🇮🇳 India’s home-grown full-stack ecosystem for Publishers, Authors, Writers, and Readers. 🎊🎊 Celebrate Your Language, Authors from Your Own Land, with Rachnaye!!! 🎊🎊 Enjoy 🎧 Audiobooks at Rachnaye, download the Rachnaye App from Play Store or App Store

Nithalle Bahut Busy Hain

In category

Satire

Language

Hindi

Ships within 48 Hours

Free Shipping in India on orders above Rs. 1100


About the book

लोभ-लाभ के गणित में उलझे लोगों के बीच सच को बयान करना आसान नहीं होता, क्योंकि वहाँ सच लोगों के सामने किसी आईने की तरह खड़ा हो जाता है और उन्हें उनकी असल शक्ल दिखाने लगता है। लेकिन एक सजग रचनाकार यही काम करता है। उसके लिए अपने समय की सचाइयों से मुँह मोड़ पाना न तो सम्भव है न उचित। दरअसल एक रचनाकार के रूप में उसकी सफलता ही इससे तय होती है कि वह सच के साथ खड़ा है कि नहीं। जाहिर है व्यक्तिगत दायरों में महदूद, खौफ़ खाए अधिकतर लोगों के विपरीत उसे निडर होना पड़ता है। तभी उसका लिखा हलचल पैदा करता है। सुपरिचित व्यंग्यकार सम्पत सरल की इस किताब से गुज़रते हुए आप इस सचाई से इनकार नहीं कर पाएँगे। वे एक सजग रचनाकार की इस भूमिका को आगे बढ़कर स्वीकार करते हैं। आम बोलचाल की भाषा और भंगिमाओं से अपने इस समय पर सीधा प्रहार करते हैं। इस पुस्तक की भूमिका में विजय बहादुर सिंह ने ठीक ही कहा है—यह कला उनसे पहले हरिशंकर परसाई, शरद जोशी और श्रीलाल शुक्ल जैसे लेखकों में थी पर मंचों पर जाकर अपने पाठकों को श्रोताओं के रूप में सामने बिठाकर आँखों में आँखें डालकर कहने की कला का आविष्कार तो शरद जोशी का है। सम्पत सरल इसी कला के आगे के अध्याय हैं।

Read more

₹ 299

₹ 239.2 20% off

Unavailable

Rachnaye membership

Pick a membership and see exactly what it gets you

  • 15 Free Deliveries
  • 1 Free Book up to ₹500 MRP

Format

This Book is out of stock
Frequently bought together
Nithalle Bahut Busy Hain This book ₹239
Ek Manzila Makan Mein Lift Sampat Saral ₹250
Buddhiprakash Sampat Saral ₹299
3 books selected ₹848 ₹788
This Book is out of stock

100% Original

Fast Dispatch

Secure Payment

About the Book

लोभ-लाभ के गणित में उलझे लोगों के बीच सच को बयान करना आसान नहीं होता, क्योंकि वहाँ सच लोगों के सामने किसी आईने की तरह खड़ा हो जाता है और उन्हें उनकी असल शक्ल दिखाने लगता है। लेकिन एक सजग रचनाकार यही काम करता है। उसके लिए अपने समय की सचाइयों से मुँह मोड़ पाना न तो सम्भव है न उचित। दरअसल एक रचनाकार के रूप में उसकी सफलता ही इससे तय होती है कि वह सच के साथ खड़ा है कि नहीं। जाहिर है व्यक्तिगत दायरों में महदूद, खौफ़ खाए अधिकतर लोगों के विपरीत उसे निडर होना पड़ता है। तभी उसका लिखा हलचल पैदा करता है। सुपरिचित व्यंग्यकार सम्पत सरल की इस किताब से गुज़रते हुए आप इस सचाई से इनकार नहीं कर पाएँगे। वे एक सजग रचनाकार की इस भूमिका को आगे बढ़कर स्वीकार करते हैं। आम बोलचाल की भाषा और भंगिमाओं से अपने इस समय पर सीधा प्रहार करते हैं। इस पुस्तक की भूमिका में विजय बहादुर सिंह ने ठीक ही कहा है—यह कला उनसे पहले हरिशंकर परसाई, शरद जोशी और श्रीलाल शुक्ल जैसे लेखकों में थी पर मंचों पर जाकर अपने पाठकों को श्रोताओं के रूप में सामने बिठाकर आँखों में आँखें डालकर कहने की कला का आविष्कार तो शरद जोशी का है। सम्पत सरल इसी कला के आगे के अध्याय हैं।

Book details

Fast dispatchShips within 48 hours
Secure paymentOnline, or cash on delivery on eligible orders
100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
2nd
Publication year
2024
Weight
190 grams
ISBN-13
9789360862428
Pages
208
Reading time
~7 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
13 × 20 cm
Language
Hindi

Recommended for you

Customer reviews

Be the first to write a review

Read this one? Tell other readers what you thought about the story, the translation and the print.

Offers

Loading offers…

whatsapp