Channabasavanna : Gyan Ki Nidhi
(0)
Author:
Kashinath AmbalgePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
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छोटा होने से क्या हुआ? या बड़ा होने से?</p> <p>ज्ञान के लिए क्या छोटे-बड़े में अन्तर है?</p> <p>आदि-अनादि से पूर्व, अंडांड</p> <p>ब्रह्मांड कोटि के उत्पन्न होने से पूर्व</p> <p>गुहेश्वर लिंग में तुम ही अकेले एक महाज्ञानी</p> <p>दिखाई पड़े, देखो जी, हे चन्नबसवण्णा!</p> <p> </p> <p>भक्त को शान्तचित्त रहना चाहिए</p> <p>अपनी स्थिति में सत्यवान रहना चाहिए</p> <p>सबके हित में वचन बोलना चाहिए</p> <p>जंगम में निन्दा रहित होकर</p> <p>सभी प्राणियों को अपने समान मानना चाहिए</p> <p>तन मन धन, गुरु लिंग जंगम के लिए समर्पित करना चाहिए।</p> <p>अपात्र को दान न देना चाहिए</p> <p>सभी इन्द्रियों को अपने वश में रखना चाहिए</p> <p>यही पहला आवश्यक वृतनेम है देखो</p> <p>लिंग की पूजा कर प्रसाद पाने के लिए यही मेरे लिए साधन है।
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छोटा होने से क्या हुआ? या बड़ा होने से?</p>
<p>ज्ञान के लिए क्या छोटे-बड़े में अन्तर है?</p>
<p>आदि-अनादि से पूर्व, अंडांड</p>
<p>ब्रह्मांड कोटि के उत्पन्न होने से पूर्व</p>
<p>गुहेश्वर लिंग में तुम ही अकेले एक महाज्ञानी</p>
<p>दिखाई पड़े, देखो जी, हे चन्नबसवण्णा!</p>
<p> </p>
<p>भक्त को शान्तचित्त रहना चाहिए</p>
<p>अपनी स्थिति में सत्यवान रहना चाहिए</p>
<p>सबके हित में वचन बोलना चाहिए</p>
<p>जंगम में निन्दा रहित होकर</p>
<p>सभी प्राणियों को अपने समान मानना चाहिए</p>
<p>तन मन धन, गुरु लिंग जंगम के लिए समर्पित करना चाहिए।</p>
<p>अपात्र को दान न देना चाहिए</p>
<p>सभी इन्द्रियों को अपने वश में रखना चाहिए</p>
<p>यही पहला आवश्यक वृतनेम है देखो</p>
<p>लिंग की पूजा कर प्रसाद पाने के लिए यही मेरे लिए साधन है।
Book Details
-
ISBN9789389742039
-
Pages13
-
Avg Reading Time0 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Dr. Vinod Bala Arun
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- Description: रामकथा भारतवर्ष की सांस्कृतिक एकता का प्रबल सूत्र रही है। जहाँ भारत की प्राचीन भाषाओं (पालि, प्राकृत, अपभ्रंश आदि) में विस्तृत राम-साहित्य अनेक विधाओं में लिखा गया, वहीं यह दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के लगभग सभी देशों, जैसे जावा, बाली, मलय, हिंद चीन, स्याम, चीन आदि में भी उपलब्ध होता है। चीन का ‘दशरथ कथानम्’, इंडोनेशिया का ‘रामायण काकावीन’, जावा का ‘सेरतराम’ और स्याम का ‘रामकियेन’ आदि इसके कतिपय उदाहरण हैं। रामकथा मानव जीवन को समुन्नत बनाने वाले नैतिक मूल्यों का अक्षय भंडार है। संभवतः विश्व वाङ्मय में वाल्मीकि-रामायण वह प्रथम ग्रंथ है, जिसमें नैतिक मूल्यों का काव्यात्मक, व्यावहारिक और मूर्तिमान् रूप दिखाई देता है। मनुष्य के अभ्युदय और निःश्रेयस के लिए ये मूल्य इतने उपयोगी और महत्त्वपूर्ण हैं कि वाल्मीकीय रामायण के बाद रामकथा की एक लंबी परंपरा बन गई, जिसमें इन नैतिक मूल्यों को जीवन में आचरित और अवतरित होते हुए दिखाया गया। रामचरितमानस में तो इनको दैवी गरिमा दी गई। इस पुस्तक में रामकथा के मूल ग्रंथ वाल्मीकि-रामायण और शिखर ग्रंथ रामचरितमानस में सन्निहित नैतिक मूल्यों का तुलनात्मक अध्ययन करके मानव जीवन में उनकी उपयोगिता का आकलन किया गया है। नैतिक मूल्यों के संरक्षण-संवर्धन हेतु एक विशिष्ट पुस्तक।
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