Karam Sanyasi Krishna
(0)
Author:
Jhunni Lal VermaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
995
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Available
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व्यासदेव प्रणीत ‘महाभारत’ ग्रन्थ में भारत के राष्ट्रीय युग-परिवर्तन का इतिहास है। वह उस दीप-स्तम्भ के समान है, जिसके प्रकाश में अतीत की चित्रावली के साथ-साथ युग-क्रान्ति के पश्चात् स्थापित होनेवाली नवीन राजसत्ता, समाज और व्यक्ति के नवीन रूप, नवीन उत्साह और नवीन आकांक्षाओं की भी झलक प्राप्त होती है। यद्यपि उस ग्रन्थ में कौरव-पांडवों के भीषण युद्ध का वर्णन है, परन्तु रचना के मूल नायक कृष्ण हैं।</p> <p>कृष्ण के जिन स्वरूपों का उक्त ग्रन्थ में उद्घाटन हुआ है, उनमें युग-पुरुष, विभूति, तत्त्वज्ञ तथा पूर्णावतार मुख्य हैं<strong>।</strong> यदि कृष्ण के अवतार रूप को वादग्रस्त भी मान लिया जाए तब भी उनके शेष तीन रूप ही उन्हें मानवेतर या महामानव के पद पर आसीन करने को पर्याप्त हैं<strong>।</strong> उनका चरित्र इतना विशाल और गूढ़ है कि उसका पूर्ण दर्शन सम्भव नहीं<strong>।</strong> मानवीय जीवन का कोई भी पक्ष ऐसा नहीं जो उनके क्रियात्मक रूप से अछूता बचा हो<strong>।</strong> प्रथम रूप में वे अपने युग के नरोत्तम, दूसरे में महामानव और तीसरे में जगद्गुरु हैं<strong>।</strong> इन सब कारणों से वे पूर्ण पुरुष कहे व माने जाते हैं<strong>।</strong> योगेश्वर कृष्ण ने जिस अध्यात्म की चर्चा की तथा जिस स्थिति को प्राप्त करना प्रगतिशील मानवी जीवन की सबसे उत्कृष्ट उपलब्धि बतलाई है, वह इस जीवन से विलग किसी अन्य क्षेत्र की गतिविधि नहीं<strong>।</strong> यथार्थ में गीता-प्रतिपादित अध्यात्म मानवी-जीवन का ही विषय है और उसी का अंग है<strong>।</strong> वह संसार के व्यवहार से सम्बन्धित है<strong>।</strong> वह व्यक्तिगत व सामाजिक व्यवहार शुद्धि पर अवलम्बित है<strong>।</strong> आसुरी वृत्ति का त्याग और सात्त्विकता का अर्जन उस मार्ग के दिशा-सूचक संकेत-चिन्ह हैं<strong>।</strong></p> <p>यह पुस्तक पश्चिम के प्रभावस्वरूप भारत में कृष्ण को लेकर प्रचलित उन धारणाओं का खंडन करती है</p> <p>जो कृष्ण की ऐतिहासिकता और गुण-सम्पन्नता को क्षतिग्रस्त करने का प्रयास करती है<strong>।</strong> कृष्ण के सन्दर्भ में प्रक्षेपित संशयों का निराकरण करते हुए विद्वान लेखक इस पुस्तक में कृष्ण की नितान्त आधुनिक और समीचीन व्याख्या प्रस्तुत करते हैं और अकाट्य तथा प्रखर तर्कों के आधार पर एक सम्पूर्ण कृष्ण-छवि की रचना करते हैं<strong>।</strong>
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व्यासदेव प्रणीत ‘महाभारत’ ग्रन्थ में भारत के राष्ट्रीय युग-परिवर्तन का इतिहास है। वह उस दीप-स्तम्भ के समान है, जिसके प्रकाश में अतीत की चित्रावली के साथ-साथ युग-क्रान्ति के पश्चात् स्थापित होनेवाली नवीन राजसत्ता, समाज और व्यक्ति के नवीन रूप, नवीन उत्साह और नवीन आकांक्षाओं की भी झलक प्राप्त होती है। यद्यपि उस ग्रन्थ में कौरव-पांडवों के भीषण युद्ध का वर्णन है, परन्तु रचना के मूल नायक कृष्ण हैं।</p>
<p>कृष्ण के जिन स्वरूपों का उक्त ग्रन्थ में उद्घाटन हुआ है, उनमें युग-पुरुष, विभूति, तत्त्वज्ञ तथा पूर्णावतार मुख्य हैं<strong>।</strong> यदि कृष्ण के अवतार रूप को वादग्रस्त भी मान लिया जाए तब भी उनके शेष तीन रूप ही उन्हें मानवेतर या महामानव के पद पर आसीन करने को पर्याप्त हैं<strong>।</strong> उनका चरित्र इतना विशाल और गूढ़ है कि उसका पूर्ण दर्शन सम्भव नहीं<strong>।</strong> मानवीय जीवन का कोई भी पक्ष ऐसा नहीं जो उनके क्रियात्मक रूप से अछूता बचा हो<strong>।</strong> प्रथम रूप में वे अपने युग के नरोत्तम, दूसरे में महामानव और तीसरे में जगद्गुरु हैं<strong>।</strong> इन सब कारणों से वे पूर्ण पुरुष कहे व माने जाते हैं<strong>।</strong> योगेश्वर कृष्ण ने जिस अध्यात्म की चर्चा की तथा जिस स्थिति को प्राप्त करना प्रगतिशील मानवी जीवन की सबसे उत्कृष्ट उपलब्धि बतलाई है, वह इस जीवन से विलग किसी अन्य क्षेत्र की गतिविधि नहीं<strong>।</strong> यथार्थ में गीता-प्रतिपादित अध्यात्म मानवी-जीवन का ही विषय है और उसी का अंग है<strong>।</strong> वह संसार के व्यवहार से सम्बन्धित है<strong>।</strong> वह व्यक्तिगत व सामाजिक व्यवहार शुद्धि पर अवलम्बित है<strong>।</strong> आसुरी वृत्ति का त्याग और सात्त्विकता का अर्जन उस मार्ग के दिशा-सूचक संकेत-चिन्ह हैं<strong>।</strong></p>
<p>यह पुस्तक पश्चिम के प्रभावस्वरूप भारत में कृष्ण को लेकर प्रचलित उन धारणाओं का खंडन करती है</p>
<p>जो कृष्ण की ऐतिहासिकता और गुण-सम्पन्नता को क्षतिग्रस्त करने का प्रयास करती है<strong>।</strong> कृष्ण के सन्दर्भ में प्रक्षेपित संशयों का निराकरण करते हुए विद्वान लेखक इस पुस्तक में कृष्ण की नितान्त आधुनिक और समीचीन व्याख्या प्रस्तुत करते हैं और अकाट्य तथा प्रखर तर्कों के आधार पर एक सम्पूर्ण कृष्ण-छवि की रचना करते हैं<strong>।</strong>
Book Details
-
ISBN9788180319570
-
Pages304
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: मृत्यु जीवन का अटल सत्य है; यह अवश्यंभावी है। काल को जीतना लगभग दुर्लभ एवं असंभव है। इसलिए जीव मृत्यु के भय में रहता है। अनगिनत-अनजाने प्रश्न और शंकाएँ उसके मन-मस्तिष्क को जकड़े रहती हैं। विज्ञान लेखक श्री राजेंद्र तिवारी ने गहन शोध और अध्ययन करके जटिल व दुरूह ‘मृत्यु’ के बारे में विवेचना की है। प्रस्तुत पुस्तक उनकी अब तक के प्रयासों से प्राप्त तथ्यों और उनसे निसृत निष्कर्षों की अभिव्यक्ति है। शरीर के अंदर कुछ रहता अवश्य है, जिसके बाहर जाते ही शरीर मृत हो जाता है। वह कुछ क्या है? प्राणों के निष्क्रमण की प्रकिया कष्टदायी है अथवा वस्त्र बदलने की भाँति एक सहज क्रिया? मृत्यु के उपरांत नया परिवेश प्राप्त होने तक आत्मा कहाँ विचरण करती है? क्या पुनर्जन्म होता है? क्या लोक और परलोक हैं? कर्म का सिद्धांत क्या है? क्या सद्कर्म-दुष्कर्म अर्थात् कर्म के रूप भाग्य और भविष्य की रचना करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं? क्या स्वर्ग और नरक हैं? यदि हैं तो कहीं और हैं अथवा इसी पृथ्वी पर? पुस्तक में मृत्यु के समय एवं मृत्युपर्यंत के अनुभव प्रमाण सहित प्रस्तुत किए गए हैं। संदेश यह है कि ‘सुधर जाओ अन्यथा मृत्यु के समय व पश्चात् कष्ट-ही-कष्ट हैं।’ मृत्यु से भयभीत नहीं होना है, बल्कि जिसने भी मृत्यु के रहस्य को जान लिया, अज्ञात व अंधकारमय प्रश्नों से परदा हटकर ज्ञान के प्रकाश से अवगत हो गया, उसे मृत्यु से कभी भी भय नहीं लगेगा|
Geet Govind
- Author Name:
Jaidev
- Book Type:

- Description: ‘गीतगोविंद’ संस्कृत कवि जयदेव द्वारा रचित एक अनुपम काव्य ग्रंथ है, जिसमें राधा-कृष्ण की केलि-कथाओं तथा उनकी अभिसार-लीलाओं के अत्यंत रसमय चित्रण के साथ ही प्रेम के सभी भारतीय रूपों का बड़ी तन्मयता और कुशलता के साथ वर्णन किया गया है। समग्र संस्कृत साहित्य में इस कोटि की मधुर रचना दूसरी कोई नहीं। यह आध्यात्मिक श्रृंगार का अत्यंत मनोरम काव्य ग्रंथ है, जिसमें शब्द और अर्थ का मनोमुग्धकारी सामंजस्य है। कृष्ण भक्ति साहित्य में ‘गीतगोविंद’ को धर्मग्रंथ का स्थान प्राप्त है। श्रीवल्लभ संप्रदाय में भी ‘गीतगोविंद’ को श्रीमद्भगवत पुराण के समान प्रतिष्ठा प्राप्त है। यह ग्रंथ देश-विदेश के अनेक मूर्द्धन्य एवं लब्धप्रतिष्ठ विद्वान् समीक्षकों द्वारा मुक्त कंठ से प्रशंसित है। प्रस्तुत है, धर्म और दर्शन के क्षेत्र में सुप्रतिष्ठित इस ग्रंथ-रत्न का सुमधुर हिंदी अनुवाद।
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