Yugpurush Jaiprakash Narayan
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जनक्रांति झुग्गियों से न हो जब तलक शुरू, इस मुल्क पर उधार है इक बूढ़ा आदमी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के क्रांतिकारी व्यक्तित्व की झलक देतीं सूर्यभानु गुप्त की उपरोक्त पंक्तियाँ बतलाती हैं कि आम जन में परिवर्तन के सपने को जयप्रकाश नारायण ने कैसे रूपाकार दिया था। युगपुरुष जयप्रकाश में प्रसिद्ध कवि, संपादक उमाशंकर वर्मा ने हिंदी के ऐसे सैकड़ों कवियों की कविताएँ संकलित की हैं, जिन्होंने जयप्रकाश के क्रांतिकारी उद्घोष को सुना और उससे उद्वेलित हुए। भगीरथ, दधीचि, भीष्म, सुकरात, चंद्रगुप्त, गांधी, लेनिन और न जाने कैसे-कैसे संबोधन जे.पी. को दिए कवियों ने। उन्हें याद करते हुए आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने सही कहा कि ‘इस देश की संस्कृति का जो कुछ भी उत्तम और वरेण्य है, वह उनके व्यक्तित्व में प्रतिफलित हुआ है।’ आरसी प्रसाद सिंह, इंदु जैन, उमाकांत मालवीय, कलक्टर सिंह केसरी, जगदीश गुप्त, जानकी वल्लभ शास्त्री, धर्मवीर भारती, पोद्दार रामावतार अरुण, बालकवि बैरागी, बुद्धिनाथ मिश्र, रामधारी सिंह दिनकर, कुमार विमल, नीरज आदि प्रसिद्ध कवियों-गीतकारों सहित सैकड़ों रचनाकारों की लोकनायक के प्रति काव्यांजलि को आप यहाँ पढ़ सकते हैं। —कुमार मुकुल
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जनक्रांति झुग्गियों से न हो जब तलक शुरू,
इस मुल्क पर उधार है इक बूढ़ा आदमी।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण के क्रांतिकारी व्यक्तित्व की झलक देतीं सूर्यभानु गुप्त की उपरोक्त पंक्तियाँ बतलाती हैं कि आम जन में परिवर्तन के सपने को जयप्रकाश नारायण ने कैसे रूपाकार दिया था। युगपुरुष जयप्रकाश में प्रसिद्ध कवि, संपादक उमाशंकर वर्मा ने हिंदी के ऐसे सैकड़ों कवियों की कविताएँ संकलित की हैं, जिन्होंने जयप्रकाश के क्रांतिकारी उद्घोष को सुना और उससे उद्वेलित हुए।
भगीरथ, दधीचि, भीष्म, सुकरात, चंद्रगुप्त, गांधी, लेनिन और न जाने कैसे-कैसे संबोधन जे.पी. को दिए कवियों ने। उन्हें याद करते हुए आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने सही कहा कि ‘इस देश की संस्कृति का जो कुछ भी उत्तम और वरेण्य है, वह उनके व्यक्तित्व में प्रतिफलित हुआ है।’
आरसी प्रसाद सिंह, इंदु जैन, उमाकांत मालवीय, कलक्टर सिंह केसरी, जगदीश गुप्त, जानकी वल्लभ शास्त्री, धर्मवीर भारती, पोद्दार रामावतार अरुण, बालकवि बैरागी, बुद्धिनाथ मिश्र, रामधारी सिंह दिनकर, कुमार विमल, नीरज आदि प्रसिद्ध कवियों-गीतकारों सहित सैकड़ों रचनाकारों की लोकनायक के प्रति काव्यांजलि को आप यहाँ पढ़ सकते हैं।
—कुमार मुकुल
Book Details
-
ISBN9789355215499
-
Pages224
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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यह संग्रह एक विशेष अर्थ में कवि की यात्रा के अगले दौर की पूर्वसूचना भी देता है। पहले की अपेक्षा इन कविताओं में तमाम मानवीय कार्यव्यापारों की अर्थ-छवियाँ अधिक विस्तृत भूमि पर फैली हैं और कवि का सम्बन्ध ठोस वस्तुगत संसार से प्रगाढ़तर है। अपने को निरन्तरता में नया करते जानेवाले अपनी रचना-प्रक्रिया के प्रति सजग और आत्मचेता इस कलाकार के “नागर मन की भावप्रवणता, सूक्ष्मदर्शिता और तटस्थ निर्ममता अब नए परिचय की मोहताज नहीं। सहज सौन्दर्य और सूक्ष्म अनुभूति से निर्मित रघुवीर सहाय का काव्य-संसार जितना निजी है उतना ही हम सबका है—एक गहरे और अराजनैतिक अर्थ में जनवादी। भीड़ से घिरा एक व्यक्ति जो भीड़ बनने से इनकार करता है और उससे भाग जाने को ग़लत समझता है, रघुवीर सहाय का साहित्यिक व्यक्तित्व है।’’
—भारतभूषण अग्रवाल की यह टिप्पणी आज भी उल्लेखनीय है।
जहाँ तक कवि का प्रश्न है, वह मानता है कि उसे यह जानने से शक्ति नहीं मिलती कि उसने अपने को कहाँ जोड़ा है। उसका सर्जनात्मक सुख यह जानने में है कि उसने अपने को कहाँ तोड़कर एक नई बस्ती बसाई है और कमोबेश वह यह भी दिखा सके कि वह नई सृष्टि उसकी पुरानी बस्ती को उजाड़कर बनी है तो क्या कहने।
Raja Ayogya Hai Tatha Anya Kavitayen
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Madhulika Ben Patel
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Description:
राजा अयोग्य है तथा अन्य कविताएँ' भारतीय समाज का आईना है। कविता संग्रह की शुरुआत 'आईना' से होती है। आगे की कविताएँ भारतीय समाज में व्याप्त अविश्वास, भुखमरी, गरीबी, धोखा, बेरोजगारी, किसानों की बदहाली, लोकतंत्र की दुर्दशा, शासक की नियति, औरतों के साथ छल, पुरुषों की नियति, पारिवारिक संबंधों की प्रगाढ़ता, माँ की ममता, स्त्री की सहृदयता को दिखाने का मुकम्मल आईना बनती हैं। इस कविता संग्रह की कविताओं को पढ़ने पर भारतीय समाज और भारतीय मन का चित्र स्वतः उभरकर सामने आ जाता है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह कविता संग्रह पाठकों के हृदय में अपना मुकम्मल स्थान जरूर बनायेगा।
प्रो. बिपिन कुमार हिन्दी विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
Udhav Satak
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Jagannath Das Ratnakar
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Sansad Se Sarak Tak
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Sudama Pandey Dhoomil
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- Description: धूमिल मात्र अनुभूति के नहीं, विचार के भी कवि हैं। उनके यहाँ अनुभूतिपरकता और विचारशीलता, इतिहास और समझ, एक-दूसरे से घुले-मिले हैं और उनकी कविता केवल भावात्मक स्तर पर नहीं बल्कि बौद्धिक स्तर पर भी सक्रिय होती है। धूमिल ऐसे युवा कवि हैं जो उत्तरदायी ढंग से अपनी भाषा और फ़ार्म को संयोजित करते हैं। धूमिल की दायित्व-भावना का एक और पक्ष उनका स्त्री की भयावह लेकिन समकालीन रूढि़ से मुक्त रहना है। मसलन, स्त्री को लेकर लिखी गई उनकी कविता ‘उस औरत की बग़ल में लेटकर’ में किसी तरह का आत्मप्रदर्शन, जो इस ढंग से युवा कविताओं की लगभग एकमात्र चारित्रिक विशेषता है, नहीं है बल्कि एक ठोस मानव स्थिति की जटिल गहराइयों में खोज और टटोल है जिसमें दिखाऊ आत्महीनता के बजाय अपनी ऐसी पहचान है जिसे आत्म-साक्षात्कार कहा जा सकता है। उत्तरदायी होने के साथ धूमिल में गहरा आत्मविश्वास भी है जो रचनात्मक उत्तेजना और समझ के घुले-मिले रहने से आता है और जिसके रहते वे रचनात्मक सामग्री का स्फूर्त लेकिन सार्थक नियंत्रण कर पाते हैं। यह आत्मविश्वास उन अछूते विषयों के चुनाव में भी प्रकट होता है जो धूमिल अपनी कविताओं के लिए चुनते हैं। ‘मोचीराम’, ‘राजकमल चौधरी के लिए’, ‘अकाल-दर्शन’, ‘गाँव’, ‘प्रौढ़ शिक्षा’ आदि कविताएँ, जैसा कि शीर्षकों से भी आभास मिलता है, युवा कविता के सन्दर्भ में एकदम ताज़ा बल्कि कभी-कभी तो अप्रत्याशित भी लगती हैं। इन विषयों में धूमिल जो काव्य-संसार बसाते हैं, वह हाशिए की दुनिया नहीं, बीच की दुनिया है। यह दुनिया जीवित और पहचाने जा सकनेवाले समकालीन मानव-चरित्रों की दुनिया है जो अपने ठोस रूप-रंगों और अपने चारित्रिक मुहावरों में धूमिल के यहाँ उजागर होती है।
Avyakt
- Author Name:
Navin Mishra
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Description:
अभिव्यक्ति किसी भी कला को और उसकी ज़्यादातर आपूर्ति उसके स्वयं के परिवेश की परिकल्पना से होती है। जो भी व्यक्ति के साथ होता है, उन सभी अनुभवों को कमोबेश क्रम से प्रस्तुत करता है और वह साहित्य हो जाता है।
कई बार स्वयं को लगता है कि क्या यह सचमुच मैंने लिखा है? एक मोड़ पर आकर वह दैवीय शक्ति से अनुगृहीत हो जाता है। मैंने स्वयं लिखा है कि कविता किसी सुदूर तारागणों के पास से उन्हीं की धूल से अटी धरती तक पहुँचती है, फिर वह मुझमें बस जाती है, कविता मेरी हो जाती है—बस कविता हो जाती है।
मेरा योगदान सिर्फ़ इतना है कि मैंने ईमानदारी से उन क्षणों का, उन सम्बन्धों का चित्रण किया। वही लिखा जो सत्य था, जो पवित्र था और जो लेशमात्र भी कृत्रिम न था।
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