Nithalle Bahut Busy Hain
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लोभ-लाभ के गणित में उलझे लोगों के बीच सच को बयान करना आसान नहीं होता, क्योंकि वहाँ सच लोगों के सामने किसी आईने की तरह खड़ा हो जाता है और उन्हें उनकी असल शक्ल दिखाने लगता है। लेकिन एक सजग रचनाकार यही काम करता है। उसके लिए अपने समय की सचाइयों से मुँह मोड़ पाना न तो सम्भव है न उचित। दरअसल एक रचनाकार के रूप में उसकी सफलता ही इससे तय होती है कि वह सच के साथ खड़ा है कि नहीं। जाहिर है व्यक्तिगत दायरों में महदूद, खौफ़ खाए अधिकतर लोगों के विपरीत उसे निडर होना पड़ता है। तभी उसका लिखा हलचल पैदा करता है। सुपरिचित व्यंग्यकार सम्पत सरल की इस किताब से गुज़रते हुए आप इस सचाई से इनकार नहीं कर पाएँगे। वे एक सजग रचनाकार की इस भूमिका को आगे बढ़कर स्वीकार करते हैं। आम बोलचाल की भाषा और भंगिमाओं से अपने इस समय पर सीधा प्रहार करते हैं। इस पुस्तक की भूमिका में विजय बहादुर सिंह ने ठीक ही कहा है—यह कला उनसे पहले हरिशंकर परसाई, शरद जोशी और श्रीलाल शुक्ल जैसे लेखकों में थी पर मंचों पर जाकर अपने पाठकों को श्रोताओं के रूप में सामने बिठाकर आँखों में आँखें डालकर कहने की कला का आविष्कार तो शरद जोशी का है। सम्पत सरल इसी कला के आगे के अध्याय हैं।
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लोभ-लाभ के गणित में उलझे लोगों के बीच सच को बयान करना आसान नहीं होता, क्योंकि वहाँ सच लोगों के सामने किसी आईने की तरह खड़ा हो जाता है और उन्हें उनकी असल शक्ल दिखाने लगता है। लेकिन एक सजग रचनाकार यही काम करता है। उसके लिए अपने समय की सचाइयों से मुँह मोड़ पाना न तो सम्भव है न उचित। दरअसल एक रचनाकार के रूप में उसकी सफलता ही इससे तय होती है कि वह सच के साथ खड़ा है कि नहीं। जाहिर है व्यक्तिगत दायरों में महदूद, खौफ़ खाए अधिकतर लोगों के विपरीत उसे निडर होना पड़ता है। तभी उसका लिखा हलचल पैदा करता है। सुपरिचित व्यंग्यकार सम्पत सरल की इस किताब से गुज़रते हुए आप इस सचाई से इनकार नहीं कर पाएँगे। वे एक सजग रचनाकार की इस भूमिका को आगे बढ़कर स्वीकार करते हैं। आम बोलचाल की भाषा और भंगिमाओं से अपने इस समय पर सीधा प्रहार करते हैं। इस पुस्तक की भूमिका में विजय बहादुर सिंह ने ठीक ही कहा है—यह कला उनसे पहले हरिशंकर परसाई, शरद जोशी और श्रीलाल शुक्ल जैसे लेखकों में थी पर मंचों पर जाकर अपने पाठकों को श्रोताओं के रूप में सामने बिठाकर आँखों में आँखें डालकर कहने की कला का आविष्कार तो शरद जोशी का है। सम्पत सरल इसी कला के आगे के अध्याय हैं।
Book Details
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ISBN9789360862428
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Pages208
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Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: सीधा और स्पष्ट अवलोकन, गहरी विश्लेषण-दृष्टि, एक निश्चित और परिभाषित फ़ासले से अपने विषय को देखना, उसका निर्मम विवेचन करना, सटीक और सुस्पष्ट शब्दों का चुनाव और अपने आसपास के जीवन के प्रामाणिक अनुभवों से उपजी विवरणात्मकता—ये कुछ तत्त्व हैं जो शरद जोशी को एक विशिष्ट व्यंग्यकार बनाते हैं। जो वस्तु, व्यक्ति या विषय शरद जोशी की लेखनी के निशाने पर आता है, वह सचमुच कुछ देर के लिए कुछ नहीं रहता। उसकी एक-एक परत, उसकी आभा के एक-एक आवरण को उतारकर वे उसे उसी प्राकृतिक रूप में वापस कर देते हैं जैसा वह सत्ता की विभिन्न भंगिमाओं को ओढ़ने के पहले होता होगा। यह उनके व्यंग्य को दार्शनिक आभा देता है जो हास्य उत्पन्न करने को व्याकुल व्यंग्यकारों के यहाँ नहीं होती। शरद जोशी का व्यंग्य कहीं-कहीं इतना क्रूर, निर्दय और बहुपक्षीय होता है कि लगता है, आस्था को पैर टिकाने के लिए कोई जगह ही नहीं रही। लेकिन मनुष्यता फिर भी है, जो उनके व्यंग्य की रीढ़ है, और जो जीवन की अन्तिम और सबसे ज़्यादा भरोसेमन्द आस्था है। उसी के लिए, और उसी के नज़रिए से वे अपने विषयों की अप्राकृतिकता और हास्यास्पदता को देखते हैं, और उसी के हित में उनका अनावरण भी करते हैं। इस पुस्तक में उनके अपने शहर भोपाल के विषय में लिखे गए आलेखों को समेटा गया है।
Sarvar Down Hai
- Author Name:
Yash Malviya
- Book Type:

- Description: सृजन हृदय की अकुलाहट व्यक्त करने का माध्यम है। जब कोई संवेदनशील रचनाकार किसी विधा की अभिव्यक्ति के लिए अपर्याप्त पाता है तो वह विधाओं के दर-दर पर भटकता है। जीवन इतना जटिल है कि उसे विश्लेषित करना, समझना और अभिव्यक्त करना किसी भी संवेदनशील रचनाकार के लिए एक चुनौतीपूर्ण रचनाकर्म बना रहता है। शायद यही कारण है कि यश मालवीय भी विधा-दर-विधा भटकते रहते हैं। किसी भी बेचैन रूह के परिन्दे की यही परिणति है। किसी भी पाठक के लिए यह एक चौंकानेवाला अनुभव होता है जब वह यश का अत्यन्त भावप्रवण गीत पढ़ने के बाद अचानक उसके किसी तीखे व्यंग्य लेख से साक्षात्कार करता है। कई बार तो यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि यश मूल रूप से संवेदनशील कवि हैं अथवा व्यग्यंकार। यश के पिता स्वर्गीय उमाकान्त मालवीय इस बेचैनी के शिकार थे मगर वह स्थितियों को उजागर करने के लिए अतीतोन्मुख हो जाते थे। यह बेचैनी एक तरह से यश को विरासत में मिली है। उनका दृष्टिकोण इस दृष्टि से नितान्त भिन्न है, वह वर्तमान से उचककर भविष्य की ओर झाँकने की कोशिश करते हैं। ऐसे रचनाकारों को एक समय में बहुमुखी प्रतिभा के धनी कहा जाता था। समसामयिक ज्वलन्त प्रश्नों पर शरद जोशी बहुत निर्ममता से प्रहार करते थे, उनके बाद यह प्रवृत्ति यश में देखी जा सकती है। वह विडम्बनापूर्ण परिस्थितियों का अन्तःपरीक्षण करके यथार्थ से मुठभेड़ करते हैं। शरद जोशी की ही तरह यश के व्यंग्य लेख भी पत्र-पत्रिकाओं के अलावा दैनिक पत्रों के पृष्ठों पर बिखरे पड़े हैं। शरद जोशी के व्यंग्य लेखों के संकलन का कार्य आज तक जारी है! यह एक सुखद आश्चर्य है कि यश यह काम स्वयं कर रहे हैं, और इसी क्रम में उनका यह संकलन व्यंग्य लेखन की समृद्ध परम्परा में एक मील का पत्थर साबित होता है।
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