Pratinidhi Shairy : Mirza Shauq Lakhnawi
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Mirza Shauq Lakhnawi, Naresh 'Nadeem'Publisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
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मौलाना अब्दुल माजिद दरियावादी ने नवाब मिर्ज़ा ‘शौक़’ लखनवी को ‘उर्दू का एक बदनाम शायर’ तो कहा ही, साथ ही यह फ़ैसला भी सुना दिया कि ‘आज उर्दू की तारीख़ में कहीं उसके लिए जगह नहीं।’ यह और बात है कि सच्चाई आख़िर सिर चढ़कर बोलती है, और अपने इसी लेख में मौलाना ने आख़िर यह बात मानी कि ‘शौक़’ की डायरी की ख़ूबियों ने उनके नाम को गुमनाम नहीं होने दिया; उन्हें बदनाम करके सही, ज़िन्दा रखा। अलावा इसके, आख़िर में वे ख़ुद को यह भी कहने के लिए मजबूर पाते हैं कि ‘मशरिक़ के बेहया सुख़नगी, उर्दू के बदनाम शायर, रुख़सत! तू दर्द भरा दिल रखता था; तेरी याद भी दर्दवालों के दिलों में ज़िन्दा रहेगी। तूने मौत को याद रखा; तेरी याद पर, इंशाअल्लाह, मौत न आने पाएगी।’ इस सिलसिले में स्वर्गीय प्रो. ‘मजनूँ’ गोरखपुरी की बात भी याद रखने योग्य है। लिखते हैं कि उनके एक अंग्रेज़ प्रोफ़ेसर ‘शौक़’ की ‘ज़ह्रे इश्क़’ से बेहद प्रभावित हुए और बोले, ‘तुम लोग हो बड़े कमबख़्त। यह मस्नवी और इस क़समपुर्सी की हालत में! आज यूरोप में यह लिखी गई होती तो शायर की क़ब्र सोने से लेप दी गई होती और अब तक इस मस्नवी के न जाने कितने नुस्ख़े, रंग-बिरंगे एडिशन निकल चुके होते।’ प्रो. ‘मजनूँ’ गोरखपुरी ने तो बल्कि इस मस्नवी का शुमार जनवादी साहित्य में किया है—“ख़वास के लिए यह ऐब है; मगर इसकी क़द्र अवाम से पूछिए।” मुहावरेदार ज़बान और दिलकश तर्ज़े-बयान, देसज और अरबी-फ़ारसी शब्दों पर एक समान अधिकार और उन्हें आपस में दूध-शक्कर कर देने की क्षमता, पात्रों का जीवन्त चरित्र-चित्रण और उनकी भावनाओं का मर्मस्पर्शी वर्णन, इश्क़े-मजाज़ी से इश्क़े-हक़ीक़ी तक की दास्तान—ये तमाम ऐसी ख़ूबियाँ हैं जो ‘शौक़’ को शायरों की पहली क़तार में ला खड़ी करती हैं। और एक मस्नवी जब रंगमंच पर पेश की जाए, फिर पूरा हॉल मातमघर बन जाए, चारों तरफ़ से सिसकियों और हिचकियों की आवाज़ें आनी लगें, कुछ लोग ग़श खाकर लुढ़क पड़ें, घर जाकर एक लड़की आत्महत्या कर ले, कुछ और लोग आत्महत्या की कोशिश करें, और फिर सरकार इस मस्नवी पर पाबन्दी लगा दे, तो आप इसे क्या कहेंगे? ‘शौक़’ को अश्लील कहनेवालों से यह बात ज़रूर पूछी जानी चाहिए कि अश्लीलता थोड़ी देर का मज़ा भले दे ले, क्या वह भावनाओं में इस तरह का तूफ़ान उठाने की क्षमता रखती है।
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मौलाना अब्दुल माजिद दरियावादी ने नवाब मिर्ज़ा ‘शौक़’ लखनवी को ‘उर्दू का एक बदनाम शायर’ तो कहा ही, साथ ही यह फ़ैसला भी सुना दिया कि ‘आज उर्दू की तारीख़ में कहीं उसके लिए जगह नहीं।’ यह और बात है कि सच्चाई आख़िर सिर चढ़कर बोलती है, और अपने इसी लेख में मौलाना ने आख़िर यह बात मानी कि ‘शौक़’ की डायरी की ख़ूबियों ने उनके नाम को गुमनाम नहीं होने दिया; उन्हें बदनाम करके सही, ज़िन्दा रखा। अलावा इसके, आख़िर में वे ख़ुद को यह भी कहने के लिए मजबूर पाते हैं कि ‘मशरिक़ के बेहया सुख़नगी, उर्दू के बदनाम शायर, रुख़सत! तू दर्द भरा दिल रखता था; तेरी याद भी दर्दवालों के दिलों में ज़िन्दा रहेगी। तूने मौत को याद रखा; तेरी याद पर, इंशाअल्लाह, मौत न आने पाएगी।’ इस सिलसिले में स्वर्गीय प्रो. ‘मजनूँ’ गोरखपुरी की बात भी याद रखने योग्य है। लिखते हैं कि उनके एक अंग्रेज़ प्रोफ़ेसर ‘शौक़’ की ‘ज़ह्रे इश्क़’ से बेहद प्रभावित हुए और बोले, ‘तुम लोग हो बड़े कमबख़्त। यह मस्नवी और इस क़समपुर्सी की हालत में! आज यूरोप में यह लिखी गई होती तो शायर की क़ब्र सोने से लेप दी गई होती और अब तक इस मस्नवी के न जाने कितने नुस्ख़े, रंग-बिरंगे एडिशन निकल चुके होते।’ प्रो. ‘मजनूँ’ गोरखपुरी ने तो बल्कि इस मस्नवी का शुमार जनवादी साहित्य में किया है—“ख़वास के लिए यह ऐब है; मगर इसकी क़द्र अवाम से पूछिए।” मुहावरेदार ज़बान और दिलकश तर्ज़े-बयान, देसज और अरबी-फ़ारसी शब्दों पर एक समान अधिकार और उन्हें आपस में दूध-शक्कर कर देने की क्षमता, पात्रों का जीवन्त चरित्र-चित्रण और उनकी भावनाओं का मर्मस्पर्शी वर्णन, इश्क़े-मजाज़ी से इश्क़े-हक़ीक़ी तक की दास्तान—ये तमाम ऐसी ख़ूबियाँ हैं जो ‘शौक़’ को शायरों की पहली क़तार में ला खड़ी करती हैं। और एक मस्नवी जब रंगमंच पर पेश की जाए, फिर पूरा हॉल मातमघर बन जाए, चारों तरफ़ से सिसकियों और हिचकियों की आवाज़ें आनी लगें, कुछ लोग ग़श खाकर लुढ़क पड़ें, घर जाकर एक लड़की आत्महत्या कर ले, कुछ और लोग आत्महत्या की कोशिश करें, और फिर सरकार इस मस्नवी पर पाबन्दी लगा दे, तो आप इसे क्या कहेंगे? ‘शौक़’ को अश्लील कहनेवालों से यह बात ज़रूर पूछी जानी चाहिए कि अश्लीलता थोड़ी देर का मज़ा भले दे ले, क्या वह भावनाओं में इस तरह का तूफ़ान उठाने की क्षमता रखती है।
Book Details
-
ISBN9788183613279
-
Pages175
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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एक बेगाने और असन्तुलित दौर में मंगलेश डबराल अपनी नई कविताओं के साथ प्रस्तुत हैं—अपने शत्रु को साथ लिए। बारह साल के अन्तराल से आए इस संग्रह का शीर्षक चार ही लफ़्ज़ों में सब कुछ बता देता है : उनकी कला-दृष्टि, उनका राजनीतिक पता-ठिकाना, उनके अन्तःकरण का आयतन।
यह इस समय हिन्दी की सर्वाधिक समकालीन और विश्वसनीय कविता है। भारतीय समाज में पिछले दो-ढाई दशक के फासिस्ट उभार, साम्प्रदायिक राजनीति और पूँजी के नृशंस आक्रमण से जर्जर हो चुके लोकतंत्र के अहवाल यहाँ मौजूद हैं और इसके बरक्स एक सौन्दर्य-चेतस कलाकार की उधेड़बुन का पारदर्शी आकलन भी। ये इक्कीसवीं सदी से आँख मिलाती हुई वे कविताएँ हैं जिन्होंने बीसवीं सदी को देखा है। ये नए में मुखरित नए को भी परखती हैं और उसमें बदस्तूर जारी पुरातन को भी जानती हैं। हिन्दी कविता में वर्तमान सदी की शुरुआत ही ‘गुजरात के मृतक का बयान’ से होती है।
ऊपर से शान्त, संयमित और कोमल दिखनेवाली, लगभग आधी सदी से पकती हुई मंगलेश की कविता हमेशा सख्तजान रही है—किसी भी चीज़ के लिए तैयार। इतिहास ने जो ज़ख़्म दिए हैं उन्हें दर्ज करने, मानवीय यातना को सोखने और प्रतिरोध में ही उम्मीद का कारनामा लिखने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध। यह हाहाकार की ज़बान में नहीं लिखी गई है; वाष्पिभूत और जल्दी ही बदरंग हो जानेवाली भावुकता से बचती है। इसकी मार्मिकता स्फटिक जैसी कठोरता लिए हुए है। इस मामले में मंगलेश ‘क्लासिसिस्ट’ मिज़ाज के कवि हैं—सबसे ज़्यादा तैयार, मँजी हुई और तहदार ज़बान लिखनेवाले।
मंगलेश असाधारण सन्तुलन के कवि हैं—उनकी कविता ने न यथार्थ-बोध को खोया है, न अपने निजी संगीत को। वे अपने समय में कविता की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारियों को अच्छे से सँभाले हुए हैं और इस कार्यभार से दबे नहीं हैं। मंगलेश के लहज़े की नर्म-रवी और आहिस्तगी शुरू से उनके अकीदे की पुख़्तगी और आत्मविश्वास की निशानी रही है। हमेशा की तरह जानी-पहचानी मंगलेशियत इसमें नुमायाँ है।
और इससे ज़्यादा आश्वस्ति क्या हो सकती है कि इन कविताओं में वह साजे-हस्ती बे-सदा नहीं हुआ है जो ‘पहाड़ पर लालटेन’ से लेकर उनके पिछले संग्रह ‘आवाज़ भी एक जगह है’ में सुनाई देता रहा था। ‘नए युग में शत्रु’ में उसकी सदा पूरी आबो-ताब से मौजूद है।
—असद ज़ैदी।
Main Jab Tak Aayi Bahar
- Author Name:
Gagan Gill
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‘मैं क्यों कहूँगी तुम से/अब और नहीं/सहा जाता/मेरे ईश्वर’—गगन गिल की ये काव्य-पंक्तियाँ किसी निजी पीड़ा की ही अभिव्यक्ति हैं या हमारे समय के दर्द का अहसास भी? और जब यह पीड़ा अपने पाठक को संवेदित करने लगती है तो क्या वह अभिव्यक्ति प्रकारान्तर से प्रतिरोध की ऐसी कविता नहीं हो जाती, जिसमें ‘दर्दे-तनहा’ और ‘ग़मे-ज़माना’ का कथित भेद मिटकर ‘दर्दे-इनसान’ हो जाता है? कविता इसी तरह इतिहास अर्थात समय का काव्यान्तरण सम्भव करने की ओर उन्मुख होती है।
गगन गिल की इन आत्मपरक-सी लगती कविताओं के वैशिष्ट्य को पहचानने के लिए मुक्तिबोध के इस कथन का स्मरण करना उपयोगी हो सकता है कि कविता के सन्दर्भ ‘काव्य में व्यक्त भाव या भावना के भीतर से भी दीपित और ज्योतित’ होते हैं, उनका स्थूल संकेत या भाव-प्रसंगों अथवा वस्तु-तथ्यों का विवरण आवश्यक नहीं है। इन कविताओं का अनूठापन इस बात में है कि वे एक ऐसी भाषा की खोज करती हैं, जिसमें सतह पर दिखता हल्का-सा स्पन्दन अपने भीतर के सारे तनावों-दबावों को समेटे होता है—बाँध पर एकत्रित जलराशि की तरह।
यह भी कह सकते हैं कि ये कविताएँ प्रार्थना के नये-से शिल्प में प्रतिरोध की कविताएँ हैं—प्रतिरोध उस हर सत्ता-रूप के सम्मुख जो मानवत्व मात्र पर, स्त्रीत्व पर भी, आघात करता है। इन आघातों का दर्द अपने एकान्त में सहने पर ही कवि-मन पहचान पाता है कि ‘मैं जब तक आयी बाहर एकान्त से अपने/बदल चुका था मर्म भाषा का’। ये कविताएँ काव्य-भाषा को उसकी मार्मिकता लौटाने की कोशिश कही जा सकती हैं।
—नन्दकिशोर आचार्य
Aakash Dharti Ko Khatkhataata Hai
- Author Name:
Vinod Kumar Shukla +1
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विनोद कुमार शुक्ल समकालीन कविता के संसार में उन थोड़े से ऐसे कवियों में शुमार हैं जिन्होंने समकालीन कविता की दिशा और दृष्टि को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया है। उनकी इस हैसियत को हिन्दी में लगभग सभी कवियों ने स्वीकार किया है।
काव्याभिव्यक्ति में मित कथनों का जितना सार्थक प्रयोग वे करते हैं, उतना शमशेर ही कर पाते थे। शब्दों को कम से कम ख़र्च करके कैसे अर्थ के भंडार को समेटा जाए इसे सीखने के लिए विनोद कुमार शुक्ल की कविता काम की चीज़ है।
उनकी कविता नितांत समसामयिक होकर भी समयातीत लगती है। वह पीछे भी देखती है और आगे भी, पर उल्लेखनीय बात यह है कि वह अपने समय में धँसी होने के बावजूद अपने समय में फँसती नहीं है। उनके काव्यबोध में जो अचूक क़िस्म की पारदर्शी सूक्ष्मता है, वह कई लोगों को जटिलता, रूपवाद, कलावाद का अवतार लगती है लेकिन रूपवादी कविता है नहीं। काव्य-प्रयोगों के लिए उनसे बड़ा कवि आज कम से कम हिन्दी में दिखाई नहीं देता
वे विचारधारा के पुल से होकर रास्ता तय करने वाले कवि नहीं हैं, बल्कि वे कविता की नदी को ख़ुद तैर कर पार करने वाले कवि हैं। कम से कम उनके लम्बे कवि-कर्म का संघर्ष यही प्रतिमान हमारे सामने रखता है। वे हिन्दी कविता के संसार में उन थोड़े से कवियों में हैं जिन्होंने चालू मुहावरे को तोड़कर अपनी कविता में संवेदना और काव्य-शिल्प के लिए अनोखा आयाम चुना है। अपनी काव्यभाषा के चुनाव में वे जितने विरल, संयमी और जागरूक कवि हैं, उतने कम ही कवि रहे हैं। यह उनकी चुनिन्दा कविताओं का संकलन है।
Sarkti Parchhaiyan
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
- Book Type:

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Book
Hum Jo Nadiyon Ka Sangam Hein
- Author Name:
Bodhisatwa
- Book Type:

- Description:
यह संग्रह अपनी कविताओं के तीव्र आवेग, भाव–विविधता एवं वस्तु–बहुलता के कारण महत्त्वपूर्ण माना जाएगा। बोधिसत्व की कविताएँ मानो अनेक नदियों का संगम हैं। लोकगीतों की ऊष्मा तथा रागात्मकता, वर्तमान जीवन के ‘दुख–तंत्र’ की कठोर प्रतीति और वैचारिक दृढ़ता एवं प्रतिरोध—इन सबके संयोग से ये कविताएँ हमारे लिए एक वैकल्पिक पाठ की सृष्टि करती हैं। ‘हाहाकार के बीच से गुज़रती’ इन कविताओं में दर्ज हैं ‘बेनूर आँखों के ख़्वाब’, ‘सिले होंठों की मुस्कुराहट’ और ‘बँधे हाथों की छटपटाहट’। लोकगीत और बोलियों की शक्ति का उपयोग, जिसके लिए बोधिसत्व की आरम्भिक कविताएँ चिह्नित की गई थीं, उनका अद्यतन रूप यहाँ मिलता है, कुछ ज्वाया और सख़्त।
इनमें बेचैन कर देनेवाली ऐन्द्रिकता है—‘ताज़े आटे की गर्मी थी उसकी ख़ुशी/वसन्त उसके लिए अब उखड़े नाखून की तरह है’। एक विरल करुणा और क्रोध। इनमें जीवन के प्रति समर्थन और लालसा है जैसे कि ‘ऐसा ही होता है’ कविता में, जो साधारण मनुष्य के दैनंदिन प्रेम को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य प्रदान करती है। ‘गंध’ शीर्षक कविता स्वयं बोधिसत्व की कविताओं में अलग से उल्लेखनीय है। यह एक बड़ी कविता है, हमारे जीवन की दारुण विपत्ति, विडम्बना एवं निजी और सामाजिक के सीमा–प्रदेश पर निरन्तर विद्यमान द्वन्द्व की कविता।
एक बात और—ये कविताएँ गहरे राजनैतिक आशय एवं नैतिक संकल्प की कविताएँ हैं। बोधिसत्व का ही शब्द लेकर कहें तो यह वह कविता है ‘जो समाज के हारे–गाढ़े काम दे’।
—अरुण कमल
Dhoop Ka Tukda
- Author Name:
Amrita Preetam +1
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- Description:
अमृता प्रीतम की कविताओं में रमना, हृदय में कसकती व्यथा का घाव लेकर, प्रेम और सौन्दर्य की धूपछाँह-वीथी में विचरने के समान है, जहाँ वियोग तथा अतृप्ति के तीखे नुकीले काँटे भावना के सुकुमार चरणों को क्षत-विक्षत करते रहते हैं । ऐसी गहरी, दर्द में डूबी, प्राणिक संवेदनाओं के गीत कम ही देखने को मिलते हैं। अमृताजी धरती के जीवन के गीत भी गाती हैं । वह युग-संघर्ष के प्रति प्रबुद्ध होने के कारण प्रगतिशील भावधारा से प्रेरित हैं, किन्तु प्रेम के प्रति एकाग्र समर्पण ही उनकी जीवन-साधना तथा आत्म-विकास का एकान्त पथ है।
अमृताजी की कविताओं के अनुवाद से हिन्दी काव्य भाव-धनी, स्वप्न-संस्कृत तथा शिल्प-समृद्ध बनेगा। इन कविताओं से यह सहज ही प्रमाणित हो जाता है कि अमृताजी का स्थान पंजाबी ही नहीं, समस्त भारतीय भाषाओं में भी प्रथम श्रेणी के योग्य है । इस संग्रह से हिन्दी के नये कवियों को विशेष प्रेरणा मिलेगी। जिस गहरी भाव-संवेदना, सामाजिक यथार्थ तथा युग मानव की व्यथा का सच्चा चित्रण अमृताजी ने अपनी नारी-हृदय की जादू-तूली से इन कविताओं में किया है, वह उनकी कृति को एक अत्यन्त उच्च तथा व्यापक स्तर पर उठा देती है।
—सुमित्रानन्दन पंत
Hari Patang Par Hara Patanga
- Author Name:
Varun Grover +1
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Age group 9-12 years कथा शुरू ऐसे होती है ……….एक है घोड़ा दो सवार हैं ….तीन लोक के चार द्वार हैं। यह अपनी हरियाली के लिये अपना बादल आप बनाने के सफर का किस्सा है। भटक भटक के किस्से किस्से जमा किए बादल के हिस्से वरुण ग्रोवर ने इस लम्बी कविता में ऐसी भाषा, बिम्ब और लय अपनाये हैं कि पुराने समय की खोजी यात्राएँ साकार होने लगती हैं। और वह यात्रा भी जो यात्रियों में अपने समय को समझने के लिए चलती है। इसमें एलन शॉ के चित्रों का वैविध्य बेमिसाल है। चित्रों में माया सभ्यता से लेकर अब तक के आम इंसान हैं। सब अपने-अपने तरीकों से अपने बादलों की खोज में दिखाई देते हैं। जैसे यह इंसानी सभ्यता की अनवरत खोज है। इस तरह किताब में दो कविताएँ हैं। दूसरी कहें कि पहलीॽ कि पहले के भी पहले की कविता, एलन शॉ की है।
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