Chhichhorebaji Ka Resolution
Author:
Piyush PandeyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Satire0 Ratings
Price: ₹ 120
₹
150
Available
पीयूष पांडे का व्यंग्य-लेखन एकदम नई तरह का इसलिए नहीं है कि ये ख़ुद</p>
<p>नए हैं, बल्कि इसलिए नया है कि इनकी चेतना एकदम आधुनिक है। एकदम छोटे बच्चे भी पर्याप्त बूढ़े हो सकते हैं चेतना के स्तर पर। और एकदम बूढ़े भी बच्चे हो सकते हैं चेतना के स्तर पर। पीयूष पांडे ने व्यंग्य के विषय तलाशे नहीं हैं, विषय उनके आसपास टहल रहे हैं। एसएमएस, फेसबुक, मजनूँ से लेकर पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था तक के विषय उनके व्यंग्य लेखन में हैं। विषयों की तलाश व्यंग्यकारों को परेशान करती है। पर पीयूष पांडे उस परेशानी से जूझते नहीं दिखते। जो भी विषय है, उस पर अपनी दृष्टि से लिखो, व्यंग्य हो जाएगा, वह इस सिद्धान्त पर अमल करते हुए दिखते हैं। पर पीयूष पांडे के व्यंग्य की ख़ास बात यह है कि वह व्यंग्य लेखों का इस्तेमाल सिर्फ़ हँसाने के लिए नहीं करते। इधर, व्यंग्यकारों की बहुत बड़ी फ़ौज इस तरह के सिद्धान्त पर काम कर रही है कि किसी भी गद्य में हँसने के चार-छह मौक़े धर दो, व्यंग्य हो जाएगा। व्यंग्यकारों का एक बड़ा वर्ग इसके उलट यह भी मानता है कि व्यंग्य को हँसने-हँसाने का काम तो करना ही नहीं चाहिए।</p>
<p>पीयूष एक सीधे रास्ते पर चलते हैं। स्थितियों को जैसी हैं, वैसी हैं, उन्हें पेश कर देते हैं। उनमें हँसी का स्कोप है, तो हँस लीजिए। पर बेवजह हँसाने की कोशिश नहीं है। मोबाइल, फेसबुक जैसी आसपास इतनी आधुनिक चीज़ें हैं कि ख़ास तौर पर शिक्षित युवा इनसे मुक्त नहीं रह सकते। कई तरह की स्थितियाँ व्यंग्य बन रही हैं। एक तरह से देखें, तो पीयूष पांडे की यह किताब नए बनते व्यंग्य का आईना है। बदलती परिस्थितियों का आईना है, जो कि व्यंग्य को होना चाहिए। पीयूष ख़ुद मीडिया से जुड़े हुए हैं, इसलिए मीडिया की आन्तरिक परिस्थितियों को बख़ूबी समझते हैं। इस पुस्तक में मीडिया पर कुछ शानदार व्यंग्य लेख हैं। मीडिया कैसी मदारीगिरी में बिजी है, यह बात इस पुस्तक में बार-बार सामने आती है।</p>
<p>वास्तविक दुनिया में वर्चुअल दुनिया यानी आभासी दुनिया किस तरह से प्रवेश करती है, इस पुस्तक में बार-बार दिखाई देता है। कुल मिलाकर कहें, तो यह नए ज़माने के व्यंग्य की किताब है। जो कई तरह के नए मानकों का निर्माण करेगी। व्यंग्य के नए और पुराने छात्रों को इस किताब को पढ़ना चाहिए, ऐसी मेरी रिकमंडेशन है। इसे पढ़ना सब लोग रिजोल्यूशन बनाएँगे, ये मेरी शुभकामना है।</p>
<p>—आलोक पुराणिक
ISBN: 9788183615334
Pages: 92
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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हिन्दी साहित्य में व्यंग्य-लेखन की अनेक प्रविधियाँ और छवियाँ विद्यमान हैं। सबका लक्ष्य एक ही है—उन प्रवृत्तियों, व्यक्तियों व स्थितियों का व्यंजक वर्णन जो विभिन्न विसंगतियों के मूल में हैं। 'तहँ तहँ भ्रष्टाचार' व्यंग्य-संग्रह में सतीश अग्निहोत्री ने समकालीन समाज की अनेक विसंगतियों पर प्रहार किया है। फैंटेसी का आश्रय लेते हुए लेखक ने राजनीति के गर्भ से उपजी विभिन्न समस्याओं का विश्लेषण किया है।
ज्ञान चतुर्वेदी के शब्दों में, ‘सतीश अग्निहोत्री के इस व्यंग्य-संग्रह की अधिकांश रचनाओं में यह व्यंग्य-कौशल बेहद मेच्योरली बरता गया दिखता है। व्यंग्य के उनके विषय तो नए हैं ही, उनको पौराणिक तथा लोक-ग़ल्पों से जोड़ने की उनकी शैली भी बेहद आकर्षक है। आप मज़े-मज़े से सब कुछ पढ़ जाते हैं और फैंटेसी में बुने जा रहे व्यंग्य की डिजाइन को लगातार समझ भी पाते हैं।’
व्यंग्यकार के लिए ज़रूरी है कि उसके पास सन्दर्भों की प्रचुरता हो। वह विभिन्न प्रसंगों को वर्णन के अनुकूल बनाकर अपने मन्तव्य को विस्तार प्रदान करे। सतीश अग्निहोत्री केवल पौराणिक व लोक प्रचलित सन्दर्भों से ही परिचित नहीं, वे आधुनिक विश्व की विभिन्न उल्लेखनीय घटनाओं का मर्म भी जानते हैं। पौराणिक वृत्तान्त में लेखक अपने निष्कर्षों के लिए स्पेस की युक्ति निकाल लेता है।
‘एक ब्रेन ड्रेन की कहानी’ के वाक्य हैं, ‘कार्तिकेय मेधावी थे, पर तिकड़मी नहीं। इस देश को रास्ता बनानेवाले इंजीनियरों की ज़रूरत नहीं है, केवल पैसा ख़र्च करनेवाले इंजीनियरों की है।’ यह व्यंग्य-संग्रह प्रमुदित करने के साथ प्रबुद्ध भी बनाता है, यही इसकी सार्थकता है।
Pagdandiyon Ka Zamana
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Alag
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- Description: सामयिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक विसंगतियों और विडम्बनाओं पर तीखा प्रहार करते हुए व्यंग्य परम्परा को एक नई भाषा और शिल्प प्रदान करनेवाला विशिष्ट संकलन। लेखक यहाँ हमारे दैनिक जीवन और रोज़मर्रा की विडम्बनापूर्ण घटनाओं का सूक्ष्म विश्लेषण कर न सिर्फ़ हमें झकझोरता है, बल्कि उन कारणों को भी परत-दर-परत खोलता है जो इनके मूल में हैं। इस संकलन का हर आलेख हास-परिहास करते हुए संवेदना के स्तर पर पाठकों से रिश्ता बनाकर उनके दु:ख, बेचैनी के साथ जुड़ता है और उन्हें आश्वस्त कर सोच का एक नया स्तर भी प्रदान करता है। पुस्तक में राजनीति के विभिन्न रंगों, सत्तालोलुपता और भ्रष्टाचार को बेनक़ाब किया गया है और आन्तरिक स्थितियों पर दृष्टिपात करते हुए चीज़ों को देखने की एक नई दृष्टि की ओर भी संकेत किया गया है। अपने व्यंग्य-उपन्यासों से हिन्दी व्यंग्य को एक नई ऊँचाई देनेवाले ज्ञान चतुर्वेदी की इन रचनाओं से हँसी उतनी नहीं आती, जितनी अपने आसापास की विडम्बनाएँ हमें कोंचती हैं। शायद यही व्यंग्यकार की सफलता भी है।
To Angrej Kya Bure The
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Description:
व्यंग्य आधुनिक साहित्य का अचूक अस्त्र है। विसंगतियों, विडम्बनाओं और पाखंड आदि पर प्रहार करते समय इसका उपयोग अत्यन्त रोचक अभिव्यक्तियों को जन्म देता है। ‘तो अंग्रेज़ क्या बुरे थे’ व्यंग्य-मिश्रित ललित गद्य का दिलचस्प उदाहरण है। इस पुस्तक में विभिन्न विषयों, मुद्दों और प्रसंगों पर तेज़-तर्रार टिप्पणियाँ हैं।
लेखक रविन्द्र बड़गैयाँ की दृष्टि उन बिन्दुओं पर टिकी है जिन्हें प्रायः हम सब महसूस करते हैं। रविन्द्र सामान्य अनुभवों के बीच ऐसे अन्तराल खोज लेते हैं जहाँ से कटाक्ष झाँकते हैं, ठहाके झिलमिलाते हैं और बेचैन कर देनेवाली व्यंजनाएँ प्रकाशित होती हैं।
इस पुस्तक में अनेक ऐसे वाक्य हैं जो व्यवस्था की विचित्र अवस्था का विश्लेषण करते हैं। जैसे ‘...सेवक को राजा बनाना आसान था पर राजा को वापस सेवक बनाना नामुमकिन।’ ऐसे कथनों के मूल में है सामाजिक मनोविज्ञान का सूक्ष्म ज्ञान। लेखक इसमें पारंगत लगता है। समग्रतः यह पुस्तक पाठक को मुस्कुराते हुए कुछ सोचने के लिए विवश करती है।
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