Chidambara
(0)
₹
1195
956 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
‘चिदंबरा’ मेरी काव्यचेतना के द्वितीय उत्थान की परिचायिका है। उसमें ‘युगवाणी’ से लेकर ‘अतिमा’ तक की रचनाओं का संचयन है—सन् ’37 से ’57 तक प्राय: बीस वर्षों की विकास-श्रेणी का विस्तार।</p> <p>‘चिदंबरा’ की पृथु-आकृति में मेरी भौतिक, सामाजिक, मानसिक, आध्यात्मिक संचरणों से प्रेरित कृतियों को एक स्थान पर एकत्रित देखकर पाठकों को उनके भीतर व्याप्त एकता के सूत्रों को समझने में अधिक सहायता मिल सकेगी। इनमें मैंने अपनी सीमाओं के भीतर, अपने युग के बहिरन्तर के जीवन तथा चैतन्य को, नवीन मानवता की कल्पना से मंडित कर, वाणी देने का प्रयत्न किया है। मेरी दृष्टि में ‘युगवाणी’ से लेकर ‘वाणी’ तक मेरी काव्य-चेतना का एक ही संचरण है, जिसके भीतर भौतिक और आध्यात्मिक चरणों की सार्थकता, द्विपद मानव की प्रकृति के लिए, सदैव ही अनिवार्य रूप से रहेगी।</p> <p>‘‘पाठक देखेंगे कि (इन रचनाओं में) मैंने भौतिक-आध्यात्मिक, दोनों दर्शनों से जीवनोपयोगी तत्त्वों को लेकर, जड़-चेतना सम्बन्धी एकांगी दृष्टिकोण का परित्याग कर, व्यापक सक्रिय सामंजस्य के धरातल पर, नवीन लोक-जीवन के रूप में, भरे-पूरे मनुष्यत्व अथवा मानवता का निर्माण करने का प्रयत्न किया है, जो इस युग की सर्वोपरि आवश्यकता है?’’</p> <p>—भूमिका से
Read moreAbout the Book
‘चिदंबरा’ मेरी काव्यचेतना के द्वितीय उत्थान की परिचायिका है। उसमें ‘युगवाणी’ से लेकर ‘अतिमा’ तक की रचनाओं का संचयन है—सन् ’37 से ’57 तक प्राय: बीस वर्षों की विकास-श्रेणी का विस्तार।</p>
<p>‘चिदंबरा’ की पृथु-आकृति में मेरी भौतिक, सामाजिक, मानसिक, आध्यात्मिक संचरणों से प्रेरित कृतियों को एक स्थान पर एकत्रित देखकर पाठकों को उनके भीतर व्याप्त एकता के सूत्रों को समझने में अधिक सहायता मिल सकेगी। इनमें मैंने अपनी सीमाओं के भीतर, अपने युग के बहिरन्तर के जीवन तथा चैतन्य को, नवीन मानवता की कल्पना से मंडित कर, वाणी देने का प्रयत्न किया है। मेरी दृष्टि में ‘युगवाणी’ से लेकर ‘वाणी’ तक मेरी काव्य-चेतना का एक ही संचरण है, जिसके भीतर भौतिक और आध्यात्मिक चरणों की सार्थकता, द्विपद मानव की प्रकृति के लिए, सदैव ही अनिवार्य रूप से रहेगी।</p>
<p>‘‘पाठक देखेंगे कि (इन रचनाओं में) मैंने भौतिक-आध्यात्मिक, दोनों दर्शनों से जीवनोपयोगी तत्त्वों को लेकर, जड़-चेतना सम्बन्धी एकांगी दृष्टिकोण का परित्याग कर, व्यापक सक्रिय सामंजस्य के धरातल पर, नवीन लोक-जीवन के रूप में, भरे-पूरे मनुष्यत्व अथवा मानवता का निर्माण करने का प्रयत्न किया है, जो इस युग की सर्वोपरि आवश्यकता है?’’</p>
<p>—भूमिका से
Book Details
-
ISBN9788126704910
-
Pages354
-
Avg Reading Time12 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Aaradhana
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
- Book Type:

- Description: आराधना के गीत निराला-काव्य के तीसरे चरण में रचे गए हैं, मुख्यतया 24 फरवरी 1952 से आरम्भ करके दिसम्बर 1952 के अन्त तक। इन गीतों से यह भ्रम हो सकता है कि निराला पीछे की ओर लौट गए हैं। वास्तविकता यह है कि "धर्म-भावना निराला में पहले भी थी, वह उनमें अन्त-अन्त तक बनी रही। उनके इस चरण के धार्मिक काव्य की विशेषता यह है कि वह हमें उद्विग्न करता है, आध्यात्मिक शान्ति निराला को कभी मिली भी नहीं, क्योंकि इस लोक से उन्होंने कभी मुँह नहीं मोड़ा, बल्कि इस लोक को अभाव और पीड़ा से मुक्त करने के लिए वे कभी सामाजिक और राजनीतिक आन्दोलनों की ओर देखते रहे और कभी ईश्वर की ओर। उनकी यह व्याकुलता ही उनके काव्य की सबसे बड़ी शक्ति है।" —नंदकिशोर नवल
Media Monthon
- Author Name:
Dr. Mukesh Kumar
- Book Type:

- Description: Book
Prakriti Aur Kriti
- Author Name:
Gyanendrapati
- Book Type:

- Description: नरक्षेत्र के भीतर बद्ध रहने वाली काव्य-दृष्टि की अपेक्षा सम्पूर्ण जीवन-क्षेत्र और समस्त चराचर के क्षेत्र में मार्मिक तथ्यों का चयन करने वाली दृष्टि उत्तरोत्तर अधिक व्यापक और गम्भीर कही जाएगी। रामचन्द्र शुक्ल (रसात्मक बोध के विविध रूप : चिन्तामणि भाग-1 यह है वह दृष्टि-पथ जिस पर संचरण करते हुए ‘प्रकृति और कृति’ कविता-संग्रह का अस्तित्व आकृत हुआ है। ज्ञानेन्द्रपति के कवि-कर्म में अयात्रित जीवन-क्षेत्रों में परिभ्रमण की उत्सुकता आरम्भ से ही मौजूद रही है; सुगम लीक पर चलते रहने की जगह ऊबड़-खाबड़ में भटकते हुए एक तरह के कठिन आनन्द से उत्फुल्ल बने रहना उनके कवि का प्रकृत स्वभाव रहा है। सर्जना की इस प्रचेष्टा की परिणति ‘प्रकृति और कृति’ आपके हाथों में है। यहाँ एक तरफ मानवेतर प्राणियों की अन्यता नहीं, अनन्यता के एहसास के साथ प्रकृति के विविध प्रारूपों की जीवन्त उपस्थिति मिलेगी और मिलेंगे जीवन को पुनर्नव करते हुए ऋतु-चक्र के गति-लेख, तो दूसरी तरफ वे निर्मितियाँ जो मानवकृत होते हुए भी अपनी इयत्ता को जीती रहती हैं : अनेकरूपा सत्ता के संवेदना-पगे साक्षात्कार! यहाँ ईश्वर भी एक कृति है—सर्वोत्तम मानवीय रचना—जिसको अब अनकिया नहीं किया जा सकता। कविता की इस दुनिया में कुछ भी निर्जीव नहीं, जैव स्पंदन से रहित नहीं। चराचर जगत् के ओर-छोर तक प्रसृत हो जाना चाहने वाली इस काव्य-सृष्टि की केन्द्रकील, लेकिन, मनुष्यता का आत्मबोध ही है। भाव-प्रसार के क्षेत्र की व्यापकता मानव-आत्म की संवृद्धि के समरूप है। कविता इसी तरह हमारे लिए अपने अध्यात्म को अर्जित करती है। आशा है, इस पुस्तक से गुजरते हुए पाठक अपनी आँखों में नई आँखों का उन्मीलन महसूस करेंगे और कविता से उनकी प्रीति कुछ और गाढ़ी हो उठेगी।
Khoontiyon Per Tange Log
- Author Name:
Sarveshwardayal Saxena
- Book Type:

-
Description:
‘खूँटियों पर टँगे लोग’ सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का सातवाँ काव्य-संग्रह है, जिसमें शामिल अधिकतर कविताएँ 1976-1981 के बीच लिखी गई थीं। इन कविताओं में नियति और स्थिति को स्वीकार कर लेने की व्यापक पीड़ा है। यह पीड़ा कवि के आत्म से शुरू होकर समाज तक जाती है और फिर समाज से कवि के आत्म तक आती है और इस तरह कवि और समाज को पृथक् न कर, एक करती हुई उसके काव्य-व्यक्तित्व को विराट कर जाती है।
सम्प्रेषण की सहजता सर्वेश्वर की कविताओं का मुख्य गुण रहा है और इसकी कलात्मक साध इस संग्रह में और निखरी है। एक समर्थ कवि के स्पर्श से चीज़ें वह नहीं रह जातीं जो हैं—कोट, दस्ताने, स्वेटर सब-के-सब युग की चुनौतियों से टकराकर क्रान्ति, विद्रोह और विरोध से जुड़ जाते हैं। प्रतीकों और बिम्बों का ऐसा सहज इस्तेमाल दुर्लभ है। सर्वेश्वर का काव्य-संसार बहुत व्यापक है। इतना व्यापक संवेदन-क्षेत्र वह रचते हैं कि उनके एक कवि में अनेक कवि देखे जा सकते हैं और सभी सर्वेश्वर हैं। उनकी काव्य-भाषा लोक से आकर इस तरह सम्भ्रान्त भाषा में मिल जाती है कि एक का खुरदरापन और दूसरे का चिकनापन अलग-अलग पहचान पाना कठिन हो जाता है।
वस्तुतः ‘खूँटियों पर टँगे लोग’ की कविताएँ सर्वेश्वर की काव्य-भाषा को और आगे बढ़ाती हैं तथा समकालीन हिन्दी काव्य को भी, जिसका चरित्र मूल्यों के अभाव और व्यवस्था के दबाव में तेज़ी से बदल रहा है। यह बदलाव, बिना किसी अतिरिक्त आग्रह के, सर्वेश्वर के इस संग्रह में आसानी से देखा जा सकता है।
Dreams Of a Psychopath
- Author Name:
Saumitra +1
- Book Type:

- Description: Description Awaited
Gungunati Nrityamay Kavitayen
- Author Name:
Pooja Saxena
- Book Type:

- Description: Poems
Sirhane ke pal
- Author Name:
Sulabha Kore
- Book Type:

- Description: मराठी भाषी हिंदी कवयित्री सुलभा कोरे का ताज़ा काव्य-संग्रह 'सिरहाने के पल' प्रकृति और जीवन, जीवन और देश, देश और सरोकार के अंतरसंबंधों की सचेत टोह लेती कविताओं का विलक्षण संकलन है। सुलभा कोरे कविता इसलिए लिखती हैं ताकि 'धरती साँस ले सके', पेड़ सपने देख सकें और चिडिय़ा दाना चुग सके। सदियों से जिनके मुँह पर पाबंदियाँ लगी हुई हैं, उन पाबंदियों को चुनौती देती सुलभा की कविताएँ उन्हें बोलने का आह्वान करती हैं। आह्वान करती हैं ताकि वह अपना आसमां $खुद तोल सकें। 'सिरहाने के पल' की कविताएँ इस्तकबाल करती हैं 'अंतिम छोर पर खड़ी औरतों' का, उनकी उड़ान का, उनकी जिम्मेदारियों का और 'गहरी खाई में उतरने' के उनके अदम्य साहस का। 'सिरहाने के पल' की कविताएँ सारे जलते-सुलगते सवालों से बहसतलब होती हैं। भूले-बिसरे यादों को ताज़ा करने का काव्य-आग्रह आपको कविता के पास ले जाएगा। 'अतीत के बवंडर में गुम हो गए पलों' की शिनाख्त करती सुलभा कोरे की कविता राजनीतिक छल-छद्म से भी दो-दो हाथ करती है। कविता अपने पाठकों से सावधान रहने की गुजारिश करती हुई याद दिलाती है कि इस देश में 'सब कुछ बेचा जाएगा', देशभक्ति भी बेची जाएगी और देशद्रोह भी, इमानदारी भी और बेईमानी भी। छोटी-छोटी किंतु निहायत ज़रूरी बातों, विचारों, घटनाओं और मुद्दों का काव्य रूपांतरण कविता को गरिमामयी बनाता है। —कमलानंद झा
Mere Desh Mein Kahte Hain Dhanyavad
- Author Name:
Sharad Chandra
- Book Type:

-
Description:
रने एमिल शार्, जिन्हें अल्बैर् कामू अपने समय का महानतम कवि मानते थे, का जन्म दक्षिणी फ्रांस के प्रोवॉन्स प्रदेश के एक नामी और ख़ूबसूरत क़स्बे, ईल-सुर-सोर्ग में, 7 जून, 1907 को हुआ था। उन्होंने अपने जीवन का ज़्यादातर समय पेरिस और प्रोवान्स में बिताया।
शार् ने अपने बिम्ब और प्रतिमाएँ दक्षिण फ्रांस में बीते अपने बचपन से और वहाँ के प्राकृतिक दृश्यों से ली हैं। वो कोई देहाती कवि नहीं थे, लेकिन देहात के दृश्यों का प्रभाव उनकी कविताओं में भरपूर मिलता है। प्रकृति के प्रति शार् की आस्था उतनी ही दृढ़ थी जितनी अपनी कविताओं के शिल्प के प्रति। उन्होंने सोर्ग नदी के प्रदूषण, वान्तू—जिस पर प्रैटार्क ने 1336 में विजय प्राप्त की थी—और मौं मिराइल पहाड़ों की चोटियों पर न्यूक्लियर रिएक्टरों के लगाने पर शहरी आपत्ति जताई थी।
शार् की सृजनात्मक दृष्टि पर, उनके कविता लिखने के उद्देश्य और शिल्प पर जिन लोगों का प्रभाव रहा, उनमें ग्रीक दार्शनिक हेरा क्लाइटस, फ़्रैंच कलाकार जॉर्ज दि लातूर और कवि आर्थर रैम्बो को प्रमुख माना जाता है। रैम्बो का साया उनके बिम्बों पर स्पष्ट दिखता है, ख़ास तौर से उनकी सूक्ष्म, घनीभूत गद्य कविताओं में। शार् पर एक और प्रभाव रहा अति यथार्थवाद का।
शार् एक ही विधा में लिखना पसन्द नहीं करते। उन्होंने मुख्य रूप से तीन विधाओं (forms) में कविताएँ लिखी हैं : मुक्त छन्द, गद्य कविता, और सूक्ति। वो अपनी पद्य कविताओं (Verse Poems) और गद्य कविताओं में उन्हीं विषयों को परिवर्द्धित करते हैं जिन्हें उन्होंने अपनी सूक्तियों में उठाया।
अपनी आख़िरी किताब के प्रकाशन तक शार् इस धारणा के समर्थक रहे कि कला, साहित्य और संगीत पारस्परिक रूप से प्रतिरोध की आवश्यक अभिव्यक्ति में जुड़े हुए हैं।
Mere Rashk-E-Qamar
- Author Name:
Fanah Buland Shehri Shoaib Shahid
- Book Type:

- Description: फ़ना बुलन्दशहरी का मूल नाम हनीफ़ मोहम्मद था। आपका बुनियादी ताल्लुक़ उत्तर प्रदेश सूबे के बुलन्दशहर से था। आपकी पैदाइश का वक़्त मुस्तनद तौर बता पाना मुमकिन है, न ही बुलन्दशहर में आपकी पैदाइश की जगह और शिजरा। इसकी वाहिद वजह यही है कि फ़ना साहब एक सूफ़ी शायर थे। और सूफ़ी शायर अपना कलाम सिर्फ़ अपने महबूब के लिए लिखते हैं और ख़ुद को दुनिया से छुपा कर गुमनाम कर लेना उनका तरीक़ा रहा है। आपकी पैदाइश के कुछ बरस बाद ही आप हिजरत करके पाकिस्तान चले गए। शायरी का शौक़ बचपन से था। उस दौर के मशहूर शायर क़मर जलालवी के शागिर्द हो गए। आपका सूफ़ियाना ताल्लुक़ मोहम्मद शरीफ़ मियाँ क़ादरी नक़्शबंदी पीलीभीत से था और आपका आख़िरी वक़्त गुजराँवाला और लाहौर की ख़ानक़ाहों में गुज़रा। यहीं 1 नवम्बर 1986 को आपका इन्तिक़ाल हो गया।
Silent Uproar
- Author Name:
Surbhi Islam
- Book Type:

- Description: Step into a world where Surbhi Islam skillfully simmers life’s ingredients in the pot of her soul, creating a poetic feast that resonates deeply. With culinary art as her palette and flavors as her strokes, she creates vibrant dishes that evoke a symphony of emotions on the palate. Ta da! A new tadka of poetry collection is ready!!
Udti Dhool
- Author Name:
Amjad Islam Amjad
- Book Type:

- Description: कौन आएगा! किसकी आहट पर मिट्टी के कान लगे हैं! ख़ुशबू किसको ढूँढ रही है! शबनम का आशोब समझ और देख कि उन फूलों की आँखें किस का रस्ता देख रही हैं किसकी ख़ातिर क़रया-क़रया जाग रहा है सूना रस्ता गूँज रहा है किसकी ख़ातिर!! तनहाई के हौल नगर मे शब-भर गिरते पत्तों की आवाज़ें चुनता रहता हूँ अपने सर पर तेज़ हवा के नौहे सुनता रहता हूँ
The Unspoken Scars
- Author Name:
Crrystal Agravat
- Rating:
- Book Type:

- Description: Painful, bold, and raw. In her first collection, Crrystal Agravat exhibits pieces of naked and real emotions enclosed in a poetry book. The book revolves around a teenage girl who saw the world as black and dark but overcame the pain inflicted on her with her resilience and power, evolving into a strong woman. This book gives the reader an insight into the real hardships, the unbearable pain, and the shattered heart of a human being. Once you delve into the book, you shall form a superficial connection with her. Jump into this ocean of unmatched pain, struggle, and a ray of hope.
Ayushya
- Author Name:
Rajvardhan Azad
- Book Type:

- Description: जीवन में आस्था और उसके सत्य के अन्वेषण की जिज्ञासा ही ‘आयुष्य’ की मूल प्रेरणा है। इस प्रबन्ध-काव्य में कथा के स्थान विचार की सरिता प्रवाहित होती है जो मानव-जीवन के इस सिरे से लेकर उस सिरे तक जाती है—यानी जन्म से लेकर जीवन के अवसान तक। आठ सर्गों में विभाजित इस प्रबन्ध-काव्य का प्रत्येक चरण मनु के बाह्य और आन्तरिक जीवन का सम्पूर्ण चित्र प्रस्तुत करता है। एक दार्शनिक की भंगिमा में कवि मनुष्य की ऐहिक यात्रा के अलग-अलग पड़ावों पर ठहरकर उन सारे बिम्बों को सँजोता है, उन पर विचार करता है, जो हमारे अस्तित्व को परिभाषित करते हैं। बचपन के ललित चित्रों से आरम्भ होकर यह कृति यौवन के सपनों-संघर्षों, प्रौढ़ वय के गाम्भीर्य और वृद्धावस्था के शान्त समतल से होती हुई समय के उस विराट विवर पर समाप्त होती है जहाँ सब कुछ किसी विराट में विलय हो जाता है—जीवन भी, सृष्टि भी; और जिज्ञासु मानव मस्तिष्क जहाँ हठात् जीवन के उद्देश्य का अन्वेषण नए सिरे से करने को व्याकुल हो उठता है।जीव का विलोपन या जीवन का विघटन?मनुष्य के संसार में अवतरण का प्रयोजन? आज जब हम सभ्यता के ऐसे चरण में पहुँच गए हैं जहाँ मनुष्य जीवन का मोल शायद कुछ भी नहीं, हर दिन ऐसा लगता है, ‘आयुष्य' की प्रश्नाकुलता को अनुभव करना एक नई दृष्टि की आधार-भूमि बनेगी।
Bharat-Bharati
- Author Name:
Maithlisharan Gupt
- Book Type:

- Description: v data-content-type="html" data-appearance="default" data-element="main"><p>‘भारत-भारती’ मैथिलीशरण गुप्त की सर्वाधिक प्रचलित कृति है। यह सर्वप्रथम संवत् 1969 में प्रकाशित हुई थी और अब तक इसके पचासों संस्करण निकल चुके हैं। एक समय था जब ‘भारत-भारती’ के पद्य प्रत्येक हिन्दी-भाषी के कंठ पर थे। गुप्त जी का प्रिय हरिगीतिका छन्द इस कृति में प्रयुक्त हुआ है। भारतीय राष्ट्रीय चेतना की जागृति में इस पुस्तक का हाथ रहा है। यह काव्य तीन खण्डों में विभक्त है : <br />(1) ‘अतीत’ खंड, (2) ‘वर्तमान’ खंड, (3) ‘भविष्यत्’ खंड। ‘अतीत’ खंड में भारतवर्ष के प्राचीन गौरव का बड़े मनोयोग से बखान किया गया है। भारतीयों की वीरता, आदर्श, विद्या-बुद्धि, कला-कौशल, सभ्यता-संस्कृति, साहित्य-दर्शन, स्त्री-पुरुषों आदि का गुणगान किया गया है। ‘वर्तमान’ खंड में भारत की वर्तमान अधोगति का चित्रण है। इस खंड में कवि ने साहित्य, संगीत, धर्म, दर्शन आदि के क्षेत्र में होनेवाली अवनति, रईसों और उनके सपूतों के कारनामें, तीर्थ और मन्दिरों की दुर्गति तथा स्त्रियों की दुर्दशा आदि का अंकन किया है। ‘भविष्यत्’ खंड में भारतीयों को उद्बोधित किया गया है तथा देश के मंगल की कामना की गई है।</p>
Thanega Pranam
- Author Name:
Manju Preetham
- Rating:
- Book Type:

- Description: The best poetry collection
Ab Meri Bari
- Author Name:
Ankita Anand
- Book Type:

-
Description:
अब मेरी बारी की कविताएँ नए समय की उस नई स्त्री को सम्मुख लाती हैं जो प्रेम तो करना जानती है, लेकिन अपनी वैयक्तिक इयत्ता की क़ीमत पर नहीं। वह प्रेम में डूब जाना चाहती है, लेकिन इस आश्वस्ति के साथ कि प्रेम का दूसरा भागीदार भी उतना ही गहरे उतरे—दूसरे के साथ/न होना/ नहीं होता वफ़ादार होना/वफ़ादार होना होता है/
किसी के साथ/पूरी तरह होना!
प्रेम, पाठ, पहचान और परिवेश—इन श्रेणियों में विभक्त इस संग्रह की कविताएँ जीवन और समाज के अन्य हलक़ों को भी इतनी ही आत्म सजगता के साथ देखती हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि ये कविताएँ अपनी भाषा भी अलग ढंग से गढ़ती हैं। निहायत और ग़ैर-पारम्परिक बिम्बों और प्रतीकों का उपयोग करती हुई ये कविताएँ अपनी एक नई भाषा ईजाद करती हैं जिसके ऊपर काव्यास्वाद की स्वीकृत
पम्परा का भार लगभग नहीं है।
पुरुषों के घेरों के बीच अपने पूरे आप को लेकर खड़ी हुई औरतों की तरफ़ से कहा गया है—हम अट्टहास करें, भयावह दिखें, ऑक्टोपस बनें/शरीर से छोड़ें स्याही की पिचकारियाँ/उन पर साधे/जो संग होली खेलने को व्याकुल थे।
Aankhein
- Author Name:
Sara Shagufta
- Book Type:

-
Description:
पाकिस्तान में उर्दू की शायरात शायरी के मैदान में शायरों से कहीं आगे निकल गई हैं, जिसकी मिसाल दुनिया भर में किसी देशकाल में नहीं मिलेगी। उन शायरात में जो पोस्ट-मॉडर्न कहलाती हैं, उनमें सारा शगुफ़्ता, अज़रा अब्बास, किश्वर नाहीद, नसरीन अंजुम भट्टी, अनूपा, तनवीर अंजुम और शाइस्ता हबीब के नाम ज़्यादा नुमायाँ हैं। लेकिन सारा शगुफ़्ता इनमें सब से ऊपर हैं। ‘सुपर पोएटेस’ या ‘क्वीन ऑफ़ पोएटिक्स’ के तौर पर वह चमत्कार से कम नहीं। ...पढ़ने वाले मेरी राय से इत्तिफ़ाक़ करेंगे कि इतनी आला शायरी पश्चिम में भी नहीं हो रही। यह शायरी हालाँकि आज की पोस्ट-मॉडर्न रिवायत की तरह सुगठित नहीं लेकिन असर-अंगेज़ी में अपना जवाब नहीं रखती, और आला सतह की शायरी को भी कहीं पीछे छोड़ जाती है।
—मुबारक अहमद, आँखें (उर्दू) के फ़्लैप से
सारा जिस तरह की ज़िन्दगी गुज़ारती थी, ज़हनी सतह पर ख़ुद भी उसे पसंद नहीं करती थी। इसीलिए हमेशा अपराध-भाव से भरी रहती थी। उसकी शायरी में इसी अपराध-भाव की झलक नज़र आती है। ऐसी ज़िन्दगी को वह ख़ुद से चिमटाये हुए चलती थी... एक नज़्म में वह कहती है : मुझे रोटी दो, और फिर गाली दो।
—अतिया दाऊद, ‘सारा मेरी दोस्त’ से
...सारा शगुफ़्ता के नाम और उसकी शायरी को दूसरे समकालीन शायरों और उनकी रचनाओं के साथ ब्रैकेट नहीं किया जा सकता। यह तो ज़रूर है कि उसने ज़्यादातर नज़्में नस्री नज़्म के रूप में लिखीं लेकिन उसकी नस्री शायरी पिछले तीन दशकों (1960 के बाद) से अब तक की नस्री शायरी से बिलकुल अलग नज़र आती है। उसकी शब्दावली की बनावट बेमिसाल है। हम उसकी शायरी की विषय-वस्तु पर बात करें तो उसकी आँखें सब से अहम समयकाल—चरम-जीवन से चरम-मृत्यु तक फैली है। कम से कम भारतीय उपमहाद्वीप में सारा शगुफ़्ता के सिवा कोई ऐसी औरत नज़र नहीं आती जिसने शायरी और अदब के माध्यम से इस इन्तहा पर पहुँच कर सच—बल्कि नंगा सच—बोला हो।
—अहमद हमीश, मशहूर शायर और ‘आँखें’ (उर्दू) के प्रकाशक
Pratinidhi Kavitayen : Chandrakant Devtale
- Author Name:
Chandrakant Devtale
- Book Type:

- Description: चन्द्रकान्त देवताले की कविता के विषय-वस्तु संसार के ऐतिहासिक तथ्य मात्र नहीं हैं, एक अदम्य और अनवरत् जारी सृजनात्मक ऊर्जा के जादुई स्पर्श से ही चन्द्रकान्त इन विषयों का काव्य-रूपान्तरण करते हैं। उनकी कविताओं में मौजूद लयों की विविधता के पीछे शिल्प-संयम या कौशल या नवाचार की ज़ाहिर चेष्टा की जगह एक तरह की रागाविष्ट स्वत:स्फूर्तता ही अधिक है। इसी वजह से उनके वस्तु-वर्णन भी किसी रैखिक वैचारिकता में विन्यस्त नहीं लगते। वास्तव में उनकी कविता की पक्षधर वैचारिकता या उसकी प्रतिबद्धता का स्रोत मानव विवेक के आदिम संघर्ष और अपनी लोकोन्मुख सांस्कृतिक परम्परा में है। उपभोग और उन्माद की सभ्यता के बेरोक प्रसार, राजनैतिक संस्कृति में लगातार जारी गिराव, शोषण, दमन और अन्याय को पालने-पोसनेवाली बाज़ारू रफ़्तार के विरुद्ध, ख़ालिस देसी सन्दर्भों के धधकते अनुभवों में वाग्मिता और बेबाकी से विन्यस्त चन्द्रकान्त देवताले की कविता कवि की पक्षधरता का एक मार्मिक और अविस्मरणीय दस्तावेज़ है। चन्द्रकान्त देवताले की कविता श्रम के सम्मान और लोक-संस्कृति की स्मृतियों से ही अपनी मूल्य-चेतना को निरन्तर संस्कारित करती रही है। इसीलिए उनके यहाँ न तो भारतभूमि में जन्म लेने और जीने की गद्गद आत्ममुग्ध भारतीयता है और न ही ऐसी कोई महान विश्वदृष्टि जिसे पास-पड़ोस के रोज़मर्रे का दु:ख और अन्याय ही न दिखे। चन्द्रकान्त देवताले की कविता का सार अगर करना ही हो, तो मुक्तिबोध के शब्दों में 'वह आवेगत्वरित कालयात्री है’।
Use Laut Aana Chahiye
- Author Name:
Sudeep Banerji
- Book Type:

-
Description:
मुझे अपनी कविताओं के प्रति मोह बिलकुल नहीं है, ऐसा कहना ग़लत होगा। मैं शायद ज़रूरत से ज़्यादा सतर्क और सजग अपनी कविताओं के बारे में हूँ—इसलिए उनसे डरता रहता हूँ। फिर भी यदि कविता लिखता हूँ तो लगता है, ऐसी बातें तो मैं कह चुका हूँ, दूसरे शब्दों से उन्हीं बातों को सहलाना भी मेरे चुक जाने की ही निशानी है। ऐसा नहीं कि मेरे पास विचार या जीवनानुभवों का टोटा पड़ गया है—अभी भी किसी विचार, किसी घटना, छोटी-बड़ी बात से परेशान हो उठता हूँ, कभी-कभी महीनों तक जूझता रहता हूँ। पर उनसे निकलने के लिए कविता मेरे लिए अब आसान रास्ता नहीं रह गई है।
मैं सोचता हूँ कि लेखन में कोई इसलिए आता है कि उसे अपने दिए हुए संसार में बने रहना नाकाफ़ी लगता है। उसके आस-पास जो लोग हैं, सिर्फ़ उनसे रूबरू होकर उसका काम नहीं चलता। वह ऐसे लोगों से बातचीत करना चाहता है जिन्हें वह जानता भी नहीं है, जो दूसरे नगरों में रहते हैं, जो शायद मर चुके हैं या अभी पैदा भी नहीं हुए हैं। वह अपने आस-पास की सांसारिकताओं में ही मशगूल हो जाता है, या दीगर दिलचस्पियों में खप जाता है तो उसकी मानसिकता में दूर, मनचाहे से, अज्ञात से रिश्ते जोड़ने की सामर्थ्य नहीं बची रहती। जितने मनोरथ मैंने उठा रखे हैं, वे ही अब मुझसे नहीं सधते—क्या किया जाए?
देश में और समाज में तमाम तरह की उत्तेजनाएँ हैं। करोड़ों लोग अपनी ज़िन्दगी के थोड़े-बहुत सार्थक को भी बचा रख पाने के लिए दारुण संघर्ष में लगे हुए हैं। काफ़ी लोग बदलाव के लिए बेचैन हो रहे हैं। यह देश और दुनिया ऐसी बने रहने के लिए अभिशप्त नहीं है। तमाम लोग लगे हैं, इसे बदलने के लिए। इस बात से कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता कि एक कवि चुक गया है या उसका वक़्त आ गया है। हो सकता है कि ठीक अज़ाँ सुनने पर वह भी अपना क़फ़न फाड़कर बाहर निकल ही आए। अपनी छोटी-सी भूमिका निभाने में शायद वह और कोताही न करे। मूक बोलने लगे और पंगु गिरि को लाँघने लगे, ऐसा नामुमकिन नहीं है।
— सुदीप बॅनर्जी
Uttar Kabeer Aur Anya Kavitayen
- Author Name:
Kedarnath Singh
- Book Type:

-
Description:
‘उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ’ केदारनाथ सिंह का पाँचवाँ काव्य-संकलन है, जिसमें पिछले छह-साढ़े छह वर्षों के बीच लिखी गई कविताएँ संगृहीत हैं। यह दौर बाहर और भीतर, दोनों ही धरातलों पर क्षिप्र परिवर्तनों का दौर रहा है। इस संग्रह की कविताओं में उसकी कुछ अनुगूँजें सुनी जा सकती हैं। पर एक ख़ास बात यह है कि यहाँ बहुत-सी कविताएँ एक ऐसे स्मृतिलोक से छनकर बाहर आई हैं, जहाँ समय के कई सम-विषम धरातल एक साथ सक्रिय हैं। इस संग्रह तक आते-आते कवि की भाषा में एक नई पारदर्शिता आई है। इस भाषालोक में कुछ भी वर्जित या अग्राह्य नहीं है—पर यहाँ ऐसे शब्दों पर भरोसा बढ़ा है, जो मानव-व्यवहार में लम्बे समय तक बरते गए हैं।
इस संग्रह की कविताओं में अपने स्थान के साथ कवि का रिश्ता थोड़ा बदला है, जिसका एक संकेत ‘गाँव आने पर’ जैसी कविता में देखा जा सकता है। रचना में यह नया धरातल एक तरह के आन्तरिक विस्थापन की सूचना देता है। विस्थापन की यह पीड़ा अनेक दूसरी कविताओं में भी देखी जा सकती है—यहाँ तक कि ‘कुदाल’ में भी। कोई चाहे तो कह सकता है कि यह कवि के काव्य-विकास में एक नए प्रस्थान की आहट है—हालाँकि ये कविताएँ अपने स्वभाव के अनुसार इस तरह का कोई दावा नहीं करतीं। इस संकलन की बहुत-सी कविताओं में एक अन्तर्निहित प्रश्नात्मकता है। वे अक्सर कुछ पूछती हैं—बाहर से कम और अपने-आपसे ज़्यादा। ‘उत्तर कबीर’ शीर्षक अपेक्षाकृत लम्बी कविता इस प्रश्नात्मक बेचैनी का एक बेलौस उदाहरण है। फिर इस पूछने की धार के आगे मुक्ति भी विडम्बनापूर्ण लगने लगती है और स्वयं कवि-कर्म भी—जो सड़ रहा है और ज़ाहिर कि बहुत कुछ है जो सड़ रहा है क्या मैं उसे बचा सकता हूँ कविता लिखकर?
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book