Khattar Kakak Tarang
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खट्टर कका आई सँ पछस्तर साल पहिने ‘प्रकट’ भेलाह। केना? इ रहस्य बाद मे, मुदा भाङक भांगक तरंग मे एहन-एहन गूढ़ अर्थक फुलझड़ी छोड़ल जा सकैत अछि, इ प्रतिभा खट्टर कका कें छोड़ि कऽ ककरो लग नहि अछि। ओ कखनो सोमरस कें भाङ सिद्ध क दैत छैथ, तऽ आयुर्वेद कें महाकाव्य। कखनो अपन तर्क सँ भगवान कें मौसा बना लैत छैथ, तऽ कखनो समधि। ओ पातिव्रत्य कें व्यभिचार साबित कऽ सकैत छैथ, तऽ असती कें सती। हुनकर नजर मे कामदेव सृष्टि कें कर्ता छैथ। जेना कबीरदासक उनटे वाणी कहल जायत अछि, तहिना खट्टर कका उनटे गंङ्गा बहबैत छैथ। तरंग मे कहल हुनकर गप्पक जवाब प्रकांड पंडितो कें नहि फुरैत छहिन। हुनकर किछु तरंग देखू—ब्रह्मचारी कें वेद नहि पढ़बाक चाही, पुराण बहु-बेटी कें योग्य नहि अछि, दुर्गाक कथा स्त्रैण रचनै छैथ, गीता मे श्रीकृष्ण अर्जुन कें फुसला लेलथिन, दर्शनशास्त्रक रचना रस्सी देखि क भेल अछि, असली ब्राह्मण विदेश मे रहैत छैथ, मूर्खताक कारण पंडितगण छैथ, दही-चूड़ा-चीनी सांख्यक त्रिगुण अछि, स्वर्ग गेला पर धर्म भ्रष्ट भ जायत आदि। इ जनैत कि हुनकर तरंग कर्मकाडी कें लाल-पीअर करैत अछि, खट्टर कका मस्त रहैत छैथ, भांग घोंटैत रहैत छैथ, आ आनन्द-विनोदक वर्षा करैत रहैत छैथ। जेना शुरू मे कहल गेल कि खट्टर कका प्रकट भेलाह, तऽ ओ प्रकट होयते प्रसिद्ध भ गेलाह। मैथिलिए मे नहि, हिन्दी, गुजराती आदि भाषा मे सेहो पढ़ल गेलाह। ‘कहानी’, ‘धर्मयुग’ जकाँ पत्रिका खट्टर ककाक किछु तरंग छपलक। हुनकर लोकप्रियता एहन छलैन्हि कि हुनकर परिचय-पात, घर-द्वार जनैत लेल चिट्ठी आबऽ लागल। खट्टर कका हँसी-हँसी मे जरूर तरंग छोड़ैत छैथ, मुदा ओकरा ओ अपन तर्क सँ प्रमाणित सेहो क दैत छथिन। वेद, उपनिषद, पुराण सब पर हुनकर पकड़ छैन। तर्कक जाल एहन बुनताह कि पाठकगण सोच मे पड़ि जेताह। हुनकर चश्मा सँ देखब, त इ दुनिया मे सब उनिटा नजर आयत। मुदा, हुनकर बातक रस आ विनोद पाठकगण कें सब उलझन सुलझा दैतेन, इ भरोसा अछि।
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खट्टर कका आई सँ पछस्तर साल पहिने ‘प्रकट’ भेलाह। केना? इ रहस्य बाद मे, मुदा भाङक भांगक तरंग मे एहन-एहन गूढ़ अर्थक फुलझड़ी छोड़ल जा सकैत अछि, इ प्रतिभा खट्टर कका कें छोड़ि कऽ ककरो लग नहि अछि। ओ कखनो सोमरस कें भाङ सिद्ध क दैत छैथ, तऽ आयुर्वेद कें महाकाव्य। कखनो अपन तर्क सँ भगवान कें मौसा बना लैत छैथ, तऽ कखनो समधि। ओ पातिव्रत्य कें व्यभिचार साबित कऽ सकैत छैथ, तऽ असती कें सती। हुनकर नजर मे कामदेव सृष्टि कें कर्ता छैथ। जेना कबीरदासक उनटे वाणी कहल जायत अछि, तहिना खट्टर कका उनटे गंङ्गा बहबैत छैथ। तरंग मे कहल हुनकर गप्पक जवाब प्रकांड पंडितो कें नहि फुरैत छहिन। हुनकर किछु तरंग देखू—ब्रह्मचारी कें वेद नहि पढ़बाक चाही, पुराण बहु-बेटी कें योग्य नहि अछि, दुर्गाक कथा स्त्रैण रचनै छैथ, गीता मे श्रीकृष्ण अर्जुन कें फुसला लेलथिन, दर्शनशास्त्रक रचना रस्सी देखि क भेल अछि, असली ब्राह्मण विदेश मे रहैत छैथ, मूर्खताक कारण पंडितगण छैथ, दही-चूड़ा-चीनी सांख्यक त्रिगुण अछि, स्वर्ग गेला पर धर्म भ्रष्ट भ जायत आदि। इ जनैत कि हुनकर तरंग कर्मकाडी कें लाल-पीअर करैत अछि, खट्टर कका मस्त रहैत छैथ, भांग घोंटैत रहैत छैथ, आ आनन्द-विनोदक वर्षा करैत रहैत छैथ। जेना शुरू मे कहल गेल कि खट्टर कका प्रकट भेलाह, तऽ ओ प्रकट होयते प्रसिद्ध भ गेलाह। मैथिलिए मे नहि, हिन्दी, गुजराती आदि भाषा मे सेहो पढ़ल गेलाह। ‘कहानी’, ‘धर्मयुग’ जकाँ पत्रिका खट्टर ककाक किछु तरंग छपलक। हुनकर लोकप्रियता एहन छलैन्हि कि हुनकर परिचय-पात, घर-द्वार जनैत लेल चिट्ठी आबऽ लागल। खट्टर कका हँसी-हँसी मे जरूर तरंग छोड़ैत छैथ, मुदा ओकरा ओ अपन तर्क सँ प्रमाणित सेहो क दैत छथिन। वेद, उपनिषद, पुराण सब पर हुनकर पकड़ छैन। तर्कक जाल एहन बुनताह कि पाठकगण सोच मे पड़ि जेताह। हुनकर चश्मा सँ देखब, त इ दुनिया मे सब उनिटा नजर आयत। मुदा, हुनकर बातक रस आ विनोद पाठकगण कें सब उलझन सुलझा दैतेन, इ भरोसा अछि।
Book Details
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ISBN9788119028207
-
Pages224
-
Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: सम्पत सरल को ज़्यादातर लोग मंच से जानते हैं जहाँ वे पिछले कई वर्षों से उल्लेखनीय निडरता के साथ न सिर्फ़ समाज, बल्कि सरकार को भी आईना दिखाते रहे हैं। ‘बुद्धिप्रकाश’ उनके व्यंग्य निबन्धों की पुस्तक है; और इन्हें पढ़कर कोई भी कहेगा कि जिस धारदार, सधे और सुँते हुए व्यंग्य की कमी हिन्दी में काफ़ी समय से खल रही थी, वह अब हमारे सामने है। हमारे आसपास ऐसी बहुत कम चीज़ें रह गई होंगी, जिन्हें व्यंग्य का विषय बनाते हुए किसी को कोई संकोच हो; जीवन का, सामाजिक व्यवस्था का अधिकांश अपने विरोधाभासों के चलते स्वयं ही व्यंग्य है। लेकिन चीज़ों के बाह्य आडम्बरों, शक्ति और सामर्थ्य की अभेद्य भंगिमाओं और रंध्रहीन व्यवस्था को बेधकर उनके भीतर के व्यंग्य को पकड़ना—इसके लिए एक निगाह चाहिए, जो सम्पत सरल के पास है; और उसे बिना किसी लाग-लपेट के साफ़-साफ़ उकेर देनेवाली भाषा भी। इस संकलन में शामिल निबन्धों को पढ़ते हुए जो चीज़ सबसे पहले महसूस होती है वह यही कि वे अपनी एक भी पंक्ति को व्यर्थ नहीं जाने देते; हर वाक्य सही निशाने पर जाकर लगता है; और हर बात अपने अनूठेपन में हमें नई लगती है। हास्य उनके व्यंग्य के साथ स्वयं चला आता है, अनायास, एक साथ कई दिशाओं में मार करता हुआ, जैसे कि उन्होंने अपने इस समय को सांगोपांग समझ लिया हो। यह पुस्तक आपको बार-बार अपने पास बुलाएगी।
Ishwar Ki Kahaniyan
- Author Name:
Vishnu Nagar
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Description:
नई शैली में नई बात कहने के लिए ईश्वर की कहानियाँ साहित्य की दुनिया में चर्चित हैं। लेकिन इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ये कहानियाँ जहाँ भी छपी हैं, इन्हें पाठकों ने पसन्द किया है। इन पाठकों में बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी शामिल हैं। अपने ही ढंग की इन छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से हर पाठक अपने आसपास बिखरे यथार्थ के व्यंग्य को समझ सकता है। ये पाठक की कल्पनाशीलता को भी उर्वर करती हैं और वह अपने भीतर छिपी ऐसी तमाम कहानियों को ख़ुद गढ़ना शुरू कर देता है।
पाठक की कल्पना को इस तरह जाग्रत् करनेवाली रचनाएँ दुर्भाग्य से हमारे साहित्य में अधिक नहीं हैं। ईश्वर तो दरअसल यथार्थ को खोलने-उधेड़ने-जाँचने का बहाना है। लेकिन इस बहाने के बग़ैर यथार्थ के अनेक पक्ष प्रभावशाली ढंग से उद्घाटित भी नहीं हो पाते। पहली बार इस पुस्तक में अभी तक प्रकाशित ईश्वर की सभी कहानियाँ एक साथ संकलित हैं।
Paavati Kaun Dega
- Author Name:
Priy
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- Description: प्रिय का सधा हुआ चमकदार गद्य उनके व्यंग्य को वह ज़रूरी धार मुहैया कराता है जिसकी अनुपस्थिति में इस तरह के लेखन के सामने दोहराव का जोखिम बना रहता है। उनके लेखन में जीवन से सीधी मुठभेड़ करते आमजन के लिए स्पष्ट प्रतिबद्वता तो नज़र आती ही है, उनके अध्ययन के विस्तृत और दिलचस्प दायरे की झलक भी मिलती है। वे बड़ी आसानी से भाषा और शैलियों के अलग-अलग रास्तों में आवाजाही करना जानते हैं और उनकी चपल और संवेदनशील दृष्टि चीज़ों के आरपार देखने का हौसला रखती है। प्रिय का यह पहला संग्रह समकालीन साहित्य में उनकी मजबूत उपस्थिति को दर्ज करेगा। -अशोक पाण्डे प्रिय हिन्दी व्यंग्य की उम्मीद हैं। उनके लेखन में राजनीतिक जुमलों से भरमाने वाली अभिव्यक्ति नहीं बल्कि उससे आगे निकलता सहज परिहास है। बीते अनेक दशकों से व्यंग्य के नाम पर बौद्विक कुण्ठा परोसी जा रही थी। कभी-कभी कुण्ठा के ऐसे ही प्रस्तुतिकरण को राजनीतिक चेतना भी कह दिया जाता रहा है। प्रिय की लिखत में सिर्फ राजनीति नहीं, हमारे आसपास का आम परिवेश है। प्रिय, तुम ‘पारसाई’ से बचते हुए हमाम की हलचल बताते रहो।
Urdu Ki Aakhiree Kitab
- Author Name:
Ibne Insha
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Description:
उर्दू में तेज़ निगारी (व्यंग्य) के जो बेहतरीन उदाहरण मौजूद हैं, उनमें इब्ने इंशा का अन्दाज़ सबसे अलहदा और प्रभाव में कहीं ज़्यादा तीक्ष्ण है। इसका कारण है उनकी यथार्थपरकता, उनकी स्वाभाविकता और उनकी बेतकल्लुफ़ी। उर्दू की आख़िरी किताब उनकी इन सभी ख़ूबियों का मुजस्सिम नमूना है।
...यह किताब पाठ्य-पुस्तक शैली में लिखी गई है और इसमें भूगोल, इतिहास, व्याकरण, गणित, विज्ञान आदि विभिन्न विषयों पर व्यंग्यात्मक पाठ तथा प्रश्नावलियाँ दी गई हैं। इस ‘आख़िरी किताब’ जुम्ले में भी व्यंग्य है कि छात्रों को जिससे विद्यारम्भ कराया जाता है, वह प्राय: ‘पहली किताब’ होती है और यह ‘आख़िरी किताब’ है। इंशा का व्यंग्य यहीं से शुरू होता है और शब्द-ब-शब्द तीव्र होता चला जाता है।
इंशा के व्यंग्य में यहाँ जिन चीज़ों को लेकर चिढ़ दिखाई पड़ती है, वे छोटी-मोटी चीज़ें नहीं हैं। मसलन—विभाजन, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की अवधारणा, क़ायदे-आज़म जिन्ना, मुस्लिम बादशाहों का शासन, आज़ादी का छद्म, शिक्षा-व्यवस्था, थोथी नैतिकता, भ्रष्ट राजनीति आदि। और अपनी सारी चिढ़ को वे बहुत गहन-गम्भीर ढंग से व्यंग्य में ढालते हैं—इस तरह कि पाठक को लज़्ज़त भी मिले और लेखक की चिढ़ में वह ख़ुद को शामिल भी महसूस करे।
Vaishnav Ki Phislan
- Author Name:
Harishankar Parsai
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- Description: ‘वैष्णव की फिसलन’ प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की श्रेष्ठ रचनाओं का संकलन है। इस संग्रह की व्यंग्य रचनाएँ यह स्थापित करने में कामयाब हैं कि जीवन की श्रेष्ठ आलोचना की संज्ञा व्यंग्य है। सहज ढंग से चुभती हुई भाषा में ये व्यंग्य रचनाएँ अपनी बात कहते हुए गहरी चोट कर जाती हैं। इस व्यंग्य-संग्रह की रचनाओं की सफलता के पीछे जो सबसे बड़ी चीज़ है वह है - लेखक की पैनी दृष्टि, जिससे छुपकर भी कुछ भी छुपा नहीं रह जाता और अव्यक्त भी व्यक्त होने लगता है। यह संग्रह चिन्ताओं का नहीं चिन्तन का संग्रह है, और यह लेखक की कुशलता ही है कि इसे वह विचार और संवेदना के सामंजस्य से कर पाया है। ‘वैष्णव की फिसलन’ में संकलित रचनाएँ हमारे आसपास की ज़िन्दगी को उघाड़कर इस प्रकार सामने रख देती हैं कि ऊपर से सीधी-सादी दिखनेवाली घटनाएँ और स्थितियाँ नए अर्थ देने लगती हैं, उनके अन्तर्निहित आशय उजागर हो उठते हैं। इस संग्रह की रचनाएँ आज के जीवन की विसंगतियों और विरूपताओं, अवरोधों और कुंठाओं पर चोट करती हैं और बताती हैं कि विसंगति के विरुद्ध क़लम कैसे तलवार का काम करती है।
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