Shoonya Ki Jheel Mein Prem
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‘शून्य की झील में प्रेम’ में लौकिक प्रेम को अलौकिक प्रेम में परिवर्तित होते हुए देखना सुखद अनुभूति है। प्रेम जिसकी महिमा आदिकाल से आराध्य देवताओं से लेकर साधारण मनुष्य तक व्याप्त है जिसने भी इस धरती पर जन्म लिया और जब तक जीवित रहा।-ख़ुदेजा ख़ान मयंक मुरारी का नवीनतम कविता-संग्रह ‘शून्य की झील में प्रेम’ विश्व के प्रेम साहित्य को नए अरमानों से सुसज्जित करने का सुपर्ण सुयत्न है जिसके महत्त्व पर ख़ुदेजा ख़ान और स्वयं कवि ने यथेष्ट प्रकाश डाला है। कुछ आरम्भिक उद्धरण इसे पूर्णता प्रदान करते हैं। इसमें मेरे जैसे पाठक के लिए कुछ भी जोड़ पाना असम्भव है। यह प्रेम का मधु है जो मौन की अपेक्षा करता है। मयंक जी सिद्धहस्त एकान्त निस्पृह साधक हैं जिनका कवि-कर्म किसी तारीफ का मोहताज नहीं। उन्होंने इन टुकड़ों में अपना हृदय-रस उड़ेल दिया है जो समस्त भारतीय मानस को रसाप्लावित करेगा। शून्य की झील इश्क और अध्यात्म के सामासिक ऐश्वर्य को इंगित करने वाला प्रतीक बन मयंक मुरारी की काव्य-साधना का महत्तम राग बन जाती है। इसी के साथ वे न केवल हिन्दी बल्कि सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप के उन सारस्वत कवियों के शिरोमणि बनने की ओर अग्रसर हैं जो इश्क़ के रूहानी और डिवाइन तत्वों का प्रतिनिधित्व करने की सामर्थ्य रखते हैं। प्रत्येक टुकड़े की शिरोरेखा की भाँति प्रदत्त गद्य मुखड़े पूरी पुस्तक को नई रश्मियों से आलोकित करते हैं। यह पुस्तक सहृदय पाठकों का हृदय हार बने, यही कामना है। अस्तु। अरुण कमल
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‘शून्य की झील में प्रेम’ में लौकिक प्रेम को अलौकिक प्रेम में परिवर्तित होते हुए देखना सुखद अनुभूति है। प्रेम जिसकी महिमा आदिकाल से आराध्य देवताओं से लेकर साधारण मनुष्य तक व्याप्त है जिसने भी इस धरती पर जन्म लिया और जब तक जीवित रहा।-ख़ुदेजा ख़ान
मयंक मुरारी का नवीनतम कविता-संग्रह ‘शून्य की झील में प्रेम’ विश्व के प्रेम साहित्य को नए अरमानों से सुसज्जित करने का सुपर्ण सुयत्न है जिसके महत्त्व पर ख़ुदेजा ख़ान और स्वयं कवि ने यथेष्ट प्रकाश डाला है। कुछ आरम्भिक उद्धरण इसे पूर्णता प्रदान करते हैं। इसमें मेरे जैसे पाठक के लिए कुछ भी जोड़ पाना असम्भव है। यह प्रेम का मधु है जो मौन की अपेक्षा करता है। मयंक जी सिद्धहस्त एकान्त निस्पृह साधक हैं जिनका कवि-कर्म किसी तारीफ का मोहताज नहीं। उन्होंने इन टुकड़ों में अपना हृदय-रस उड़ेल दिया है जो समस्त भारतीय मानस को रसाप्लावित करेगा। शून्य की झील इश्क और अध्यात्म के सामासिक ऐश्वर्य को इंगित करने वाला प्रतीक बन मयंक मुरारी की काव्य-साधना का महत्तम राग बन जाती है। इसी के साथ वे न केवल हिन्दी बल्कि सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप के उन सारस्वत कवियों के शिरोमणि बनने की ओर अग्रसर हैं जो इश्क़ के रूहानी और डिवाइन तत्वों का प्रतिनिधित्व करने की सामर्थ्य रखते हैं। प्रत्येक टुकड़े की शिरोरेखा की भाँति प्रदत्त गद्य मुखड़े पूरी पुस्तक को नई रश्मियों से आलोकित करते हैं। यह पुस्तक सहृदय पाठकों का हृदय हार बने, यही कामना है। अस्तु।
अरुण कमल
Book Details
-
ISBN9789360863906
-
Pages216
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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दिनकर जी सचमुच ही अपने समय के सूर्य की तरह तपे। मैंने स्वयं उस सूर्य का मध्याह्न भी देखा है और अस्ताचल भी। वे सौन्दर्य के उपासक और प्रेम के पुजारी भी थे। उन्होंने ‘संस्कृति के चार अध्याय' नामक विशाल ग्रन्थ लिखा है, जिसे पं. जवाहरलाल नेहरू ने उसकी भूमिका लिखकर गौरवान्वित किया था। दिनकर बीसवीं शताब्दी के मध्य की एक तेजस्वी विभूति थे।
—नामवर सिंह
उनकी राष्ट्रीय चेतना और व्यापक सांस्कृतिक दृष्टि, उनकी वाणी का ओज और काव्यभाषा के तत्त्वों पर बल, उनका सात्त्विक मूल्यों का आग्रह उन्हें पारम्परिक रीति से जोड़े रखता है।
—अज्ञेय
Sukanya
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Kya Koi Pankti Doobegi Khoon Mein
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चम्बल के नज़दीक स्थित शहर ग्वालियर में जनमे और बचपन तथा कैशोर्य में उसके आसपास के जंगलों में पले-बढ़े नरेश सक्सेना की कविता में इस इलाक़े के अवाम की स्वाभाविक विशेषताएँ—सरलता, सचाई, प्यार, बग़ावत और करुणा—छलछलाती हैं।
लगभग सात दशक पहले रचना-यात्रा शुरू करने के कुछ ही समय बाद नरेश सक्सेना ने कुछ अनूठे गीत भी लिखे और ग़ौरतलब है कि उनकी कोमलता, प्रवाह और मर्मस्पर्शिता को ज़रा बदले हुए विन्यास में अपनी कविताओं में भी अक्षुण्ण रखा। सुदीर्घ रचनात्मक जीवन के लिहाज़ से उन्होंने कम लिखा, मगर जो भी लिखा, वह अपने प्रभाव में अनुपम और अप्रत्याशित है। उसकी गहनता असंदिग्ध है, इसीलिए व्यापकता भी।
बाँसुरी वादन में नरेश जी की प्रवीणता के चलते उनकी सर्वश्रेष्ठ कविताओं में भी कुछ वैसी ही कशिश, मार्मिकता और सम्मोहन है। जो संगीत का सच है, वही उनकी कविता का। इस मानी में नरेश सक्सेना के सम्पूर्ण अवदान के उत्कृष्टतम को सामने लाने वाली ये शताधिक चयनित कविताएँ मनुष्य, मनुष्येतर जीव-सृष्टि और प्रकृति से वाबस्ता उनके प्यार, पीड़ा और युयुत्सा की अविस्मरणीय रचनात्मक साक्ष्य हैं।
Raag Virag
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Suryakant Tripathi 'Nirala'
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...यह उन कविताओं का संग्रह है जिनमें जितना आनन्द का अमृत है, उतना ही वेदना का विष। कवि चाहे अमृत दे, चाहे विष, इनके स्रोत इसी धरती में हों तो उसकी कविता अमर है।
...जैसे ‘उड़ि जहाज को पंछी फिरि जहाज पर आवै’, निराला की कविता आकाश में चक्कर काटने के बाद इसी धरती पर लौट आती है।
...निराला की कल्पना धरती के भीतर पैठकर वनबेला की सुगन्ध के साथ ऊपर उठती है।
...इस धरती के सौन्दर्य से निराला का मन बहुत दृढ़ता से बँधा हुआ है। आकाश में उड़नेवाले रोमांटिक कवियों और धरती के कवि निराला में यही अन्तर है।
...नारी के सौन्दर्य के बिना बसन्त का उल्लास अधूरा है। निराला की शृंगारी रचनाएँ देखकर विरोधी आलोचक कहते थे—ये कैसे छायावादी कवि हैं, जो अपने को ही रहस्यवादी कहते हैं और नारी सौन्दर्य के गीत भी गाते हैं।
...निराला ने गतकर्म सरोज को अर्पित कर दिए, फिर नया कर्म आरम्भ किया, उन्होंने ‘राम की शक्ति-पूजा' लिखी। ‘सरोज-स्मृति’ से निराला का आधा दु:ख सरोज की मृत्यु के कारण है, आधा उनके अपने संघर्षों के कारण।
...वह दु:ख की कथा सरोज के जन्म से पहले शुरू हुई थी और सरोज की मृत्यु के बाद बहुत दिन तक चलती रही। उसी की एक कड़ी है ‘राम की शक्ति-पूजा'।
...यह संग्रह निराला के सुदीर्घ कवि जीवन की सार्थकता का भी प्रमाण है।
—रामविलास शर्मा (इसी संग्रह से)
Chidiya Laut Aai Hai
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Pratap Rao Kadam
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मुनिश्री क्षमासागर हमारे समय के एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कवि हैं, एक अद्वितीय कवि। यह तथ्य उनके प्रत्येक काव्य-संग्रह के साथ और पुष्ट और गहरा होता गया। मुनिश्री की कविताएँ जितना बाहर की यात्रा कराती हैं, उससे कहीं अधिक भीतर अपनी पड़ताल करती हैं। संवेदना के दायरे में आई हर वस्तु असाधारण काव्यात्मक गरिमा से भर उठती है। वस्तुओं की वस्तुमयता और जीवों के जैविक गुण और क्रियाकलापों की स्वाभाविकता बनाए रख, उसे अपनी दृष्टि से इतना ट्रांसपेरेंट और व्यापक बना देते हैं कि हमें हमारी गाँठें स्वत: दिखाई पड़ने लगती हैं—‘वाह रे हम/अपनी प्यास/अपने लालच/और अपने दीवानेपन पर/हमें अपने से/कुछ नहीं कहना।’
जीवन और जगत् के प्रति उनकी सजग, सतर्क, संवेदनशील दृष्टि समूचे काव्य-जगत से झाँकती है। जड़ता हमारे समाज को चारों तरफ़ से घेर रही है, ऐसे में मानवीय संवेदना को जीवित और सुरक्षित रखना कवि की प्राथमिकता है—‘सवाल यह नहीं है/कि किसे कम मिला/और किसके हिस्से में/ज़्यादा आया है/मेरी पीड़ा/अपने ही/बँट जाने की है।’
मुनि क्षमासागर जी की कविताओं को तीन भागों में बाँटा जा सकता है। एक वह, जिसके केन्द्र में प्रकृति है। दूसरा वह, जिसमें इहलोक झाँकता है और कर्म के लिए प्रेरित करता है। तीसरा वह, जिसमें अमूर्त व गूढ़ विषयों पर महत्त्वपूर्ण कविताएँ हैं। बहुत सारे अवरोध तो उसके अपने ही हाथों खड़े किए गए हैं। चिड़िया भीग जाती है, नदी भर जाती है, धरती गीली हो जाती है, पर वह न भीग पाता है, न भर पाता है, न गीला हो पाता है। बचने की जुगत में रीता ही रह जाता है। भीगना, भरना, गीला होना व्यापक सन्दर्भ खोलते हैं। प्रकृति से यह दूरी उसे अधूरा ही रखती है—‘पर बहुत मुश्किल है/इस तरह/आदमी का/भीगना और/भर जाना/आदमी के पास/बचने के/उपाय हैं न।’
इन कविताओं में आकाश शामिल होता है चिड़िया की उड़ान में। चिड़िया की, घर पहुँचने की दृढ़ता को असीम सखा भाव से सहलाता है। प्रकृति से बड़ा कोई कलाकार नहीं और न ही प्रकृति से बड़ा कोई शिक्षक, सखा। प्रकृति न कोई भेदभाव करती है, न जाति-बिरादरी के आधार पर बँटवारा। कठघरे, घेरे तो हमारे अपने बनाए हैं—‘आकाश सबका/ दीवारें हमारी अपनी/नदी सबकी/गागर हमारी अपनी/धरती सबकी/आँगन हमारा अपना/बिराट सबका/सीमाएँ हमारी अपनी।’
मुनि क्षमासागर जी की कविताओं से गुज़रकर चीज़ें वह नहीं रहतीं जो पूर्व में थीं। उन्हें देखने का नज़रिया अलहदा हो जाता है। इन कविताओं में ‘घर’ रह-रहकर आता है और घर एक समाधान, दिशा, दृष्टि की तरह आता है। वह दृष्टि, जो ‘मेरे घर’ को ‘अपना घर’ बनाती है—‘तुम मेरे घर/नहीं आती/अपने घर आती हो/पर अपने घर/आने के लिए/तुम्हारा मेरे घर आना/मुझे अच्छा लगता है/सचमुच/तुम्हारे घर ने/मेरे घर को/अपना घर बना दिया है।’ वहीं घर-1 व घर-2 कविताओं में घर भिन्न तरह से आता है, जहाँ ‘अपना घर’ कविता में सबके लिए गुंजाइश है। वह मेरे घर से अपना घर बनता है। पर यहाँ बड़ा घर होता है। अतीत, अनागत, वर्तमान के बावजूद। घर—1 कविता यही कहती है—‘चिड़ियों के लिए/और शायद/हम सभी के लिए/अतीत/अनागत/और वर्तमान का/इतना ही अर्थ है/कि हमें हर बार/रहने के लिए/एक घर बनाना है।’ एक छत की जद्दोजहद तो हमेशा रही है और सम्बन्धों के सगेपन को जीने की चाह भी और जहाँ यह हो, वहाँ तो घर होता ही है। ‘खिड़की’ कविता में व्याप्त घर इसी तरफ़ इशारा करता है।
ये कविताएँ कर्म के लिए उकसाती हैं। होश और जोश दोनों ही स्थितियों में कर्म की सीढ़ी बनाने की बात कहती हैं। इन कविताओं के केन्द्र में मनुष्य है। ये कविताएँ अपने-अपने ख़ुदाओं को बनानेवाले मनुष्य से मनुष्य बनने का आग्रह करती हैं—‘सवाल सिर्फ़/योग्यता का नहीं/हू-ब-हू होने का है/स्वयं को/भगवान मानने/मनवाने का नहीं स्वयं भगवान बन जाने का है/और फिर इस बार/ना सही भगवान/एक बेहतर/इनसान तो बन जाएँ।’
मुनि क्षमासागर जी की कविताएँ, प्रकृति को इतना पारदर्शी बना देती हैं कि उसमें भूत-वर्तमान-भविष्य, सत्ता, नश्वरता, व्यवस्था और जनजीवन के जटिल सम्बन्धों की पहचान आसानी से हो जाती है। ये कविताएँ प्रकृति को इतना अर्थगर्भित और व्यापक बना देती हैं कि इसमें हमारे समय और समाज की आहट अनन्त सम्भावनाएँ उत्पन्न करती हैं। इन कविताओं से गुज़रना प्रकृति, कर्म और घर के नज़दीक होना है। चिड़िया की तरह अपने आकाश, पेड़, नदी, परिवेश को जीना है। कुल मिलाकर अपने नज़दीक आना है, चिड़िया की तरह लौट आना है।
—प्रताप राव कदम
Kammo Matiyarin
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Mukesh Dubey
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Do Sharan
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Suryakant Tripathi 'Nirala'
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निराला की सम्पूर्ण गीत-रचना का एक बहुत बड़ा भाग शरणागति या प्रपत्ति-भाव के गीतों से सम्बद्ध है। भक्ति, प्रार्थना और शरणागति के गीत ‘परिमल’ संग्रह से ही हमें मिलने लगते हैं। इसकी क्षीण ध्वनि उनके पहले संग्रह ‘अनामिका’ की ‘माया’ कविता में हमें सुनाई देती है। ‘या कि ले कर सिद्धि तू आगे खड़ी, त्यागियों के त्याग की आराधना’—कहकर कवि अपनी रचनात्मकता की उस विशेष दिशा की ओर संकेतित करता है, जो आगे चलकर उसके अवसाद, उसकी उदासी, खिन्नता, मृत्यु-भय और आत्म-जर्जरता से होती हुई, अन्ततः शरणागति की प्रार्थना-भूमि पर उसे उतारती है।
‘आराधना’ और ‘अर्चना’ में उसकी संख्या आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है। अकेले ‘अर्चना’ में शरणागति के लगभग 34-35 गीत संगृहीत हैं। ‘गीत-गुंज’ और उनके अन्तिम संग्रह ‘सांध्य काकली’ में भी यह प्रार्थना-क्रम तिरोहित नहीं हुआ है। यद्यपि अपने जीवन के अन्तिम दिनों में निराला ‘प्रार्थना की व्यर्थता’ की बात भी करते हुए दिखाई देते हैं, लेकिन यह उत्कट नैराश्य के क्षणों की ही अभिव्यक्ति लगती है, अन्यथा वे अपनी कारुणिक आत्म-जर्जरता में लगातार ‘प्रभु’ की अमर फ़ैंटेसी में शरण लेते हुए दिखाई देते हैं। उनके सारे संग्रहों को मिलाकर शरणागति और प्रार्थना-क्रम के इन गीतों की संख्या लगभग 90 के आस-पास पहुँचती है। इस तरह निराला के अन्तःसंगीत का एक बहुत महत्त्वपूर्ण भाग ‘प्रभु’ के इसी साक्षात्कार से सम्बद्ध है।
वरिष्ठ लेखक दूधनाथ सिंह ने निराला की प्रपत्ति भाव की कविताओं को संकलित किया है। इन कविताओं में मनुष्य की उस आत्मिक मुक्ति की जद्दोजहद को सहज ही परिलक्षित किया जा सकता है, जो दरअसल सम्पूर्ण मानवमुक्ति का एक महत्त्वपूर्ण और अनिवार्य हिस्सा है।
Gharanedar Gayaki : Hindustani Sangeet Ke Gharane Ki Sulalit Saundarya-Meemansa
- Author Name:
Vamanrao Hari Deshpande
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‘‘मराठी में पहली बार काफ़ी ऊँचे दर्जे का सांगीतिक सैद्धान्तिक निरूपण।’’
—डॉ. अशोक रानडे
‘‘इस ग्रन्थ ने हिन्दुस्तानी संगीत की सैद्धान्तिकी को निश्चित रूप से आगे बढ़ाया है। वामनराव जी का यह कार्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।’’
—डॉ. बी.वी. आठवले
‘‘घरानेदार गायकी’ ग्रन्थ शास्त्रीय संगीत के सौन्दर्यात्मक ढाँचे के यथासम्भव सभी आयामों का सैद्धान्तिक विवेचन करनेवाला मराठी का (और सम्भवत: अन्य भाषाओं में भी) पहला अनुसन्धानात्मक ग्रन्थ होगा।’’
—डॉ. श्रीराम संगोराम
‘‘श्री वामनराव देशपाण्डे का यह अध्ययन मात्र उनके किताबी ज्ञान पर निर्भर नहीं है। इस सम्पूर्ण अध्ययन के पीछे उनकी अनुभूति है। स्वानुभव से उन्होंने अपने विचार निश्चित किए हैं और अत्यन्त प्रासादिक शैली में उन्होंने एक जटिल विषय प्रस्तुत किया है और इसीलिए पठन का आनन्द भी अवश्यमेव प्राप्त होता है।’’
—श्री दत्ता मारूलकर
‘‘भारतीय संगीत परम्परा के कई आयामों की दृष्टि से यह अग्रणी पुस्तक है।’’
—एलिस बर्नेट
‘‘आश्चर्य है कि ‘खयाल’ पर भारत या पश्चिम में बहुत कम सामग्री प्रकाशित हुई है। जो हुई है, उनमें देशपाण्डे की पुस्तक ही प्रमुख है, जो सन् 1973 में अंग्रेज़ी में ‘Indian Musical Traditions’ के नाम से प्रकाशित हुई।’’
–जेम्स किप्पेन
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