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Author:
Firaq Gorakhpuri, Firak Gorakhpuri, Jafar RazaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
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‘आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हम-असरो जब ये ध्यान आएगा उनको, तुमने ‘फ़िराक़’ को देखा था।’ ‘फ़िराक़’ की शायरी इस धरती की सोंधी-सुगन्ध, नदियों की मदमाती चाल, हवाओं की नशे में डूबी मस्ती में ढूँढ़ी जा सकती है। ‘फ़िराक़’ प्रायः कहा करते थे कि कलाकार का मात्र भारतवासी होना पर्याप्त नहीं है, वरन् उसके भीतर भारत को निवास करना चाहिए। भारत की शायरी की पहचान भारतीयता से होनी चाहिए। भारतीयता का एक विशिष्ट काव्य प्रतिमान है। ‘फ़िराक़’ की शायरी ने जीवन पर अमृत वर्षा कर दी और उसे ऐसा मधुर संगीत प्रदान किया, जिससे देवताओं के पवित्र नेत्र भीग जाएँ। ‘फ़िराक़’ की शायरी जीवन के लिए पाकीज़ा दुआ बन गई। 'फ़िराक़' ने उर्दू शायरी को एक बिलकुल नया आशिक़ दिया है और उसी तरह बिलकुल नया माशूक़ भी। इस नए आशिक़ की एक बड़ी स्पष्ट विशेषता यह है कि इसके भीतर एक ऐसी गम्भीरता पाई जाती है जो उर्दू शायरी में पहले नज़र नहीं आती थी। ‘फ़िराक़’ के काव्य में मानवता की वही आधारभूमि है और उसी स्तर की है जैसे ‘मीर’ के यहाँ उनके काव्य में ऐसी तीव्र प्रबुद्धता है, जो उर्दू के किसी शायर से दब के नहीं रहती। अतएव, उनके आशिक़ में एक तरफ़ तो आत्मनिष्ठ मानव की गम्भीरता है, दूसरी तरफ़ प्रबुद्ध मानव की गरिमा है।
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‘आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हम-असरो
जब ये ध्यान आएगा उनको, तुमने ‘फ़िराक़’ को देखा था।’
‘फ़िराक़’ की शायरी इस धरती की सोंधी-सुगन्ध, नदियों की मदमाती चाल, हवाओं की नशे में डूबी मस्ती में ढूँढ़ी जा सकती है। ‘फ़िराक़’ प्रायः कहा करते थे कि कलाकार का मात्र भारतवासी होना पर्याप्त नहीं है, वरन् उसके भीतर भारत को निवास करना चाहिए।
भारत की शायरी की पहचान भारतीयता से होनी चाहिए। भारतीयता का एक विशिष्ट काव्य प्रतिमान है।
‘फ़िराक़’ की शायरी ने जीवन पर अमृत वर्षा कर दी और उसे ऐसा मधुर संगीत प्रदान किया, जिससे देवताओं के पवित्र नेत्र भीग जाएँ। ‘फ़िराक़’ की शायरी जीवन के लिए पाकीज़ा दुआ बन गई।
'फ़िराक़' ने उर्दू शायरी को एक बिलकुल नया आशिक़ दिया है और उसी तरह बिलकुल नया माशूक़ भी। इस नए आशिक़ की एक बड़ी स्पष्ट विशेषता यह है कि इसके भीतर एक ऐसी गम्भीरता पाई जाती है जो उर्दू शायरी में पहले नज़र नहीं आती थी।
‘फ़िराक़’ के काव्य में मानवता की वही आधारभूमि है और उसी स्तर की है जैसे ‘मीर’ के यहाँ उनके काव्य में ऐसी तीव्र प्रबुद्धता है, जो उर्दू के किसी शायर से दब के नहीं रहती। अतएव, उनके आशिक़ में एक तरफ़ तो आत्मनिष्ठ मानव की गम्भीरता है, दूसरी तरफ़ प्रबुद्ध मानव की गरिमा है।
Book Details
-
ISBN9788180319938
-
Pages280
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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आदिवासी जनी (स्त्री) मन का धरातल बिलकुल दूसरी तरह का है। आदिवासियत के दर्शन पर खड़ा। समभाव जिसकी मूल प्रकृति है। प्राकृतिक विभेद के अलावा जहाँ इनसान अथवा सत्ता द्वारा कृत्रिम रूप से थोपा हुआ कोई दूसरा भेद नहीं है। हालाँकि कुछ बन्दिशें हैं, परन्तु सामन्ती क्रूरता और धार्मिक आडम्बरों के क़िले में आदिवासी स्त्री बिलकुल क़ैद नहीं है। ‘कवि मन जनी मन’ संकलन में वृहत्तर झारखंड के आदिवासी समुदायों की स्त्री-रचनाकारों की कविताएँ शामिल हैं। कवियों में से एक या दो को छोड़कर प्राय: सभी अपनी-अपनी आदिवासी मातृभाषाओं में लिखती हैं। परन्तु संकलन में शामिल कविताएँ मूल रूप से हिन्दी में रची गई हैं। कुछ का हिन्दी अनुवाद है जिसे कवयित्रियों ने स्वयं किया है। हिन्दी में आदिवासी स्त्री-कविताओं का मूल या अनुवाद लाना इसलिए ज़रूरी लगा कि यह समझ बिलकुल साफ़ हो जाए कि नसों में दौड़नेवाला लहू चाहे कितनी पीढ़ियों का सफ़र तय कर ले, अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ता। यानी रचने का, गढ़ने का और बचाने का स्वभाव। अपने लिए ही नहीं बल्कि सबके लिए सम्पूर्ण समष्टि की चिन्ता का स्वभाव। पहाड़ी नदी की तरह चंचल, पोखरे की तरह गम्भीर, घर के बीचोंबीच खड़ा मज़बूत स्तम्भ या कि आर्थिक-सांस्कृतिक पौष्टिकता लिये महुआ-सी महिलाएँ अपने समुदाय की रीढ़ हैं। ठीक वैसे ही उनका लेखन है। वे अपनी कविताओं से विमर्श करती हैं। उनके विमर्श में वर्चस्व की आक्रामकता नहीं बचाव के युद्धगीत हैं। और है रचने का दुर्दम्य आग्रह जिसका सबूत यह संकलन है।
Ek Charwahe Ka Geet
- Author Name:
Ketan Yadav
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वे न मनु थे न आदम/ग्रन्थों की गढ़ी हुई छवियों के बाहर/वे केवल और केवल चरवाहे थे। यह एक चरवाहे का गीत है जो सभ्यता के समानान्तर बजते हुए एक अपनी दुनिया का दावा पेश कर रहा है—उस सभ्यता के बरक्स जिसमें चारागाह दफ़्न होते जा रहे हैं। यह सभ्यता की आलोचना नहीं बल्कि प्रकृति के साहचर्य में जीती उस दुनिया का स्मरण है जो अगर अपने ही रास्ते आगे बढ़ती तो वैसी न होती जैसी आज हमारी यह दुनिया है। इन कविताओं को पढ़ते हुए अग्रगामिता की किसी वैकल्पिक सरणि का अभाव हमें लगातार विचलित करता है। हिंसा के नवीनतम दृश्यों की आदी होती आँखें जो कुछ भी देखने की तैयारी कर चुकी हैं, हमारे वर्तमान की आँखें हैं, जिनके लिए अद्यतित होने का अर्थ है और अधिक संवेदनशून्य होना, और भी भीषण को पचा लेने को प्रस्तुत रहना। ये कविताएँ इस प्रक्रिया को अलग-अलग कोणों से देखती हैं, और कहीं अपनी सावधानी को ढीला नहीं होने देतीं। तकनीक के आधुनिक युवा संसार की सत्ता को लेकर भी ये कविताएँ कम सजग नहीं हैं— मेरे मनुष्य के सामने तुमसे बड़ी चुनौतियाँ हैं, पुरखा कवियो!/यहाँ मनुष्य बनाम मनुष्य नहीं, मशीन है। ऐन्द्रीय स्पर्श के दिन-ब-दिन संकीर्ण और सपाट होते जाने के मुकाबले प्रेम यहाँ एक उम्मीद की तरह आता है, लेकिन क्या वह भी हमारी पहुँच में है, मशीनों की इस्पाती निस्पन्द धवल चौंध को चीरकर क्या उस तक हमारा वह आर्त स्वर पहुँच पाता है जिसके सामने ‘कभी सूर्योदय न होनेवाली रात’ किसी भी दिन आ खड़ी होगी! आशंका जो मौजूदा समय की निर्मिति के अभिन्न हिस्से के रूप में हमारे चारों ओर उपस्थित है, इन कविताओं में बार-बार लौटती है। यह इस युवा कवि की सूक्ष्म संवेदना का प्रमाण है और सामाजिक-राजनीतिक बोध का भी जिसका एक सिरा जरूरी तौर पर तकनीक के आतंक से जा जुड़ता है जो अब मनुष्य को सामने से नहीं, ऊपर से देख रही है—देवता की तरह। पेड़ों, पशुओं और पत्तियों की भाषा से लेकर मशीनों की चीख तक को सुनतीं ये कविताएँ पाठक को निःसन्देह एक भिन्न धरातल पर ले जाएँगी।
Sarkti Parchhaiyan
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
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Main Jab Tak Aayi Bahar
- Author Name:
Gagan Gill
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‘मैं क्यों कहूँगी तुम से/अब और नहीं/सहा जाता/मेरे ईश्वर’—गगन गिल की ये काव्य-पंक्तियाँ किसी निजी पीड़ा की ही अभिव्यक्ति हैं या हमारे समय के दर्द का अहसास भी? और जब यह पीड़ा अपने पाठक को संवेदित करने लगती है तो क्या वह अभिव्यक्ति प्रकारान्तर से प्रतिरोध की ऐसी कविता नहीं हो जाती, जिसमें ‘दर्दे-तनहा’ और ‘ग़मे-ज़माना’ का कथित भेद मिटकर ‘दर्दे-इनसान’ हो जाता है? कविता इसी तरह इतिहास अर्थात समय का काव्यान्तरण सम्भव करने की ओर उन्मुख होती है। गगन गिल की इन आत्मपरक-सी लगती कविताओं के वैशिष्ट्य को पहचानने के लिए मुक्तिबोध के इस कथन का स्मरण करना उपयोगी हो सकता है कि कविता के सन्दर्भ ‘काव्य में व्यक्त भाव या भावना के भीतर से भी दीपित और ज्योतित’ होते हैं, उनका स्थूल संकेत या भाव-प्रसंगों अथवा वस्तु-तथ्यों का विवरण आवश्यक नहीं है। इन कविताओं का अनूठापन इस बात में है कि वे एक ऐसी भाषा की खोज करती हैं, जिसमें सतह पर दिखता हल्का-सा स्पन्दन अपने भीतर के सारे तनावों-दबावों को समेटे होता है—बाँध पर एकत्रित जलराशि की तरह। यह भी कह सकते हैं कि ये कविताएँ प्रार्थना के नये-से शिल्प में प्रतिरोध की कविताएँ हैं—प्रतिरोध उस हर सत्ता-रूप के सम्मुख जो मानवत्व मात्र पर, स्त्रीत्व पर भी, आघात करता है। इन आघातों का दर्द अपने एकान्त में सहने पर ही कवि-मन पहचान पाता है कि ‘मैं जब तक आयी बाहर एकान्त से अपने/बदल चुका था मर्म भाषा का’। ये कविताएँ काव्य-भाषा को उसकी मार्मिकता लौटाने की कोशिश कही जा सकती हैं। —नन्दकिशोर आचार्य
Dhoop Ka Tukda
- Author Name:
Amrita Preetam +1
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अमृता प्रीतम की कविताओं में रमना, हृदय में कसकती व्यथा का घाव लेकर, प्रेम और सौन्दर्य की धूपछाँह-वीथी में विचरने के समान है, जहाँ वियोग तथा अतृप्ति के तीखे नुकीले काँटे भावना के सुकुमार चरणों को क्षत-विक्षत करते रहते हैं । ऐसी गहरी, दर्द में डूबी, प्राणिक संवेदनाओं के गीत कम ही देखने को मिलते हैं। अमृताजी धरती के जीवन के गीत भी गाती हैं । वह युग-संघर्ष के प्रति प्रबुद्ध होने के कारण प्रगतिशील भावधारा से प्रेरित हैं, किन्तु प्रेम के प्रति एकाग्र समर्पण ही उनकी जीवन-साधना तथा आत्म-विकास का एकान्त पथ है। अमृताजी की कविताओं के अनुवाद से हिन्दी काव्य भाव-धनी, स्वप्न-संस्कृत तथा शिल्प-समृद्ध बनेगा। इन कविताओं से यह सहज ही प्रमाणित हो जाता है कि अमृताजी का स्थान पंजाबी ही नहीं, समस्त भारतीय भाषाओं में भी प्रथम श्रेणी के योग्य है । इस संग्रह से हिन्दी के नये कवियों को विशेष प्रेरणा मिलेगी। जिस गहरी भाव-संवेदना, सामाजिक यथार्थ तथा युग मानव की व्यथा का सच्चा चित्रण अमृताजी ने अपनी नारी-हृदय की जादू-तूली से इन कविताओं में किया है, वह उनकी कृति को एक अत्यन्त उच्च तथा व्यापक स्तर पर उठा देती है। —सुमित्रानन्दन पंत
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