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अनूप मणि त्रिपाठी की व्यंग्य रचनाओं को पढ़ने के पहले मुझे लगता था कि हर व्यंग्य का स्वाद एक जैसा होता है। उनके इस संग्रह को आद्योपांत पढ़ने के बाद समझ में आया कि खुद उनकी हर रचना का स्वाद अलग है। राजनीति के विद्रूप, निष्ठुरता और नंगई को जिस तरह गले से पकड़कर वे अनावृत करते और उस पर चोट करते हैं वह अद्वितीय है। उनका व्यंग्य औरों से इस मामले में अलग और मूल्यवान है कि वह पाठक की समझ पर लानत ही नहीं भेजता, उसे समझदार भी बनाता है। जनता का ध्यान कैसे असली और ज्वलन्त मुद्दों से भटकाकर नकली और काल्पनिक मुद्दों में उलझाया जाता है इसके एक से एक नमूने आपको कदम कदम पर मिलते हैं। 'बहती लाशों की कहानियाँ' पढ़कर लगता है व्यंग्य नहीं पढ़ रहे, कोई हॉरर फिल्म देख रहे हैं। भाषा की विदग्धता का उदाहरण देने से इसलिए बच रहा हूँ कि आख़िर कितने उदाहरण देंगे। फिर भी बानगी के लिए एक उदाहरण दे रहा हूँ। शीर्षक है—‘साँपों की सभा’। ‘वह धारा प्रवाह बोलता रहा, ‘बस हमें सपने और भय दोनों साथ-साथ दिखाने होंगे! अच्छे-अच्छे शब्दों के चयन पर ध्यान केन्द्रित करना होगा!’ उसने चूहे की डेड बॉडी पर एक नजर मारी। फिर बोला, ‘देखिए! कैसे हमारे रंग में यह रँगने के लिए तैयार हो गया!’ वह आगे बोला, ‘जहर भरिए, खूब भरिए, मगर उपदेश की शक्ल में...आप देखेंगे कि उपदेश स्वतः उन्माद में बदलता जाएगा...बस फैलकर हर जगह हमें अपना काम लगातार करते रहना है। क्या समझे!’ एक बूढ़ा साँप जोश में बोला, ‘समझ गए! हमें लोकतंत्र को लोकतांत्रिक ढंग से खत्म करना है...’ दरअसल इन रचनाओं की शैलीगत व्याप्ति इतनी अधिक है कि इन्हें केवल व्यंग्य के खाँचे में रखना इनकी मारक क्षमता को कम करके आँकना होगा। यह कोई और विधा है जिसकी तिलमिलाहट अन्दर तक कँपकँपी पैदा कर देती है और जिसे उपयुक्त नाम दिया जाना अभी बाकी है। हाँ, जब तक इसका उपयुक्त नामकरण न हो जाए तब तक व्यंग्य से काम चलाना पड़ेगा। इन रचनाओं से गुजरने के बाद मेरा मानना है कि अनूप मणि त्रिपाठी आज की मारक व्यंग्य विधा के सर्वाधिक सशक्त हस्ताक्षर हैं। —शिवमूर्ति
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अनूप मणि त्रिपाठी की व्यंग्य रचनाओं को पढ़ने के पहले मुझे लगता था कि हर व्यंग्य का स्वाद एक जैसा होता है। उनके इस संग्रह को आद्योपांत पढ़ने के बाद समझ में आया कि खुद उनकी हर रचना का स्वाद अलग है। राजनीति के विद्रूप, निष्ठुरता और नंगई को जिस तरह गले से पकड़कर वे अनावृत करते और उस पर चोट करते हैं वह अद्वितीय है। उनका व्यंग्य औरों से इस मामले में अलग और मूल्यवान है कि वह पाठक की समझ पर लानत ही नहीं भेजता, उसे समझदार भी बनाता है। जनता का ध्यान कैसे असली और ज्वलन्त मुद्दों से भटकाकर नकली और काल्पनिक मुद्दों में उलझाया जाता है इसके एक से एक नमूने आपको कदम कदम पर मिलते हैं। 'बहती लाशों की कहानियाँ' पढ़कर लगता है व्यंग्य नहीं पढ़ रहे, कोई हॉरर फिल्म देख रहे हैं। भाषा की विदग्धता का उदाहरण देने से इसलिए बच रहा हूँ कि आख़िर कितने उदाहरण देंगे। फिर भी बानगी के लिए एक उदाहरण दे रहा हूँ। शीर्षक है—‘साँपों की सभा’।
‘वह धारा प्रवाह बोलता रहा, ‘बस हमें सपने और भय दोनों साथ-साथ दिखाने होंगे! अच्छे-अच्छे शब्दों के चयन पर ध्यान केन्द्रित करना होगा!’ उसने चूहे की डेड बॉडी पर एक नजर मारी। फिर बोला, ‘देखिए! कैसे हमारे रंग में यह रँगने के लिए तैयार हो गया!’ वह आगे बोला, ‘जहर भरिए, खूब भरिए, मगर उपदेश की शक्ल में...आप देखेंगे कि उपदेश स्वतः उन्माद में बदलता जाएगा...बस फैलकर हर जगह हमें अपना काम लगातार करते रहना है। क्या समझे!’ एक बूढ़ा साँप जोश में बोला, ‘समझ गए! हमें लोकतंत्र को लोकतांत्रिक ढंग से खत्म करना है...’
दरअसल इन रचनाओं की शैलीगत व्याप्ति इतनी अधिक है कि इन्हें केवल व्यंग्य के खाँचे में रखना इनकी मारक क्षमता को कम करके आँकना होगा। यह कोई और विधा है जिसकी तिलमिलाहट अन्दर तक कँपकँपी पैदा कर देती है और जिसे उपयुक्त नाम दिया जाना अभी बाकी है। हाँ, जब तक इसका उपयुक्त नामकरण न हो जाए तब तक व्यंग्य से काम चलाना पड़ेगा। इन रचनाओं से गुजरने के बाद मेरा मानना है कि अनूप मणि त्रिपाठी आज की मारक व्यंग्य विधा के सर्वाधिक सशक्त हस्ताक्षर हैं।
—शिवमूर्ति
Book Details
-
ISBN9789348229281
-
Pages152
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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व्यंग्य इन लेखों का दुधारा है। नेताओं के साथ-साथ ‘किर्रुओं’ पर भी उसकी धार है। ‘किर्रू’ यानी जो नेताओं को कोसते भी रहते हैं और जीते भी रहते हैं उन्हीं के आसरे। दरअसल यहीं ‘म. श्या. जो.’ के व्यंग्य से बचाव मुश्किल है, क्योंकि तिलमिला उठता है हमारे ही भीतर बैठा कोई किर्रू! निश्चय ही ‘हिन्दुस्तान’ के नेताओं और ‘किर्रुओं’ पर किए गए ये व्यंग्य हिन्दी के ‘कामचलाऊ’ स्वरूप, राष्ट्रीय चरित्र और जातीय स्वभाव का बेहतरीन ख़ुलासा करते हैं।
Aao Baith Len Kuchh Der
- Author Name:
Shrilal Shukla
- Book Type:

- Description: आओ बैठ लें कुछ देर’ प्रसिद्ध कथाकार और चिन्तक श्रीलाल शुक्ल की सीधी-सादी किन्तु व्यंग्यात्मक शैली में 1992-93 के दौरान ‘नवभारत टाइम्स’ में लिखे गए चुनिन्दा स्तम्भ लेखों का संकलन है। श्री शुक्ल के इन लेखों में राजनीति, समाज, भाषा, साहित्य, रंगमंच, पत्रकारिता, फ़िल्म आदि विषयों पर समग्रता से विचार करने की एक निजी पद्धति देखने को मिलती है। दरअसल ये टिप्पणियाँ एक ख़ास मिज़ाज और ख़ास शैली में लिखी गई हैं, जिनकी प्रासंगिकता पर कभी धूल की परत नहीं जम सकती। कुछ टिप्पणियाँ घटना या समाचार-विशेष से प्रेरित होने के बावजूद अपना व्यापक प्रभाव छोड़ जाती हैं। दरअसल प्रस्तुत पुस्तक की टिप्पणियों से गुज़रना एक अर्थवान अनुभव लगता है इसलिए नहीं कि इस प्रक्रिया में हम सिर्फ़ वर्तमान का स्पर्श कर रहे होते हैं, बल्कि इसलिए कि यह हमें बहुत कुछ सोचने पर विवश करती है। इन टिप्पणियों में ऐसी अन्तर्दृष्टि है, सूझ-भरी समझ है, जिससे वर्तमान को हम और अधिक प्रामाणिकता से जान पाते हैं। इन लेखों में यूँ तो व्यंग्य और विनोद का रंग भी मिलता है, लेकिन वे जिन स्थितियों, धारणाओं या विचारों से जुड़े हैं, वे सम्भवतः आज भी हमारी चिन्तन-प्रक्रिया को सक्रिय बना सकते हैं।
Jeep Par Sawar Illiyan
- Author Name:
Sharad Joshi
- Book Type:

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Description:
‘जीप पर सवार इल्लियाँ’ एक ऐसा ‘व्यंग्य-संग्रह’ है जिसकी प्रत्येक रचना में शरद जोशी की पैनी दृष्टि किसी न किसी विसंगति का मार्मिक उद्घाटन करती है और रेखांकित करती है कि शरद जोशी की व्यंग्य-दृष्टि का कहीं कोई जोड़ नहीं है।
वस्तुतः संग्रह की रचनाएँ यह बताने के लिए काफ़ी हैं कि शरद जोशी सतत जागरूक व्यंग्यकार की भूमिका में इसलिए चर्चित हुए कि उनकी नज़र अपने परिवेश पर ही नहीं, अपितु जीवन और समाज की हर छोटी-से-छोटी घटना पर टिकी रहती थी जिसके कारण इस संग्रह की रचनाओं में धर्म, राजनीति, सामाजिक जीवन, व्यक्तिगत आचरण और ऐसा ही बहुत कुछ समाया हुआ है—चकित करता हुआ, चौंकाता हुआ, चुटकी काटता हुआ या गुदगुदाता हुआ।
कम शब्दों में कहें तो शरद जोशी की यह कृति ‘जीप पर सवार इल्लियाँ’ व्यंग्य-विधा की कठिन चुनौतियों को पूरा करती है और व्यंग्य के निकष पर खरा उतरती है। उनके व्यंग्य भ्रष्ट नेताओं की कलई खोलनेवाले तो हैं ही, सामाजिक जीवन और लोकतंत्र की रखवाली भी करते हैं और उनकी व्यंग्य-दृष्टि इतनी पैनी है कि कोई भी विसंगति उससे बिंधे बिना नहीं रह पाती।
Pratinidhi Vyang : Harishankar Parsai
- Author Name:
Harishankar Parsai
- Book Type:

- Description: हरिशंकर परसाई हिन्दी के पहले रचनाकार हैं, जिन्होंने व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाया और उसे हल्के-फुल्के मनोरंजन की परम्परागत परिधि से उबारकर समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा है। उनकी व्यंग्य रचनाएँ हमारे मन में गुदगुदी पैदा नहीं करतीं, बल्कि हमें उन सामाजिक वास्तविकताओं के आमने-सामने खड़ा करती हैं, जिनसे किसी भी व्यक्ति का अलग रह पाना लगभग असम्भव है। लगातार खोखली होती जा रही हमारी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में पिसते मध्यवर्गीय मन की सच्चाइयों को उन्होंने बहुत ही निकटता से पकड़ा है। सामाजिक पाखंड और रूढ़िवादी जीवन-मूल्यों की खिल्ली उड़ाते हुए उन्होंने सदैव विवेक और विज्ञान-सम्मत दृष्टि को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी भाषा-शैली में खास किस्म का अपनापा है, जिससे पाठक यह महसूस करता है कि लेखक उसके सिर पर नहीं, सामने ही बैठा है।
Rag Darbari
- Author Name:
Shrilal Shukla
- Rating:
- Book Type:

- Description: ‘राग दरबारी’ एक ऐसा उपन्यास है जो गाँव की कथा के माध्यम से आधुनिक भारतीय जीवन की मूल्यहीनता को सहजता और निर्ममता से अनावृत्त करता है। शुरू से आख़िर तक इतने निस्संग और सोद्देश्य व्यंग्य के साथ लिखा गया हिन्दी का शायद यह पहला बृहत् उपन्यास है। फिर भी ‘राग दरबारी’ व्यंग्य-कथा नहीं है। इसका सम्बन्ध एक बड़े नगर से कुछ दूर बसे हुए गाँव की ज़िन्दगी से है, जो इतने वर्षों की प्रगति और विकास के नारों के बावजूद निहित स्वार्थों और अनेक अवांछनीय तत्त्वों के सामने घिसट रही है। यह उसी ज़िन्दगी का दस्तावेज़ है। 1968 में ‘राग दरबारी’ का प्रकाशन एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक घटना थी। 1971 में इसे ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया और 1986 में एक दूरदर्शन-धारावाहिक के रूप में इसे लाखों दर्शकों की सराहना प्राप्त हुई। वस्तुतः ‘राग दरबारी’ हिन्दी के कुछ कालजयी उपन्यासों में से एक है।
Itihas Ka Shav
- Author Name:
Ravindranath Tyagi
- Book Type:

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Description:
हिन्दी व्यंग्य के निर्माताओं में परसाई और शरद जोशी के साथ रवीन्द्रनाथ त्यागी का भी नाम एक महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर के रूप में लिया जाता है। केवल हास्य पर निर्भर न रहकर उन्होंने भी व्यंग्य को सामाजिक-राजनीतिक सन्दर्भों में प्रयोग किया। ‘इतिहास का शव’ उनकी चर्चित व्यंग्य कृतियों में से एक है। उसमें संकलित दो दर्जन से ज़्यादा व्यंग्य-लेख, टिप्पणियाँ और निबन्ध उनकी मौलिक शैली और अपने अनूठे अन्दाज़ का नमूना हैं।
सरकारी नौकरी के सर्व स्वीकृत ढर्रे पर टिप्पणी करते हुए व्यंग्य में वे कहते हैं : अपने लम्बे सरकारी जीवन के आधार पर आपको यह सूचना देते हुए हर्ष होता है कि सरकार के ज़्यादातर अधिकारी और शेष कर्मचारी मूर्ख नहीं हैं। वे कम से कम काम करते हैं, और सरकार का जादू यह है कि वह फिर भी चलती रहती है। यही तुर्शी हमारे परिवेश के अन्य घटकों को लक्षित उनके अन्य आलेखों में भी है।
इस पुस्तक में कुछ निबन्ध ऐसे भी हैं जो सिर्फ़ व्यंग्य नहीं हैं, बल्कि हमारा ज्ञानवर्द्धन करनेवाले हैं। मिसाल के तौर पर ‘प्रेमचन्द और प्रसाद : कुछ रोचक प्रसंग’, ‘हिन्दी की कुछ श्रेष्ठ व्यंग्य-कविताएँ’, ‘कश्मीरी और डोगरी के कुछ दिलचस्प लोकगीत’, ‘अपराधी साहित्यकार’ और ‘विश्व के महान राजनेताओं का हास्य-व्यंग्य’ आदि। इन आलेखों में उन्होंने कुछ ऐसी सूचनाओं को उपलब्ध कराया है जिनका ऐतिहासिक महत्त्व भी है।
Nithalle Bahut Busy Hain
- Author Name:
Sampat Saral
- Book Type:

- Description: लोभ-लाभ के गणित में उलझे लोगों के बीच सच को बयान करना आसान नहीं होता, क्योंकि वहाँ सच लोगों के सामने किसी आईने की तरह खड़ा हो जाता है और उन्हें उनकी असल शक्ल दिखाने लगता है। लेकिन एक सजग रचनाकार यही काम करता है। उसके लिए अपने समय की सचाइयों से मुँह मोड़ पाना न तो सम्भव है न उचित। दरअसल एक रचनाकार के रूप में उसकी सफलता ही इससे तय होती है कि वह सच के साथ खड़ा है कि नहीं। जाहिर है व्यक्तिगत दायरों में महदूद, खौफ़ खाए अधिकतर लोगों के विपरीत उसे निडर होना पड़ता है। तभी उसका लिखा हलचल पैदा करता है। सुपरिचित व्यंग्यकार सम्पत सरल की इस किताब से गुज़रते हुए आप इस सचाई से इनकार नहीं कर पाएँगे। वे एक सजग रचनाकार की इस भूमिका को आगे बढ़कर स्वीकार करते हैं। आम बोलचाल की भाषा और भंगिमाओं से अपने इस समय पर सीधा प्रहार करते हैं। इस पुस्तक की भूमिका में विजय बहादुर सिंह ने ठीक ही कहा है—यह कला उनसे पहले हरिशंकर परसाई, शरद जोशी और श्रीलाल शुक्ल जैसे लेखकों में थी पर मंचों पर जाकर अपने पाठकों को श्रोताओं के रूप में सामने बिठाकर आँखों में आँखें डालकर कहने की कला का आविष्कार तो शरद जोशी का है। सम्पत सरल इसी कला के आगे के अध्याय हैं।
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