उपन्यास है जो गाँव की कथा के माध्यम से आधुनिक भारतीय जीवन की मूल्यहीनता को सहजता और निर्ममता से अनावृत्त करता है। शुरू से आख़िर तक इतने निस्संग और सोद्देश्य व्यंग्य के साथ लिखा गया हिन्दी का शायद यह पहला बृहत् उपन्यास है। फिर भी ‘राग दरबारी’ व्यंग्य-कथा नहीं है। इसका सम्बन्ध एक बड़े नगर से कुछ दूर बसे हुए गाँव की ज़िन्दगी से है, जो इतने वर्षों की प्रगति और विकास के नारों के बावजूद निहित स्वार्थों और अनेक अवांछनीय तत्त्वों के सामने घिसट रही है। यह उसी ज़िन्दगी का दस्तावेज़ है। 1968 में ‘राग दरबारी’ का प्रकाशन एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक घटना थी। 1971 में इसे ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया और 1986 में एक दूरदर्शन-धारावाहिक के रूप में इसे लाखों दर्शकों की सराहना प्राप्त हुई। वस्तुतः ‘राग दरबारी’ हिन्दी के कुछ कालजयी उपन्यासों में से एक है।
Tanh Tanh Bhrashtachar
- Author Name:
Satish Agnihotri
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी साहित्य में व्यंग्य-लेखन की अनेक प्रविधियाँ और छवियाँ विद्यमान हैं। सबका लक्ष्य एक ही है—उन प्रवृत्तियों, व्यक्तियों व स्थितियों का व्यंजक वर्णन जो विभिन्न विसंगतियों के मूल में हैं। 'तहँ तहँ भ्रष्टाचार' व्यंग्य-संग्रह में सतीश अग्निहोत्री ने समकालीन समाज की अनेक विसंगतियों पर प्रहार किया है। फैंटेसी का आश्रय लेते हुए लेखक ने राजनीति के गर्भ से उपजी विभिन्न समस्याओं का विश्लेषण किया है।
ज्ञान चतुर्वेदी के शब्दों में, ‘सतीश अग्निहोत्री के इस व्यंग्य-संग्रह की अधिकांश रचनाओं में यह व्यंग्य-कौशल बेहद मेच्योरली बरता गया दिखता है। व्यंग्य के उनके विषय तो नए हैं ही, उनको पौराणिक तथा लोक-ग़ल्पों से जोड़ने की उनकी शैली भी बेहद आकर्षक है। आप मज़े-मज़े से सब कुछ पढ़ जाते हैं और फैंटेसी में बुने जा रहे व्यंग्य की डिजाइन को लगातार समझ भी पाते हैं।’
व्यंग्यकार के लिए ज़रूरी है कि उसके पास सन्दर्भों की प्रचुरता हो। वह विभिन्न प्रसंगों को वर्णन के अनुकूल बनाकर अपने मन्तव्य को विस्तार प्रदान करे। सतीश अग्निहोत्री केवल पौराणिक व लोक प्रचलित सन्दर्भों से ही परिचित नहीं, वे आधुनिक विश्व की विभिन्न उल्लेखनीय घटनाओं का मर्म भी जानते हैं। पौराणिक वृत्तान्त में लेखक अपने निष्कर्षों के लिए स्पेस की युक्ति निकाल लेता है।
‘एक ब्रेन ड्रेन की कहानी’ के वाक्य हैं, ‘कार्तिकेय मेधावी थे, पर तिकड़मी नहीं। इस देश को रास्ता बनानेवाले इंजीनियरों की ज़रूरत नहीं है, केवल पैसा ख़र्च करनेवाले इंजीनियरों की है।’ यह व्यंग्य-संग्रह प्रमुदित करने के साथ प्रबुद्ध भी बनाता है, यही इसकी सार्थकता है।
Buddhiprakash
- Author Name:
Sampat Saral
- Book Type:

- Description: सम्पत सरल को ज़्यादातर लोग मंच से जानते हैं जहाँ वे पिछले कई वर्षों से उल्लेखनीय निडरता के साथ न सिर्फ़ समाज, बल्कि सरकार को भी आईना दिखाते रहे हैं। ‘बुद्धिप्रकाश’ उनके व्यंग्य निबन्धों की पुस्तक है; और इन्हें पढ़कर कोई भी कहेगा कि जिस धारदार, सधे और सुँते हुए व्यंग्य की कमी हिन्दी में काफ़ी समय से खल रही थी, वह अब हमारे सामने है। हमारे आसपास ऐसी बहुत कम चीज़ें रह गई होंगी, जिन्हें व्यंग्य का विषय बनाते हुए किसी को कोई संकोच हो; जीवन का, सामाजिक व्यवस्था का अधिकांश अपने विरोधाभासों के चलते स्वयं ही व्यंग्य है। लेकिन चीज़ों के बाह्य आडम्बरों, शक्ति और सामर्थ्य की अभेद्य भंगिमाओं और रंध्रहीन व्यवस्था को बेधकर उनके भीतर के व्यंग्य को पकड़ना—इसके लिए एक निगाह चाहिए, जो सम्पत सरल के पास है; और उसे बिना किसी लाग-लपेट के साफ़-साफ़ उकेर देनेवाली भाषा भी। इस संकलन में शामिल निबन्धों को पढ़ते हुए जो चीज़ सबसे पहले महसूस होती है वह यही कि वे अपनी एक भी पंक्ति को व्यर्थ नहीं जाने देते; हर वाक्य सही निशाने पर जाकर लगता है; और हर बात अपने अनूठेपन में हमें नई लगती है। हास्य उनके व्यंग्य के साथ स्वयं चला आता है, अनायास, एक साथ कई दिशाओं में मार करता हुआ, जैसे कि उन्होंने अपने इस समय को सांगोपांग समझ लिया हो। यह पुस्तक आपको बार-बार अपने पास बुलाएगी।
Chhalkat Jaye Gyan Ghat
- Author Name:
K. D. Singh
- Book Type:

- Description: जब ढोल की बात चल ही पड़ी है, तो एक और खास बात है जिस पर आपको गौर करना चाहिए। ... और वह यह है कि, जो ढोल जितनी गहन, गम्भीर आवाज करता है, वह अन्दर से उतना ही खोखला होता है। ढोल की आवाज, उसके आकार-प्रकार पर कम, उसके खोखलेपन पर ज्यादा निर्भर करती है। ढोल की एक पोल भी होती है, जो कभी-कभी खुल जाती है। परम्परागत ढोल की तो पोल खुलते ही वह बजना बन्द हो जाता है और घर के किसी कोने पर सन्यास लेकर पड़ा रहता है, जब तक कि उसे उसकी पोल के साथ पुनः कस न दिया जाय। लेकिन आधुनिक पीढ़ी के ढोल तो, पोल खुलने के बाद भी उतनी ही गम्भीर रिदम के साथ पूरी बेशर्मी से बजते रहते हैं... और मजे की बात यह है कि लोग उसे सुनते भी रहते हैं... पूरी तन्मयता के साथ। बजनेवाले ढोल, अगर आपके नजदीक बज रहे हों, तो वे आपको कर्कश लग सकते हैं... लेकिन ज्यों-ज्यों ढोल और आपके बीच की दूरी बढ़ती जाती है, उनकी आवाज अपेक्षाकृत मधुर होती जाती है, और विश्वसनीय भी।
Fir Aaya Mausam Chunav Ka
- Author Name:
Sunita Shanoo
- Book Type:

- Description: मैं जो हूँ तो हूँ… जब जिंदगी में तकलीफें इस कदर बढ़ जाएँ कि खुशियाँ मुँह चिढ़ाने लग जाएँ, और लगे कि अब बस आँसुओं को निकलने से कोई रोक नहीं सकता, तो खुद को इतना गुदगुदाओ, हँसाओ कि आँसू निकल आएँ और तुम कह सको—अरे यार! ये तो खुशी के आँसू हैं।...मैं भी ऐसा ही कुछ करती हूँ। जब दुःख-परेशानियाँ अपनी हदें पार कर जाती हैं, और क्रांति फिल्म की तरह खुद को कभी उलटा तो कभी सीधा खूँटी पर टँगा पाती हूँ तो आज भी मैं वही गाना गाती हूँ, मेरा चना खा गए गोरे, मारें हमको कोड़े, फिर भी निकला न है दम, चना जोर गरम। मैं जो हूँ, बस ऐसी ही हूँ, और उम्मीद करती हूँ कि मेरा यह व्यंग्य-संग्रह आपको डिस्प्रीन, क्रोसिन से निजात दिलाएगा।
Ghoonghat Ke Pat Khol
- Author Name:
Ashwini Kumar Dubey
- Book Type:

-
Description:
‘घूँघट के पट खोल’ व्यंग्य-रचनाओं का संकलन है जो जीवन तथा समाज के अलग-अलग पहलुओं को विषय बनाकर लिखे गए हैं। हास्य के साथ-साथ विचार के लिए प्रेरित करनेवाले व्यंग्य-निबन्ध मौजूदा समय की वास्तविकताओं को भी एक अलग अन्दाज़ में देखते हैं।
मिसाल के तौर पर पहला ही व्यंग्य प्रेमचन्द के मशहूर पात्रों अलगू चौधरी और जुम्मन शेख को आज के ग्रामीण परिदृश्य में ले आता है, जहाँ आज़ादी के बाद लोकतांत्रिक राजनीति का एक स्थानीय संस्करण पनपा है। इसमें अलगू और जुम्मन की अलग-अलग पार्टियाँ हैं जिनमें एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ चलती रहती है।
नाई की दुकान में ‘विमान अपहरण की योजना’ का हास्य, ‘फ़ाइलें बतर्ज नायिका-भेद’ में सरकारी दफ़्तरों की लाल फीताशाही का व्यंग्यात्मक विश्लेषण, किसी शहरी कान्वेंटी की किशोर द्वारा लिखा गया ‘एक निबन्ध गाँव पर’—ऐसी कई चुटीली रचनाएँ इस पुस्तक में संकलित हैं जो आपको हँसाते-हँसाते सोचने पर मजबूर कर देंगी। इश्क़-मुहब्बत से लेकर संस्कृति, शिक्षा प्रणाली, परीक्षाएँ, साहित्य, सिनेमा तक लगभग हर विषय पर लेखक ने इसमें व्यंग्य-प्रहार किए हैं।
लोककला उत्सवों की विसंगतियों पर ये पंक्तियाँ देखें : ‘जो कलाकार हैं वे अपने उदर-पोषण के लिए सड़क किनारे गिट्टी फोड़ रहे हैं। अफ़सरों से लदी सरकारी जीत उन पर धूल उड़ाती हुई ‘लोक-कला’ खोज रही है।’
Itihas Ka Shav
- Author Name:
Ravindranath Tyagi
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी व्यंग्य के निर्माताओं में परसाई और शरद जोशी के साथ रवीन्द्रनाथ त्यागी का भी नाम एक महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर के रूप में लिया जाता है। केवल हास्य पर निर्भर न रहकर उन्होंने भी व्यंग्य को सामाजिक-राजनीतिक सन्दर्भों में प्रयोग किया। ‘इतिहास का शव’ उनकी चर्चित व्यंग्य कृतियों में से एक है। उसमें संकलित दो दर्जन से ज़्यादा व्यंग्य-लेख, टिप्पणियाँ और निबन्ध उनकी मौलिक शैली और अपने अनूठे अन्दाज़ का नमूना हैं।
सरकारी नौकरी के सर्व स्वीकृत ढर्रे पर टिप्पणी करते हुए व्यंग्य में वे कहते हैं : अपने लम्बे सरकारी जीवन के आधार पर आपको यह सूचना देते हुए हर्ष होता है कि सरकार के ज़्यादातर अधिकारी और शेष कर्मचारी मूर्ख नहीं हैं। वे कम से कम काम करते हैं, और सरकार का जादू यह है कि वह फिर भी चलती रहती है। यही तुर्शी हमारे परिवेश के अन्य घटकों को लक्षित उनके अन्य आलेखों में भी है।
इस पुस्तक में कुछ निबन्ध ऐसे भी हैं जो सिर्फ़ व्यंग्य नहीं हैं, बल्कि हमारा ज्ञानवर्द्धन करनेवाले हैं। मिसाल के तौर पर ‘प्रेमचन्द और प्रसाद : कुछ रोचक प्रसंग’, ‘हिन्दी की कुछ श्रेष्ठ व्यंग्य-कविताएँ’, ‘कश्मीरी और डोगरी के कुछ दिलचस्प लोकगीत’, ‘अपराधी साहित्यकार’ और ‘विश्व के महान राजनेताओं का हास्य-व्यंग्य’ आदि। इन आलेखों में उन्होंने कुछ ऐसी सूचनाओं को उपलब्ध कराया है जिनका ऐतिहासिक महत्त्व भी है।
Rashtriya Naak
- Author Name:
Vishnu Nagar
- Book Type:

-
Description:
विष्णु नागर का व्यंग्य सबसे पहला हमला हमारी आदतों और ‘कंडीशनिंग्स’ पर करता है—वे आदतें जो हमारे ‘सामान्य नागरिक’ होने के अहं का निर्माण और पोषण करती हैं और जिनके आधार पर हमारी सुविधा और हमारा यथास्थितिवाद खड़ा होता है। यह व्यंग्य हमारे मुहावरों को विचलित कर देता है और हम यकायक, विकल होकर देखते हैं कि हमारे दैनिक जीवन की जो चीज़ें हमें तक़रीबन ‘परम’ प्रतीत होती हैं, सवाल उन पर भी उठाया जा सकता है, और सबसे बड़ी बात कि, उन पर हँसा भी जा सकता है।
स्थितियों के भीतर व्यंग्य की इस उपस्थिति को पकड़ने के लिए कई बार विष्णु नागर का व्यंग्यकार कल्पना और अतिरंजना का सहारा भी लेता है, लेकिन यह उनका यथार्थ से हटना या कटना नहीं है, बल्कि यथार्थ की एक सुलभ परत से आगे जाकर उसकी कुछ दुर्लभ और दुरूह छवियों तक पहुँचने की कोशिश करना है, इसीलिए कई बार ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ और ‘भैंस के आगे बीन बजाना’ जैसे मुहावरे भी उनकी व्यंग्य–रचना के प्रस्थान बिन्दु हो सकते हैं जो किसी व्यंग्य का निशाना होने के लिए इतने निरीह, निर्दोष और निष्पक्ष दिखाई देते हैं लेकिन विष्णु नागर उनसे भी अपना लक्ष्य साध लेते हैं।
Neki Kar, Akhbar Main Dal
- Author Name:
Alok Puranik
- Book Type:

-
Description:
तमाम दरियाओं की गन्दगी देखकर पता लगता है कि लोग अब दरियाओं में नेकी तो नहीं डालते। कोई वक़्त रहा होगा, जब नेकी दरिया में डाली जाती थी। कोई वक़्त रहा होगा, जब साधु-सन्त प्रवचन करते थे, अब प्रवचनों की मार्केटिंग होती है। रामकथा की मार्केटिंग होती है। राम की मार्केटिंग होती है। राम के चाकर तुलसीदास ने लिखा था कि बड़ी मुश्किल से खाने का इन्तज़ाम हो पाता है, मस्जिद में सोना पड़ता है। अब राम के चाकर एक मस्जिद छोड़, पचास मस्जिद भर की जगह क़ब्ज़ा कर लें। राम की चाकरी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नौकरी के रिटर्न इधर समान हो गए हैं। राम की चाकरी में लगे सीनियर लोग भी मर्सिडीज में चल रहे हैं और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नौकरी में लगे सीनियर लोग भी मर्सिडीज में चल रहे हैं। राम का कारोबार इधर बहुत रिटर्न वाला हो गया है। ग़ौर से देखने पर पता चलता है कि बाज़ार सिर्फ़ वहाँ नहीं है, जहाँ वह दिखाई पड़ता है। बाज़ार वहाँ भी है, जहाँ वह दिखाई नहीं पड़ता है।
बाज़ार के इस छद्म को पकड़ने की चुनौती ख़ासी जटिल है। यह किताब इस छद्म को समझने में महत्त्वपूर्ण मदद करती है। व्यंग्य के लपेटे से कुछ भी बाहर नहीं है, इस कथन की पुष्टि इस किताब में बार-बार होती है।
Raag Bhopali
- Author Name:
Sharad Joshi
- Book Type:

- Description: सीधा और स्पष्ट अवलोकन, गहरी विश्लेषण-दृष्टि, एक निश्चित और परिभाषित फ़ासले से अपने विषय को देखना, उसका निर्मम विवेचन करना, सटीक और सुस्पष्ट शब्दों का चुनाव और अपने आसपास के जीवन के प्रामाणिक अनुभवों से उपजी विवरणात्मकता—ये कुछ तत्त्व हैं जो शरद जोशी को एक विशिष्ट व्यंग्यकार बनाते हैं। जो वस्तु, व्यक्ति या विषय शरद जोशी की लेखनी के निशाने पर आता है, वह सचमुच कुछ देर के लिए कुछ नहीं रहता। उसकी एक-एक परत, उसकी आभा के एक-एक आवरण को उतारकर वे उसे उसी प्राकृतिक रूप में वापस कर देते हैं जैसा वह सत्ता की विभिन्न भंगिमाओं को ओढ़ने के पहले होता होगा। यह उनके व्यंग्य को दार्शनिक आभा देता है जो हास्य उत्पन्न करने को व्याकुल व्यंग्यकारों के यहाँ नहीं होती। शरद जोशी का व्यंग्य कहीं-कहीं इतना क्रूर, निर्दय और बहुपक्षीय होता है कि लगता है, आस्था को पैर टिकाने के लिए कोई जगह ही नहीं रही। लेकिन मनुष्यता फिर भी है, जो उनके व्यंग्य की रीढ़ है, और जो जीवन की अन्तिम और सबसे ज़्यादा भरोसेमन्द आस्था है। उसी के लिए, और उसी के नज़रिए से वे अपने विषयों की अप्राकृतिकता और हास्यास्पदता को देखते हैं, और उसी के हित में उनका अनावरण भी करते हैं। इस पुस्तक में उनके अपने शहर भोपाल के विषय में लिखे गए आलेखों को समेटा गया है।
Chhichhorebaji Ka Resolution
- Author Name:
Piyush Pandey
- Book Type:

-
Description:
पीयूष पांडे का व्यंग्य-लेखन एकदम नई तरह का इसलिए नहीं है कि ये ख़ुद
नए हैं, बल्कि इसलिए नया है कि इनकी चेतना एकदम आधुनिक है। एकदम छोटे बच्चे भी पर्याप्त बूढ़े हो सकते हैं चेतना के स्तर पर। और एकदम बूढ़े भी बच्चे हो सकते हैं चेतना के स्तर पर। पीयूष पांडे ने व्यंग्य के विषय तलाशे नहीं हैं, विषय उनके आसपास टहल रहे हैं। एसएमएस, फेसबुक, मजनूँ से लेकर पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था तक के विषय उनके व्यंग्य लेखन में हैं। विषयों की तलाश व्यंग्यकारों को परेशान करती है। पर पीयूष पांडे उस परेशानी से जूझते नहीं दिखते। जो भी विषय है, उस पर अपनी दृष्टि से लिखो, व्यंग्य हो जाएगा, वह इस सिद्धान्त पर अमल करते हुए दिखते हैं। पर पीयूष पांडे के व्यंग्य की ख़ास बात यह है कि वह व्यंग्य लेखों का इस्तेमाल सिर्फ़ हँसाने के लिए नहीं करते। इधर, व्यंग्यकारों की बहुत बड़ी फ़ौज इस तरह के सिद्धान्त पर काम कर रही है कि किसी भी गद्य में हँसने के चार-छह मौक़े धर दो, व्यंग्य हो जाएगा। व्यंग्यकारों का एक बड़ा वर्ग इसके उलट यह भी मानता है कि व्यंग्य को हँसने-हँसाने का काम तो करना ही नहीं चाहिए।
पीयूष एक सीधे रास्ते पर चलते हैं। स्थितियों को जैसी हैं, वैसी हैं, उन्हें पेश कर देते हैं। उनमें हँसी का स्कोप है, तो हँस लीजिए। पर बेवजह हँसाने की कोशिश नहीं है। मोबाइल, फेसबुक जैसी आसपास इतनी आधुनिक चीज़ें हैं कि ख़ास तौर पर शिक्षित युवा इनसे मुक्त नहीं रह सकते। कई तरह की स्थितियाँ व्यंग्य बन रही हैं। एक तरह से देखें, तो पीयूष पांडे की यह किताब नए बनते व्यंग्य का आईना है। बदलती परिस्थितियों का आईना है, जो कि व्यंग्य को होना चाहिए। पीयूष ख़ुद मीडिया से जुड़े हुए हैं, इसलिए मीडिया की आन्तरिक परिस्थितियों को बख़ूबी समझते हैं। इस पुस्तक में मीडिया पर कुछ शानदार व्यंग्य लेख हैं। मीडिया कैसी मदारीगिरी में बिजी है, यह बात इस पुस्तक में बार-बार सामने आती है।
वास्तविक दुनिया में वर्चुअल दुनिया यानी आभासी दुनिया किस तरह से प्रवेश करती है, इस पुस्तक में बार-बार दिखाई देता है। कुल मिलाकर कहें, तो यह नए ज़माने के व्यंग्य की किताब है। जो कई तरह के नए मानकों का निर्माण करेगी। व्यंग्य के नए और पुराने छात्रों को इस किताब को पढ़ना चाहिए, ऐसी मेरी रिकमंडेशन है। इसे पढ़ना सब लोग रिजोल्यूशन बनाएँगे, ये मेरी शुभकामना है।
—आलोक पुराणिक
Hashiye Par
- Author Name:
K. D. Singh
- Book Type:

- Description: व्यंग्य का उद्देश्य यह होता है कि आप अपनी ख़ामियों को जान भी लें, और आहत भी महसूस करें। कई बार करुणा भी पैदा करता है। इस पुस्तक में संकलित व्यंग्य-रचनाएँ हल्की चोट मारकर गहरे और दीर्घकालीन प्रभाव को सम्भव करती हैं। शायद इसीलिए व्यंग्यकार ने अधिकांशत: यहाँ ऐसे विषयों को चुना है जो हमारे सामाजिक जीवन में परम्पराओं के रूप में निहित हैं। मसलन धार्मिक कर्मकांड और आज के युग में उनकी धन-केन्द्रीयता। पहले ही व्यंग्य, ‘गंगे तव दर्शनात् मुक्ति’ में गंगा-स्नान और उसके इर्द-गिर्द होनेवाली अन्य धार्मिक क्रियाओं के बहाने होनेवाली लूट को दिलचस्प ढंग से दिखाया गया है। इसी तरह ‘धर्मोपदेश:’, ‘जिन्नबबूता की भारत यात्रा’ और अन्य रचनाओं में प्रशासन, राजनीति, पुलिस-तंत्र आदि को केन्द्र में रखते हुए हमारे सामाजिक व्यवहार की बारीक पड़ताल की गई है। इन व्यंग्य रचनाओं में कहीं कहानी की तरह, तो कहीं सीधी टिप्पणियों और कहीं रूपक के माध्यम से हास्य की रचना की गई है, लेकिन लेखक के सरोकार कहीं भी ओझल नहीं होते। हर साहित्यिक प्रयास का अन्तिम लक्ष्य जीवन जैसा है, उसे उससे बेहतर बनाना होता है, इस पुस्तक में शामिल व्यंग्य भी इस लक्ष्य से नहीं भटकते। एक अंश देखें, “शाम को एकान्त में बैठकर जिवनू ने लिखा—‘प्रान्त का सामाजिक जन-जीवन धर्म और अध्यात्म से परिपूर्ण है।...इस कार्य में युवाओं का योगदान महत्त्वपूर्ण है। देवी-पूजा के नौ दिन अधार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को दंडित करने का प्रचलन है। युवा नागरिकगण मद्य-भाँग-धतूरा आदि के नशे में उन्मत्त होकर अधार्मिक वर्ग की महिलाओं का स्तन-मर्दन करते तथा पुरुषों की माँ -बहन को विभिन्न पशुओं के साथ यौन-क्रियाओं के लिए आमंत्रित करते चला करते हैं।’’
Bholaram Ka Jeev
- Author Name:
Harishankar Parsai
- Rating:
- Book Type:

- Description: परसाई के पास एक ऐसी नैतिक दृष्टि है जो गहरे पर्यवेक्षण, अनुभव, अध्ययन और वैचारिकता से बनी है। यह उन्हें साहसी तथा आत्मविश्वासी बनाती है, जो काइयाँ से काँइयाँपन में होड़ लेनेवाली भी है। हम उनके लेखन में बार-बार पाएँगे कि वे कुतर्कियों को यूँ ही बख्श नहीं देते, उनसे प्रतिस्पर्धा करते हैं और खदेड़ते हुए दूर तक उनके पीछे जाते हैं। परसाई श्रेष्ठ व्यंग्यकार इसलिए हैं कि वे केवल व्यंग्यकार ही नहीं हैं। हर स्थिति में व्यंग्य को नहीं बरतते; जब अनिवार्य होता है, तभी उसका उपयोग करते हैं। इसका सम्बन्ध परसाई के संवेदनशील-विचारधारायुक्त प्रगतिशील व्यक्तित्व से है जो उनके व्यंग्य नए रूपों में नैतिक और कलात्मक बनाता है। जब वे स्वार्थियों, शोषकों, भ्रष्टाचारियों, अहंकारियों, पाखंडियों, नैतिकता का मुखौटा लगाए व्यक्तियों का चित्रण करते हैं तो उनका रूप अलग होता है और सामान्य, शोषित, अभावग्रस्त, प्रतिकूल परिस्थितियों में पिस रहे लोगों का चित्रण करते समय वे एकदम बदल जाते हैं। कुल मिलाकर परसाई की ये रचनाएँ उनके रचना-संसार का दूसरा पक्ष प्रस्तुत करती हैं। इन रचनाओं में मामूली, सामान्य घरों के युवक-युवतियाँ और साहित्य-राजनीति के क्षेत्र के कुछ व्यक्तित्व मानवीयता और आचरण संहिता का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। यह अमानवीयता के नीचे दबी मानवीय सम्भावनाओं का सर्जनात्मक-आग्रहपूर्वक प्रकटीकरण है जो पहले पक्ष का पूरक है और परसाई की रचनाओं के सौन्दर्य-बोध के ढाँचे को समझने में सहायक है।
Angad Ka Paon
- Author Name:
Shrilal Shukla
- Book Type:

- Description: श्रीलाल शुक्ल सामान्य अर्थों में व्यंग्यकार नहीं हैं। उनका व्यंग्य गुदगुदी या हास्य पैदा करनेवाला व्यंग्य नहीं है। उसके पीछे निहित उनका गहन समाजबोध उनकी व्यंग्य रचनाओं को एक रचनात्मक आयाम देता है, ‘राग दरबारी’ जिसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। यह गुण उनकी खुदरा व्यंग्य रचनाओं में भी इतनी ही गम्भीरता से मौजूद है। ‘अंगद का पाँव’ उनके विविध व्यंग्य निबन्धों का संग्रह है जो उनकी सामाजिक संलग्नता, चिन्ता और अपनी दुनिया के प्रति उनके नज़रिए को समग्रतापूर्वक प्रतिबिम्बित करता है। मसलन इसी पुस्तक में शामिल ‘शॉ का भूमिका भाष्य’ में पुस्तक की भूमिका लिखवाने गए एक हिन्दुस्तानी लेखक को शॉ की कही बातें द्रष्टव्य हैं जिनसे आज के लेखकीय जगत में बड़े नामों से भूमिकाएँ लिखवाने के विज्ञापनी रिवाज की कलई खुल जाती है : ‘‘भूमिका इसलिए होती है कि पाठक समझ लें कि लेखक की एक अपनी भूमि भी है। भूमिहीन लेखकों के लिए भूमिका का इसलिए और भी महत्त्व है। इसलिए नाटक के कई अंक काटकर एक भूमिका लिखना नाटककार की बुद्धिमत्ता में शामिल है।’’ ‘‘जो अपने प्रकाशक से प्रस्तावना लिखवाते हैं, वे अपनी पुस्तक के लिए विज्ञापन लिखाने के पैसे तो बचा लेते हैं पर अपनी पुस्तक को रजिस्टर्ड दवाओं के स्तर पर उतार देते हैं।’’ कहने की आवश्यकता नहीं कि जीवन के हर विद्रूप के विषय में उनका व्यंग्य उतना ही यथार्थवादी और साफ़गो है जितना उक्त पंक्तियों में नज़र आता है। ‘अंगद का पाँव’ में शामिल सभी व्यंग्य इसका प्रमाण हैं।
Kavi Ki Manohar Kahaniyan
- Author Name:
Yashwant Vyas
- Book Type:

-
Description:
भाषा का क्या अनूठा खेल है, प्रयोग की क्या मोहक ताजगी!
—विश्वनाथ त्रिपाठी
यशवंत का मास्टर-पीस है। कुछ अंश तो इस क़दर ईर्ष्या पैदा करनेवाले हैं कि काश ये हमने लिखे होते।
—ज्ञान चतुर्वेदी
ये भीतर उतर जानेवाली अद्भुत काव्यकथाएँ हैं। क्या गजब है कि इनका कवि गहन पाखंड को भी विचार की तरह पेलता है।
—सुधीश पचौरी
मोती कितने गहरे जाकर मिलते हैं, यह जानना हो तो हर एक को यह किताब जरूर पढ़ना चाहिए।
—प्रेम जनमेजय
ये हमारी जनरेशन की भाषा है। इसके हैशटैग से पिस्तौल चलती है। असली-नक़ली की लाइन क्लियर, तबीयत साफ़ हो जाती है।
—ट्विटर से
गुनाह इतने शायराना कभी न थे।
—इंस्टाग्राम से
कवि की मनोहर कहानियाँ रिबूट होकर और भी कातिल हो गई हैं।
—खटाक कमेंट बॉक्स से
Bhadrapad Ki Sanjh
- Author Name:
Ravindranath Tyagi
- Book Type:

- Description: रवीन्द्रनाथ त्यागी ने न तो शुद्ध हास्य लिखा, न शुद्ध व्यंग्य और न शुद्ध ललित-निबन्ध। तीनों की मिली-जुली विशेषताओं को लेकर उन्होंने अपने ख़ास रंग को शोख़ व चटख बनाया। उनके लेखन से जो आनन्द मिलता है, वह इधर के बहुत सारे लेखन से नहीं मिलता। जो लेखन एक ‘ज्वॉय’ दे, एक ‘एक्सटेसी’ दे, उसकी अहमियत से इनकार नहीं किया जा सकता। वैसे भी जितना वैविध्य रवीन्द्रनाथ त्यागी में है, उतना उनके समकालीन किसी भी व्यंग्यकार के पास नहीं है। —डॉ. धनंजय वर्मा रवीन्द्रनाथ त्यागी को पढ़ना मुश्किल है क्योंकि बीच-बीच में हँसना पड़ता है। मुझे हँसते देखकर घर के सयाने बच्चे और विद्वान् अनुसन्धित्सु मेरी हँसी उड़ाते हैं और पुस्तक को मेरे हाथ से छीनकर पढ़ने लगते हैं। जब वे भी हँसने लगते हैं तो मैं इस शून्यकाल का फ़ायदा उठाकर पुस्तक फिर पढ़ने लगता हूँ। त्यागी जी की भाषा नटखट, प्रभावशाली व सुखकारी है। मैं उनके साहित्य को व्यंजना-कौशल की बारीकियों की दृष्टि से ‘व्यंग्य’ कहता हूँ। उन्होंने साहित्य का गम्भीर अध्ययन किया है और बुहमुखी सन्दर्भशीलता भी उनके साहित्य में है। ‘व्यंग्य’ का मूलतत्त्व है भाषा में अभिव्यंजना की एक विशेष शक्ति पैदा करना। रवीन्द्रनाथ त्यागी तथा श्रीलाल .शुक्ल के अतिरिक्त किसी और हिन्दी-व्यंग्यकार के पास अध्ययन-गर्भित प्रजातीय संस्कृति की भाषा-संश्लिष्टता और बहुविद्या के साथ-साथ शब्द-मुद्रा में विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न करते हुए कथन-काक के द्वारा व्यंग्य उत्पन्न करने की क्षमता नहीं है। —डॉ. शुकदेव सिंह रवीन्द्रनाथ त्यागी का गद्य मुझे अच्छा ही नहीं, वरन् बहुत अच्छा लगता है। उनके लेखन में व्यंग्य व लालित्य—दोनों हैं। उनके अनुभव का आयाम बहुत विस्तृत है। मैं तो चाहता हूँ कि इसी शैली में वे अपनी आत्मकथा लिखें। —डॉ. कुबेरनाथ राय
Customer Reviews
5 out of 5
Book
15/07/2025
Anuj Kumar Deo
i must say that it is designed to be humorous, at the same time it prompts deeper reflection on serious issues.