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हिन्दी व्यंग्य-विधा को जिन रचनाकारों ने सार्थकता सौंपी है, श्रीलाल शुक्ल उनकी पहली पंक्ति में गण्य हैं। हिन्दी जगत में उन्हें यह सम्मान ‘राग दरबारी’ और ‘पहला पड़ाव’ जैसे विशिष्ट उपन्यासों के कारण तो प्राप्त है ही, अपने व्यंग्यात्मक निबन्धों के लिए भी है। ‘यहाँ से वहाँ’, ‘अंगद का पाँव’ और ‘उमराव नगर में कुछ दिन’ उनकी पूर्व प्रकाशित व्यंग्य-कृतियाँ हैं और इस क्रम में यह उनकी एक अन्य महत्त्वपूर्ण कृति है। इन निबन्धों में श्रीलाल शुक्ल की रचना-दृष्टि विभिन्न वस्तु-सत्यों को उकेरती दिखाई देती है। इनमें से पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित निबन्धों के लिए ‘ज़मीन पर’ और रेडियो तथा दूरदर्शन से प्रसारित निबन्धों के लिए ‘हवा में’ कहकर भी उन्होंने जिस व्यंग्यार्थ की व्यंजना की है, उसकी ज़द में सर्वप्रथम वे स्वयं भी आ खड़े हुए हैं। इसमें उनके व्यंग्य की ईमानदारी भी है और अन्दाज़ भी। सामाजिक विसंगतियों, विडम्बनाओं और समकालीन जीवन की विकृतियों की बेलाग शल्य-चिकित्सा में उनका गहरा विश्वास है। साहित्य, कला, संस्कृति, धर्म, इतिहास और राजनीति—किसी की भी रुग्णता उनके सोद्देश्य व्यंग्योपचार का विषय हो सकती है। इसके अतिरिक्त यह संग्रह कुछ वरिष्ठ रचनाकारों को उनकी समग्र सृजनशीलता के सन्दर्भ में समझने का भी अवसर जुटाता है। कहना न होगा कि श्रीलाल शुक्ल की यह व्यंग्य कृति हिन्दी व्यंग्य को कुछ और समृद्ध करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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हिन्दी व्यंग्य-विधा को जिन रचनाकारों ने सार्थकता सौंपी है, श्रीलाल शुक्ल उनकी पहली पंक्ति में गण्य हैं। हिन्दी जगत में उन्हें यह सम्मान ‘राग दरबारी’ और ‘पहला पड़ाव’ जैसे विशिष्ट उपन्यासों के कारण तो प्राप्त है ही, अपने व्यंग्यात्मक निबन्धों के लिए भी है। ‘यहाँ से वहाँ’, ‘अंगद का पाँव’ और ‘उमराव नगर में कुछ दिन’ उनकी पूर्व प्रकाशित व्यंग्य-कृतियाँ हैं और इस क्रम में यह उनकी एक अन्य महत्त्वपूर्ण कृति है।
इन निबन्धों में श्रीलाल शुक्ल की रचना-दृष्टि विभिन्न वस्तु-सत्यों को उकेरती दिखाई देती है। इनमें से पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित निबन्धों के लिए ‘ज़मीन पर’ और रेडियो तथा दूरदर्शन से प्रसारित निबन्धों के लिए ‘हवा में’ कहकर भी उन्होंने जिस व्यंग्यार्थ की व्यंजना की है, उसकी ज़द में सर्वप्रथम वे स्वयं भी आ खड़े हुए हैं। इसमें उनके व्यंग्य की ईमानदारी भी है और अन्दाज़ भी। सामाजिक विसंगतियों, विडम्बनाओं और समकालीन जीवन की विकृतियों की बेलाग शल्य-चिकित्सा में उनका गहरा विश्वास है।
साहित्य, कला, संस्कृति, धर्म, इतिहास और राजनीति—किसी की भी रुग्णता उनके सोद्देश्य व्यंग्योपचार का विषय हो सकती है। इसके अतिरिक्त यह संग्रह कुछ वरिष्ठ रचनाकारों को उनकी समग्र सृजनशीलता के सन्दर्भ में समझने का भी अवसर जुटाता है। कहना न होगा कि श्रीलाल शुक्ल की यह व्यंग्य कृति हिन्दी व्यंग्य को कुछ और समृद्ध करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
Book Details
-
ISBN9789360868420
-
Pages236
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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उर्दू में तेज़ निगारी (व्यंग्य) के जो बेहतरीन उदाहरण मौजूद हैं, उनमें इब्ने इंशा का अन्दाज़ सबसे अलहदा और प्रभाव में कहीं ज़्यादा तीक्ष्ण है। इसका कारण है उनकी यथार्थपरकता, उनकी स्वाभाविकता और उनकी बेतकल्लुफ़ी। उर्दू की आख़िरी किताब उनकी इन सभी ख़ूबियों का मुजस्सिम नमूना है। ...यह किताब पाठ्य-पुस्तक शैली में लिखी गई है और इसमें भूगोल, इतिहास, व्याकरण, गणित, विज्ञान आदि विभिन्न विषयों पर व्यंग्यात्मक पाठ तथा प्रश्नावलियाँ दी गई हैं। इस ‘आख़िरी किताब’ जुम्ले में भी व्यंग्य है कि छात्रों को जिससे विद्यारम्भ कराया जाता है, वह प्राय: ‘पहली किताब’ होती है और यह ‘आख़िरी किताब’ है। इंशा का व्यंग्य यहीं से शुरू होता है और शब्द-ब-शब्द तीव्र होता चला जाता है। इंशा के व्यंग्य में यहाँ जिन चीज़ों को लेकर चिढ़ दिखाई पड़ती है, वे छोटी-मोटी चीज़ें नहीं हैं। मसलन—विभाजन, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की अवधारणा, क़ायदे-आज़म जिन्ना, मुस्लिम बादशाहों का शासन, आज़ादी का छद्म, शिक्षा-व्यवस्था, थोथी नैतिकता, भ्रष्ट राजनीति आदि। और अपनी सारी चिढ़ को वे बहुत गहन-गम्भीर ढंग से व्यंग्य में ढालते हैं—इस तरह कि पाठक को लज़्ज़त भी मिले और लेखक की चिढ़ में वह ख़ुद को शामिल भी महसूस करे।
Tulsidas Chandan Ghisain
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Harishankar Parsai
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हरिशंकर परसाई के लिए व्यंग्य साध्य नहीं, साधन था। यही बात उनको साधारण व्यंग्यकारों से अलग करती है। पाठक को हँसाना, उसका मनोरंजन करना उनका मक़सद नहीं था। उनका मक़सद उसे बदलना था। और यह काम समाज-सत्य पर प्रामाणिक पकड़, सच्ची सहानुभूति और स्पष्ट विश्व-दृष्टि के बिना सम्भव नहीं हो सकता। ख़ास तौर पर अगर आपका माध्यम व्यंग्य जैसी विधा हो। हरिशंकर परसाई के यहाँ ये सब ख़ूबियाँ मिलती हैं। उनकी दृष्टि की तीक्ष्णता और वैचारिक स्पष्टता उनको व्यंग्य-साहित्य का नहीं विचार-साहित्य का पुरोधा बनाती है। तुलसीदास चन्दन घिसैं के आलेखों का केन्द्रीय स्वर मुख्यत: सत्ता और संस्कृति के सम्बन्ध हैं। इसमें हिन्दी साहित्य का समाज और सत्ता प्रतिष्ठानों से उसके सम्बन्धों के समीकरण बार-बार सामने आते हैं। पाक्षिक ‘सारिका’ में 84-85 के दौरान लिखे गए इन निबन्धों में परसाई जी ने उस दुर्लभ लेखकीय साहस का परिचय दिया है, जो न अपने समकालीनों को नाराज़ करने से हिचकता है और न अपने पूर्वजों से ठिठोली करने से जिसे कोई चीमड़ नैतिकता रोकती है। गौरतलब यह कि इन आलेखों को पढ़ते हुए हमें बिलकुल यह नहीं लगता कि इन्हें आज से कोई तीन दशक पहले लिखा गया था। हम आज भी वैसे ही हैं और आज भी हमें एक परसाई की ज़रूरत है जो चुटकियों से ही सही पर हमारी खाल को मोटा होने से रोकता रहे।
Vikalang Shraddha Ka Daur
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Harishankar Parsai
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हरिशंकर परसाई ने अपनी एक पुस्तक के लेखकीय वक्तव्य में कहा था –‘ व्यंग्य ’ अब ‘ शूद्र ’ से ‘ क्षत्रिय ’ मान लिया गया है। विचारणीय है कि वह शूद्र से क्षत्रिय हुआ है , ब्राह्मण नहीं , क्योंकि ब्राह्मण ‘ कीर्तन ’ करता है। निस्सन्देह व्यंग्य कीर्तन करना नहीं जानता , पर कीर्तन को और कीर्तन करनेवालों को खूब पहचानता है। कैसे-कैसे अवसर , कैसे-कैसे वाद्य और कैसी-कैसी तानें – जरा-सा ध्यान देंगे तो अचीन्हा नहीं रहेगा विकलांग श्रद्धा का (यह) दौर। 'विकलांग श्रद्धा का दौर' के व्यंग्य अपनी कथात्मक सहजता और पैनेपन में अविस्मरणीय हैं , ऐसे कि एक बार पढक़र इनका मौखिक पाठ किया जा सके। आए दिन आसपास घट रही सामान्य-सी घटनाओं से असामान्य समय-सन्दर्भों और व्यापक मानव-मूल्यों की उद्भावना न सिर्फ रचनाकार को मूल्यवान बनाती है बल्कि व्यंग्य-विधा को भी नई ऊँचाइयाँ सौंपती है। इस दृष्टि से प्रस्तुत कृति का महत्त्व और भी ज्यादा है।
Pagdandiyon Ka Zamana
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Harishankar Parsai
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Awating description for this book
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