Hamari Umra Ka Kapas
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Book Details
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ISBN9788119092970
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Pages133
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Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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पुस्तक में इन कवियों के जीवन और सृजन के साथ ही उनकी तीन-तीन ऐसी प्रमुख रचनाएँ भी संकलित की गई हैं जो राष्ट्रीय चेतना की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं।
Tulsidas "Nirala"
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
- Book Type:

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“तुलसीदास में स्वाधीनता की भावना का पूर्ण प्रस्फुटन हुआ है। भारत के सांस्कृतिक सूर्य के अस्त होने पर देश में किस तरह अन्धकार छाया हुआ है, इसका मार्मिक चित्रण करते हुए निराला ने दिखलाया है कि किस प्रकार एक कवि इस अन्धकार को दूर करने की चेष्टा करता है। तुलसीदास के रूप में निराला ने आधुनिक कवि के स्वाधीनता-सम्बन्धी भावों के उद्गम और विकास का चित्रण किया है। छायावादी कवि की तरह निराला के तुलसीदास को भी देश की पराधीनता का बोध प्रकृति की पाठशाला में ही होता है; किन्तु छायावादी कवि की तरह वे भी कुछ दिनों के लिए नारी-मोह में पड़कर उस भाव को भूल जाते हैं। अन्त में जो ज्ञान प्रकृति की पाठशाला में मिला था, उसका दीक्षांत भाषण उसी नारी के विश्वविद्यालय में सुनने को मिलता है, और भविष्यवाणी होती है कि :
देश-काल के शर से बिंधकर
यह जागा कवि अशेष छविधर
इसके स्वर से भारती मुखर होंगी।
इस तरह हिन्दी जाति के सबसे बड़े जातीय कवि की जीवन-कथा के द्वारा निराला ने अपनी समसामयिक परिस्थितियों में रास्ता निकालने का संकेत दिया है।”
—नामवर सिंह
Meri Aawaj Suno
- Author Name:
Kaifi Azmi
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- Description: गीत लिखना और ख़ास तौर पर फ़िल्मों के लिए गीत लिखना कुछ ऐसा अमल है जिसे उर्दू अदीब एक लम्बे अरसे तक अपने स्तर से नीचे की चीज़ समझता रहा है। एक ज़माना था भी ऐसा जब फ़िल्मों में संवाद-लेखक (‘मुंशी’) और गीतकार सबसे घटिया दर्जे के जीव समझे जाते थे। इसलिए अगर मरहूम ‘जोश’ मलीहाबादी फ़िल्म-लाइन को हमेशा के लिए ख़ैरबाद कहकर ‘सपनों’ की उस दुनिया से भाग आए तो इसका कारण आसानी से समझा जा सकता है। उतनी ही आसानी से यह बात भी समझी जा सकती है कि क्यों लोगों ने राजा मेहदी अली ख़ान जैसे शायरों पर ‘नग़्मानिगार’ का लेबिल चिपकाकर उनकी शायराना शख़्सियत को एक सिरे से भुला दिया। एक ज़माना वह भी आया जब लखनऊ और दिल्ली की सड़कों पर फटे कपड़ों और फटी चप्पलों में मलबूस, हफ़्ते में दो दिन भूखे रहनेवाले तरक़्क़ीपसंद शायरों की एक जमात रोज़ी-रोटी की तलाश में आगे-पीछे बंबई जा पहुँची। इन्हीं तरक़्क़ीपसंद नौजवान शायरों का कमाल यह रहा कि जहाँ तक गीत-कहानी-संवाद का सवाल है, उन्होंने फ़िल्म-जगत का नक़्शा ही बदलकर रख दिया। नग़्मगी के अलावा अछूते बोल और ऊँचे ख़यालात, भविष्यमुखी दृष्टि और इनसानी ज़िंदगी के उरूज को लेकर देखे जानेवाले सपने इन गीतकारों की विशेषता थे। सच तो यह है कि, इन गीतकारों के पहले या उनके बाद, गीत की विधा कभी इतनी ऊँचाई तक नहीं पहुँची जहाँ तक उसे इन शायरों के दस्ते-मुबारक ने पहुँचा दिया। इन शायरों और नग़्मानिगारों के योगदान को समझना हो तो आज के पतन के माहौल से मुक़ाबला करके समझिए जब पैसा बटोरने के लिए लालायित खोटे सिक्के खरे सिक्कों को बाज़ार से विस्थापित करने लगे हैं। ऐसे ही अँधेरे, काले माहौल में ‘कैफ़ी’ जैसे शायरों के गीत जुगनुओं की तरह चमकते दिखाई देते हैं और, आप जानें, अल्लामा इक़बाल ने तो जुगनू को परवाने से लाख दर्जा बेहतर ठहराया है। ‘कैफ़ी’ के फ़िल्मी गीतों का मूल उर्दू पाठ ‘मेरी आवाज़ सुनो’ के उनवान से 1974 में प्रकाशित हुआ था और तब से इसके अनेकों संस्करण सामने आ चुके हैं। बेशक दूसरे फ़िल्मी गीतकारों की तरह ‘कैफ़ी’ की भी सीमाएँ रही हैं। क्या कहना है, इसका निश्चय गीतकार नहीं करता, फ़िल्म के निर्माता और निर्देशक करते हैं। लेकिन कैसे कहना है—इस बारे में शायर एक हद तक अपनी बात चला ही सकता है। फ़िल्मी गीत अधिकतर रोमानी होते हैं जो रोमांस के सुखों या दु:खों का वर्णन होते हैं। लेकिन इस महदूद से दायरे में भी ‘कैफ़ी’ ने अपनी शायराना फ़ितरत का, अदीब की दूर-रस निगाह का दामन नहीं छोड़ा। काग़ज़ के फूल, हक़ीक़त, यहूदी की बेटी, गरम हवा और अर्थ जैसी फ़िल्मों के लिए ‘कैफ़ी’ ने जो गीत लिखे उनकी हैसियत किसी अदबपारे से कम नहीं, और यही बात फ़िल्म पाकीज़ा के उस अकेले गीत ‘चलते-चलते’ के बारे में कही जा सकती है जो ‘कैफ़ी’ के जादूबयान क़लम की सौग़ात है। लेकिन ये तो गिनी-चुनी मिसालें हैं; पूरा ख़ज़ाना इस समय आपके अपने हाथों में है। क्या है आख़िर ‘कैफ़ी’ के गीतों की वह विशेषता जो इनको दूसरे हज़ारों फ़िल्मी गीतों से अलग करती है ? बात बहुत सादा-सी है। ‘कैफ़ी’ ने किसी की छत पर कबूतरों को गुटुर-गूँ नहीं कराया, किसी की शालू का टाँका समोसे के आलू से नहीं भिड़ाया, किसी से ‘आ जा आ जा मोरे बालमा’ की पुकार भी नहीं लगवाई जो फ़िल्मी गीतकारों के लिए आसान-सा नुस्ख़ा है। ‘कैफ़ी’ उन गीतकारों में से नहीं जो फ़ख़्र से कहते हैं कि उन्होंने एक दिन में 23 गीत लिखे। इसके बजाय ‘कैफ़ी’ उन गीतकारों में एक हैं जो अपनी नज़्मों और ग़ज़लों की तरह अपने गीतों को भी महीनों तक माँजते रहते हैं और इस तरह अपनी रूह की गहराइयों से जो चीज़ निकालकर पेश करते हैं, वह तक़रीबन 24 कैरेट की होती है। इसीलिए ‘कैफ़ी’ के गीत उन हज़ारों गीतों में नहीं हैं कि इधर सिनेमा हॉल से फ़िल्म का बैनर उतरा और उधर उसके गीत भी लोगों की ज़बान से उतर गए। वो उतरें भी कैसे, उन्हें तो फ़िल्म देखनेवालों और गीत सुननेवालों ने ‘कैफ़ी’ की नहीं, अपनी आवाज़ समझकर अपनी रूह की गहराइयों में बसा लिया है ! ‘कैफ़ी’ के इन्हीं गीतों का तबर्रुक (प्रसाद) आज ‘मेरी आवाज़ सुनो’ के उनवान से हिन्दी पाठक के हाथों में है। सलाम इस आवाज़ पर और आवाज़ देनेवालों पर, सलाम ‘कैफ़ी’ के हमनवाओं पर, और सलाम उस रवायत पर जिसने ‘कैफ़ी’ को ‘कैफ़ी’ बनाया !!
Deewan-E-Galib
- Author Name:
Ali Sardar Jafri
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साहित्य के हज़ारों साल लम्बे इतिहास में जिन चन्द काव्य-विभूतियों को विश्वव्यापी सम्मान प्राप्त है, ग़ालिब उन्हीं में से एक हैं। उर्दू के इस महान शायर ने अपनी युगीन पीड़ाओं को ज्ञान और बुद्धि के स्तर पर ले जाकर जिस ख़ूबसूरती से बयान किया, उससे समूची उर्दू शायरी ने एक नया अन्दाज़ पाया और वही लोगों के दिलो-दिमाग़ पर छा गया। उनकी शायरी में जीवन का हर पहलू और हर पल समाहित है, इसीलिए वह जीवन की बहुविध और बहुरंगी दशाओं में हमारा साथ देने की क्षमता रखती है।
काव्यशास्त्र की दृष्टि से ग़ालिब ने स्वयं को ‘गुस्ताख़’ कहा है, लेकिन यही उनकी ख़ूबी बनी। उनकी शायरी में जो हलके विद्रोह का स्वर है, जिसका रिश्ता उनके आहत स्वाभिमान से ज़्यादा है, उसमें कहीं शंका, कहीं व्यंग्य और कहीं कल्पना की जैसी ऊँचाइयाँ हैं, वे उनकी उत्कृष्ट काव्य-कला से ही सम्भव हुई हैं। इसी से उनकी ग़ज़ल प्रेम-वर्णन से बढ़कर जीवन-वर्णन तक पहुँच पाई। अपने विशिष्ट सौन्दर्यबोध से पैदा अनुभवों को उन्होंने जिस कलात्मकता से शायरी में ढाला, उससे न सिर्फ़ वर्तमान के तमाम बन्धन टूटे, बल्कि वह अपने अतीत को समेटते हुए भविष्य के विस्तार में भी फैलती चली गई। निश्चय ही ग़ालिब का यह दीवान हमें उर्दू-शायरी की सर्वोपरि ऊँचाइयों तक ले जाता है।
Amiri Rekha
- Author Name:
Kumar Ambuj
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न्याय और अन्याय, अभाव और रईसी, इच्छा और यथार्थ, पुरातन और नई सभ्यता जैसे अनेक विलोम प्रत्ययों के बीच वैचारिक आवागमन को ये कविताएँ अप्रत्याशित अनूठेपन एवं द्वंद्वात्मकता के साथ सम्भव बनाते हुए नए प्रस्ताव प्रस्तुत करती हैं। यहाँ भाषा, विचार, नैतिकता और स्वप्नशीलता के साथ कलाकर्म की वही अप्रतिम सर्जनात्मकता दृष्टव्य है जिसे कुमार अंबुज की कविता ने लगातार अर्जित किया है और अंबुज हर बार उसे नई ऊँचाइयों, अभिनव जगहों तक ले गए हैं। ये कविताएँ सक्रिय और सकर्मक प्रतिरोध की रचनात्मक कार्रवाई हैं। इनमें जीवन के संगीत, उत्तराधिकार, वैश्विकता, राजनीति, बाज़ार, मनुष्यता, प्रेम और अपमान की, हमारे समय और हमारी भाषा की पुनर्परिभाषाएँ हैं, उनकी आधुनिक पहचान है। साहसिक आत्मावलोकन और प्रवंचनाएँ भी हैं। इन कविताओं से अपने भीतर के टूटे-फूटे मनुष्य की मरम्मत की जा सकती है। इन्हें इनके खुरदुरेपन के लिए प्यार किया जा सकता है और इस बात के लिए भी कि इनके भीतर कितना कुछ है—शान्त, चपल और भविष्य से लबालब भरा हुआ। संवेदित, व्यग्र अभिव्यक्ति, अचूक दृष्टि और पक्षधरता से पुष्ट कविता कुमार अंबुज की अपनी उपलब्धि है, जिसे यहाँ समूची हिन्दी कविता के सन्दर्भ में कुछ अधिक शक्ति के साथ औचक, विस्मयकारी, दुर्लभ, हार्दिक और नव्यतर भंगिमाओं के साथ देखा जा सकता है। किंचित् लम्बे अन्तराल और प्रतीक्षा के बाद प्रकाशित यह संग्रह निश्चय ही नई बहसों, रुझानों, प्रस्थानों और चुनौतियों का कारण बनेगा।
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