Tipoo Ka Afsana : Himmat-E-Marda
Author:
Frank HuzurPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Satire0 Ratings
Price: ₹ 1600
₹
2000
Available
इस किताब में उत्तर प्रदेश के युवा, सुचर्चित, सुस्वीकृत, सजग और सफल मुख्यमंत्री रहे अखिलेश यादव तथा समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता श्री मुलायम सिंह यादव के बेटे, टीपू के राजनीतिक जीवन पर बने कार्टून इकट्ठे किए गए हैं। वे कार्टून जो ख़ुद अखिलेश यानी टीपू को भी उतने ही प्यारे हैं जितने देश के लाखों-लाख पाठकों को। या हो सकता है उनसे भी ज़्यादा, क्योंकि संस्कृति-साहित्य और रचनात्मकता से ख़ास लगाव रखनेवाला यह युवा समाजवादी कार्टून विधा में कुछ ज़्यादा ही रस लेता है। कार्टूनकार ने अपनी रेखाएँ उनके ख़िलाफ़ उकेरी हों तो भी अखिलेश उसके रचनात्मक आयाम को नज़रअन्दाज़ नहीं करते और अच्छे कार्टूनों को अपने फ़ोन में सहेजकर रखते हैं। यह नेता के रूप में उनकी वयस्कता और सोच के खुलेपन की निशानी है और समाजवादी सहिष्णुता की एक अनुकरणीय मिसाल। इन कार्टूनों में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल की खट्टी-मीठी झलकियाँ भी मिलेंगी और श्रेष्ठ कार्टून कला के संग्रहणीय नमूने भी जिन्हें आप भी अपने पास सँजोकर रखना चाहेंगे।
ISBN: 9788126726547
Pages: 72
Avg Reading Time: 2 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: अनूप मणि त्रिपाठी की व्यंग्य रचनाओं को पढ़ने के पहले मुझे लगता था कि हर व्यंग्य का स्वाद एक जैसा होता है। उनके इस संग्रह को आद्योपांत पढ़ने के बाद समझ में आया कि खुद उनकी हर रचना का स्वाद अलग है। राजनीति के विद्रूप, निष्ठुरता और नंगई को जिस तरह गले से पकड़कर वे अनावृत करते और उस पर चोट करते हैं वह अद्वितीय है। उनका व्यंग्य औरों से इस मामले में अलग और मूल्यवान है कि वह पाठक की समझ पर लानत ही नहीं भेजता, उसे समझदार भी बनाता है। जनता का ध्यान कैसे असली और ज्वलन्त मुद्दों से भटकाकर नकली और काल्पनिक मुद्दों में उलझाया जाता है इसके एक से एक नमूने आपको कदम कदम पर मिलते हैं। 'बहती लाशों की कहानियाँ' पढ़कर लगता है व्यंग्य नहीं पढ़ रहे, कोई हॉरर फिल्म देख रहे हैं। भाषा की विदग्धता का उदाहरण देने से इसलिए बच रहा हूँ कि आख़िर कितने उदाहरण देंगे। फिर भी बानगी के लिए एक उदाहरण दे रहा हूँ। शीर्षक है—‘साँपों की सभा’। ‘वह धारा प्रवाह बोलता रहा, ‘बस हमें सपने और भय दोनों साथ-साथ दिखाने होंगे! अच्छे-अच्छे शब्दों के चयन पर ध्यान केन्द्रित करना होगा!’ उसने चूहे की डेड बॉडी पर एक नजर मारी। फिर बोला, ‘देखिए! कैसे हमारे रंग में यह रँगने के लिए तैयार हो गया!’ वह आगे बोला, ‘जहर भरिए, खूब भरिए, मगर उपदेश की शक्ल में...आप देखेंगे कि उपदेश स्वतः उन्माद में बदलता जाएगा...बस फैलकर हर जगह हमें अपना काम लगातार करते रहना है। क्या समझे!’ एक बूढ़ा साँप जोश में बोला, ‘समझ गए! हमें लोकतंत्र को लोकतांत्रिक ढंग से खत्म करना है...’ दरअसल इन रचनाओं की शैलीगत व्याप्ति इतनी अधिक है कि इन्हें केवल व्यंग्य के खाँचे में रखना इनकी मारक क्षमता को कम करके आँकना होगा। यह कोई और विधा है जिसकी तिलमिलाहट अन्दर तक कँपकँपी पैदा कर देती है और जिसे उपयुक्त नाम दिया जाना अभी बाकी है। हाँ, जब तक इसका उपयुक्त नामकरण न हो जाए तब तक व्यंग्य से काम चलाना पड़ेगा। इन रचनाओं से गुजरने के बाद मेरा मानना है कि अनूप मणि त्रिपाठी आज की मारक व्यंग्य विधा के सर्वाधिक सशक्त हस्ताक्षर हैं। —शिवमूर्ति
Teparesi Ritarns
- Author Name:
B.N. Mallesh
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- Description: ಸಾಮಾಜಿಕ ವಿದ್ಯಮಾನಗಳನ್ನು ಸೂಕ್ಷ್ಮ ದೃಷ್ಟಿಯಿಂದ ನೋಡಿ ಅವುಗಳಿಗೆ ಹಾಸ್ಯದ ಲೇಪನ ನೀಡಿ, ವ್ಯಂಗ್ಯ, ವಿಡಂಬನೆಗಳ ಮೂಲಕ ಆರೋಗ್ಯಕರ ಸಮಾಜ ನಿರ್ಮಾಣದ ಆಶಯದೊಂದಿಗೆ ಇಲ್ಲಿಯ ಬರಹಗಳಿವೆ. ಆಯ್ದ ವಸ್ತು, ನಿರೂಪಣಾ ಶೈಲಿ, ಸಾಮಾಜಿಕ ಹೊಣೆಗಾರಿಕೆಯ ಎಚ್ಚರ ಇಂತಹ ಸಾಹಿತ್ಯಕ ಅಂಶಗಳಿಂದ ಇಲ್ಲಿಯ ಬರಹಗಳು ಓದುಗರ ಗಮನ ಸೆಳೆಯುತ್ತವೆ. There are writings here with the hope of building a healthy society by looking at social phenomena from a sensitive point of view and giving them a coating of humor, irony and satire. The writings here attract the attention of the readers due to such literary elements as selected material, narrative style, awareness of social responsibility.
Tanh Tanh Bhrashtachar
- Author Name:
Satish Agnihotri
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Description:
हिन्दी साहित्य में व्यंग्य-लेखन की अनेक प्रविधियाँ और छवियाँ विद्यमान हैं। सबका लक्ष्य एक ही है—उन प्रवृत्तियों, व्यक्तियों व स्थितियों का व्यंजक वर्णन जो विभिन्न विसंगतियों के मूल में हैं। 'तहँ तहँ भ्रष्टाचार' व्यंग्य-संग्रह में सतीश अग्निहोत्री ने समकालीन समाज की अनेक विसंगतियों पर प्रहार किया है। फैंटेसी का आश्रय लेते हुए लेखक ने राजनीति के गर्भ से उपजी विभिन्न समस्याओं का विश्लेषण किया है।
ज्ञान चतुर्वेदी के शब्दों में, ‘सतीश अग्निहोत्री के इस व्यंग्य-संग्रह की अधिकांश रचनाओं में यह व्यंग्य-कौशल बेहद मेच्योरली बरता गया दिखता है। व्यंग्य के उनके विषय तो नए हैं ही, उनको पौराणिक तथा लोक-ग़ल्पों से जोड़ने की उनकी शैली भी बेहद आकर्षक है। आप मज़े-मज़े से सब कुछ पढ़ जाते हैं और फैंटेसी में बुने जा रहे व्यंग्य की डिजाइन को लगातार समझ भी पाते हैं।’
व्यंग्यकार के लिए ज़रूरी है कि उसके पास सन्दर्भों की प्रचुरता हो। वह विभिन्न प्रसंगों को वर्णन के अनुकूल बनाकर अपने मन्तव्य को विस्तार प्रदान करे। सतीश अग्निहोत्री केवल पौराणिक व लोक प्रचलित सन्दर्भों से ही परिचित नहीं, वे आधुनिक विश्व की विभिन्न उल्लेखनीय घटनाओं का मर्म भी जानते हैं। पौराणिक वृत्तान्त में लेखक अपने निष्कर्षों के लिए स्पेस की युक्ति निकाल लेता है।
‘एक ब्रेन ड्रेन की कहानी’ के वाक्य हैं, ‘कार्तिकेय मेधावी थे, पर तिकड़मी नहीं। इस देश को रास्ता बनानेवाले इंजीनियरों की ज़रूरत नहीं है, केवल पैसा ख़र्च करनेवाले इंजीनियरों की है।’ यह व्यंग्य-संग्रह प्रमुदित करने के साथ प्रबुद्ध भी बनाता है, यही इसकी सार्थकता है।
Ghoonghat Ke Pat Khol
- Author Name:
Ashwini Kumar Dubey
- Book Type:

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Description:
‘घूँघट के पट खोल’ व्यंग्य-रचनाओं का संकलन है जो जीवन तथा समाज के अलग-अलग पहलुओं को विषय बनाकर लिखे गए हैं। हास्य के साथ-साथ विचार के लिए प्रेरित करनेवाले व्यंग्य-निबन्ध मौजूदा समय की वास्तविकताओं को भी एक अलग अन्दाज़ में देखते हैं।
मिसाल के तौर पर पहला ही व्यंग्य प्रेमचन्द के मशहूर पात्रों अलगू चौधरी और जुम्मन शेख को आज के ग्रामीण परिदृश्य में ले आता है, जहाँ आज़ादी के बाद लोकतांत्रिक राजनीति का एक स्थानीय संस्करण पनपा है। इसमें अलगू और जुम्मन की अलग-अलग पार्टियाँ हैं जिनमें एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ चलती रहती है।
नाई की दुकान में ‘विमान अपहरण की योजना’ का हास्य, ‘फ़ाइलें बतर्ज नायिका-भेद’ में सरकारी दफ़्तरों की लाल फीताशाही का व्यंग्यात्मक विश्लेषण, किसी शहरी कान्वेंटी की किशोर द्वारा लिखा गया ‘एक निबन्ध गाँव पर’—ऐसी कई चुटीली रचनाएँ इस पुस्तक में संकलित हैं जो आपको हँसाते-हँसाते सोचने पर मजबूर कर देंगी। इश्क़-मुहब्बत से लेकर संस्कृति, शिक्षा प्रणाली, परीक्षाएँ, साहित्य, सिनेमा तक लगभग हर विषय पर लेखक ने इसमें व्यंग्य-प्रहार किए हैं।
लोककला उत्सवों की विसंगतियों पर ये पंक्तियाँ देखें : ‘जो कलाकार हैं वे अपने उदर-पोषण के लिए सड़क किनारे गिट्टी फोड़ रहे हैं। अफ़सरों से लदी सरकारी जीत उन पर धूल उड़ाती हुई ‘लोक-कला’ खोज रही है।’
Nadi Mein Khada Kavi
- Author Name:
Sharad Joshi
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Description:
अस्सी की होने चली दादी ने विधवा होकर परिवार से पीठ कर खटिया पकड़ ली। परिवार उसे वापस अपने बीच खींचने में लगा। प्रेम, वैर, आपसी नोकझोंक में खदबदाता संयुक्त परिवार। दादी बज़िद कि अब नहीं उठूँगी।
फिर इन्हीं शब्दों की ध्वनि बदलकर हो जाती है अब तो नई ही उठूँगी। दादी उठती है। बिलकुल नई। नया बचपन, नई जवानी, सामाजिक वर्जनाओं-निषेधों से मुक्त, नए रिश्तों और नए तेवरों में पूर्ण स्वच्छन्द।
कथा लेखन की एक नई छटा है इस उपन्यास में। इसकी कथा, इसका कालक्रम, इसकी संवेदना, इसका कहन, सब अपने निराले अन्दाज़ में चलते हैं। हमारी चिर-परिचित हदों-सरहदों को नकारते लाँघते। जाना-पहचाना भी बिलकुल अनोखा और नया है यहाँ। इसका संसार परिचित भी है और जादुई भी, दोनों के अन्तर को मिटाता। काल भी यहाँ अपनी निरन्तरता में आता है। हर होना विगत के होनों को समेटे रहता है, और हर क्षण सुषुप्त सदियाँ। मसलन, वाघा बार्डर पर हर शाम होनेवाले आक्रामक हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी राष्ट्रवादी प्रदर्शन में ध्वनित होते हैं ‘क़त्लेआम के माज़ी से लौटे स्वर’, और संयुक्त परिवार के रोज़मर्रा में सिमटे रहते हैं काल के लम्बे साए।
और सरहदें भी हैं जिन्हें लाँघकर यह कृति अनूठी बन जाती है, जैसे स्त्री और पुरुष, युवक और बूढ़ा, तन व मन, प्यार और द्वेष, सोना और जागना, संयुक्त और एकल परिवार, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान, मानव और अन्य जीव-जन्तु (अकारण नहीं कि यह कहानी कई बार तितली या कौवे या तीतर या सड़क या पुश्तैनी दरवाज़े की आवाज़ में बयान होती है) या गद्य और काव्य : ‘धम्म से आँसू गिरते हैं जैसे पत्थर। बरसात की बूँद।’
Angad Ka Paon
- Author Name:
Shrilal Shukla
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- Description: श्रीलाल शुक्ल सामान्य अर्थों में व्यंग्यकार नहीं हैं। उनका व्यंग्य गुदगुदी या हास्य पैदा करनेवाला व्यंग्य नहीं है। उसके पीछे निहित उनका गहन समाजबोध उनकी व्यंग्य रचनाओं को एक रचनात्मक आयाम देता है, ‘राग दरबारी’ जिसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। यह गुण उनकी खुदरा व्यंग्य रचनाओं में भी इतनी ही गम्भीरता से मौजूद है। ‘अंगद का पाँव’ उनके विविध व्यंग्य निबन्धों का संग्रह है जो उनकी सामाजिक संलग्नता, चिन्ता और अपनी दुनिया के प्रति उनके नज़रिए को समग्रतापूर्वक प्रतिबिम्बित करता है। मसलन इसी पुस्तक में शामिल ‘शॉ का भूमिका भाष्य’ में पुस्तक की भूमिका लिखवाने गए एक हिन्दुस्तानी लेखक को शॉ की कही बातें द्रष्टव्य हैं जिनसे आज के लेखकीय जगत में बड़े नामों से भूमिकाएँ लिखवाने के विज्ञापनी रिवाज की कलई खुल जाती है : ‘‘भूमिका इसलिए होती है कि पाठक समझ लें कि लेखक की एक अपनी भूमि भी है। भूमिहीन लेखकों के लिए भूमिका का इसलिए और भी महत्त्व है। इसलिए नाटक के कई अंक काटकर एक भूमिका लिखना नाटककार की बुद्धिमत्ता में शामिल है।’’ ‘‘जो अपने प्रकाशक से प्रस्तावना लिखवाते हैं, वे अपनी पुस्तक के लिए विज्ञापन लिखाने के पैसे तो बचा लेते हैं पर अपनी पुस्तक को रजिस्टर्ड दवाओं के स्तर पर उतार देते हैं।’’ कहने की आवश्यकता नहीं कि जीवन के हर विद्रूप के विषय में उनका व्यंग्य उतना ही यथार्थवादी और साफ़गो है जितना उक्त पंक्तियों में नज़र आता है। ‘अंगद का पाँव’ में शामिल सभी व्यंग्य इसका प्रमाण हैं।
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